मंगलवार, 21 जनवरी 2020

फिल्म समीक्षा – तान्हाजी, द अनसंग वॉरियर


स्वराज के अमर योद्धा की अद्वितीय शौर्य-बलिदानी गाथा

बाहुबली के बाद एक ऐसी फिल्म आई है, जो दर्शकों को अपने सिनेमाई करिश्मे के साथ मंत्रमुग्ध कर रही है और उनमें एक नया जोश, एक नयी ऐतिहासिक समझ व सांस्कृतिक चेतना का संचार कर रही है। मराठा योद्धा तानाजी मालुसरे के अप्रतिम शौर्य, बलिदान एवं अदम्य साहस की गाथा पर आधारित यह फिल्म शुरु से अंत तक दर्शकों को बाँधे रखती है। इसके कथानक की कसावट, चरित्रों के रोल, चाहे वे तानाजी के रुप में अजय देवगन हों, खलनायक उदयभान सिंह राठौर के रुप में सैफ अली खान या सावित्री बाई के रुप में काजोल या छत्रपति शिवाजी महाराज के रुप में शरद केलकर या अन्य – सभी अपनी जगह सटीक छाप छोड़ते हैं। पृष्ठभूमि में सुत्रधार के रुप में संजय मिश्रा की आबाज अपना प्रभाव डालती है। एनीमेशन एवं वीएफएक्स का उत्कृष्ट प्रयोग इसकी विजुअल अपील को ज्बर्दस्त ढंग से दर्शकों को हर दृश्य में हिस्सेदार बनाती है। गीत-संगीत एवं नृत्य भी स्वयं में बेजोड़ है, जिनमें भागीदार होकर दर्शक शौर्यभाव से भर जाते हैं। युद्ध के बीच-बीच में हल्की कॉमेडी दर्शकों को गुदगुदाती है तो मानवीय भावों के मार्मिक चित्रण दर्शकों को भावुक कर देते हैं।

आश्चर्य नहीं कि जीवंत इतिहास के रोमाँचक पलों के साक्षी बनते हुए दर्शकों के अंदर जैसे भावनाओं का समन्दर लहलहा उठता है और फिल्म के अंत में नम आँखों के साथ दर्शक बाहर निकलता है। कुल मिलाकर अनसंग वॉरियर तानाजी का चरित्र दर्शकों के जेहन में अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है।

आश्चर्य नहीं कि पहले दिन से फिल्म को देखने के लिए दर्शकों की भीड़ उमड़ रही है और 2020 की यह सबसे लोकप्रिय एवं हिट फिल्म के रुप में उभरी है। 8.6 की आईबीडीएम रेटिंग के साथ बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने धमाल मचा रखा है। दूसरे सप्ताह भी तान्हाजी का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा है। बॉक्स आफिस पर महज सप्ताह में 100 करोड़ क्लब में शामिल हो चुकी है और इस सप्ताह 200 करोड़ की ओर अग्रसर है और आगे यह किन नए रिकॉर्ड को स्थापित करती है, देखना रोचक होगा।
विदित हो कि सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक लगभग पूरा भारत मुगल शासकों के अधीन था। शिवाजी के पिता शाहजी भौंसले मुगल शासन में एक सैन्य अधिकारी के रुप में कार्यरत थे। माता जीजाबाई नहीं चाहती थी कि उनका वेटा शिवा भी मुगलों के अधीन काम करे। वे बालक शिवा को बचपन से ही रामायण-महाभारत की कथाओं के माध्यम से स्वतंत्रता, स्वाभिमान एवं शौर्य की भावना कूट-कूट कर भरती हैं।
दादाजी कोन्डेव उन्हें युद्धकला एवं नीतिशास्त्र में पारंगत बनाते हैं। साहसी एवं स्वाभिमानी मराठों को इक्टठा कर बालक शिवा उन्हें प्रशिक्षित करते हैं और मात्र 15 साल की आयु में तोरण का किला जीतकर स्वराज की ओर पहला कदम उठाते हैं। इस तरह इनका विजय अभियान आगे बढ़ता है और कई किले इनके अधिकार में आ जाते हैं तथा स्वराज की परिकल्पना मूर्त होने लगती है। मुगल शासक औरंगजेब को यह विस्तार नागवार गुजरता है और वो विराट सेना के साथ हमला करवाता है। मध्यम मार्ग अपनाते हुए पुरन्दर की संधि होती है, जिसमें कोन्ढाणा सहित 23 किले खो बैठते हैं। कूटनीतिक चाल चलते हुए मुगल शासन मराठा शक्ति को चुनौती देने के उद्देश्य से राजपूत यौद्धा उदयभान सिंह राठोर को कोन्ढाणा का सरदार बनाते हैं।
कोन्ढाणा का किला रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ माता जीजावाई को विशेषरुप से प्रिय था, जिसको अपने अधिकार में लाने की दृष्टि से शिवाजी महाराज स्वयं धावा करने की तैयारी करते हैं।

ईधर तानाजी अपने बेटे की शादी का निमंत्रण लेकर राजगढ़ पहुँचते हैं। जब पता चलता है कि कोन्ढाणा के किले के लिए युद्ध की तैयारियाँ चल रही हैं, तो वे इसका जिम्मा स्वयं पर ले लेते हैं। तानाजी एक बार छद्मवेश में जाकर किले का पूरा मुआइना करते हैं और इसके बाद पाँच सौ मराठा यौद्धाओं को साथ लेकर दो हजार सैनिकों से आबाद किले पर चढ़ाई करते हैं। इसके लिए वे रात के अंधेरे में किले के चढ़ाईदार पश्चिमी हिस्से से उपर चढ़ते हैं, जहां पहरा कम रहता है तथा कल्याण दरवाजे से प्रवेश करते हैं और अंदर घमासान युद्ध होता है।
 युद्ध के दौरान एक हाथ कटने के बाद, तानाजी इस पर पगडी लपेट कर ढाल के साथ लड़ते हैं। युद्ध में अंततः उदयभान सिंह राठोर परास्त हो जाता है, लेकिन तानाजी भी वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। किला मराठाओं के कब्जे में आ जाता है, लेकिन वे अपना सरदार खो बैठते हैं। इस पर शिवाजी महाराज के शब्द थे – गढ़ आला पण सिंह गेला अर्थात् गढ़ तो जीत लिया, लेकिन मेरा सिंह नहीं रहा। तब से कोन्ढाणा किले का नाम सिंहगढ़ पड़ता है। पुना से महज 35 किमी दूर सिंहगढ़ आज एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, जो इस फिल्म के बाद पूरे देश की नजर में आ चुका है। युद्ध के बाद शिवाजी महाराज स्वयं तानाजी के बेटे की शादी करवाते हैं और तानाजी का बूत स्मृति समारक के रुप में सिंहगढ़ में स्थापित होता है।

उत्कृष्ट एनीमेशन एवं वीएफएक्स का उपयोग करते हुए किले को व युद्ध के हर दृश्य को जीवंत तरीके से दर्शाया गया है। युद्ध का फिल्माँकन हॉलीबुड की किसी भी युद्ध फिल्म से कम नहीं है, जिसमें भारतीय सिनेमा (बालीवुड़) के विश्व सिनेमा की ओर बढ़ते कदमों की आहट देखी जा सकती है। ऐसे तकनीकी कौशल से बनी फिल्में विदेशों में जहाँ इससे कई गुणा अधिक बजट में बनती है, वहीं यह फिल्म महज 150 करोड़ रुपए में तैयार हुई है, जिसे कुछ विशेषज्ञ भारत के मंगल ग्रह पर भेजे चंद्रयान की तरह किफायती प्रयोग मान रहे हैं। मालूम हो कि फिल्म के एनीमेशन व वीएफएक्स में स्वदेशी तकनीशियनों ने काम किया है।
हमारे विचार में तान्हाजी बाहुबली के बाद एक दूसरी बेमिसाल फिल्म आई है, जो दर्शकों के जेहन को कहीं गहरे छू जाती है। साथ ही ऐतिहासिक दस्ताबेजों के ऊपर आधारित होने के कारण तान्हाजी का असर बाहुबली से कहीं अधिक गहरा एवं व्याप्क प्रतीत होता है, क्योंकि इसके साथ छत्रपति शिवाजी महाराज का भव्य एवं दिव्य चरित्र भी अभिन्न रुप में जुड़ा हुआ है।
फिल्म के माध्यम से जहाँ दर्शकों की ऐतिहासिक समझ रवाँ हो रही है, वहीं स्वदेश एवं राष्ट्रभक्ति के भावनाएं हिलोंरें मार रही हैं। जिस पावन भाव के साथ इसके निर्देशक ओम राउत एवं प्रोड्यूसर अजय देवगन ने फिल्म को बनाया है, वह दर्शकों को कहीं गहरे छू रहा है। कहीं से भी हल्के फिल्मी मनोरंजन को परोसने की कुचेष्टा यहाँ नहीं दिखती। पात्रों के चरित्र के साथ उचित न्याय इस फिल्म की विशेषता है, जो आशा है कि अनसंग वॉरियर की श्रृंखला की अगली कढ़ियों में भी बर्करार रहेंगी।

यदि आपने यह फिल्म अभी तक न देखी हो तो बड़े थियेटर में जाकर अवश्य देखें। लेप्टॉप या मोबाईल पर इसके साथ न्याय नहीं हो पाएगा।
कुछ तथ्य जो फिल्म को और भी दर्शनीय बनाते हैं –
1.     अजय देवगन के फेन्ज के लिए यह फिल्म एक ट्रीट से कम नहीं है, जो इनकी 100वीं फिल्म भी है। काजोल के साथ इनकी भूमिका के कारण फिल्म ओर भी विशिष्ट बन गई है। दोनों आठ साल बाद एक साथ किसी फिल्म में काम कर रहे हैं।

2.  खलनायक उदयभान सिंह राठोर के रुप में सैफ अली खान का अभिनय दर्शनीय है।
3.     छत्रपति शिवाजी महाराज के रुप में शरद केलकर भी भूमिका बेजोड़ है। याद हो कि डब्ब की गई एसएस राजामौली की फिल्म बाहुबली के हिंदी संस्करण में इन्हीं की आबाज बाहुबली के रुप में गूंजती रही है।
4.     मराठा शौर्य पर आधारित यह फिल्म इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। अपने इतिहास से अनभिज्ञ या भूला बैठी पीढ़ी के लिए यह फिल्म एक प्रभावी एवं जीवंत शिक्षण से कम नहीं है।
5.     फिल्म का थ्री-डी संस्करण भी उपलब्ध है, जिसमें थ्री-डी चश्में के साथ फिल्म के दृश्यों व घटनाओं का सघन फील लिया जा सकता है। हालाँकि फिल्म का दू-डी संस्करण भी स्वयं में जीवंत एवं प्रभावशाली है।

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

यात्रा वृतांत – गड़सा घाटी के एक शांत-एकांत रिमोट गाँव में, भाग-2


जापानी फल के मॉडल बाग में
हमारे सामने एक प्रयोगधर्मी किसान के 27 वर्षों के तप का फल, एक लहलहाता फलदार बगीचा सामने था, जो किसी भी बागवानी प्रेमी व्यक्ति का स्वप्न हो सकता है। जापानी फल से लदे पेड़ नेट से ढके थे, जो एक ओर चमगादड़ों के आतंक से फलों की रक्षा करते हैं, तो दूसरी ओर औलों की मार से। मालूम हो कि खराब मौसम में औलों की बौछार फलों को बर्वाद कर देती है, इनसे बचाव के लिए नेट का उपयोग किया जाता है। इस बार दुर्भाग्य से हवाईशा साईड से भयंकर औलावारी हुई थी, जिसका आंशिक असर यहाँ भी हुआ, महज आधे घंटे में नेट के बावजूद चालीस फिसदी फल इनसे बर्वाद हुए थे। इस नुकसान का दर्द एक किसान भली-भांति समझ सकता है, जो पूरे साल भर दिन-रात एक कर अपने खून-पसीने से उमदा फसल तैयार कर रहा होता है।
अपने अभिनव प्रयोग पर चर्चा करे हुए श्री हुकुम ठाकुर ने वताया कि इस बगीचे का रोपण 27 वर्ष पूर्व किया गया था, जब इस फल की कोई मार्केट वेल्यू नहीं थी। मात्र 4-5 रुपए किलो तब यह बिकता था। शौकिया तौर पर इसकी शुरुआत हुई थी। चण्डीगढ़ किसी फल प्रदर्शनी में एक किसान प्रतिनिधि के रुप में वे गए थे, जहाँ इज्रायल से आए डेलीगेशन ने जापानी फलों को प्रदर्शनी में सजाया था, इसका स्वाद चखाया व इसकी तारीफ की थी। हुकुम ठाकुर को आश्चर्य हुआ कि इस फल के इक्का दुक्का पेड़ तो हमारे इलाके में भी घर के आस-पास उगाए जाते हैं, क्यों न इसका पूरा बगीचा तैयार किया जाए।
इस तरह लगभग 100 वृक्षों के साथ घर के साथ जापानी फल का बगीचा खड़ा होता है। लोगों के लिए यह एक पागलपन था, क्योंकि इलाके में ऐसे बगीचों का कोई चलन नहीं था, न ही इस फल की कोई मार्केट थी। लेकिन अपनी धुन के पक्के हुकुम ठाकुर अपने जुनून और शौक को असीम धैर्य, अथक श्रम एवं उत्साह के साथ खाद-पानी दे रहे थे। साथ ही अपनी जान-पहचान व पहुँच के आधार पर मार्केट तैयार होती है। फल की गुणवत्ता में अपनी प्रयोगधर्मिता के आधार पर इजाफा होता है। इसके आकार व रंग आदि में सुधार होता है और आज एक उम्दा फल के रुप में इस बाग का जापानी फल सीधे दिल्ली में स्पलाई हो रहा है, जहाँ यह फाईव स्टार होटलों की पार्टियों की शोभा बनता है।
मालूम हो कि जापानी एक ऑर्गेनिक फल है, जिसमें रसायन, कीटनाशक छिड़काव आदि का झंझट नहीं रहता, क्योंकि इसमें किसी तरह की बिमारी नहीं होती। बस समुचित खाद-पानी की व्यवस्था इसकी उमदा फसल के लिए करनी होती है। फिर यह पौष्टिकता से भरपूर एक स्वादिष्ट फल है, जिसमें विद्यमान एंटी ऑक्सिडेंटस ह्दय रोग व मधुमेह में राहत देने वाले होते हैं। यह बजन कम करने में सहायक है। इसमें रक्तचाप व कोल्सट्रोल को कम करने की गुणवत्ता भी है। फाईवर से भरपूर यह फल पेट के मरीजों के लिए बहुत उपयोगी है व एसिडिटी से राहत देता है। विटामिन ए की प्रचुरता के कारण आँखों के लिए बहुत उपयोगी है। पौष्टिकता के साथ स्वाद में यह फल बहुत मीठा होता है, जिसका नाश्ते में या भोजन के बाद आनन्द लिया जा सकता है। इसका पका, रसीला फल तो स्वाद में लाजबाव होता है, जिसका लुत्फ तो खाकर ही उठाया जा सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग की मार झेल रहे सेब उत्पादक क्षेत्रों के लिए जापानी फल एक वेहतरीन बिकल्प भी है, जो अपनी विभिन्न विशेषताओं के कारण किसी बरदान से कम नहीं। घाटी में श्री हुकुम ठाकुर के इस बगीचे की प्रेरणा से कई किसान अपने-अपने स्तर पर इसके बाग तैयार कर रहे हैं। हुकुम ठाकुर के यहाँ एक नया बगीचा भी तैयार है, जहाँ 7-8 वर्ष के पौधे जापानी फलों से लदे हैं। इन्हीं के साथ जापानी फल की उम्दा नर्सरी भी, जिनकी एडवांस बुकिंग रहती है। 
जापानी फल के पेड़ की विशेषता है यह 80-100 वर्षों तक फल देता है। पतझड़ में इसके पत्ते लाल-पीले रंगत लेते हैं, जिनसे लदे बगीचे की सुंदरता देखते ही बनती है।
जीजाजी के बगीचे के दर्शन के बाद इनके घर पर पारम्परिक चाबल, राजमाँ व देशी घी के साथ स्वागत होता है। बगीचे के जापानी फलों का आचार लाजबाव लगा। तीन दशकों के बाद अपनी बोवा(बहन) से मुलाकात होती है। इनके नाति-पोतों से भरे परिवार को देखकर बहुत खुशी होती है। इनके बच्चे अपनी नौकरी पेशे में व्यस्त हैं, व खुद दादा-दादी बन कर परिवार व बगीचे को संभाल रहे हैं।
घर के छत व आँगन से हमें यहाँ की लोकेशन मनभावन लगी। सामने गगनचुम्बी पर्वत, जहाँ शिखर पर आस्था के केंद्र देवालय हैं, जहाँ से होकर जल की धार नीचे उतरती है, गाँव को सींचित करती है। दायीं ओर देवदार-बाँज के घने जंगल, पीछे आवाद गाँव, घर के ऊपर-नीचे और साइड में फैला जापानी फल से लदा बगीचा। सब मिलाकर यहाँ का शांत-एकांत एवं रिमोट क्षेत्र हमें सृजन के लिए ऊर्बर स्थल लगा। आश्चर्य नहीं कि ऐसे उर्बर परिवेश से एक विचारशील किसान-बागवान के सृजनधर्मी ह्दय से कविताएं, साहित्य व अनूठा जीवन दर्शन फूट पडे।
मालूम हो कि श्री हुकुम ठाकुर एक उत्कृष्ट कवि भी हैं। इनकी कविताएं पहल, सदानीरा, अकार, अनहद और बया जैसी राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।  इन पर पीएचडी स्तर के शोध-कार्य भी चल रहे हैं। कविता कोश में (http://kavitakosh.org/kk/हुकम_ठाकुर) इनकी प्रतिनिधि कविताओं को पढकर इनके सृजन की एक झलक पाई जा सकती है। इनके उत्कृष्ट सृजन को कई पुरस्कारों के लिए चयनित किया गया है, लेकिन इस औघड़ कवि को इनकी कोई परवाह नहीं। प्रचार-प्रसार व दिखावे से दूर ये कवि अपनी कविताओं के प्रति उदासीन व निर्मोही दिखे।
बापसी में जीजाजी अपनी कविता संग्रह पुस्तक – ध्वनियों के मलबे से भेंट करते हैं। एक कवि के रुप में इनकी कविताओं में मिट्टी की सौंधी खुश्बू, एक मेहनतकश किसान की रफ-टफ जिंदगी की कठोरता एवं एक दार्शनिक की गूढ़ता रहती है। बिम्बों के माध्यम से गूढ़ तथ्यों को समझाने की इनकी कला बेजोड़ है, जिनको समझने के लिए कभी-कभी माथे पर बल पड़ जाते हैं। लेखक परिचय देते हुए प्रियंवद(अकार) के शब्दों में – कुल्लू शहर से 20 किलोमीटर दूर पहाडों के बीच धुर निर्जनता में किसानी, बागवानी करते हुए हुकुम ठाकुर की कविताओं में इसीलिए अनाज और फूलों की गंध है। भाषा की ताजगी, बिंबों की अपूर्वता और संवेदना की अनगढ़ता इनकी कविताओं की अलग पहचान बनती है।
संसार-समाज की दुनियादारी से दूर किसानी के साथ हुकुम ठाकुर जीवन के गूढ़ सत्यान्वेषण में मग्न हैं, एक औघड़ इंसान के रुप में रह गाँव व क्षेत्र के अंधविश्वास व प्रतिगामिता से भी इनका संघर्ष चल रहा है। सत्यपथ के राही के रुप में इनकी वैज्ञानिक दृष्ठि, खोजधर्मिता व एकांतिक निष्ठा गहरे छू जाती है। कविताओं के साथ दर्शन इनका प्रिय विषय है, जिसके अंतर्गत इनकी अगली रचना ब्रह्मसुत्र, महाभारत एवं टाईम वार्प पर आधारित उपन्यास है, जो अभी प्रकाशनाधीन है। 
इस तरह सृजन में मग्न ये प्रगतिशील किसान हमें अपनी कोटि के एक अद्भुत इंसान लगे, जो पुरस्कारों के लिए लालायित वर्तमान साहित्यकारों की पीढ़ी के बीच निर्लिप्तता एवं औघडपन के साथ एक विरल सृजनकारों की नस्ल का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी तादाद अधिक नहीं है।
सौभाग्यशाली हैं यहाँ रह रहे लोग, जो इनकी प्रयोगधर्मिता एवं सृजनशीलता के एक अंश को लेकर अपने व इलाके के जीवन को संवारने में अपनी योगदान दे सकते हैं। हालाँकि ऐसे दुर्गम क्षेत्रों की व्यवहारिक दुश्वारियां भी कम नहीं। खासकर जब यहाँ सड़कें नहीं बनीं थीं, आधुनिक सुबिधाएं उपलब्ध नहीं थी। लेकिन आज गाँव तक बिजली, पानी, सड़क, इंटरनेट जैसी सभी सुबिधाएं उपलब्ध हैं। अतः नयी पीढ़ी के लिए जीवन यहाँ सरल हो चला है।
शाम का अंधेरा यहाँ घाटी-गाँव में छा रहा था, आज ही हमें बापिस लौटना था, सो इनसे आज की यादगार मुलाकात की प्रेरक बातों व प्रयोगधर्मी शिक्षाओं को समेटते हुए इनसे सपरिवार बिदाई लेते हैं और बापिस अपने गाँव चल देते हैं, इस आश्वासन एवं भाव के साथ कि अगली बार अधिक समय लेकर यहाँ आएंगे और शेष रही बातों को पूरा करेंगे।
यदि इसका पहला भाग न पढ़ा हो, जो आगे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं - कुल्लू घाटी के एक शांत-एकाँत रिमोट गाँव में

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