रविवार, 25 दिसंबर 2022

मृत्यु का अटल सत्य और उभरता जीवन दर्शन

जीवन की महायात्रा और ये धरती एक सराय

मृत्यु इस जीवन की सबसे बड़ी पहेली है और साथ ही सबसे बड़ा भय भी, चाहे वह अपनी हो या अपने किसी नजदीकी रिश्ते, सम्बन्धी या आत्मीय परिजन की। ऐसा क्यों है, इसके कई कारण हैं। जिसमें प्रमुख है स्वयं को देह तक सीमित मानना, जिस कारण अपनी देह के नाश व इससे जुड़ी पीड़ा की कल्पना से व्यक्ति भयाक्रांत रहता है। फिर अपने निकट सम्बन्धियों, रिश्तों-नातों, मित्रों के बिछुड़ने व खोने की वेदना-पीड़ा, जिनको हम अपने जीवन का आधार बनाए होते हैं व जिनके बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते। और तीसरा सांसारिक इच्छाएं-कामनाएं-वासनाएं-महत्वाकांक्षाएं, जिनके लिए हम दिन-रात को एक कर अपने ख्वावों का महल खड़ा कर रहे होते हैं, जैसे कि हमें इसी धरती पर हर-हमेशा के लिए रहना है और यही हमारा स्थायी घर है।

लेकिन मृत्यु का नाम सुनते ही, इसकी आहट मिलते ही, इसका साक्षात्कार होते हैं, ये तीनों तार, बुने हुए सपने, अरमानों के महल ताश के पत्तों की ढेरी की भाँति पल भर में धड़ाशयी होते दिखते हैं, एक ही झटके में इन पर बिजली गिरने की दुर्घटना का विल्पवी मंजर सामने आ खडा होता है। एक ही पल में सारे सपने चकानाचूर हो जाते हैं व जीवन शून्य पर आकर खड़ा हो जाता है।

जो भी हो, मृत्यु एक अकाट्य सत्य है, देर सबेर सभी को इससे होकर गुजरना है, किसी को पहले तो किसी को बाद में, सबका नम्बर तय है, बल्कि जन्म लेते ही इसकी उल्टी गिनती शुरु हो चुकी होती है। हर दूसरे व्यक्ति के मौत के साथ इसकी सूचना की घण्टी बजती रहती है, लेकिन मन सोचता है कि दूसरों की ही तो मौत हुई है, हम तो जिंदा है और मौत का यह सिलसिला तो चलता रहता है, मेरी मौत में अभी देर है। यह मन की माया का एक विचित्र खेल है। लेकिन हर व्यक्ति की सांसें निर्धारित हैं, यहाँ तक की मृत्यु का स्थान और तरीका भी। हालाँकि यह बात दूसरी है इस सत्य से अधिकाँश लोग अनभिज्ञ ही रहते हैं। केवल त्रिकालदर्शी दिव्य आत्माएं व सिद्ध पुरुष ही इसके यथार्थ से भिज्ञ रहते हैं।

जब कोई पूरी आयु जीकर संसार छोड़ता है, तो उसमें अधिक गम नहीं होता, क्योंकि सभी इसके लिए पर्याप्त रुप से तैयार होते हैं, विदाई ले रही जीवात्मा भी और उसके परिवार व निकट परिजन भी। लेकिन जब कोई समय से पहले इस दुनियाँ को अल्विदा कह जाता है, या काल का क्रूर शिंकंजा उसको हमसे छीन लेता है या कहें भगवान बुला लेता है, तो फिर एक बज्रपात सा अनुभव होता है, एक भूचाल सा आ जाता है, जिसमें शुरु में कुछ अधिक समझ नहीं आता। व्यक्ति अपनी कॉम्मन सेंस के आधार पर स्थिति को संभालता है, परिस्थिति से निपटता है। ऐसे में अपनों का व शुभचिंतकों का सहयोग-सम्बल मलमह का काम करता है। धीरे-धीरे कुछ सप्ताह, माह बाद व्यक्ति इस शोकाकुल अवस्था से स्वयं को बाहर निकलता हुआ पाता है।

इस तरह काल जख्म को भरने की अचूक औषधि सावित होता है। लेकिन जख्म तो जख्म ही ठहरे। कुरेदने पर, यादों के ताजा होने पर यदा-कदा रुह को कचोटने वाली वेदना के रुप में उभरते रहते हैं, जो हर भुगत भोगी के हिस्से में आते हैं। ऐसे स्थिति में भावुक होना स्वाभाविक है, आंसुओं का झरना स्वाभाविक है, ह्दय में भावों का स्फोट स्वाभाविक है। लेकिन रोते-कलपते ही रहा जाए, शोक ही मनाते रहा जाए, तो इसमें भी समाधान नहीं, किसी भी प्रकार तन-मन व आत्मा के लिए यह हितकर नहीं। इस स्थिति से उबरने के लिए हर धर्म, संस्कृति व समाज में ऐसी सामूहिक व्यवस्था रहती है, कि शोक बंट जाता है व परिवार का मन हल्का होता है। सनातन धर्म में इसके निमित तेरह दिन, एक माह या चालीस दिन तथा इससे आगे तक धार्मिक कर्मकाण्डों का सिलसिला चलता रहता है, जिनका शोक निवारण के संदर्भ में अपना महत्व रहता है। हर वर्ष पितृ-पक्ष में श्राद्ध तर्पण का विधान इसी तरह का एक विशिष्ट प्रयोग रहता है।

इनके साथ अपनी शोक-वेदना को सृजनात्मक मोड़ दिया जाता है। इसमें जीवन-मरण, लोक-परलोक व अध्यात्म से जुड़ी पुस्तकों का परायण बहुत सहायक रहता है। इनसे एक तो सांत्वना मिलती है, दूसरा इनके प्रकाश में जीवन के प्रति एक नई अंतर्दृष्टि व समझ विकसित होती है, जो इस शोकाकुल समय को पार करने में बहुत कारगर रहती हैं।

साथ ही समझ आता है, कि धरती अपना असली घर नहीं, असली घर तो आध्यात्मिक जगत है, जहाँ जीवात्मा देह छोड़ने के बाद वास करती है। हालाँकि इस मृत्युलोक और जीवात्मा जगत के बीच यात्रा का सिलसिला चलता रहता है, जब तक कि जीवात्मा मुक्त न हो जाए। इस प्रक्रिया पर थोडा सा भी गहराई से चिंतन व विचार मंथन जाने-अनजाने में ही व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन की गहराइयों में प्रवेश दिला देता है। और इसके साथ जीवन-मरण, लोक-परलोक, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म, कर्मफल सिद्धान्त जैसी बातें गहराई में समझ आने लगती हैं। समझ आता है कि जन्म-मरण का सिलसिला न जाने कितना बार घटित हो चुका है और आगे कितनी बार इससे गुजरा शेष है, जब तक कि कर्मों का हिसाब-किताब पूरा न हो जाए।

समझ आता है कि धरती पर जन्म अपने कर्मों के सुधार के लिए होता है, यह धरती एक प्रशिक्षण केंद्र है, कर्मभोग की भूमि है और साथ ही कर्मयोग भूमि भी, जहाँ एक अच्छे एवं श्रेष्ठ जीवन जीते हुए अपना आत्म परिष्कार करते हुए, जीवात्मा जगत में अपने स्तर को उन्नत करना है। संयम-सदाचार से लेकर सेवा साधना आदि के साथ अपने सद्गुणों का विकास करते हुए जीवात्मा अपने कर्म सुधार कर सकती है तथा इनके अनुरुप जीवात्मा जगत में उच्चतर लोकों में स्थान मिलता है।

इन सबके साथ जीवन-मरण का खेल और मृत्यु की अबुझ पहेली के समाधान तार हाथ में आने शुरु हो जाते हैं व धरती पर एक सार्थक जीवन के मायने व अर्थ समझ आते हैं। सांसारिक मोह-माया व अज्ञानता-मूढ़ता की बेहोशी टूटती है व एक नए होश, जोश व समझ के साथ जीवन के क्रियाक्लापों का पुनर्निधारण होता है। इस सबमें ईश्वर या किसी दूसरे को दोषी मानने की भूल से भी बचाव होता है। अंततः अपने कर्मों के ईर्द-गिर्द ही सब केंद्रित समझ आता है - जन्म भी, मृत्यु भी, स्वर्ग भी, नरक भी, पुनर्जन्म भी और अन्ततः मुक्ति भी। इसके साथ ही हर स्तर पर अपनी भूल-चूक, त्रुटियों व गल्तियों के सुधार, अपने दोषों के परिमार्जन व अपने कर्मों के सुधार की प्रक्रिया अधिक प्रगाढ़ रुप में गति पकड़ती है।

इस तरह मृत्यु के सत्य से दीक्षित पथिक इस धरती रुपी सराय का बेहतरतम उपयोग करता है और जब मृत्यु रुपी दूत दस्तक दे जाता है, तो पथिक अपनी अर्जित धर्म-पुण्य और सत्कर्मों की पूँजी के साथ बोरिया-बिस्तर समेटते हुए इस धरती पर एक प्रेरक विरासत छोड़ते हुए महायात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़ चलता है।

सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

पुस्तक समीक्षा, हिमालय की वादियों में


 

यायावरी का तिलिस्म

प्रो. शंकर शरण, राष्ट्रीय अध्येता,

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (IIAS), शिमला, हिं.प्र.



 मात्र पचास-साठ वर्ष पहले तक यात्रा और भ्रमण साहित्य अच्छे प्रकाशन संस्थानों का एक विशिष्ट भाग होता था। केवल बनारसी दास चतुर्वेदी, राहुल सांकृत्यायन, और कवि अज्ञेय जैसे ख्यातनाम, अपितु सामान्य व्यक्तियों द्वारा लिखे यात्रा-वृत्तांत भी प्रकाशक सहर्ष छापते थे यहाँ तक कि बड़े लोग उस की भूमिकाएँ तक लिखते थे। कदाचित कारण यही रहा हो कि तब यात्राएँ उतनी सुलभ और प्रचलित नहीं थीं। इसलिए जो लोग यात्राएँ और भ्रमण करते थे, उनके विवरणों से सहृदय पाठक उसका घर बैठे आनंद, कल्पना और जानकारी प्राप्त कर लियाकरते थे। अब यातायात, संचार और पर्यटन उद्योग का ही भारी विस्तार हो चुका है। संभवतः इसीलिए अब इस विधा का महत्त्व कम हो गया 

इसीलिए प्रो. सुखनन्दन सिंह जैसे जन्मजात घुमक्कड के प्रथम यात्रा वृत्तांत को जितना महत्त्व मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला है। वह देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार में पत्रकारिता के प्राध्यापक तथा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला के यू.जी.सी.-एसोसियट भी हैं। यद्यपि उनकी यह पुस्तक 'हिमालय की वादियों में' (बिलासपुरः एविन्सपब, 2021) काफी समृद्ध है, और बड़े मनोयोग से लिखी गयी है। यह किसी बाहरी पर्यटक द्वारा या ऊपरी दृष्टि से हिमालय के रमणीक और महत्त्वपूर्ण स्थलों को देखने का वर्णन बिलकुल नहीं है। बल्कि स्वयं एक हिमालय पुत्र द्वारा गहरी संवेदनशील दृष्टि से अनेकानेक स्थानों के विस्तृत यात्रा-वृत्तांत हैं।

जिनमें कुछ स्थलों पर वह अनेक बार गया है। इस तरह, एक तुलनात्मक दृष्टि के साथ-साथ, केवल भौगोलिक, जिनमें कहीं-कहीं नदियों, झीलों, वनस्पतियों और वन्य जीव-जंतुओं तक के बारे में सूक्ष्म अवलोकन है, बल्कि संबंधित क्षेत्रों के सामाजिक, सांस्कृतिक तत्त्वों का भी मुजायका मिलता है। विवरणों के अतिरिक्त इस में 57 तस्वीरें भी हैं। इस रूप में यह पुस्तक एक रोचक यात्रा-विवरण के साथ-साथ, एक अच्छा पथवृत्त-मार्गदर्शक तथा पर्यावरणीय एवं सामाजिक शिक्षा की सामग्री भी प्रदान करती है।



पुस्तक के समर्पण से भी लेखक की भावना की झलक मिलती है। स्वयं हिमालय को इसे अर्पित करते हुए उन्होंने लिखा है, “उस देवात्मा हिमालय को जिसकी गोदी में बचपन बीता, जिसकी वादियों में युवावस्था के स्वर्णिम पल देखे, जो जीवन की ढलती शाम में, मौन तपस्वी-सा आत्मस्थ, अंतस्थ एवं अडिग खड़ा, आंतरिक हिमालय के आरोहण की सतत् प्रेरणा देता रहता है।" लेखक का दिल बचपन से ही पहाड़ों के लिए धड़कता रहा है, जिनमें हिमालय  को बाद में उन्होंने गुरुजनों से 'देवात्मा' के रूप में जाना जो मिट्टी और पत्थर के विग्रह मात्र नहीं, अपितु आध्यात्मिक चेतना के मूर्तिमान संवाहक हैं। इस कारण ही संपूर्ण हिमालयी परिवेश को देवभूमि भी कहा जाता है।

यद्यपि यह लेखक का पहला यात्रा-संकलन है, जिसमें हिमाचल और उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों के वर्णन हैं। किंतु उन्होंने इसे अत्यंत समृद्ध आकलनों और अवलोकनों से भर दिया है। नोट करने की बात है कि लेखक विगत तीन दशकों से हिमालयी प्रदेशों की यात्राएँ करते रहे हैं। इससे भी कुछ अनुमान किया जा सकता है कि हिमालय के संपूर्ण परिदृश्य को आँकने की उनकी दृष्टि कितनी पैनी और अनुभव-समृद्ध हो चुकी होगी। वे पेड़-पौधों ही नहीं, विविध वन्य जीव-जंतुओं, घास-लताओं और चट्टानों में लगी काई तक की विशेषताएँ पहचानते हैं। यह भी कि बंदर किन पत्तें, या फलों को खाते हैं, किस घास से किस जीव-जंतु का क्या संबंध है, अथवा किस वृक्ष की क्या विशेषता है। ऋषिकेश में रामझूला से नीलकंठ जाने के मार्ग में लंगूरों का उल्लेख मिलता है, “ये शांत एवं सज्जन जंगली जीव यात्रियों के हाथों से चना खाने के अभ्यस्त हैं। ये झुंडों में रहते हैं। इनसे यदि भय खाया जाए, तो इनकी संगत का भरपूर आनंद उठाया जा सकता है।” (पृ.33)


यद्यपि सिद्ध पाठकों को इस पुस्तक के विवरण-शैली में एक अनगढ़ता लग सकती है, किंतु वह कोई कमी होने के बदले गुण ही है क्योंकि उसमें लेखक के हृदय की अनुभूति है, जो संपादन की कमी को खलने नहीं देती। यायावर को इसकी चेतना भी बनी रही है कि उन हिमालयी मार्गों, क्षेत्रों में पहले गुरु गोविन्द सिंह, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी शिवानन्द, स्वामी सत्यानन्द, आदि जैसे महान गुरु और मनीषी भ्रमण करते रहे हैं। जो अपनी बारी में स्वयं हजारों वर्ष पहले की हिमालय साधना परंपरा का ही अनुकरण कर रहे थे। अतः कोई सचेत, निष्ठावान यायावर आज भी वह अनुभूति कर ही सकता है, जो उन मनीषियों को हुई होगी।

कुल मिलाकर इस संकलन में छत्तीस विभिन्न यात्राओं के विवरण हैं। इनमें कुमाऊँ, गढ़वाल, शिमला, मंडी, कुल्लू घाटी, मनाली हिमालय और लाहौल घाटियों में अलग-अलग स्थानों की यात्राओं के वर्णन मिलते हैं। इसे पढ़ते हुए संपूर्ण हिमालय क्षेत्र के असंख्य मंदिरों, गाँवों, कस्बों, घाटियों, नदियों, ताल-तलैयों, आदि की स्थिति, विशेषताएँ, तथा चित्र एवं शब्दचित्रों के भी दर्शन होते हैं। जैसे, मालिनी नदी का परिदृश्य बताते हुए, “कहीं किसान इसके किनारे खेती कर रहे हैं, तो कहीं मछुआरे मछली पकड़ रहे, कहीं कपड़े धुल रहे हैं तो कहीं इसके किनारे भेड़-बकरियाँ-गाय-घोड़े आदि चर रहे हैं, तो कहीं इसके किनारे तंबू लगे हैं, रिजॉर्ट बने हैं, टूरिस्ट कैंप चल रहे हैं। कहीं इसके किनारे पूरे गाँव आबाद हैं।” (पृ.18) इसी नदी के बाएँ तट पर हनुमान का सिद्धबली मंदिर है, जहाँ भंडारा कराया जाता है। इस मंदिर की महत्ता इसी से समझ सकते हैं कि लेखक को अपनी यात्रा के समय पता चला कि वहाँ भंडारा करवाने के लिए अगले दस वर्ष तक की बुकिंग हो चुकी है!



कई वर्णनों में अनायास अनेक तकनीकी जानकारियाँ भी मिल जाती हैं, जो नये यायावरों के लिए बड़े काम की साबित होंगी। जैसे कि कहाँ पर कौनसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं, और कहाँ पर कैसी विशेष कठिनाइयाँ उपस्थित हो सकती हैं। इस रूप में, यह पुस्तक युवा यायावरों के लिए एक मूल्यवान गाइड, मार्गदर्शिका का काम भी करेगी, जो उन स्थलों की यात्राएँ करने की योजना या हौसला रखते हैं। यथा, लैंसडाउन का वर्णन पढ़ते हुए यह मिलता है, "टिप-एन-टॉप यहाँ से ऊपर चोटी पर दर्शनीय बिंदु है, जहाँ से दूर घाटी का अदभुत नजारा देखा जा सकता है इसके नीचे किनारे बाँज, बुराँश देवदार के घने जंगल बसे हैं, जिनके बीच का सफर पैसा-वसूल ट्रिप साबित होता है। रास्ते में चर्च के पास ही गाड़ी खड़ी कर पैदल यात्रा का आनंद लिया जा सकता है देवदार-बुराँश के जंगल के बीच स्थित चर्च में शांतचित्त होकर दो पल प्रार्थना के बिताये जा सकते हैं।” (पृ. 19) या फिर, हरिद्वार में चलते-चलाते मोहन पूरीवाले, प्रकाशलोक नामक लाजबाव लस्सी की दुकान, त्रिमूर्ति के पास बेहतरीन गुजराती ढाबे की सूचना भी दी गयी है। इसी तरह शिमला की आकर्षक पैदल चढ़ाइयों (ट्रैकिंग ट्रेल्स) की विस्तृत जानकारियाँ इस में विस्तार से दी गयी हैं (पृ. 144-48)

आध्यात्मिक और पर्यटकीय विवरणों के साथ-साथ हर स्थान की सामाजिक, आर्थिक, कृषि संबंधी, आदि स्थितियों की ऊँच-नीच पर भी लेखक की अनायास नजर रही है कि कहाँ कौन-से सामाजिक रोग, या व्यसन समाज को कमजोर कर रहे हैं। विभिन्न पर्वतीय स्थानों की तुलनात्मक विशेषताएँ भी दिखायी गयी हैं। फिर एक ही स्थान की तुलनात्मक स्थिति को भी नोट किया गया है, कि पहले वह कैसी थी तथा अब उसमें क्या परिवर्तन आये हैं। उदाहरण के लिए, अल्मोड़ा से आगे के इलाकों पर, “सड़क के साथ जल-स्रोत के होते हुए भी लोग सामान्य खेती तक ही सीमित दिखे। उर्वर जमीन के साथ पहाड़ी क्षेत्र होते हुए यहाँ फल और सब्जी की अपार संभावनाएँ हमारे बागवानी भाई को दिख रही थी। इस ऊँचाई पर नाशपाती, पलन, आडू, अनार, जापानी फल की शानदार खेती हो सकती है। सेब की भी विशिष्ट किस्में यहाँ आजमाई जा सकती हैं। सब्जियों में मटर, टमाटर, शिमलामिर्च से लेकर औषधीय पौधे, फूल, लहसुन, प्याज, गोभी जैसी नकदी फसलें उग सकती हैं। यदि क्षेत्रीय युवा इस पर ध्यान केंद्रित कर दें, तो उनके गाँव-घर छोड़ कर दूर रहने, पलायन की नौबत ही आये।” (पृ. 3) यद्यपि लेखक अपनी बुद्धि कोछटाँक भर की' मानते हैं, फिर भी उनके कई अवलोकन बड़े वजनी और दूरगामी महत्त्व के प्रतीत होते हैं। यथा, “गाँव वालों का कहना था कि कितनी भी गमी हो यहाँ का पानी कभी सूखता नहीं। वास्तव में बाँज के पेड़ की जड़ें नमी को छोड़ती हैं इसे संरक्षित रखती हैं। हमारे मन में आया कि यदि गाँव वाले इस जंगल में बाँज के पेड़ों के साथ मिश्रित वनों को बहुतायत से लगा लें तो शायद यहाँ के सूखे पड़ते जल-स्रोत फिर रिचार्ज हो जाएँ।” (पृ. 4)

शिमला और आस-पास के स्थलों का विस्तार से वर्णन (पृृृृ. 136-61) लगभग सभी महत्त्वपूर्ण जानकारियों से भरा हुआ है जिसमें सुंदर स्थानों, मंदिरों, प्रसिद्ध शैक्षिक संस्थानों, एवं विशेष पैदल-पथों, ट्रैकिंग-ट्रेल्स के विवरण और तस्वीरें हैं। ऐसे विवरणों से किसी इच्छुक को अपनी भावी यात्रा की सही योजना बनाने में सहायता सकती है। इस पुस्तक में वर्णित यात्राओं में कुछ टीम-यात्राएँ भी हैं, जिनमें लेखक अपने शिक्षण संस्थान के छात्रों के दल लेकर भ्रमण और पर्वतारोहण प्रशिक्षण पर गये थे।

पुस्तक में कहीं से भी दस-बीस पन्ने पढ़कर भी लेखक की संवेदनशील दृष्टि, सजग अवलोकन, या हिमालयी प्रदेश की संपूर्ण थाती और संबंधित धर्म-समाज के प्रति हार्दिक चिंता की झलक मिल जाती है। कहीं-कहीं अनुभवजन्य दार्शनिक टिप्पणियाँ भी हैं। जैसेयदि ध्यान सारा रास्ते लक्ष्य पर केंद्रित हो तो फिर भय को घुसने का प्रवेश द्वार ही मिले।" यह बात किसी खतरनाक रास्ते को पार करते समय की स्थिति पर कही गयी है, किंतु यह मनुष्य के जीवन के कठिन, चुनौतीपूर्ण कार्यों को साधने के लिए भी यथावत सच है।

अतः कई रूपों में यह पुस्तक पारंपरिक यात्रा-वृत्तांतों से अधिक मूल्यवान प्रतीत होती है। इसे किसी सुयोग्य संपादक द्वारा यथोचित संपादित कर, संभव हो तो सभी यात्राओं का काल आदि जोड़कर, कहीं-कहीं दुहरावों तथा सामान्य वैयक्तिक तस्वीरों को हटा कर, इसका एक लघुतर संस्करण विद्यार्थियों एवं सामान्य पाठकों के लिए भी  बहुत उपयोगी, पठनीय हो सकता है। उन्हें इससे अपने देश के हिमालयी क्षेत्र के प्रति सार्थक जानकारी पाने के साथ-साथ अपनी संवेदना और कल्पनाशीलता भी विकसित करने में सहायता मिलेगी। 


(महात्मा गाँघी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विशिवद्यालय, बर्धा की त्रैमासिक पत्रिक - पुस्तक वार्ता, जुलाई-सितंबर 2020 अंक के पृष्ठ 106-108)

पुस्तक - हिमालय की वादियों में, लेखक - प्रो. सुखनन्दन सिंह

प्रकाशक - एविंन्सपव बिलासपुर, छत्तीसगढ़, वर्ष - 2021, पृष्ठ - 243, मूल्य -399 रु.




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