बुधवार, 29 नवंबर 2017

मेरा गाँव मेरा देश - हिमालय की गोद में बचपन की यादों को कुरेदती एक यात्रा

कुल्लू से रायसन वाया व्यासर-माछिंग

बादलों के संग कुल्लू-मानाली घाटी का मनोरम दृश्य

2011 के नवम्बर माह में सर्दी का दौर शुरु हो चुका था। कितने वसन्त विताए होंगे, सामने पश्चिम की ओर की घाटी को घर से निहारते हुए। पर्वत शिखरों पर सुबह का स्वर्णिम सूर्योदय, फिर धीरे-धीरे धूप का पहाड़ की चोटी से घाटी में नीचे उतरना, घरों में लगे सीसों से टकराकर झिलमिलाना। फिर नीचे ब्यास नदी को छूकर हमारी घाटी में प्रवेश और धीरे-धीरे खेत-खलियान, बगीचों से होते हुए सूर्योदय का आलौकिक नजारा। पूर्व की ओर से पहाड़ियों के शिखर पर आसमान को छूते देवदार के वृक्षों के पीछे से सूर्य भगवान का प्रकट होकर पूरी घाटी को अपने आगोश में लेना।

सामने पहाड़ की गोद में बसी घाटी को बचपन से निहारते आए थे, हर मौसम में इसके अलग-अलग रुप-रंग, मिजाज व स्वरुप को देख चुके थे, लेकिन सब दूर से, घाटी के इस ओर से। चाहते हुए भी संयोग नहीं बन पाया था उस पार जाने का। मन था कि कभी उस पार गाँवों को पार करते हुए उस पहाड़ी के शिखर तक जाएंगे, वहाँ से चारों ओर क्या नजारा रहता है, इस रहस्य को निहारेंगे। लेकिन यह सब खुआब ही बना रहा। तब उस पार के लिए कोई पक्की सड़क थी नहीं, जहाँ से होकर किसी वाहन से होकर आसानी से वहाँ घूमकर आया जा सके। उस पार के गाँवों (माछिंग, बवेली, बनोगी, नलहाच) से बच्चे हमारे गाँव के मिडल स्कूल में पढ़ने आते थे। वे पहाड़ों व नदियों को लाँघते हुए रोज पैदल ही यहाँ आते और बापिस घर जाते।

हिमाच्छादित घाटी से उतरता सूर्योदय

लेकिन आज लगभग तीन दशकों के बाद स्थिति पूरी तरह से पलट चुकी है। आज उस पार घाटी में पहाड़ों को आर-पार चीरते हुए सड़क बन चुकी हैं। कुल्लु से रायसन तक वाया माछिंग-व्यासर इसका मुख्य लिंक रोड़ है। आज इसी घाटी को एक्सप्लोअर करने का मन था, भाईयों के साथ। वाहन की व्यवस्था हो चुकी थी। बचपन की चिरआकाँक्षित इच्छा पूरा होने वाली थी कि उस पार की घाटी व पहाड़ों के नजदीक से अवलोकन का तथा यह जानने का कि वहाँ से हमारा गाँव व घाटी कैसी दिखती है।

घर से यात्रा शुरु होती है, पहले लुग्डीभट्टी से होकर रामशीला, कुल्लू वाइपास पहुँचते हैं। मुख्य मार्ग से भेखली मार्ग पर चल पड़ते हैं। जैसे-जैसे जलेबी सड़क पर आगे बढ़ते हैं, ऊपर चढ़ते हैं, बैसे बैसे नीचे कुल्लू-अखाड़ा बाजार का तथा उस पार खराहल घाटी का विहंगम नजारा निखरता जाता है। 

ब्यास नदी के संग खराहल घाटी कुल्लू का नजारा

कुछ ही देर में हम भेखली गाँव के नीचे से गुजरते हैं, यहाँ कन्या रुप में भगवती का रुप भेखली माता प्रतिष्ठित हैं, मालूम हो कि भेखली माता का कुल्लू के दशहरे के साथ रोचक सम्बन्ध है। भगवती की ओर से आदेश मिलने के बाद ही दशहरे का आगाज होता है। भेखली धारा से पंचम स्वरों में घोषणा होती है, ईशारा किया जाता है, जिसे पाकर फिर सुलतानपुर से रघुनाथजी की यात्रा शुरु होती है और ढालपुर मैदान में रथ यात्रा के साथ कुल्लू के दशहरे का शुभारम्भ होता है।
 
भेखली गाँव की राह में

भगवती को दूर से ही अपना भाव निवेदन करते हुए हम यहाँ से आगे बढ़ते हैं, अब यात्रा कोंगती गाँव को पार करते हुए उत्तर की ओर कुछ चढ़ाईदार सड़क के संग आगे बढ़ रही थी। रास्ते में देवदार के घने जंगल से प्रवेश होता है। रास्ते में स्कूल के बच्चे मिलते हैं, जो पैदल अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। इनको देखकर अपने बचपने के दिनों की याद आना स्वाभाविक थी। रास्ते में बनोगी और नलहाच गाँवों की झलक मिलना शुरु हो गई थी। इनके पास साथ ही पहाड़ियों के ऊपर जड़े टावर भी, जो हमारे गाँव के ठीक सामने पड़ते हैं। 

पहाड़ की गोद में बसे बनोगी-नलहाच गाँव की ओर

कुछ ही मिनटों में हम गाँव के बीच से गुजर रहे थे। यहाँ पारम्परिक लकड़ी के घर अधिक दिखे, साथ ही खेतों में मक्का की फसल अपने अंतिम चरणों में थी। कुछ छत्तों पर मक्की के लालिमा लिए भुट्टे सूख रहे थे। मालूम हो कि यहाँ इनको स्लेट की छत पर कई दिनों तक धूप में सुखाया जाता है और फिर सूखने पर भारी लट्ठों के सहारे इनकी मंडाई की जाती है, जिससे बीज अलग हो जाते हैं, जिन्हें फिर बोरी में एकत्र किया जाता है और पारम्परिक रुप में घराटों (पानी से चलने वाली पहाड़ी चक्की) में इनका आटा तैयार किया जाता था, जबकि आज बिजली से चलने वाली चक्कियों में आटा पीसा जाता है। 

छत पर सूखते मक्की के भुट्टे

किसी जमाने (अस्सी के दशक) में जब हम कुल्लू के स्कूल में पढने जाया करते थे, तो इस घाटी के मेहनतकश लोग प्रचूर मात्रा में उपलब्ध सूखी लकड़ी तथा घास को वहुतायत में बाजार में बेचा करते थे, आज समय के साथ फल-सब्जी उत्पादन की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है, हालाँकि इस क्षेत्र में कृषि के पारम्परिक तौर तरीके अभी भी बर्करार दिख रहे थे।

लो हम एक ऐसे बिंदु पर आ गए थे, जहाँ से सामने का नजारा स्पष्ट था। गाड़ी को साइड में रोककर यहाँ से नदी के पार अपने गाँव, घाटी, पहाड़ों का अवलोकन करने के लिए बाहर निकलते हैं। 

सामने ब्यास नदी के संग हिमालयन गाँव-घाटी का विहंगम दृश्य

हमारा रोमाँचित होना स्वाभाविक था सामने के विहंगम दृश्य को देखते हुए, जिसकी गोद में हमारा बचपन और किशोरावस्था बीती थी। नजारे को जीभर कर निहारते रहे, यथासम्भव हर एंग्ल से केप्चर करते रहे। सूर्यास्त का नजारा, घाटी में पीछे की ओर चढ़ते सूरज के साथ अद्भुत लग रहा था।

इस स्थान पर हवा बहुत तेज बह रही थी। कुछ देर तसल्लीबख्श अवलोकन एवं फोटोग्राफी के बाद फिर हम गाड़ी में बैठकर आगे चल देते हैं। घाटी के नाले को पार कर जंदोउड़ गाँवों से होकर गुजरते हैं। यहाँ भी विकास की व्यार के स्पष्ट दर्शन हो रहे थे। सड़क के दोनों ओर सेब के बगीचे तैयार हो रहे थे, हालाँकि अभी ये प्रारम्भिक अवस्था में थे। गाँव तक बिजली, पानी, स्कूल व सड़कों की बुनियादी सुबिधाएं पहुँचने के साथ निश्चित रुप में लोगों के जीवन स्तर में इजाफा होता दिख रहा था। आज समय अधिक नहीं था कि किसी ढावे पर बैठकर या गाँववासियों से इस बारे में कुछ गुप्तगुह व चर्चा की जाए।

सामने शिखर की गोद में बसा व्यासर गाँव

 अब हमारा प्रवेश पहाड़ के पीछे एक नई घाटी के व्यासर गाँव में हो रहा था, जो हमारे गाँव से नहीं दिखता है, बस चर्चा में अपने बुजुर्गों से इसकी बातें सुनते रहे थे। क्योंकि पहाडों की ओट में छिपे इस गाँव में बादल पहाडियों में घिर जाते हैं और बरसकर ही बाहर निकल पाते हैं। अतः यहाँ खूब बारिश होती है, ऊँचाई भी ठीक-ठाक है। कुल्लू-नग्गर सड़क पर काईस गाँव की ओर अपने खेतों से तो इसकी हल्की सा झलक कई बार पा चुके थे, लेकिन नजदीक से इसको आज पहली बार देख रहे थे। प्रवेश करते ही सड़क के ऊपर नीचे सेब के बाग दिखे। शाम हो रही थी, अतः बहुत रुकने का समय नहीं था, लेकिन गाँव का विहंगम अवलोकन करते हुए हम पार हो जाते हैं, जहां से उस पार पीछे की ओर खराहल खाटी के सहित बिजली महादेव की झलक मिल रही थी।

कुल्लू घाटी के शिखर पर बिजली महादेव के दूरदर्शन

मालूम हो की इस घाटी एवं फाटी में सितम्बर माह में फुंगली का मेला हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, जब लगभग हर गाँव के लोग इसमें भाग लेते हैं। इसके तहत गाँवों के पीछे शिखर पर बसे बुग्यालों का पैदल आरोहण होता है, ट्रैकिंग की जाती है। और शिखर पर स्थित भुंगली माता को भेंट व श्रद्धाँजलि दी जाती है। फुंगली चोटी का ट्रैकिंग रुट अद्भुत दृश्यावलियों से भरा हुआ है, जिसे प्रकृति प्रेमी घुमक्कड़ ट्रैक करते रहते हैं।

व्यासर गाँव के वायीं और पहाड़ में एक स्पाट चट्टान है, जो हमारे गाँव से दिखती है, माना जाता है, जिसको महाभारत कालीन पाण्डवों के अज्ञातवास से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि पाण्डव यहाँ से गुजरे थे। इसके थोड़ा आगे एक व्यू प्वाइंट पर हम फिर रुकते हैं। यहाँ पर ढलती शाम के संग घाटी के कुछ यादगार फोटो लेते हैं। अब यहाँ से सामने काईस, सोईल, राऊगी नाला आदि गाँव दर्शनीय थे और ऊपर की ओर नग्गर, कटराईं, बड़ाग्राँ तथा अप्पर बैली के पहाड़। 

 कुल्लू-मानाली, अप्पर वैली का विहंगम दृश्य

रास्ते में ही हमें हिमाचल पथ परिवहन की एक लोकल बस मिली, जो इस रुट पर अपनी सेवा दे रही थी। यह संभवतः इसकी दिन की अंतिम पारी थी।

आगे फिर घने जंगलों और सेब के बगानों के बीच हमारा सफर पूरा होता है। रास्ते में जल्लोहरा गाँव को पार करते हुए आगे, शील्ड गाँव के सामने से गुजरते हैं, जहाँ रामगढ़िया के सेब के विशाल बागान मिलते हैं। मालूम हो कि बागवानी इस क्षेत्र में आर्थिकी का एक प्रमुख आधार है, जिसे प्रगतिशील एवं पढ़े-लिखे बागवानों ने समय रहते अपनी पहल के आधार पर अपनाया। यह बगीचा इसी का एक उदाहरण है। रास्ते में हमें अंधेरा हो चुका था। इसी को चीरते हुए हम नीचे मुख्य मार्ग में रायसन पहुँचते हैं, यहाँ पुल पार कर लेफ्ट बैंक से होते हुए काईस को पार करते हुए अपने गाँव में प्रवेश करते हैं।

पूरी यात्रा के साथ हमारे मन में बचपन से जेहेन को कुरेदती कई जिज्ञासाओं तथा कौतुहलों के समाधान मिल गए थे। इस क्षेत्र का नक्शा भी काफी साफ हो चुका था। साथ ही आगे के लिए कुछ नई यात्राओं का आधार भी तैयार हो गया था। शायद यात्राओं का उद्देश्य कुछ ऐसा ही रहता है, जो हमें कुछ शिक्षित करती हैं, कुछ आनंदित करती हैं, कुछ हमारे ज्ञान के दायरे को बढ़ाती हैं तथा स्मृति कोश में कुछ सुखद अनुभवों को जोड़कर जीवन को समृद्ध करती हैं।
 
हिमालय शिखरों पर सूर्यास्त, देवभूमि कुल्लू घाटी

सोमवार, 20 नवंबर 2017

पुस्तक सार, समीक्षा - वाल्डेन


प्रकृति की गोद में जीवन का अभूतपूर्व दर्शन

वाल्डेन, अमेरिकी दार्शनिक, विचारक एवं आदर्श पुरुष हेनरी डेविड़ थोरो की कालजयी रचना है। मेसाच्यूटस नगर के समीप काँकार्ड पहाड़ियों की गोद में स्थित वाल्डेन झील के किनारे रची गयी यह कालजयी रचना अपने आप में अनुपम है, बैजोड़ है। प्रकृति की गोद में रचा गया यह सृजन देश, काल, भाषा और युग की सीमाओं के पार एक ऐसा शाश्वत संदेश  लिए है, जो आज भी उतना ही ताजा और प्रासांगिक है।
ज्ञात हो कि थोरो दार्शनिक के साथ राजनैतिक विचारक, प्रकृतिविद और गुह्यवादी समाजसुधारक भी थे। महात्मा गाँधी ने इनके सिविल डिसओविडियेंस (असहयोग आंदोलन) के सिद्धान्त को स्वतंत्रता संघर्ष का अस्त्र बनाया था। यह थोरो का विद्रोही स्वभाव और प्रकृति प्रेम ही था कि वे जीवन का अर्थ खोजते-खोजते एक कुटिया बनाकर वाल्डेन सरोवर के किनारे वस गए। 
 थोरो के शब्दों में, मैने वन-प्रवास आरम्भ किया, क्योंकि मैं विमर्शपूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहता था, जीवन के सारभूत तथ्यों का ही सामना करना चाहता था, क्योंकि मैं देखना चाहता था कि जीवन जो कुछ सिखाता है, उसे सीख सकता हूँ या नहीं। मैं यह भी नहीं चाहता था कि जीवन की संध्या वेला में मुझे पता चले कि अरे, मैंने तो जीवन को जीया ही नहीं। मैं तो गहरे में उतरना चाहता था।
इस उद्देश्य पूर्ति हेतु थोरो मार्च 1845 के वसन्त में वाल्डेन झील के किनारे पहुँच जाते हैं, और अपनी कुटिया बनाते हैं। चीड़ के वन से ढके पहाड़ी ढाल पर अत्यन्त मनोरम स्थान पर वे काम करते, जहाँ से झील का नजारा सहज ही उन्हें तरोताजा करता। झोंपड़ी के आस-पास की दो-ढाई एकड़ जमीन में बीन्स, आलू, मक्का, मटर, शलजम आदि उगाते हैं।

इस वन प्रवास में जंगली जीव उनके साथी सहचर होते। इस निर्जन स्थल पर प्रकृति की गोद में थोरो जीवन के सर्वोत्तम क्षण महसूस करते। जब वसन्त ऋतु या पतझड़ में मेह के लम्बे दौर के कारण दोपहर से शाम तक घर में कैद रहना पड़ता, तो ये थोरो के लिए सबसे आनन्दप्रद क्षण होते। एकांत प्रिय थोरो के अनुसार, साधारणतय संग-साथ बहुत सस्ते किस्म का होता है। हम एक-दूसरे से जल्दी-जल्दी मिलते रहते हैं, इसलिए एक-दूसरे के लिए कोई नई चीज सुलभ करने का मौका ही नहीं मिलता।...कम बार मिलने पर ही हमारी सबसे महत्वपूर्ण और हार्दिक बातचीत हो सकती है।
थोरो की दिनचर्या उषाकाल में शुरु होती। प्रातःकाल की शुद्ध वायु को थोरो सब रोगों की महाऔषधि मानते। अगस्त माह में जब हवा औऱ मेंह दोनों थम जाते और मेघों वाले आकाश के नीचे तीसरे पहर की नीरवता छा जाती तथा पक्षियों का संगीत इस किनारे से उस किनारे तक गूँज उठता, उस समय सरोवर का सान्निध्य सबसे मूल्यवान लगता।

कृषि को थोरो एक पावन कर्म मानते थे। थोरो सुबह पाँच बजे उठकर कुदाली लेकर जाते, दोपहर तक खेत की निंढाई-गुढ़ाई करते और दिन का शेष भाग दूसरे काम में गुजारते। थोरो सादा जीवन, उच्च विचार के हिमायती रहे। उनका वन प्रवास इसका पर्याय था। थोरो के शब्दों में - सैंकड़ों-हजारों कामों में उलझने के बजाय दो-तीन काम हाथ में ले लीजिए। अपने जीवन को सरल बनाइए, सरल। समूचे राष्ट्र की हालत, समुचित ध्येय के बिना दुर्दशाग्रस्त है। इसका एक ही इलाज है - सुदृढ़ अर्थव्यवस्था, जीवन की कठोर सादगी और ऊँचा लक्ष्य। इसके बिना अभी तो मानव बर्बादी के रास्ते पर चल रहा है।
थोरो जंगल प्रवास में हर पल जी भरकर जीए तथा इसी का वे संदेश देते हैं। उनके अनुसार - लोग समझते हैं कि सत्य कोई बहुत दूर की, दूसरे छोर की, दूर तारे के उस पार की । जबकि ये स्थान, काल, अवसर आदि सभी यहीं पर हैं, अभी इसी क्षण हैं। स्वयं ईश्वर का महानतम रुप वर्तमान में ही प्रकट होता है।...हम अपना एक दिन प्रकृति के समान संकल्पपूर्वक बिताकर तो देखें और छोटी-मोटी बाधा से पथ-भ्रष्ट न हों। प्रातः जल्दी उठें और शांत भाव से व्रत रखें। हम यथार्थ की ठोस चट्टानी जमीन पर नींव डालकर स्थिर होकर खड़े होकर तो देखें। जीवन का अर्थ बदल जाएगा। थोरो इस तरह प्रयासपूर्वक अपने जीवन का उत्थान करने की संशयहीन क्षमता को सबसे उत्साहबर्धक चीज मानते थे।

जीवन के सचेतन विकास के लिए थोरो स्वाध्याय पर विशेष बल देते और स्वयं भी ग्रंथों के संग समूचे आध्यात्मिक जगत की यात्रा का लाभ लेते। उनके अनुसार, क्लासिक ग्रन्थ मानव की श्रेष्ठतम संग्रहित विचार पूंजी हैं, इनमें देववाणी निहित है और इनका अध्ययन एक कला है। इनसे कुछ सीखने के लिए हमें पंजों के बल खड़ा होना पड़ता है, जीवन के सबसे जागरुक और सतर्कतम क्षण अर्पित करने होते हैं। थोरो का वन प्रवास बहुत कुछ इसी का पर्याय रहा।
वे नित्य भगवद्गीता के विराट विश्वोत्पत्ति सम्बन्धी दर्शन का अवगाहन करते। उनके शब्दों में, इसके सामने हमारा आधुनिक संसार औऱ साहित्य अत्यन्त तुच्छ और महत्वहीन लगता है। इसकी विराटत्व हमारी कल्पना की अवधारणाओं से भी परे का है। इसके परायण के साथ थोरो वाल्डेन औऱ गंगा के पवित्र जल को आपस में मिलता देखते।

शाकाहर के पक्षधर - विगत सालों में मैंने अनेक बार महसूस किया है कि मैं जब भी मछली मारता हूँ, तो हर बार थोडा-सा आत्म-सम्मान घट जाता है। हर बार मछली मारने के बाद अनुभव किया है कि यदि मैंने यह न किया होता तो अच्छा होता।...मेरा विश्वास है कि जो भी अपनी श्रेष्ठतर मनोवृतियों को उत्तम अवस्था में सुरक्षित रखने का इच्छुक होता है, वह मांसाहार और किसी भी प्रकार के भोजन से बचने की ओर मुड़ता है। फिर, अधिक खाना तो कीट की लार्वावस्था ही में होता है।
सरोवर के तट पर दो वर्ष, दो माह, दो दिन के बाद थोरो यहाँ से विदा लेकर जीवन के अगले पड़ाव की ओर रुख करते हैं। सरोवर के तट पर प्रकृति की गोद में विताए अनमोल पलों को वाल्डेन के रुप में एक कालजयी रचना भावी पीढ़ी को दे जाते हैं, जिसका अवगाहन आज भी सुधि पाठकों को तरोताजा कर देता है।

बुधवार, 8 नवंबर 2017

मेरा गाँव, मेरा देश – मौसम सर्दी का और यादें बचपन की


तैयारी पूरी हो तो सर्दी से अधिक रोमाँचक कुछ नहीं


सर्दी का मौसम आ चला। जैसे ही पहाड़ों में बारिश क्या हुई, पर्वत शिखरों ने बर्फ की हल्की सी चादर ओढ़ ली और सर्दी ने दरबाजे पर दस्तक दे दी। जीवन के असली आनन्द का मौसम आ गया। हालाँकि शीत लहर के चलते देश-दुनियाँ में होने वाले नुक्सान के साथ पूरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहना चाहूँगा कि यदि सर्दी का इंतजाम पूरा हो तो इससे अधिक रोमाँचक और सुखद शायद ही कोई दूसरा मौसम हो। पतझड़ के साथ आते शिशिर ऋतु के अपने ही रंग हैं, ढंग हैं, मजे हैं और अपने ही आनन्द हैं, जिनको अपने बचपन की यादों के समृद्ध स्मृति कोश से बाहर निकालकर गुदगुदाने की अपनी ही मौज है। अपने बचपन के घर से दूर, बहुत दूर, फुर्सत के पलों में हम इतना तो कर ही सकते हैं।
दशहरा आते ही हमारे गाँव में सर्दी की शुरुआत हो जाती थी, क्योंकि हम ऊनी कोट पहनकर दशहरे के कलाकेंद्र में रात्रिकालीन प्रोग्राम देखने जाया करते थे। दशहरे के ठीक 20 दिन बाद दिवाली तक ठंड़ की मार ठीक ठाक अनुभव होती थी, जिसका स्वागत हम खेतों में तिल के सुखे गट्ठों को जलाकर किया करते थे।


सर्दी की तैयारियाँ समय से पहले ही शुरु हो जाती थी। खेतों में सूखे पेड़ों के तने, जड़ों व ठूँठों पर कुल्हाड़ी से फाड़ कर इन्हें बटोरते। और मजबूत लकड़ी के लिए जंगल की ओर रुक्सत करते। बोन(बाँज) की सूखी लकडियों सबसे मजबूत मानी जाती थी, जिनसे ऊमदा किस्म का कोयला तैयार होता था। इसके साथ कोऊश (अतीश) की लकड़ी आसानी से कट जाती थी। सुबह भौर होते ही किल्टा और कुल्हाड़ी लेकर हम परिवार के बड़े-बुजुर्गों व भाईयों के संग जंगल जाया करते। सूर्योंदय तक घर बापिस हो जाते। इसके साथ युवाओं की टोली बीहड़ बन की गहराईयों में सूखे चील-देवदार-कैल आदि के सीधे, सूखे तनों को गेल(लम्बे लट्ठे) बनाकर इनको कुंदे व रस्सी में बाँधकर दरघीश (लट्ठों को घसीटने का बना मार्ग) से होकर घसीटकर घर तक लाते। ग्रामीण युवाओं के बीच इसका एक अलग ही रोमाँच रहता।
 जैसे-जैसे हम पहाड़ी में ऊपर चढ़ते, घर-गाँव की छतों पर छाया धुआँ घरों में जल रहे चूल्हों व पक रहे भोजन की चुग्ली करता। यह धुआँ लोकजीवन का सहज हिस्सा था, जिसका आज के दमघोंटू प्रदूषण से कोई वास्ता नहीं था। घर में सुलग रहे तंदूर में लकड़ी के टुकडों का हवन होता। इनके सुलगते टुकड़ों की गर्मी तंदूर की चादर से विकरित होकर कमरे के हर कौने को गर्म रखती। तंदूर पर पानी का बर्तन गर्म होता रहता, जिससे बीच-बीच में हॉट ड्रिंक की व्यवस्था होती रहती। गैंहू, मक्का, सोयावीन की धाणा (पॉपकोर्न) भूनना ऐसे में प्रिय शग्ल रहता। इसे गुड़ व अखरोट के साथ खाने का अपना ही मजा रहता। ठंड ज्यादा होती तो, चाय-पकौड़ी का विशेष इंतजाम रहता।

बैसे सेब, प्लम की प्रूनिंग से कटी टहनियाँ देशी चूल्हे के लिए आदर्श ईँधन रहतीं। इसके साथ कोहू, बोन(बाँज) जैसी हरि पत्ती वाली लकड़ियाँ भेड़-बकरियाँ के चरने के बाद आँगन के किनारों पर सूखने के लिए ढेर लगाकर रखी जाती। खुले चूल्हे के लिए ये बेहतरीन ईँधन साबित होती।

सर्दी का असली नजारा बर्फवारी के साथ शुरु होता। तापमान जमाब बिंदु के आसपास आ गिरता। पहाड़ियों व सामने के ऊँचाई पर बसे गाँव तक बफ गिरने के साथ घाटी का नजारा कुछ ओर रहता। सुबह हिमाच्छाति ध्वल शिखर से स्वर्णिम सूर्योदय सदैव दिव्य भाव झंकृत करता। घर-गाँव में बर्फ गिरने पर तो जीवन तंदूर के ईर्द-गिर्द सिमट जाता, क्योंकि बाहर कोई खास काम नहीं रहता। लोकजीवन इन पलों में जैसे ठहर सा जाता, कमरों तक सीमित हो जाता। बड़े बुजुर्गों से कथा कहानी सुनना, पहेली बुझाना ऐसे में पसंदीदा टाइमपास काम रहते। बच्चों की आपसी उछल-कूद के साथ घर में भेड़-बकरी के मेंमनों के बाढ़े में घुसकर उनके बीच खेलना रुचिकर काम रहते। (उस बक्त कैमरा एक दुर्लभ यंत्र था, अतः किन्हीं फोटो के साथ अनुभव शेयर करना संभव नहीं)


आंगन में पत्थर के ऊखलों में पानी की मोटी परत जमी रहती, जिनके शुभ दर्शन सुबह-सुबह होते। रास्ते में पानी के स्रोतों के पास बर्फ की मोटी परतों को डंडे या पत्थरों से तोड़कर सीसे के आकार के टुकडों से खेलते। घास पर औंस की जमीं बूंदें राह में स्वागत करती। पूरा खेत जैसे पाले की एक हल्की सफेद चादर ओढ़े दिखता। ठंड के चर्म पर पानी के नल जम जाते। रात को इनसे झरती पानी की बूंदें सुई का रुप लेकर नल से लटकती दिखती। जैसे ही सूर्योदय होता, जमी बर्फ की परत पिघलना शुरु होती। पूरे खेत व रास्ते में कीचड-कीचड़ हो जाता।

 

परीक्षा के दिनों में तंदूर से हटकर बाहर बरामदे में ठंड़ में पढ़ने का ऱोमाँच कुछ ओर ही रहता। दिन को छत पर धूप में बैठकर खेत व वादी का विहंगावलोकन करते हुए पढ़ना एक अलग ही अनुभव था। दोपहर शाम को खेत में किसी चट्टान या मखमली घास पर आसन जमाकर एकांत में अध्ययन का अपना ही आनन्द रहता।
धान की पुआल से माँदरी (चटाई) बनने की कबायत चलती। गाँव के हर घर में प्रायः महिलाओं को दिन की धूप में इसको बुनते व्यस्त देखा जा सकता था। घर के एक कौने में बने हथकरघे में पट्टू व ऊनी कम्बल तैयार होते। फुर्सत के समय में महिलाएं ऊन की जुरावें, दस्ताने व स्वाटर बुनने में मश्गूल रहती। तब घर में भेड़-बकरियाँ बहुतायत में थी, ऐसे में बुजुर्गों को इनकी ऊन को तकली से कातते देखते, जो आज किन्हीं बिरले घरों तक सीमित हैं। 


घर की छत्तों पर रंग-विरंगे कद्दू सूखने के लिए रखे होते, जो अपना ही रंग बिखेरते - लाल, हरे, पीले व भूरे। जापानी फल के पीले पत्ते वाले पेड़ बहुत सुंदर लगते। इसी तरह खनोर(चेस्टनेट) के बड़े-बड़े पेड़ पीले आच्छादन के साथ अपना रंग बिखेरते।
ठंड में धूप का अलग ही आनन्द रहता। सुबह की ठंड में अकड़ी नस-नाडियाँ जैसे बाहर आंगन में धूप सेकते ही खुल जाती, चैतन्य हो उठती। इसके साथ गाँव का नाला व ब्यास नदी का निर्मल जल हिमालयन टच लिए रहते। ब्यास नदी के किनारे बिहाल (विहार) में अतीश के सूखे पत्ते बटोरने का क्रम खूब चलता। सुबह व शाम को गाँव की महिलाओं व बच्चों को किल्टों में बटोरकर इनकी पुआली को ले जाते देख सकते थे। नदी के किनारे कूल्हों(पानी की छिछली धार) में मछली पकड़ने का खेल खूब चलता। बच के दलदल में बनमुर्गी को पकड़ने की कसरत, अपने पसंदीदा खेलों में शुमार रहता।


पतझड़ के कारण सेब, अखरोट, खुमानी से लेकर अतीश के पेड़ अस्थि पंजर से खड़े दिखते। इनकी विरलता के बीच गाँव, घाटी पर ब्यास नदी के उसपार आईटीबीपी कैंप का नजारा स्पष्ट दिखता। सूखते पीले पत्ते, बगानों को पीले रंग से पोत देते। घाटी में पीले, हरे व भूरे पैच प्रकृति के कैन्वास पर उस अदृश्य जादूगर की कारीगरी की बेमीसाल झलक देते और जब आसमान में बादल भी रंग बिरंगे व नाना आकार के उमड़ते-घुमड़ते दिखते, तो नजारा कुछ ओर ही रहता।


घास के टूहके सूखे मक्का की घास से लदे रहते। इसमें कौओं द्वारा छुपाए अखरोटों का जखीरा बच्चों को खूब भाता। पेड़ में बचे अखरोट सूखकर खुद व खुद गिरते रहते, जिनको बटोरना अपने आप में एक सुखद अहसास रहता। जो सूखे अखरोट छिलकों से झांक रहे होते, उन पर पत्थर से निशाना लगाने की होड़ बच्चों में लगी रहती। इसी के बीच फूलों के नाम नरगिस का फूल अपनी ध्वल फूल पतियों के बीच सोने के कटोरे को समेटे हवा में मादक सुगन्ध बिखेरने लगता। इसी के साथ शिशिर के समाप्न व बसन्त के शुभ आगमन का संकेत मिलता। अब पूरी शीतऋतु में तपस्वियों सा वेश धारण किए, शीत निद्रा में सोए तमाम वृक्ष एवं पेड़-पौधे कलियों में सिमटे पुष्पों के साथ वसन्त के स्वागत के लिए तैयार होते।

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