शुक्रवार, 18 जून 2021

मेरा गाँव मेरा देश – मौसम गर्मी का

गर्मी के साथ पहाड़ों में बदलता जीवन का मिजाज

मैदानों में जहाँ मार्च-अप्रैल में बसन्त के बाद गर्मी के मौसम की शुरुआत हो जाती है। वहीं पहाड़ों की हिमालयन ऊँचाई में, जंगलों में बुराँश के फूल झरने लगते हैं, पहाड़ों में जमीं बर्फ पिघलने लगती है, बगीचों में सेब-प्लम-नाशपाती व अन्य फलों की सेटिंग शुरु हो जाती है और इनके पेड़ों व टहनियों में हरी कौंपलें विकसित होकर एक ताजगी भरा हरियाली का आच्छादन शुरु करती हैं। मैदानों में इसी समय आम की बौर से फल लगना शुरु हो जाते हैं। मैदानों में कोयल की कूकू, तो पहाड़ों में कुप्पु चिड़िया के मधुर बोल वसन्त के समाप्न तथा गर्मी के मौसम के आगमन की सूचना देने लगते हैं।

मई माह में शुरु यह दौर जून-जुलाई तक चलता है, जिसके चरम पर मौनसून की फुआर के साथ कुछ राहत अवश्य मिलती है, हालाँकि इसके बाद सीलन भरी गर्मी का एक नया दौर चलता है। ये माह पहाड़ों में अपनी ही रंगत, विशेषता व चुनौती लिए होते हैं। अपने विगत पाँच दशकों के अनुभवों के प्रकाश में इनका लेखा जोखा यहाँ कर रहा हूँ, कि किस तरह से पहाड़ों में गर्मी का मिजाज बदला है और किस तरह के परिवर्तनों के साथ पहाड़ों का विकास गति पकड़ रहा है।

हमें याद है वर्ष 2010 से 2013 के बीच मई माह में शिमला में बिताए एक-एक माह के दो स्पैल (दौर), जब हम जैकेट पहने एडवांस स्टडीज के परिसर में विचरण करते रहे। पहाड़ी की चोटी पर भोजनालय में दोपहर के भोजन के बाद जब 1 बजे के लगभग मैस से बाहर निकलते तो दोपहरी की कुनकुनी धूप बहुत सुहानी लगती। सभी एशोसिऐट्स बाहर मैदान में खुली धूप का आनन्द लेते। अर्थात यहाँ मई माह में भरी दोपहरी में भी ठण्डक का अहसास रहता।

इससे पहले हमें याद हैं वर्ष 1991 में मानाली में मई-जून माह में बिताए वो यादगार पल, जब पर्वतारोहण करते हुए, कुछ ऐसे ही अहसास हुए थे। यहाँ इस मौसम में भी ठीक-ठाक ठण्ड का अहसास हुआ था और गुलाबा फोरेस्ट में तो पीछे ढलान पर बर्फ की मोटी चादर मिली थी, जिसपर हमलोग स्कीईंग का अभ्यास किए थे।

हमारे गाँव में भी मई माह में गर्मी नाममात्र की रहती है, बल्कि यह सबसे हरा-भरा माह रहता है। इसी तरह की हरियाली वरसात के बाद सितम्बर माह में रहती है। इस तरह घर में मई माह अमूनन खुशनुमा ही रहा। गर्मी की शुरुआत जून माह में होती रही, जो मोनसून की बरसात के साथ सिमट जाती। इस तरह मुश्किल से 3 से 4 सप्ताह ही गर्मी रहती। इस गर्मी में तापमान 38 डिग्री से नीचे ही रहता। इसके चरम को लोकपरम्परा में मीर्गसाड़ी कहा जाता है, जो 16 दिनों का कालखण्ड रहता है, जिसमें 8 दिन ज्येष्ठ माह के तो शेष 8 दिन आषाढ़ माह के रहते। इस वर्ष 2021 में 6 जून से 22 जून तक यह दौर चल रहा है। इस दौर के बारे में बुजुर्गों की लोकमान्यता रहती कि जो इन दिनों खुमानी की गिरि की चटनी (चौपा) के साथ माश के बड़े का सेवन करेगा, उसमें साँड को तक हराने की ताक्कत आ जाएगी। हालाँकि यह प्रयोग हम कभी पूरी तरह नहीं कर पाए। कोई प्रयोगधर्मी चाहे तो इसको आजमा सकता है।

इस गर्मी के दौर के बाद जून अंत तक मौनसून का आगमन हो जाता और इसके साथ जुलाई में तपती धरती का संताप बहुत कुछ शाँत होता, लेकिन बीच बीच में बारिश के बाद तेज धूप में नमी युक्त गर्मी के बीच दोपहरी का समय पर्याप्त तपस्या कराता, विशेषकर यदि इस समय खेत या बगीचे में श्रम करना हो या चढाई में पैदल चलना हो।

अधिक ऊँचाई और स्नो लाईन की नजदीकी के कारण मानाली साईड तो यह समय भी ठण्ड का ही रहता है। यहाँ पूरी गर्मी ठण्ड में ही बीत जाती है। पहाड़ों की ऊँचाईयों में तो यहाँ तक कि स्नोफाल के नजारे भी पेश होते रहते। हमें याद है मई-जून माह में ट्रेकिंग का दौर, जिसमें नग्गर के पीछे पहाड़ों की चोटी पर चंद्रखणी पास में ट्रैकरों ने बर्फवारी का आनन्द लिया था और बर्फ के गलेशियर को पार करते हुए अपनी मंजिल तक पहुँचे थे।

जून में गर्मी के दिनों में भी यदि एक-दो दिन लगातार बारिश होती तो फिर ठण्ड पड़ जाती, क्योंकि नजदीक की पीर-पंजाल व शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं में बर्फवारी हो जाती। इस तरह गर्मी का मौसम कुछ सप्ताह तक सिमट जाता। हालाँकि बारिश न होने के कारण और लगातार सूखे के कारण हमनें बचपन में दो माह तक गर्मियों के दौर को भी देखा है, जब मक्की की छोटी पौध दिन में मुरझा जाती।

यदि फसलों (क्रॉपिंग पैटर्न) की बात करें, तो हमें याद है कि पहले गर्मी में जौ व गैंहूं की फसल तैयार होती। फलों में चैरी, खुमानी, पलम, नाशपती, आढ़ू सेब आदि फल एक-एक कर तैयार होते। जापानी व अखरोट का नम्बर इनके बाद आता। सब्जियों में पहले मटर, टमाटर, मूली, शल्जम आदि उगाए जाते। फिर बंद गोभी, फूल गोभी, शिमला मिर्च आदि का चलन शुरु हुआ और आज आईसवर्ग, ब्रौक्ली, स्पाईनेच, लिफी(लैट्यूस) जैसी इग्जोटिक सब्जियों को उगाया जा रहा है। इनको नकदी फसल के रुप में तैयार किए जाने का चलन बढ़ा है।

ये मौसमी सब्जियाँ यहाँ से पंजाब, राजस्थान जैसे मैदानी राज्यों में निर्यात होती हैं, जहाँ गर्मी के कारण इनका उत्पादन कठिन होता है और वहां से अन्न का आयात हमारे इलाके में होता है। क्योंकि हमारे इलाकों में अन्न उत्पादन का रिवाज समाप्त प्रायः हो चला है, क्योंकि अन्न से अधिक यहाँ फल व सब्जी की पैदावार होती है व किसानों को इसका उचित आर्थिक लाभ मिलता है। इस क्षेत्र में जितनी आमदनी पारम्परिक अन्न व दाल आदि से होती है, उससे चार गुणा दाम पारम्परिक सब्जियों से होता है और इग्जोटिक सब्जियाँ इससे भी अधिक लाभ देती हैं। वहीं फलों का उत्पादन सब्जियों से भी अधिक लाभदायक रहता है, हालाँकि इनके पेड़ को पूरी फसल देने में कुछ वर्ष लग जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि अब किसानों ने अन्न उगाना बंद प्रायः कर दिया है तथा यहाँ बागवानी का चलन पिछले दो-तीन दशकों में तेजी से बढ़ा है और यह गर्मी में ही शुरु हो जाता है। सेब प्लम आदि की अर्ली वैरायटी जून में तैयार हो जाती हैं, हालाँकि इसकी पूरी फसल जुलाई-अगस्त में तैयार होती है।

जून माह में ही जुलाई की बरसात से पहले धान की बुआई, जिसे हम रुहणी कहते – एक अहम खेती का सीजन रहता, जिसका हम बचपन में बड़ी बेसब्री से इंतजार करते। हमारे लिए इसमें भाग लेना किसी उत्सव से कम नहीं होता था। काईस नाला से पानी के झल्कों (फल्ड इरिगेशन का किसानों की पारी के हिसाब से नियंत्रित प्रवाह) के साथ काईस सेरी में धान के खेतों की सिंचाई होती। घर के बड़े बुजुर्ग पुरुष जहाँ बैलों की जोडियों के साथ रोपे को जोतते, मिट्टी को समतल व मुलायम करते, हम लोग धान की पनीरी को बंड़ल में बाँधकर दूर से फैंकते और महिलाएं गीत गाते हुए पूरे आनन्द के साथ धान की पौध की रुपाई करती। खेत की मेड़ पर माष जैसी दालों के बीज बोए जाते, जो बाद में पकने पर दाल की उम्दा फसल देते।

गाँव भर की महिलाएं धान की रुपाई (रुहणी) में सहयोग करती। सहकारिता के आधार पर हर घर के खेतों में धान की रुपाई होती। दोपहर को बीच में थकने पर पतोहरी (दोपहर का भोजन) होती, जिसे घरों से किल्टों (जंगली वाँस की लम्बी पिट्ठू टोकरी) में नाना-प्रकार के बर्तनों में पैक कर ले जाया जाता। इसकी सुखद यादें जेहन में एक दर्दभरा रोमाँच पैदा करती हैं। आज इन रुहणियों के नायक कई बढ़े-बुजुर्ग पात्र घर में नहीं हैं, इस संसार से विदाई ले चुके हैं, लेकिन उनके साथ विताए रुहणी के पल चिर स्मृतियों में गहरे अंकित हैं। समय के फेर में हालाँकि रुहणी का चलन आज बिलुप्ति की कगार पर है, मात्र 5 से 10 प्रतिशत खेतों में ऐसा कुछ चलन शेष बचा है, लेकिन गर्मी का मौसम इसकी यादों को ताजा तो कर ही देता है।

गाँव-घर में गर्मियाँ की छुट्टियाँ भी 10 जुन से पड़ती, जो लगभग डेढ़-दो माह की रहती। ये अगस्त तक चलती। हालाँकि अब इन छुट्टियों के घटाकर क्रमशः कम कर दिया गया है, जो अभी महज 3 सप्ताह की रहती हैं। शेष छुट्टियों के सर्दी में देने का चलन शुरु हुआ है। इस दौरान जंगल में गाय व भेड़-बकरियों को चराने की ड्यूटी रहती। साथ में एक बैग में स्कूल का होम वर्क भी साथ रहता। मई, जून में ही गैर दूधारु पशुओं को जंगल में छोड़ने का चलन रहता, जिनकी फिर अक्टूबर में बापिसी होती। इनको छोड़ते समय एक-आध रात जंगल में बिताने का संयोग बनता, जिसकी यादें आज भी भय मिश्रित रोमाँच का भाव जगाती हैं।

हालाँकि गर्मी का मौसम घर में बिताए लम्बा अर्सा हो चुका है, लेकिन स्मरण मात्र करने से ये पल अंतःकरण को गुदगुदाते हुए भावुक सा बनाते हैं और दर्दभरी सुखद स्मृतियों को जगाते हैं। शायद जन्मभूमि से दूर रह रहे हर इंसान के मन में कुछ ऐसे ही भावों को समंदर उमड़ता होगा, खासकर तब, जब लोकडॉउन के बीच लम्बे अन्तराल से वहाँ जाने का संयोग न बन पा रहा हो।

सोमवार, 31 मई 2021

कोरोना काल के बीच उभरता जीवन दर्शन

अपनों के वियोग-विछोह की पीड़ा एवं आध्यात्मिक सम्बल

कोरोना काल ने कई मायनों में जीवन की परिभाषा और जिंदगी के मायने बदल दिए हैं, जिनमें एक है अपनों का असामयिक अवसान और इस जीवन की नश्वरता का तीखा बोध।

सबसे पहले ह्दय की गहराई से अपनी संवेदनापूरक श्रद्धाँजलि उन सभी दिवंगत मित्रों, परिवारजनों, परिजनों एवं जीवात्माओं को, जो कोरोना के कारण असमय ही अपनों को बिलखते हुए छोड़ गए। परमात्मा, भगवान, गुरुसत्ता उन सब दिवंगत आत्माओं को शांति दे, सद्गति दे, अपने चरणों में विश्राँति दे। साथ ही परमात्मा शोकाकुल एवं दुःखी परिवारजनों, आत्मीयजनों एवं मित्रों को इनके बिछुड़ने के असह्य दुःख को सहन करने की शक्ति दे।

निश्चित ही कोरोना के रुप में संव्याप्त जानलेवा अदृश्य वायरस ने एक आशंका, भय और आतंक का माहौल पैदा कर दिया है। प्रारम्भ में, पहली लहर के दौर में स्थिति इतनी विकट नहीं थी, जब मात्र बिमार या न्यून इम्यूनिटी बाले बृद्ध-बुजुर्गों को अपना निशाना बनाया था और इसका प्रभाव सीमित था तथा यह उतना घातक नहीं था। कोरोना की दूसरी लहर के साथ इसके घातक स्वरुप ने स्वस्थ लोगों तथा युवाओं को भी अपनी लपेट में ले लिया है। बहुत सारे इससे संक्रमित होकर उबर भी रहे हैं, लेकिन जब कोई अपना अचानक इसके खूनी शिकंजे में फंस जाता है, तो दिल सहम जाता है। प्रार्थना के स्वर उठते हैं, कि भगवान इनको जल्द ठीक कर दें। लेकिन प्रार्थना की भी एक सीमा होती है। हमेशा ही यह काम नहीं कर पाती।

फिर खबर आती है कि अमुक नहीं रहे। कई बार तो अनजाने में ही किसी मित्र को फोन करते हैं, तो जबाव किसी दूसरे  की आबाज में आता है, कि आप कौन बोल रहे हैं। परिचय पाने के बाद जब वो अपरिचित परिजन कहते हैं, कि अमुक तो अब नहीं रहे। ऐसा अनपेक्षित उत्तर सीधे शॉक करता है, पूरे अस्तित्व को हिला डालता है कि यह कैसे हो सकता है। अभी ही तो पिछले दिनों इनसे बातचीत हुई थी, स्वस्थ-सकुशल थे। अभी तो इनकी यात्रा शुरु ही हुई थी, अभी तो फूल को खिलना बाकि था। ऐसे असमय सबको बिलखता हुआ छोड़कर कैसे चले गए, कुछ समझ नहीं आता। परमात्मा के विधान पर भी कुछ पल के लिए तो संशय होता है। यह कैसा नियति का, ईश्वर का क्रूर विधान। लेकिन कुल मिलाकर अन्ततः जीवन-मरण के इस अकाट्य सत्य के सामने सर झुकाना पड़ता है। इस पर आखिर किसका वश।

ऐसे पलों में जीवन की नई परिभाषा, नए मायने, नया दर्शन अस्तित्व की गहराईयों से फूट पड़ता है। जब मृत्यु ही इस जीवन का अंतिम सत्य है, तो फिर इस जीवन के क्या मायने हैं। एक व्यक्ति के असामयिक अवसान पर तो यह सवाल और भी तल्ख हो जाते हैं।

फिर याद आते हैं, अपने बाबा, दादा-दादी, नाना-नानी और घर के बड़े बुजुर्गों की, जो एक-एक कर परिवार-संसार को छोड़ गए थे। कुछ भाई बंधु, मित्र, गुरुजन तो समय से पहले ही। इस मृत्युलोक का गहरा शॉकिंग अहसास इन पलों में हुआ था। जीवन की नश्वरता का गहरा तत्वबोध इन क्षणों में हुआ था। इंसान क्या, हमें याद है घर में हमारी प्यारी बिल्ली को जब घर के कुत्ते ने ही मार डाला था, अपना प्यारी गाय अचानक चल बसी थी या सड़क पर दुर्घटना में पशुओं को असामयिक इस देह से अलग होते देखा तो, बहुत की गहरे प्रश्न कौंधे थे जेहन में कि इस नश्वर जीवन का परमसत्य क्या है, जहाँ मृत्यु, वियोग-वछोह, दुःख, पीड़ा आदि गौण हो जाते हों, इनका उपचार मिल जाता हो। एक शाश्वत जीवन की खोज का जन्म इन पलों में हुआ था।

मित्रो, यह प्रश्न हमारे अध्यात्म के प्रति रुझान का एक बड़ा कारण रहा है। इन प्रश्नों की खोज में, इस नश्वर जीवन में शाश्वत की खोज ने, इस मृत्यु लोक में अमरता की संभाव्यता के दर्शन की पिपासा ने हमें अध्यात्म मार्ग में प्रवृत्त किया है। और यह हमारे विचार में हर संवेदनशील व्यक्ति की कहानी है। प्राय़ः जब कोई अपना बिछुड़ता है तो शमशान घाट पर हर व्यक्ति के ऊपर शमशान वैराग्य तो छा ही जाता है। जीवन की नश्वता का गहरा बोध इन पलों में होता है। यह बात दूसरी है कि कुछ समय बाद फिर जीवन पुराने ढर्रे पर आ जाता है और जीवन-मरण के प्रश्न, एक शाश्वत जीवन की अभिलाषा कहीं गौण हो जाती है।

लेकिन क्या अच्छा होता कि शमशान वैराग्य की लौ आगे भी सुलगती रहती, जीवन का एक हिस्सा बन जाती। व्यक्ति को हर पल जीवन की नश्वरता को बोध होता रहता और वह इसके अनावश्यक पहलुओं में न उलझकर एक सार्थक जीवन जीता। यह प्राय़ः नहीं हो पाता। लेकिन कोरोना काल ने इसे संभव कर दिखाया है। यह एक कटु सत्य है लेकिन इस विकट काल ने जीवन में नश्वरता का अहसास स्थायी सा कर दिया है। जब यदा-कदा कोई अपना अचानक छोड़कर जा रहा हो या अपने ही जीवन की कोरोना की चपेट में आने की नौवत आ रही हो, तो बार-बार विस्मृत कटु सत्य कौंधता है और सोचने के लिए मजबूर कर देता है।

भगवान करे कोरोना काल के ये दुखद पल जल्द ही खत्म हो जाएं और मानवीय जीवन इसके घातक शिकंजे से बाहर आ जाए। आम जीवन पटरी पर सरपट आगे बढ़े, सामाजिक-राष्ट्रीय जीवन विकास पथ पर अग्रसर हो, समूची मानवता स्वस्थ एवं सुरक्षित हो अमन-चैन से रहे। इस विकट काल में मिल रही अमूल्य सीख व सवकों को जीवन में धारण कर हम सभी एक स्वस्थ, सुखी, खुशहाल और उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ें।

ओम शाँति, शाँति, शाँति।।

शनिवार, 29 मई 2021

शाश्वत जीवन की अकथ कहानी

                                             कीमत कितने जन्म, युगों है इसने चुकाई


सागर की शांत लहरों को देख,

कहाँ समझ आती है इसकी अतल गहराई।


घाटी से नीले आसमान को निहारते हुए,

कहाँ समझ आता है इसका विस्तार अनन्त।


जंगल के हरे सौंदर्य को दूर से निहारते,

कहाँ समझ आती है उसकी बीहड़ सच्चाई।


ऐसे ही एक शाँत-सौम्य, धीर-गंभीर, सरल-सह्दय रुह को देख,

कहाँ समझ आती है उसकी अथक गहराई, अनन्त विस्तार और बीहड़ सच्चाई।


उसकी सरलता-तरलता, सहजता-फक्कड़पन, वितरागिता, समता-स्थिरता देख,

कहाँ समझ आती है हिमालय से भी उत्तुंग उसके व्यक्तित्व की ऊँचाई।


कितने दुःख, कितने झंझावत, कितने आघात, कितने प्रहार खाकर-सहकर,

पहुँची है यह रुह आज चेतना के शिखर पर, लिए अंतरतम की वह गहराई।


जहाँ शाँति, समता, स्थिरता, निर्दन्दता, निश्चिंतता बसती है हर पल,

कितनी क्राँति, कितनी अशाँति, कितने मंजर, कितने संघर्ष के बाद,

पहुँची है वह सर्वस्व दाँव पर लगा, एकाँतिक निष्ठा के बूते इस मुकाम पर,

जिसकी कीमत हर पल, हर दिन, हर जन्म है युगों उसने भरपूर चुकाई।।

बुधवार, 26 मई 2021

यात्रा वृतांत कैसे लिखें?

                       


                              यात्रा वृतांत लेखन के चरण

निश्चित रुप में यात्रा वृतांत का पहला ठोस चरण तो यात्रा के साथ शुरु होता है। व्यक्ति कहाँ की यात्रा कर रहा है, किस भाव और उद्देश्य के साथ सफर कर रहा है और किस तरह की जिज्ञासा व उत्सुक्तता लिए हुए है, इनकी गहनता, गंभीरता एवं व्यापकता एक अच्छे यात्रा वृतांत के आधार बनते हैं तथा यात्रा वृतांत में रोचकता और रोमाँच का रस घोलते हैं और साथ ही ज्ञानबर्धक भी बनाते हैं।

यात्रा वृतांत ज्ञानबर्धक बने इसके लिए यह भी आवश्यक हो जाता है कि यात्रा स्थल या रुट का पहले से कुछ अध्ययन किया गया हो। या कह सकते हैं कुछ रिसर्च की हो। पहले इसका एक मात्र साधन दूसरों के लिखे यात्रा वृतांत पढ़ना या वहाँ से घूम आए लोगों से की गई चर्चा होती थी। लेकिन आज इंटरनेट के जमाने में यह काम बहुत आसान हो गया है। लगभग हर लोकप्रिय ठिकानों पर ब्लॉग से लेकर वीडियोज मिल जाएंगे। बाकि कसर गूगल गुरु पूरा कर देते हैं, जिसमें किसी भी स्थान पर तमाम तरह की जानकारियाँ उपलब्ध रहती हैं।

यहीं से यात्रा वृतांत में नूतनता लाने के सुत्र भी मिल जाते हैं, कि अब तक दूसरे यात्री क्या कवर कर चुके हैं और इसमें कौन से पहलु या एंग्ल अभी बाकि हैं। हो सकता है कि अमुक यात्रा में आपकी रुचि के विषय पर अभी कोई प्रकाश ही न डाला गया हो या जो जानकारियाँ उपलब्ध है वे आपकी जिज्ञासा व उत्सुक्तता का समाधान नहीं कर पा रही हों। ऐसे में यह जानकारी का अभाव या खालीपन आपके यात्रा लेखन के नूतनता का एक प्रेरक तत्व बन जाता है।

उदाहरण के लिए हम एक शैक्षणिक भ्रमण में ऋषिकेश के पास कुंजादेवी शक्तिपीठ से बापसी में नीरझरना घूमना चाहते थे, लेकिन हमें कोई इसकी जानकारी देने वाला नहीं मिला। इंटरनेट खंगालने पर भी नीरझरने की कुछ फोटो या वीडियो के अलावा रुट की कोई जानकारी नहीं मिली। सो शिखर पर बसे कुँजापुरी से बापसी में लोगों से पूछते हुए, बीच में राह भटकते हुए हम इसको कवर किए थे। लेकिन यह स्वयं में एक रोचक एवं रोमाँचक यादगार यात्रा बन गई थी। इसे आप चाहें तो आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।यात्रा वृतांत - कुंजापुरी से नीरझरना ट्रैकिंग एडवेंचर।

और यदि स्थान बहुत लोकप्रिय है और इसमें पर्याप्त कवरेज हो चुकी है, तो भी यात्रा लेखक  अपने विशिष्ट नजरिए, अंदाज व शैली के आधार पर इसे नयापन दे सकता है, बल्कि देता है। एक ही स्थान को देखने के अनगिन नजरिए हो सकते हैं। किसी भी स्थान का प्राकृतिक सौंदर्य, भौगोलिक विशेषता, ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि, वहाँ का रहन-सहन, खान-पान, लोक संस्कृति, विशिष्टता, राह की खास बातें आदि कितनी बातें, कितने तरीकों से व्यक्त हो सकती हैं। इसमें व्यक्ति के अपने मौलिक अनुभव एक नयापन घोलने में सक्षम होते हैं, जिससे कि यात्रा वृतांत एक ताजगी लिए तैयार होता है।

इसके साथ कोई भी स्थान या रुट कितना ही सुंदर, आकर्षक या मनभावन क्यों न हो, वहाँ कि कुछ कमियाँ, राह की दुर्गमताएं, समस्याएं या क्लचरल शॉक्स आदि भी यात्रा वृतांत के रोचक विषय बनते हैं, जो पाठकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। इससे नए यात्री या पर्यटक इनसे परिचित होकर आवश्यक तैयारी या सावधानी के साथ यात्रा का पूरा आनन्द ले पाते हैं। यदि लेखक किसी विषय की जानकारी रखता हो या विशेषज्ञता लिए हो तो स्थानीय समस्याओं के संभावित समाधान पर भी प्रकाश डाल सकता है, जो यात्रा वृतांत में ज्ञानबर्धन आयाम जोड़ते हैं और इसकी पठनीयता बढ़ जाती है। इसमें संवेदनशील व संतुलित रवैया उचित रहता है तथा दोषारोपण या छिद्रान्वेषण आदि से हर हालत में बचना उचित रहता है।

यात्रा वृतांत में राह में मिले अन्य यात्रियों, स्थानीय लोगों के साथ चर्चाएं भी यात्रा वृतांत के अनिवार्य पहलु रहते हैं, जो जानकारी को और प्रामाणिक तथा रोचक बनाते हैं। इससे पाठकों की कई सारी जिज्ञासाओं व प्रश्नों के समाधान बात-बात में मिल सकते हैं। अतः यात्रा में लोगों से संवाद एक महत्वपूर्ण तत्व रहता है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यात्रा लेखक यदि घूमने के जुनून व जिज्ञासाओं से भरा हुआ है, तो ऐसे संवाद सहज रुप में ही घटित हो जाते हैं और प्रकृति भी राह में उचित पात्र के साथ मुलाकात में सहायक बनती है। इसमें कई लोगों को थोड़ा अचरज हो सकता है, लेकिन अनुभवी घुम्मकड़ ऐसे संयोगों को सहज रुप में समझ रहे होंगे व ऐसे संस्मरणों से नित्य रुबरु होते रहते हैं।

यात्रा वृतांत में फोटो का अपना महत्व रहता है। सटीक फोटो इसकी पठनीयत को बढ़ा देता है। यात्रा लेखक अपने लेखकीय कौशल के आधार पर जो कह नहीं पाता, वह एक उचित चित्र बखूबी व प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट कर देता है, जिससे पाठक को यात्रा के साथ भाव चित्रण में सहायता मिलती है। हालाँकि किसी स्थल के प्राकृतिक सौंदर्य़, भौगोलिक विशेषता या भावों के सुंदर व जीवंत चित्रण को लेखक अपनी कलम से करने में काफी हद तक सक्षम होता है, जिसको पढ़ने का अपना आनन्द रहता है। किसी जमाने में जब फोटोग्राफी का चलन नहीं था, तो लोग पेन या पेंसिल के स्कैच से भी चित्रों का काम चला लिया करते थे।

यात्रा वृतांत लेखन में एक महत्वपूर्ण पहलू राह के पड़ाव व स्थानों के नाम व उनसे जुड़ी मोटी व खास जानकारियाँ भी रहते हैं। इसके लिए एक डायरी व पेन साथ में रहे, तो उचित रहता है। जहाँ भी जो स्थान आए, इनके नाम नोट किए जा सकते हैं। और यदि पहले से कुछ रिसर्च कर रखें हैं, तो इन स्थानों को पहले से ही डायरी में सुचिबद्ध कर रखा जा सकता है तथा साथ में सफर कर रहे लोगों से कुछ खास जानकारियों को बटोरा जा सकता है। फिर अपने अनुभव के आधार पर इनमें अतिरिक्त नयापन जोड़ा जा सकता है। अपनी डायरी या नोटबुक में नोट किए गए ये नाम या बिंदु बाद में लेखन में सहायक बनते हैं।

यात्रा पूरी होने के बाद फिर लेखन की बारी आती है। इसमें लेखन से जुड़े सर्वसामान्य नियमों का अनुसरण करते हुए पहला रफ ड्राफ्ट तैयार किया जाता है, जिसमें अपनी यात्रा के अनुभवों को एक क्रम में कागज या कम्पयूटर-लैप्टॉप पर उतारा जाता है। फिर शांत मन से कुछ और विचार मंथन व शोध के आधार पर दूसरे ड्रॉफ्ट में अतिरिक्त आवश्यक तथ्यों व जानकारियों को शामिल किया जा सकता है तथा इसमें भाषा की अशुद्धियों को ठीक करते हुए इसे पॉलिश किया जाता है। यदि लेखन की इस प्रक्रिया को विस्तार से जानना है तो हमारे ब्लॉग पर लेखन कला - लेखन की शुरुआत करें कुछ ऐसे को पढ़ा जा सकता है।

यात्रा वृतांत लेखन में यदि इन बातों का ध्यान रखा जाए व इन चरणों का अनुसरण किया जाए, तो निश्चित ही एक बेहतरीन यात्रा ब्लॉग तैयार हो जाएगा। और पाठक इसको पढ़कर यात्रा के साथ जुडी रोचकता व रोमाँच को अनुभव करेंगे। उनके ज्ञान में इजाफा होगा तथा वे आपके साथ भावयात्रा करते हुए सफर के आनन्द का हिस्सा बनेंगे। शायद यही तो एक यात्रा लेखन का मकसद रहता है।

यात्रा लेखन के ऊपर दिए बिंदुओं को और बेहतर समझने के लिए नीचे दिए कुछ यात्रा वृतांतों को पढ़ा जा सकता है -

यात्रा वृतांत - हमारी पहली झारखण्ड यात्रा

यात्रा वृतांत - सुरकुण्डा देवी का वह यादगार सफर, भाग-1

यात्रा वृतात - कुल्लू से नेहरुकुण्ड-वशिष्ट वाया मानाली लेफ्ट बैंक

यात्रा लेखन से जुड़े कुछ अन्य उपयोगी लेख -

यात्रा लेखन के मूलभूत तत्व

हिंदी यात्रा लेखन की परम्परा एवं यात्रा लेखन के महत्व

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

पुस्तक सार - हिमालय की वादियों में

हिमाचल और उत्तराखण्ड हिमालय से एक परिचय करवाती पुस्तक


यदि आप प्रकृति प्रेमी हैं, घुमने के शौकीन हैं, शांति, सुकून और एडवेंचर की खोज में हैं और वह भी पहाड़ों में और हिमालय की वादियों में, तो यह पुस्तक – हिमालय की वादियों में आपके लिए है। यह पुस्तक उत्तराखण्ड हिमालय और हिमाचल प्रदेश की वादियों में लेखक के पिछले तीन दशकों के यात्रा अनुभवों का निचोड़ है, जिसे 36 अध्यायों में बाँटा गया है। इसमें आप यहाँ की दिलकश वादियों, नदियों-हिमानियों, ताल-सरोवरों और घाटियों के प्राकृतिक सौंदर्य से रुबरु होंगे। हिमालय की विरल ऊँचाईयों में ट्रैकिंग, एडवेंचर और पर्वतारोहण का रोमाँचक अहसास भी आपको इसमें मिलेगा।

इसके साथ इन स्थलों की ऐतिहासिक, पौराणिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं से भी आप परिचित होंगे। इन क्षेत्रों की ज्वलंत समस्याओं व इनके संभावित समाधान पर एक खोजी पत्रकार की निहारती दृष्टि भी आपको इसमें मिलेगी। और साथ में मिलेगा घूम्मकड़ी के जुनून को पूर्णता का अहसास देता दिशा बोध, जो बाहर पर्वतों की यात्रा के साथ आंतरिक हिमालय के आरोहण का भी गाढ़ा अहसास दिलाता रहेगा। इस तरह यह पुस्तक आपके लिए एक रोचक, रोमाँचक और ज्ञानबर्धक मानस यात्रा का निमन्त्रण है।

मूलतः हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला के एक गाँव से सम्बन्ध रखने वाले यात्रा लेखक अपनी मातृभूमि के कई अनछुए पहलुओं का इन यात्रा वृतांत के माध्यम से सघन एवं गहन परिचय करवाते हैं। कुल्लू-मानाली-वशिष्ट-नग्गर-मणिकर्ण जैसे यहाँ के प्रचलित स्थलों के साथ वे बिजली महादेव, जाणा, भौसा-गड़सा घाटी तथा मानाली घाटी के कई कम परिचित तथ्यों से भी सघन परिचय करवाते हैं। 

इस क्रम में मानाली के पास स्थित अटल विहारी पर्वतारोहण संस्थान के साथ सोलाँग घाटी, रोहताँग पास, कैलांग, त्रिलोनाथ, उदयपुर, दारचा, जिंगजिंगवार, सूरजताल, वारालाचा जैसे इलाकों की रोमाँचक यात्राएं पाठकों को हिमालय के बर्फीले टच का गहरा अहसास दिलाती हैं। 

हिमाचल की राजधानी शिमला के अंदर एवं आसपास टैकिंग से लेकर तीर्थाटन (कुफरी, चैयल, मशोवरा, नारकण्डा, सराहन) के रोचक पहलुओं को यहाँ पढ़ा जा सकता है। शोध-अध्ययन प्रेमियों के लिए शिमला स्थित उच्च अध्ययन संस्थान व आसपास के विश्वविद्यालयों का परिचय एक ज्ञानबर्धक अनुभव रहता है। इसके साथ मण्डी जिला के पराशर झील एवं शिमला से कुल्लू वाया जलोड़ी पास जैसे रुट यात्रा एक नया अनुभव देते हैं।

पिछले तीन दशकों से धर्मनगरी हरिद्वार लेखक की कर्मभूमि रही है। यहाँ से कवर हुए उत्तराखण्ड के दर्शनीय स्थलों की यात्राओं के फर्स्टहेंड अनुभव पाठकों का गढ़वाल हिमालय के गाढ़ा परिचय करवाते हैं। खासकर हरिद्वार-ऋषिकेश तथा बद्रीनाथ, केदारनाथ, तुंगनाथ एवं हेमकुण्ड साहिब की राह में पड़ने वाले अहं तीर्थस्थल एवं घाटियाँ इसमें कवर की गई हैं। जिसमें नीलकंठ महादेव से लेकर कुंजा देवी, सुरकुण्डा देवी, टिहरी, मसूरी, देहरादून, श्रीनगर, हरियाली देवी, देवप्रयाग, चोपता जैसे स्थल स्वाभाविक रुप से दर्शकों को राह में मिलेंगे। हिमालय के इस क्षेत्र में पर्यावरण, विकास एवं जैव विविधता को लेकर चल रहे प्रेरक प्रयोगों को पढ़कर पाठक अपना ज्ञानबर्धन कर सकते हैं। इन यात्राओं में अधिकाँश पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग तथा देवसंस्कृति विवि के विद्यार्थियों के संग शैक्षणिक भ्रमण के तहत संम्पन्न हुए थे, अतः ये अपना शैक्षणिक महत्व भी लिए हुए हैं।

इसी कड़ी में कुमाउँ हिमालय का मुयाइना करता सफर भी पुस्तक की खासियत है, जिससे पुस्तक की शुरुआत होती है। अपने शोधछात्र के साथ विकास का मुआइना करता यह सफर कुमाउँ हिमालय के अल्मोड़ा, दोलाघट, मुनस्यारी, रानीखेत, नैनीताल जैसे दर्शनीय स्थलों के साथ राह में पड़ती घाटियों एवं पड़ावों से पाठकों का साक्षात्कार करवाता है।

इस तरह हिमालय की वादियों में पुस्तक में पाठक उपरोक्त स्थलों के प्राकृतिक सौंदर्य, भौगोलिक विशेषताओं, स्थानीय इतिहास, लोक जीवन, धर्म-अध्यात्म, संस्कृति और विकास सम्बन्धी रोचक, रोमाँचक तथा ज्ञानबर्धक जानकारियों से रुबरु होंगे। हिमाचल और उत्तराखण्ड में सम्पन्न इन यात्राओं में यहाँ के हिमालयन क्षेत्रों के विकास से जुड़े कई प्रश्न, संभावित समाधान एवं अनुत्तरित पहलु पाठकों को कुछ सोचने-विचारने तथा कुछ करने के लिए प्रेरित करेंगे।

पुस्तक की भूमिका में हिंदी के यशस्वी साहित्यकार एवं आचार्य प्रो.(डॉ.) दिनेश चमौला शैलेशजी के शब्दों में -  'हिमालय की वादियों में' पुस्तक कुछ ढूंढने की खोज में निकले सुखननंदन सिंह की जिज्ञासु भटकनों व खोजी पत्रकार के साथ-साथ जीवन व स्थल के रहस्यों की पड़ताल की चाह लिए लोकानुभूतियों का लेखा-जोखा है, जिसमें उनके नसमझे को समझने का प्रयास, देखे हुए को बड़ी भावप्रवणता में कह पाने की छटपटाहट, कहीं भौगोलिकता के परिष्करण के सुझाव, कहीं लोक की कोख से दिग्दर्शित भावों को हूबहू पाठक समुदाय तक पहुंचाने की बेचैनी के परिणामस्वरूप है यह पुस्तक। कहीं सुखनंदन का जोगी मन यात्रा के मूल को तलाशता प्रकृति में ही तल्लीन होता प्रतीत होता है तो कहीं जिज्ञासा का असीम क्षितिज ससीम में बंध जाने के लिए आतुर दिखाई देता है। कहीं देखे को हूबहू न कह पाने तथा कहीं न देखे को देख पाने की बेचैनी यात्रा वृतांत को अधिक रोचक व रहस्यपूर्ण बनाती है। हिमाचल व उत्तराखंड (गढ़वाल हिमालय व कुमांऊ हिमालय) के अनेक पर्यटन स्थलों, मंदिरों, देवतीर्थों तक हो आने का लेखा-जोखा उनकी अध्यात्म प्रेरित प्रवृत्ति को भी द्योतित करता है। कैमरे की आंख से चित्रित रूपकों को अभिव्यक्ति की शब्द-संपदा की रज्जु में पिरोने का यथासंभव प्रयास किया है सुखनंदनजी ने। अनुभव की दमक से अनुभूति की चमक शनै-शनै परिष्कृत होती है।

पुस्तक के संग लेखक हिमालय की वादियों में भ्रमण, घुमक्कड़ी, एडवेंचर और तीर्थाटन के लिए पाठकों का भावभरा आवाह्न करता है, इस कामना एवं प्रार्थना के साथ कि हिमध्वल हिमालय की आत्मस्थ, अंतस्थ एवं अड़िग, भव्य एवं दिव्य उपस्थिति सबको आंतरिक हिमालय के आरोहण की सतत प्रेरणा देती रहे। और इसका दिव्य स्पर्श पाकर इसकी गोद में विचरण करने वाले हर यात्री, तीर्थयात्री, घुम्मकड़, यायावर, खोजी, पर्वतारोही, शोधार्थी, नागरिक एवं प्राणी का जीवन सुख, सौंदर्य, संतुष्टि, आनन्द एवं परमशांति की ओर अग्रसर हो।

एविंससपब पब्लिशिंग (Evincepub Publishing) से प्रकाशित यह पुस्तक अमेजन, बसपकार्ट (BSPKART), फ्लिपकार्ड, गूगल, कोवो, किंडल आदि प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

यात्रा वृतांत – विंध्यक्षेत्र के प्रवेश द्वार में

 

बाबा चौमुखनाथ के देश में

विंध्यक्षेत्र के प्रवेश द्वार सतना में पहुँचने से लेकर इसके आसपास के दर्शनीय स्थलों का अवलोकन पिछले ब्लॉग में हो चुका है। इस कड़ी में अब चित्रकूट एवं चौमुखनाथ का वर्णन किया जा रहा है। हालाँकि इस बार कोरोनाकाल में चित्रकूट की यात्रा संभव न हो सकी, लेकिन चौमुखनाथ के एकांत-शांत ऐतिहासिक तीर्थस्थल की यात्रा, इस बार की विशिष्ट उपलब्धि रही। चित्रकूट तीर्थ का अवलोकन हम दो दशक पूर्व की यात्रा में किए थे, यहाँ उस का भावसुमरण करते हुए इसके प्रमुख स्थलों का जिक्र कर रहा हूँ। शायद नए पाठकों के लिए इसमें कुछ रोचक एवं ज्ञानबर्धक बातें मिले।

चित्रकूट सतना से 78 किमी दूरी पर स्थित है। धार्मिक महत्व के इस तीर्थस्थान का कुछ भाग मप्र में पड़ता है तथा कुछ भाग उप्र में। मालूम हो कि चित्रकूट के घने जंगलों में ही कामदगिरि पर्वत शिखर पर भगवान राम, सीता माता और भाई लक्ष्मण ने वनवास के चौदह वर्षों के साढ़े ग्यारह वर्ष बिताए थे।

इसी पुण्यभूमि में महान ऋषि अत्रि एवं सती अनुसूईया और इनकी गोद में त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश की लीला कथा घटित हुई थी।


सती अनुसूइया के तप से यहीं पर पयस्विनी नदी (जिसका दूसरा नाम मंदाकिनी भी है) का उद्गम हुआ माना जाता है। इसके साथ भगवान दतात्रेय, महर्षि मार्कंडेय, सरभंगा, सुतीक्ष्ण और अन्य ऋषि, मुनि, भक्त और विचारकों की साधना स्थली के रुप में यह क्षेत्र साधना के प्रचण्ड संस्कार लिए हुए है। हालाँकि मानवीय हस्तक्षेप एवं लापरवाही के चलते इसका स्थूल स्वरुप काफी दूषित हो चला है, लेकिन आस्थावानों के लिए इसका महत्व मायने रखता है।

मंदाकिनी नदी पर आगे रामघाट बना हुआ है। यहीं पर बाबा तुलसीदास को हनुमानजी के माध्यम से अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन हुए थे। चौपाई प्रसिद्ध है कि चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसैं, तिलक देत रघुवीर।


यहीं आसपास रामपंचायत के पात्रों से जुड़े भरत मिलाप मंदिर
, चित्रकूट जलप्रपात, जानकी कुंड, गुप्त गोदावरी, पंपापुर, हनुमान धारा जैसे स्थल मौजूद हैं, जिनका भावभरा दर्शन तीर्थयात्रियों की रामायणकालीन स्मृतियाँ जीवंत हो उठती हैं। इनमें गुप्त गोदावरी की गुफा स्वयं में एक अद्भुत एवं विलक्ष्ण रचना है, जहाँ सीता माता ने कुछ समय बिताया था। माना जाता है कि मय दानव ने इस गुफा का निर्माण किया था। 

पास में ही कामदगिरि पर्वत पड़ता है, जिसकी पावन परिक्रमा श्रद्धालुओं के बीच प्रख्यात है। चित्रकूट में ही भारत रत्न नाना देशमुखजी द्वारा स्थापित भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय पड़ता है, जिसे 1991 में स्थापित किया गया था।

इन स्थलों के अतिरिक्त सतना जिला में कुछ अन्य रामायणकालीन स्थल हैं। गृद्धराज पर्वत, सतना जिले की रामनगर तहसील के देवराजनगर गाँव में स्थित धार्मिक, पुरातत्व और पारिस्थितिक महत्व की पहाड़ी है। यह रामनगर शहर से 8 किमी दूर स्थित है। इसे गिद्धराज जटायु के भाई संपति का जन्मस्थान माना जाता है। कवि कालिदास ने अपनी पुस्तक गिद्धराज महात्म्य में लिखा है कि 2354 फीट की ऊंचाई पर स्थित गिद्धराज पर्वत से निकलने वाली मानसी गंगा नदी में एक डुबकी लगाने से सभी तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। शिव संहिता में भी इसका उल्लेख है। चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने यात्रा विवरण में इसका उल्लेख किया है।

विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के बीच सतना से पहले एनएच-75, और फिर नागोद कस्बे के आगे जसो होते हुए एनएच-943 पर पड़ता है - सलेहा क्षेत्र के नचना गाँव में स्थित - चौमुखनाथ शिव मंदिर। जो अपनी तरह का स्वयं में एक अद्वितीय शिवमंदिर है। 

इस परिसर में पार्वती मंदिर भी है, बिना शिखर शैली का स्पाट छत बाला यह मंदिर, सबसे प्राचीन मंदिरों में आता है, जिसे गुप्तकाल में पाँचवी सदी में बनाया गया था। इसी तरह नागरा शैली की शिखर कला से युक्त चौमुखनाथ मंदिर पांचवी से सातवीं सदी में बनाया माना जाता है। माना जाता है कि इसे प्रतिहार राजवंश के काल में बनाया गया था। दोनों मंदिर खालिस पत्थर के बने हैं।

परिसर में गोमुख से पहाड़ों का शुद्ध, शीतल व मीठा जल आता है। आप इस पानी को पी सकते हैं व इसमें नहा भी सकते हैं। विशाल वट, पीपल, ईमली आदि के प्राचीन वृक्षों से घिरा परिसर का प्राकृतिक नजारा बेहद खूबसूरत लगता है। यहां पर एक वॉच टावर भी बना हुआ है, जिससे आप यहां के चारो तरफ के खूबसूरत नजारों का विहंगावलोकन कर सकते हैं।

मंदिर ऊँचे चबूतरे पर बना है। गेट पर दो शेर स्वागत करते हुए प्रतीत होते हैं। द्वार पर विष्णु-लक्ष्मीं एवं द्वारपाल की प्रस्तर प्रतिमाएं दिवार में टंगी हैं। चौमुखनाथ मंदिर के शिवलिंग में चारों और शिव के चार विभिन्न भावों को दर्शाते विग्रह एक ही पत्थर से उकेरे गए हैं। प्रवेश करते ही सामने चंद्रमाँ को धारण किए विवाह के समय के सौम्य शिव, इसके वाईं ओर विषपान के समय का विकराल भाव, इसके आगे समाधि का शांत भाव और अंत में शिव का अर्धनारिश्वर रुप। 

यहाँ के एकांत परिसर में श्रद्धालु भजन-पूजन एवं ध्यान के कुछ यादगार पल बिता सकते हैं। शिव के चारमुखों के साथ जीवन, सृष्टि एवं जीवात्मा के चार आयामी रहस्यों पर चिंतन-मनन करते हुए जीवन का सम्यक दर्शन प्रकट होता है, जिसे अनुभव कर आस्थावान तीर्थयात्री जीवन को सफल एवं धन्य अनुभव करते हैं।

चोमुख्ननाथ मन्दिर के सामने ही पहाड़ी के बीच प्राचीन जैन गुफा मंदिर श्रेयांसगिरी भी मौजूद है। समय हो तो इसके दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ चाय व लंगर आदि की उचित व्यवस्था रहती है। कोई चाहे तो सतना के साथ पन्ना, खजूराहो आदि दिशा से भी चौमुखनाथ आ सकते हैं। 


यहाँ से सतना की ओर बापसी के सफर में रास्ते भर कई सौ साल पुराने पेड़ों को देख मन श्रद्धा भाव से भरता उठता है। रास्ते में पक रही गैंहूँ-जौ की फसल, इनके किनारे बीच-बीच में जल से भरे तालाब और सड़क के दोनों ओर पलाश या टेसू के चटक लाल-पीले फूलों से लदे पेड़ – सब मिलाकर सफर को खुशनुमा बनाते हैं।   

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