शुक्रवार, 29 नवंबर 2019
आस्था संकट एवं समाधान की राह
बुधवार, 20 नवंबर 2019
गीता का सार्वभौमिक-सार्वकालिक संदेश
गीता वेदों का निचोड़ एवं उपनिषदों का सार है। श्रीकृष्ण रुपी ग्वाल उपनिषद रुपी गाय को दुहकर अर्जुन रुपी बछड़े को इसका दुग्धामृत पिलाते हैं, जो हर काल के मनुष्यमात्र के लिए संजीवनी स्वरुप है। हर युग में हर स्वभाव के सुपात्र व्यक्ति के लिए उपयुक्त ज्ञान एवं संदेश इसमें निहित है।
भारतीय सांस्कृतिक नवजागरण के अगुआ स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, वेदों पर गीता से बेहतर टीका नहीं लिखी गयी है और न ही संभव है।..गीता में उपलब्ध श्रीकृष्ण भगवान की शिक्षाएं भव्यतम हैं, जिन्हें विश्व ने जाना है। रामकृष्ण परमहंस गीता को अपना सतत सहचर बनाने की सलाह देते थे। महर्षि अरविंद के शब्दों में, गीता मानव जाति के लिए आध्यात्मिक सृजन का सबसे महान सुसमाचार है। यह देश की प्रमुख राष्ट्रीय विरासत और भविष्य की आशा है। मदन मोहन मालवीय के मत में, पूरे विश्व साहित्य में गीता के समान कोई ग्रंथ नहीं, जो न केवल हिंदुओं के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए धर्म-अध्यात्म का खजाना है। राष्ट्रपिता गाँधीजी के मत में, गीता न केवल मेरी बाईबिल या कुरान है, बल्कि यह तो इनसे भी बढ़कर मेरी माँ के समान है। जब भी मैं कठिनाई या दुविधा में होता हूँ, तो मैं इसके आँचल की शरण में शाँति पाता हूँ। गीता की कर्मयोग के आधार पर व्याख्या करने वाले तिलकजी के शब्दों में, गीता अपने प्राचीन पावन ग्रंथों में सबसे उत्कृष्ट एवं पावन नगीना है।
फारसी विद्वान, विल्हेम वॉन हमबोल्ट के लिए गीता विश्व में उपलब्ध सबसे गहन एवं उदात्त चीज है। अमेरिकी विचार हेनरी डेविड थोरो के शब्दों में, प्रातः मैं अपनी बुद्धि को गीता के अतिविशाल एवं विराट दर्शन में स्नान कराता हूँ, इसकी तुलना में आज का जगत एवं साहित्य बौना एवं तुच्छ प्रतीत होता है। प्रख्यात केनेडियन लेखिका एल एडम बैक के विचार में, भगवान के गीत या आकाशीय गीत के रुप में प्रख्यात गीता सानन्त आत्मा की अनन्त आत्मा की ओर उच्चतम उड़ान की एक दुर्लभतम उपलब्धि का प्रतिनिधित्व करती हैं।
भारतीय अध्यात्म का इसमें निचोड़ समाया है। आश्चर्य नहीं कि गीता का महत्व सामान्य पलों में अनुभव नहीं होता, ये तो विषाद के विशिष्ट पलों का ज्ञान अमृत है, जिसे विषाद-संताप से तप्त इंसान ही गहनता में समझ सकता है और इन पलों में यह संजीवनी का काम करता है।
जीवन की आध्यात्मिक समझ एक महत्वपूर्ण तत्व है, जिसकी पृष्ठभूमि में फिर भगवान श्रीकृष्ण निष्काम कर्म के रुप में कर्मयोग का विधान समझाते हैं।
हमारे प्रायः हर कर्म आशा-अपेक्षा एवं स्वार्थ-अहं के दायरे में होते हैं, जो अपने फल के साथ चिंता, उद्गिनता व संताप भी साथ लाते हैं। ऐसे सकाम कर्मों की सीमा व निष्काम कर्म का व्यवहारिक महत्व श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं। अहं-स्वार्थ के दायरे से बाहर निकलकर किया गया यज्ञमय कर्म गीता का महत्वपूर्ण संदेश है, जो हमें विराट से जोड़ता है। निष्काम कर्म के साथ चित्त शुद्धि का आध्यात्मिक उद्देश्य सिद्ध होता है, भाव शुद्धि होती है और भक्ति भाव का उदय एवं विकास होता है।
रविवार, 27 अक्टूबर 2019
यात्रा वृतांत – पराशर झील, मण्डी,हि.प्र. की हमारी पहली यात्रा, भाग-3
मुश्किल से पाँच मिनट में ही पहाड़ की चोटी से बादल उमड़ना शुरु हो गए थे। अगले पाँच मिनट में पूरी झील इसके आगोश में आ चुकी थी। हम पुनः धुंध के बीच गुजर रहे थे, इसकी जलकणों को हम अनुभव कर रहे थे। जैसे हल्का सा अभिसिंचन शुरु हो चुका था, जिसे हम शुभ संकेत मान रहे थे। तैरता हुआ टापू हमारे सामने था, धुँध के बीच हम इसको नजदीक से देख पा रहे थे।
पूजारी जी के अनुसार इस छोर पर यह टापू पिछले तीन माह से टिका है। झील का 10 फीसदी यह भूभाग झील में एक छोर से दूसरे छोर तक तैरता रहता है। हालांकि यह गति धीमी होती है, लेकिन पूजारीजी एक ही दिन में इसको ईधर-उधर चलता देख चुके हैं।
पिछले आधे-पौन घंटे में हम हर तरह का नजारा परिसर झील व मंदिर के चारों ओर देख चुके थे। ऋषि परिशर की तपःस्थली का प्रताप हमारे जैसे जिज्ञासु के लिए प्रत्यक्ष था व हमारी आस्था इस तीर्थस्थल की दैवीय शक्ति के प्रति प्रगाढ़ हो चुकी थी, जहाँ प्रकृति ने कुछ ही पलों में हमें इसके सारे रंग दिखाकर सुरक्षित यात्रा को पूरा कर दिया था।
बीच में गुज्जरों की छानकियों (कच्चे घर) के दर्शन हुए, जिसकी छत्त को मिट्टी व देवदार के पत्तों से ढककर बनाया जाता है। भैंसों की चरते हुए पाया। रास्ते भर डायवर्जन प्वाइंट शेगली का साइनबोर्ड हर किमी पर मिला, जो यहाँ से 23 किमी था। इस तरह क्रमशः संख्या कम होती गयी व हम नीचे बागी से होकर मुख्यमार्ग में पहुंच चुके थे। वहाँ से दायीं ओर मुड़कर बजौरा-कुल्लू मार्ग की ओर चल देते हैं।
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