शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

प्रकृति से तालमेल में छिपे समाधान युग के


कुदरत संग दोस्ती से हासिल मंज़िलें

कहावत प्रसिद्ध है कि जितना हम प्रकृति से जुड़ते हैं उतना हम संस्कृति से जुड़ते हैं। जितना हम प्रकृति व संस्कृति से जुड़ते हैं उतना हम अपनी अंतरात्मा से जुड़ते हैं। ऐसे में हमारा संवेदशनशीलता जाग्रत होती है, समाज सेवा सहज रुप में बन पड़ती है। चारों ओर सुख-समृद्धि व शांति का माहौल तैयार होता है, परिवेश में स्वर्गीय परिस्थितियाँ हिलौरें मारती हैं। आज अगर देश-समाज व विश्व में परिस्थितियाँ नारकीय बनी हुई हैं, वातावरण में अशांति, बिक्षुव्धता, दहश्त व घुटन फैली है तो कहीं न कहीं हम प्रकृति व संस्कृति से हमारा अलगाव कारण है। जिसके चलते अंतरात्मा से हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो चला है और समाज के प्रति संवेदशनशीलता कुंद पड़ चुकी है।
ऐसे में प्रकृति के दौहन-शौषण का सिलसिला ब्दस्तूर जारी है, जिसके परिणाम हमारे सामने हैं। नदियाँ सूख रही हैं, जलस्रोत्र दूषित हो रहे हैं। गंगा नदी हजारों करोड़ रुपयों के खर्च के बाद भी मैली की मैली पड़ी है। जमुना का पानी गंदे नाले में तबदील हो चुका है। ऐसे ही कितनी ही नदियों का अस्तित्व खतरे में है, कितनी प्रदूषण की मार से दम तोड़ रही हैं। संवेदनहीनता का आलम कुछ ऐसा है कि इन नदियों में डुबकी लगाकर, आचमन कर अपने पाप-संताप हरने का भाव तो करते हैं, लेकिन इनके अस्तित्व से खिलबाड़ करते सीवरेज के गंदे द्रव्य, कारखानों के बिषैले अवशिष्ट, प्लास्टिक कचरे जैसे विजातीय एवं घातक तत्वों को इसमें विसर्जित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। जीवन का आधार इन जलस्रोत्रों के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता से हीन ऐसी श्रद्धा-भक्ति समझ से परे है।
जबकि श्रद्धा-भक्ति में तो प्रकृति के घटकों के प्रति सहज रुप में संवेदनशीलता एवं आदर का भाव रहता है, क्योंकि प्रकृति के माध्यम से भक्त ईश्वर को झरता महसूस करता है। ऐसा ही भाव जागा तो बाबा बलवीर सिंह सिचेवाला का जब उन्होंने अपने इलाके में दम तोड़ती नदी काली बेईं को देखा। 

यह वही नदी है जिसकी गोद में सिखधर्म का आदि मंत्र गुरु नानकदेव के मानस में प्रकट हुआ था। लेकिन कालक्रम में मानवीय हस्तक्षेप ने 160 किमी लम्बी इस पावन नदी की दुर्गति कर दी। सीवरेज से लेकर कारखानों का गंदा व विषैला जल इसमें गिरने लगा, जिसके चलते गंदे नाले में तबदील हो गई।  इसकी दुर्दशा ने बाबाजी को झकझोर कर रख दिया था। गुरुग्रंथ साहिव की गुरुवाणी - पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत, दिवस रात दुई दाई दया, खेलाई सकल जगत  उनका जाग्रत संकल्प बना और नदी को शुद्ध करने का बेड़ा लिया।
जनसहयोग जुटा औऱ तमाम बिरोध एवं विषमताओं के बीच वे इसके कायाकल्प करने में सफल हुए। इस अथक श्रम का नतीजा रहा कि नदि का जल नल के जल से अधिक शुद्ध है। जल जीवन इसमें लहलहा रहा है, इसके किनारे हजारों हरेभरे वृक्ष लहलहा रहे हैं, इसके सुंदर घाट और इसके पावन तट तीर्थ का रुप ले चुके हैं। बाबाजी का कहना है कि आज जरुरत है कुदरत के साथ जुड़ने की, इसके सत्कार करने की। साथ ही दरिया और धरती को हराभरा करने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने की। यहि आने वाली पीढ़ी के हमारा सर्वोत्तम उपहार हो सकता है। 
 
इसी तरह एक सेवानिवृत फोजी जब अपने गाँव में महिलाओं को दूर जंगल से घास लाता देखता है, पानी के लिए दूर भटकते देखता है, इससे होने वाले कष्ट पीड़ा से संवेदित होता है, तो वह अपने गाँव के चारों ओर जंगल लगाने की ठान लेता है। इस प्रयास में वर्षों बीत जाते हैं। अकेले दम पर वह एक मिश्रित बन तैयार करता है, इस तरह 10-15 वर्षों के अथक श्रम के बाद जब बन तैयार होता है तो गाँव की समस्याओं का समाधान होने लगता है।
आज इस जंगल में पशुओं के लिए चारा उपलब्ध है। वनीय पशु-पक्षियों का यह बसेरा बना हुआ है, जिसमें इनकी चहक व हलचल एक जीवंत प्राकृतिक परिवेश का अहसास होता है। जल स्रोत रिचार्ज हो चुके हैं, गाँव का झरना बारहों मास झर रहा है, पानी की समस्या का समाधान हो चुका है। साथ ही जड़ी-बूटियों से लेकर कैश क्रोप की खेती के साथ गांववासियों के आर्थिक स्वाबलम्बन का पुख्ता आधार यहाँ तैयार है। 

ग्लोबल वार्मिंग के दौर में मिश्रित वन का यह प्रयोग समाधान की उज्जली किरण के रुप में प्रकाश स्तम्भ की भाँति सामने खड़ा है। इस प्रयोग के लिए जगत सिंह जंगली को उत्तराखण्ड के ग्रीन एम्बेसडर सहित तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं, लेकिन वे जंगली उपनाम को ही अपनी पहचान मानते हैं। दूर-दूर से आकर लोग इस अद्भुत प्रयोग को देखने आते हैं और अपने क्षेत्रों में लागू कर रहे हैं। प्रकृति के साथ सामंज्य बिठाकर किस तरह सामाजिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, यहाँ देखा व समझा जा सकता है।
इसके साथ ही प्रकृति की गोद में जीवन के उच्चतर दर्शन को भी समझा जा सकता है। अमेरिकन दार्शनिक, राजनैतिक विचारक एवं प्रकृतिविद हेनरी डेविड थोरो का जीवन इसका एक जीवंत उदाहरण है। गाँधीजी ने थोरो के सिविल डिसओविडिएंस की अवधारणा को असहयोग आंदोलन के रुप में प्रयोग किया था। जीवन को समग्र रुप से समझने के लिए थोरो मेसाच्यूट्स शहर से सटे कोंकार्ड पहाडियों की गोद में स्थित बाल्डेन सरोवर के किनारे आ बसते हैं। 

दो वर्ष, दो माह और दो दिन वहाँ सरोवर के किनारे कुटिया बनाकर वास करते हैं। खेत में मटर, बीन्स, मक्का, शलजम आदि की खेती करते हैं। कुदाल लेकर एक किसान की भूमिका में अपने लिए आहार तैयार करते हैं। कृषि के साथ ऋषि जीवन जीते हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय करते हैं और प्रकृति की गोद में आत्मचितन-मनन के गंभीर पलों को जीते हैं।

बन्य जीवों को अपना सहचर बनाते हैं, झील में नाव के सहारे नौकायान करते हैं, झील की गहराई से लेकर इसके बदलते रंगों का मुआईना कर वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार करते हैं। बर्फ पड़ने पर सर्द ऋतुओं में यहाँ के प्रकृति परिवेश की विषम परिस्थियों के बीच पूरी तैयारी के साथ जीवन के रोमाँचक पलों को जीते हैं। यहाँ की सुबह, दोपहरी शाम व रात्रि के पलों की बदलती परिस्थियोँ व मनःस्थिति को बारीकी से निहारते हैं। प्रवास के अनुभवों को वाल्डेन ग्रंथ के रुप में एक कालजयी रचना भावी पीढ़ी को दे जाते हैं।
 
सार रुप में प्रकृति के साथ सामंजस्य में ही जीवन के शांति, सृजन व समाधान के राज छिपे हैं। समाज का कल्याण भी इसी में निहित है। जितना हम प्रकृति से जुड़ेंगे, इसका संरक्षण करेंगे, इससे तालमेल बिठाकर रहेंगे, उतना ही हम इसके वरदानों को अनुभव करेंगे। जितना हम इसका दोहन-शौषण करेंगे, इससे खिलबाड़ करेंगे, उतना ही हमें इसके कोपों को भोगने के लिए तैयार रहना होगा। यह हम आप पर पर निर्भर है कि हम किस रुप में प्रकृति के साथ बरताव करते हैं, इसी में हमारा, समाज व धरती का भविष्य छिपा हुआ है। (दैनिक ट्रिब्यून, चण्डीगढ़, 29जनवरी,2018 को प्रकाशित)

सोमवार, 26 नवंबर 2018

स्वाध्याय संदोह - महापुरुषों की साधु संगत


आत्म-कल्याण की भी चिंता की जाए


आत्मिक कल्याण आवश्यक होने के साथ-साथ थोड़ कठिन भी है। कठिन इसलिए कि मनुष्य प्रायः जन्म-जन्म के संस्कार अपने साथ लाता है। ये संस्कार प्रायः भौतिक तथा सांसारिक ही होते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है तो वह मुक्त हो जाता है। उसे शरीर धारण करने की लाचारी नहीं रहती। चूँकि सभी मनुष्य की अभिव्यक्ति शरीर से हुई, इसलिए यह सिद्ध है कि उसमें अभी शारीरिक संस्कार बने हुए हैं। पूर्व संस्कारों पर विजय पाकर इन्हें आधुनिक रुप में मोड़ लेना-या यों कह लिया जाए कि शारीरिक संस्कारों का आत्मिक संस्कारों से स्थानापन्न कर लेना सहज नहीं होता। संस्कार बड़े प्रबल व शक्तिशाली होते हैं। इन दैहिक संस्कारों को बदलने का सरल सा उपाय यह है कि जिस प्रकार सांसारिक कार्यों और शारीरिक आवश्यकताओं की चिन्ता की जाती है, उसी प्रकार आत्म-कल्याण की चिंता की जाए। जिस प्रकार सांसारिक सफलताओं के लिए निर्धारित एवं सुनियोजित कार्यक्रम बनाकर प्रयत्न तथा पुरुषार्थ किया जाता है, उसी प्रकार मनोयोगपूर्ण आध्यात्मिक कार्यक्रम बनाए और प्रयत्नपूर्वक पूरे किए जाते रहें। इस प्रकार मनुष्य अपने विचारकोण के साथ-साथ पुरुषार्थ की धारा बदल डाले तो निश्चत ही उसके संस्कार परिवर्तित हो जायेंगे और वह शरीर की ओर से मुड़कर आत्मा की ओर चल पड़ेगा।                   - युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य






अंतस का दीपक जलता रहे


क्या केवल ध्यान के समय ही ईश्वर का चिंतन करना चाहिए और दूसरे समय उन्हें भूले रहना चाहिए। मन का कुछ अंश सदा ईश्वर में लगाए रखना चाहिए। तुमने देखा होगा, दुर्गापूजन के समय देवी के पास एक दीपक जलाना पड़ता है। उसे लगातार जलाए रखा जाता है, कभी बुझने नहीं दिया जाता। उसके बुझ जाने पर गृहस्थ का अमंगल होता है। इसी प्रकार ह्दयकमल में इष्टदेवता को प्रतिष्ठित करने के बाद उनके स्मरण-चिन्तनरुपी दीपक को सदा प्रज्वलित रखना चाहिए। संसार के कामकाज करते हुए बीच-बीच में भीतर की और दृष्टि डालकर देखते रहना चाहिए कि वह दीपक जल रहा है या नहीं।                           -  श्रीरामकृष्ण परमहंस

प्रेम का पथ


आत्मनिरीक्षण का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान बनो। विश्वास और प्रेम रखो तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर और आशावान बनो, तब तुम सहज रुप से जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदार ह्दय बनो। क्षुद्र अहं और अनुदारता के सभी विचारों को निर्मूल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं  को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते हैं। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं। सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य हैं। अनन्त प्रभु अपनी अनन्ता में तुम्हारे दुःख के सहभागी हैं। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूलें करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। यदि दोष भी तुम पर आ पड़े तो वह दोष नहीं रह जाएगा। यदि तुम प्रभु से प्रेम करते हो तो अत्यन्त भयावह अनुभव भी तुम्हें प्रेमास्पद प्रभु के सन्देशवाहक ही प्रतीत होंगे। वस्तुतः प्रेम के द्वारा ही तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती। वह आत्मा का प्रेमी भी उसी प्रकार है। विश्वास करो। केवल विश्वास करो। फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुमसे जो भूलें हो गई, उनसे भयभीत न होओ। मनुष्य बनो। जीवन का साहसपूर्ण सामना करो। जो भी हो होने दो। तुम शक्तिशाली बनो। स्मरण रखो तुम्हारे पीछे अनन्त शक्ति है। स्वयं ईश्वर तुम्हारे साथ है। फिर तुम्हें किस बात का भय हो सकता है।

-   एफ.जे. अलेक्जेंडर



अंतरात्मा की पुकार और समर्पण भाव




अपने कार्य को आरंभ करने के लिए ऊपर की ज्योति हमसे जो कुछ मांगती है वह है अंतरात्मा की पुकार और मन में सहारे के लिए पर्याप्त बिंदु। ........ आरंभ में विचार अपर्याप्त हो सकता है और होना भी चाहिए। अभीप्सा संकीर्ण और अपूर्ण हो सकती है, श्रद्धा धुंधली-सी हो सकती है क्योंकि वह निश्चित रुप से ज्ञान की चट्टान पर आधारित नहीं होती, इसलिए घटती-बढ़ती, अनिश्चित और आसानी से कम होनेवाली होती है। प्रायः वह बुझ भी सकती है और उसे तुफानी घाटी में मशाल की तरह फिर से कठिनाई के साथ सुलगाना होता है। लेकिन अगर एक बार भीतरी गहराईयों में दृढ़ आत्म-समर्पण हो, यदि अंतरात्मा की पुकार के प्रति जाग्रति आ जाए तो ये अपर्याप्त चीजें भागवत प्रयोजन के लिए पर्याप्त उपकरण बन  सकती हैं। इसलिए बुद्धिमान लोग हमेशा भगवान की ओर के रास्तों को सीमित करने से कतराते रहे हैं, वे उनके प्रवेश के लिए सबसे तंग दरबाजे, सबसे निचली और अंधेरी सुरंग, सबसे निचले दरीचे को भी बंद नहीं करते। कोई भी नाम, रुप, प्रतीक, कोई भी भेंट पर्याप्त मानी जाती है यदि उसके साथ समर्पण-भाव हो, क्योंकि स्वयं भगवान खोज करनेवाले के ह्दय में होते हैं और उसके नैवेद्य को स्वीकार करते हैं।     -श्रीअरविंद
 
महापुरुषों की साधु-संगत पर अन्य पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं -
 
 

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

यात्रा वृतांत-सुरकुंडा देवी का वह यादगार सफर, भाग3


गढ़वाल हिमालय के सबसे ऊँचे शक्तिपीठ के दिव्य प्राँगण में
माँ सुरकुडा देवी शक्तिपीठ का भव्य प्रांगण


कद्दुखाल से सुरकुंडा देवी तक 3 किमी का ट्रेकिंग मार्ग है, जहाँ हमें 8000 फीट से लगभग 10000 फीट ऊँचाई तक का आरोहण करना था। पूरा रास्ता पक्का, पर्याप्त चौड़ा और सीढ़ीदार है, प्रायः हल्की चढ़ाई लिए समतल, लेकिन बीच-बीच में खड़ी चढ़ाई भी है। जो चल नहीं सकते, उनके लिए घोड़े-खच्चरों की भी व्यवस्था है, लेकिन हमारे दल में कोई ऐसा नहीं था जिसे इनकी जरुरत पड़ती। पहाड़ को चढ़ने का सबका उत्साह और जोश देखते ही बन रहा था। अगले ही कुछ मिनटों में दल का बड़ा हिस्सा दृष्टि से औझल हो चुका था, कुछ ही पथिक साथ में बचे थे।
सुरकुण्डा हिल के चरणों से आगे बढ़ता काफिला


लगभग आधा पौन घंटे की चढ़ाई के बाद दम फूल रहा था, सो यहाँ एक बड़े से बुराँश पेड़ की छाया तले रेलिंग के सहारे खड़े हो गए, कुछ दम लिए, जल के दो घूंट से सूखे गले को तर किए और फिर आगे चल दिए। इन विशिष्ट पलों को यादगार के रुप में कैमरे में केप्चर किए।

प्यासे कंठ को तर करता पथिक

इस रास्ते की खासियत ये बुराँश के पेड़ भी हैं, जो पर्याप्त मात्रा में लगे हैं। गुच्छों में लगी लम्बी हरि पत्तियाँ इनकी पहचान है। अप्रैल-मई माह में इनमें सुर्ख लाल रंग के फूल लगते हैं, जिनसे तैयार किया गया जूस औषधीय गुणों से भरपूर रहता है, विशेषरुप से ह्दय के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी।
राह में बुराँश के पेड़

इसी रास्ते में खट्टे-मीठे जंगली फलों की झाडियां भरपूर मात्रा में लगी हैं, बल्कि बीच में तो सड़क इन्हीं से घिरी हुई दिखीं। इनमें कांटेदार पत्तों बाली दारू हल्दी(शाम्भल), आंछा आदि विशेषरुप में दिखी। कुछ नए पौधे व झाड़ियां भी थीं। लगा, इनके जानकार किसी जड़ी-बूटी विशेषज्ञ के साथ इस इलाके की यात्रा यहाँ की दुर्लभ वनस्पतियों पर रोचक प्रकाश डाल सकती है।
शॉर्टकट को आजमाता काफिला

काफिले के साथ बीच में मुख्य मार्ग से हटकर हमनें कुछ चढ़ाईदार शॉर्टकट्स भी मारे, जिसकी राह में वाचा घास के दर्शन हुए। इसको देखते ही जैसे बचपन आंखों के सामने तैर उठा, जब हमारे नानाजी अपने कपड़े की थैली से लोहे की कमानी निकालकर चकमक पत्थर पर चोट मारते और इसकी चिंगारी वाचा घास को सुलगा देती, जिसे चिल्म की तम्बाकू पर रखकर आग सुलगते हुए उनकी चिल्म तैयार हो जाती। तब नानाजी यह घास स्थानीय जंगलों से लाते थे। यहाँ यह अग्नि प्रज्जवल्क घास हमें प्रचुर मात्रा में ढलानों में उगी दिखी। लगा नहीं कि यहाँ कोई इसके इस गुण, धर्म व प्रयोग से परिचित है, क्योंकि यह निर्बाध रुप से ढलानों पर फैली थी।
जंगली बाचा घास 
रास्ते में चाय-नाश्ते आदि की व्यवस्था ढाबों में थी, लेकिन आज समय अभाव के चलते यहाँ रुकने की गुंजाइश नहीं थी। बाकि, साथ में रखी पानी की बोटल से काम चल रहा था। जहाँ थक जाते दो पल दम भरते और आगे चल देते। रास्ते में हमें हर उमर के सैलानी, तीर्थयात्री मिले, जिनमें बच्चे, बुढ़े, जवान, कप्पल, स्टुडेंट व प्रौढ़ शामिल थे। सबसे आश्चर्य नन्हें बच्चों को पैदल ट्रैकिंग करते हुए देखकर हुआ, जिनमें एक-ड़ेढ़ साल से लेकर 3 साल तक के बच्चे दिखे। इनको देखते ही मन रोमाँचित हो उठता, इनके जीवट को सलाम करते हुए इनसे हेंडशैक करते, इनको टॉफियाँ देते और लगता कि येही दुर्गम शिखरों पर शौर्य एवं जीवट का झंड़ा फहराने वाले भावी कर्णधार हैं।
यायावरी और तीर्थाटन का उज्जवल भविष्य

मंजिल के लगभग अंतिम शॉर्टकट के दौरान रास्ते में हमें हेलीकॉप्टर के दर्शन हुए, जो घाटी में हमसे काफी नीचे उड़ रहे थे। अहसास हुआ, जिन हेलीकॉप्टर को हम मैदान में नीचे से निहारते हैं, आज वो हमसे कितना नीचे हैं और जैसे वो हमको निहार रहे हों। लगा, यह ऊँचाईयों के साथ दोस्ती का परिणाम था। जितना हम ऊँचाईयों का संग-साथ करते हैं, उतना ही निचाईयां पीछे छूटती जाती हैं और अनायास ही हम ऊच्चता एवं महानता के संवाहक बन जाते हैं।
मंजिल के समीप और नीचे घाटी का विहंगम दृश्य

लेकिन अपनी उच्चता का मुगालता पालने की भी जरुरत नहीं। प्रभु की सृष्टि में हर इंसान व प्राणी अपनी मौलिक विशेषता के बावजूद अधूरा है और सबको मिलकर ही सर्वसमर्थ पूर्ण सत्ता बनती है। इन्हीं क्षणों में टीम के जागरुक सदस्यों ने  सर पर काफी ऊँचाईयों में मंडराते हुए ड्रोन कैमरे की ओर ईशारा किया। लगा सब प्रभु की माया है, हेलीकोप्टर नीचे और ड्रोन कैमरा हमारे ऊपर, हम बीच में कहीं। काहे का तथाकथित महानता का मुगालता-काहे का दंभ, काहे की तुलना और काहे का कटाक्ष। हम तो माता के दर्शन के लिए निकले थे, मंजिल पास थी, सो उस पर ध्यान केंद्रित कर सामने खड़ी मंजिल की ओर बढ़ चले।
मंजिल की पहली झलक - माँ सुरकण्डा परिसर

हम उस बिंदु पर थे, जहाँ से उड़न खटोले का काम चल रहा था। अगले कुछ ही महीनों में इसके तैयार होने के आसार हैं। कमजोर, बुजुर्ग और बीमार लोगों के लिए यह सुविधा वरदान सावित होने वाली है, जो पैदल चलकर या खच्चरों पर बैठकर यहाँ तक नहीं आ सकते। साथ ही यह भी लगा कि इस सुविधा के चलते कई स्वस्थ-सक्षम किंतु आरामतलब लोग इस राह के रोमाँच व सुंदर नजारों से बंचित रह जाएंगे। 
घाटी का विहंगम दृश्य और नीचे कद्दुखाल स्टॉप

सुरकुंडा देवी के दिव्य प्रांगण में
जुत्ताघर में जुता उताकर हम मंदिर के पावन परिसर में प्रवेश किए। आगे पहुँचे हुए सदस्य सब इधऱ-उधर तितर-बितर हो चुके थे। हम मंदिर की परिक्रमा कर मंदिर में प्रवेश किए, माता का दर्शन किए, आशीर्वाद लिए और बाहर मंदिर के पीछे एक कौने पर आसन जमाकर बैठ गए। सामने बर्फ से ढकी हिमालय की विराट ध्वल श्रृंखलाएं अपने दिव्य वैभव के साथ अटल तपस्वी जैसी खड़ीं थी, उस ओर मुंह कर कुछ पल चिंतन-मनन व ध्यान के विताए। 
हमारे विचार से सुरकुंडा शक्तिपीठ से हिमालय का पावन सान्निध्य इस स्थल को विशिष्ट बनाता है। यहाँ विताए कुछ पल बैट्री चार्ज जैसा अनुभव रहते हैं।
मंदिर परिसर से सुदूर गढ़वाल हिमालय पर्वत श्रृंखला के दिव्य दर्शन

काफिले का फोटो और सेल्फी अभियान जारी था। आग्रह पर हम भी बीच में शामिल हो गए और अंत में सबको बटोरकर एक ग्रुफ फोटो के बाद भगवती को अपना भाव निवेदन करते हुए बापिस चल दिए।
छात्र-छात्राओं के संग शिक्षकगण - यादगार पल

ज्ञातव्य हो कि सुरकुंडा माता वह शक्तिपीठ है, जहाँ सती माता का सर व कंठ बाला हिस्सा गिरा था, इसलिए इसका नाम सरकंठ पड़ा, जो क्रमशः बदलते-बदलते सुरकुंडा हो गया। यहाँ नवरात्रियों व ज्येष्ठ माह के गंगा दशहरा के दौरान विशेष भीड़ रहती है। आज यहाँ भीड़ उतनी अधिक नहीं थी। 
मंदिर परिसर में हनुमान, शिव-परिवार सहित अन्य देवी-देवताओं के विग्रह स्थापित हैं, जो हिमालय की पृष्ठभूमि में विशिष्ट भाव जगाते हैं।
हिमालय अधिपति शिव-शक्ति 
     
मंदिर का नवनिर्माण पिछले ही वर्षों हुआ है, जो एक विशेष शैली में है। इस शैली का मंदिर हम पहली वार देखे। यह इस क्षेत्र के सबसे ऊँचे शिखर पर स्थापित है, जहाँ से देहरादून, ऋषिकेश, प्रतापनगर एवं चकराता साइड के सुंदर दृश्यों को निहारा जा सकता है। मौसम साफ होने पर कुंजादेवी, चंद्रबदनी सहित केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री क्षेत्र की समस्त चोटियों के दर्शन किए जा सकते हैं। 

हिमालय कुछ कह रहा है...

सामने बर्फ से ढकी सफेद चोटियों के दर्शंन तो हमें भी हो रहे थे, लेकिन ये कौन सी चोटियां हैं, बताने वाला यहाँ भी कोई नहीं मिला, सो इस अनुतरित प्रश्न के साथ हम बापिस चल पड़े।
बापसी का रास्ता
बापिसी में घाटी के विहंगम दर्शन

इस जिज्ञासा के साथ हम बापिस कद्दुखाल तक नीचे उतरे। उतरने में अधिक समय नहीं लगा। चढ़ाई जहाँ लगभग 2 घंटे में तय हुई थी, उतराई महज पौने घंटे में पूरी हो गयी। उतराई में हम अघोषित नियमानुसर सबसे आगे थे। रास्ते में बुराँश के पेड़ हमें विशेष रुप में प्रभावित करते रहे, लगा कि अप्रैल-मई में फूलने पर इनके सुर्ख लाल फूलों से गुलजार इनके जंगल कितने सुंदर लगते होंगे।
देहरादून साइड की खुबसूरत वादियाँ

जहाँ थोड़ा दम भरना होता, वहाँ खड़ा होकर नीचे की घाटी के विहंगम दृश्य को निहारते, जो स्वयं में अद्भुत, मनोरम एवं बेजोड़ हैं। लगता इन्हें निहारते हुए यहीं ठहर जाएं, लेकिन समय की सीमा इसकी इजाजत नहीं दे रही थी। 
पूरा काफिला धीरे-धीरे उस बिंदु तक आ रहा था, जहाँ से ट्रेक शुरु हुआ था। यहाँ भूखे खच्चर सड़क किनारे घास चर रहे थे।
पैदल ट्रेकिंग मार्ग और घास चरते घोड़े

नीचे कद्दुखाल उतरकर पूरे समूह ने भोजन किया। महज 60 रुपए में पूरी थाली और गर्मागर्म रोटियाँ। भूख लगने पर भोजन का आनन्द कई गुणा बढ़ गया था। बाहर छत से नीचे घाटी का नजारा देखने लायक था। यहाँ तेज हवा चल रही थी, ठंड़ काफी बढ़ चुकी थी, बंद पड़े स्वाटर-जैकेट अब काम आ रहे थे। साथ में दूसरे पाठयक्रमों के बच्चों के साथ धीरे-धीरे जान-पहचान हो रही थी और इनकी बालसुलभ जिज्ञासाओं का समाधान करते-करते एक आत्मीयतापूर्ण भाव स्थापित हो चुका था तथा कुछ नाम याद भी हो गए थे। पूरे ग्रुप का अनुशासन व सहयोग काबिले तारीफ रहा। पूरा ट्रिप एक यादगार सफर के रुप में कई सुखद अनुभवों के साथ स्मृतिपटल पर अंकित रहेगा।
ढलती शाम और अंधेरे में बापसी का सफर
कद्दुखाल -धनोल्टी - मसूरी सड़क
शाम को साढ़े चार तक हम कद्दुखाल से चल चुके थे। ढलती शाम के साथ सफर आगे बढ़ रहा था। रास्ते में अँधेरा हावी हो चुका था। रात को सेलुपानी स्थान पर बस चाय के लिए रुकी। आधी सवारियाँ दिन भर की ट्रेकिंग से थकी निद्रादेवी की गोद में थीं। आगे रास्ते में कब हेंवल नदी पार हो गयी और आगराखाल पहुँचे, पता ही नहीं चला। अंधेरा होने के कारण बापसी में कुंजापुरी के दर्शन अब संभव नहीं थे। 
ऋषिकेश - रात के अंधेरे में टिमटिमाता शहर

यहाँ से नीचे डोईबाला और ऋषिकेश साइड के मैदानी इलाकों की शहरी रोशनियाँ ऐसे जगमगा रहीं थीं, जैसे कि दिपावली का नजारा हो। जब हम नरेंद्रनगर से नीचे उतर रहे थे, तो नीचे देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे आसमान के तारे जमीं पर उतर आए हों।
रात के अंधियारे में टिमटिमाता ऋषिकेश

शहर के रोशन नजारे को निहारते हुए हम क्रमशः 8 बजे तक ऋषिकेश पहुँचे और अगले आधे घंटे में देसंविवि के गेट पर थे। इस तरह पूरे 12 घंटे में हम सुरकुंडा देवी का यह यादगार सफर पूरा कर रहे थे

पहली बार दिन के उजाले में तय किया गया यह रास्ता हमारे ऑल टाइम फेवरेट रास्तों में शुमार हो चुका है। शायद इसका प्रमुख कारण इतना नजदीक से बर्फ से ढके हिमालय के दीदार थे, जो दूर होते हुए भी हमें बहुत पास लगे और हिमालय की गोद में सफर के अनुभव हमें कहीं गहरे अपने अंदर भावों की सुरम्य घाटियों व शिखरों के बीच विचरण के रोमाँचक अहसास जगा रहे थे, जो यात्रा वृतांत की तीन कड़ियों के रुप में आपके सामने प्रस्तुत हैं।
इस यात्रा के पहले दो भाग यदि न पढ़े हों, तो नीचे लिंक्स पर देख सकते हैं -

सुरकुण्डा देवी का यादगार सफर, भाग-1 (ऋषिकेश-नरेंद्रनगर-चम्बा)

सुरकुण्डा देवी का यादगार सफर, भाग-2 (चम्बा, कानाताल,कद्दुखाल)

 
हिमालय का ट्रेकिंग एडवेंचर का आवाह्न
 

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