शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

सेब उत्पादन में क्राँति के नायक, प्रगतिशील बागवान


माटी में सोना उगाने वाले अग्रदूत
सेब एक लोकप्रिय स्वादिष्ट फल है, जिससे जुड़ी कहावत ऐन एप्पल ए डे, कीप्स द डॉक्टर अवे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। सेब को मूलतः मध्य एशिया का फल माना जाता है, जो यहां से पहले यूरोप के ठंडे प्रदेशों में व फिर कालान्तर में अमेरिका तक पहुंचा। भारत में सेब का पहला बगीचा शौकिया तौर पर 1870 में कुल्लू घाटी के बंदरोल स्थान पर अंग्रेज कैप्टन आरसी ली द्वारा रोपा गया था। लेकिन भारत में सेब की व्यावसायिक खेती का श्रेय अमेरिकन मिशनरी सेमुअल स्टोक्स को जाता है जो भारतीय रंग में इस कदर रंग जाते हैं कि शिमला की पहाड़ियों में बस जाते हैं।
 1916 में सत्यानन्द स्टोक्स यहां के थानेधार क्षेत्र, कोटगढ़ में सेब की किस्मों को उगाते हैं, जिनका आगे चलकर पूरे हिमाचल व पहाड़ी क्षेत्रों में प्रसार होता है।
इस समय भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड सेब उत्पादन करने वाले मुख्य प्रांत हैं। इसके साथ पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में सेब उत्पादन शुरू हो चुका है। सेब की उम्दा फसल के लिए औसतन 1200 घंटे के चिलिंग ऑवर्ज (हाड़कंपाती ठंड) की जरूरत होती है। इनमें पारम्परिक रूप में रेड, रॉयल, गोल्डन जैसी किस्मों को उगाया जाता रहा है, जिनके फलदार वृक्ष को तैयार होने में औसतन दस से बारह साल लग जाते हैं।
 लेकिन प्रगतिशील किसानों की खोजी दृष्टि एवं अथक श्रम का परिणाम है कि नजारा पूरी तरह से बदल रहा है। आज हाई डेंसिटी (सघन घनत्व) और स्पर वैरायटी के सेब की पौध उगाई जा रही है, जो महज 3-4 साल में ही फल देना शुरू कर देती है। इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार भी अधिक हो रही है और इनके दाम भी पारम्परिक सेब की तुलना में लगभग दोगुना मिल रहे हैं। 
सेब के साथ नाशपाती जैसे अन्य फलों में भी इस तरह के प्रयोग शुरू हो चुके हैं, जो फल उत्पाद में किसी क्रांति की बयार से कम नहीं हैं। इसकी तुलना अन्न उत्पादन के क्षेत्र में किसी दौर की हरित क्रांति से की जा सकती है, जिसमें अन्न की उम्दा किस्मों के साथ पैदावार कई गुणा बढ़ गई थी। आज जब किसानों की आय को दोगुना करने की बात चल रही है तो बागवानी को लेकर चल रहे ऐसे प्रयोग महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

सेब उत्पादन के क्षेत्र में इस क्रांति के अगुआ रहे हैं शिमला की कोटखाई तहसील के ढांगवी गांव के प्रगतिशील बागवान रामलाल चौहान। यात्रा की शुरुआत इतनी सरल नहीं थी, जितनी यह आज प्रतीत होती है। शुरुआती दौर में होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद फाइवस्टार होटल की नौकरी को छोड़ जब रामलाल चौहान दिल्ली आजादपुर मंडी में फल कंपनी के साथ काम करते हैं तो देशभर में भ्रमण के दौरान फल की पैकिंग से लेकर मार्केटिंग व उन्नत बागवानी के तौर-तरीकों को नजदीक से देखते व समझते हैं। इन प्रयोगों को अपने गांव में सेब उत्पादन के क्षेत्र में लागू करते हैं।
शुरुआत में स्थानीय सरकारी नर्सरी में उपलब्ध उन्नत विदेशी किस्मों को ट्रायल के रूप में आजमाते हैं, जब प्रयोग सफल होता दिखता है तो तत्काल 7-8 साल के 300 रॉयल सेब के पौधों को टॉप वर्क कर नया बगीचा तैयार करने का साहसिक कदम उठाते हैं।
यह खबर अन्य बागवानों तक पहुंचती है तो सभी इन पर हंसते हैं। लेकिन अगले ही दो-तीन वर्षों में जब नई किस्म के उन्नत सेब उगने शुरू होते हैं व मार्केट में रिकोर्डतोड़ दाम पर बिकने लगते हैं तो वही बागवान इस पहल के अनुगामी बन जाते हैं। 
आज रामलाल चौहान के बाग में सेब व नाशपाती की विदेशी किस्मों की अधिकांश उन्नत किस्में फल-फूल रही हैं। इस प्रयोग में नौनी स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार होर्टिक्लचर यूनिवर्सिटी के उपकुलपति से लेकर वैज्ञानिकों के सहयोग व प्रोत्साहन को रामलाल चौहान कृतज्ञभाव से स्वीकार करते हैं।

आज देश ही नहीं, विदेश के वैज्ञानिक, किसान एवं शोध छात्र इनके बगीचे को देखने आते हैं। हिमाचल सहित कश्मीर, उत्तराखण्ड एवं पूर्वोत्तर के बागवान इस प्रयोग का लाभ ले रहे हैं। बागवानी में तकनीकी के प्रयोग को लेकर रामलाल चौहान को राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं। इनको आठवां राष्ट्रीय पुरस्कार 2017 में हाईटेक हॉर्टिक्लचर के लिए मिला है।
इसी क्रम में शिमला, कोटखाई के ही बखोल गांव के युवा बागवान संजीव चौहान प्रति हेक्टेयर 52 मीट्रिक टन सेब का रिकॉर्ड उत्पादन कर चुके हैं जो अमेरिका एवं चीन में हो रहे 35-40 मीट्रिक टन से कहीं अधिक है। यह सब सेब की स्पर वैरायटी एवं हाई-डेंसिटी बागवानी के बल पर संभव हुआ है।
कानून, इतिहास एवं पत्रकारिता में स्नातकोत्तर संजीव चौहान सरकारी नौकरी की बजाय बागवानी के जुनून को पिछले लगभग एक दशक से अपने ढंग से अंजाम दे रहे हैं व बागवानी को पत्रकारिता के साथ जोड़कर दूसरों को भी लाभान्वित कर रहे हैं। ऑर्चड बलूम के नाम से इनकी त्रैमासिक पत्रिका और वेबसाइट/फेसबुक पेज रिकॉर्ड पाठक संख्या और हिट्स के साथ इसकी लोकप्रियता एवं सफलता को दर्शाती है। 
 इसके अतिरिक्त फ्री ट्रेनिंग कैंप्स के माध्यम से प्रदेश भर में अपने अनुभव को साझा करते हैं व प्रशिक्षण दे रहे हैं।
वृक्ष के साथ परिवार के सदस्य-सा आत्मीयता भरा इनका संवेदनशील रवैया एक अनुकरणीय पहलु है, जिसके लिए इन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। संजीव चौहान के अनुसार सबसे बड़ा पुरस्कार हमें तब मिलता अनुभव होता है जब हमारी तकनीक से आम किसान लाभान्वित होता है औऱ उसके चेहरे पर मुस्कान आती है।

इन पहलों के बीच एक अभिनव प्रयोग की चर्चा के बिना बात अधूरी रहेगी। यह हैं हिमाचल के ही बिलासपुर जिला में पनियाला गांव के प्रगतिशील बागवान हरिमन शर्मा।
 जिनकी अद्भुत प्रयोगधर्मिता ने सेब की उम्दा किस्म को कम ऊंचाई के गर्म मैदानी इलाकों के लिए एक हकीकत बना दिया है जहां पहले सपने में भी किसान सेब उत्पादन की नहीं सोच सकते थे। इनके बाग में 1800 फीट की ऊंचाई में सफलतापूर्वक फल दे रही सेब की किस्म को इनके नाम से हरमन 1999 नाम दिया गया है, जिसे किसी चिलिंग हॉवर की जरूरत नहीं रहती। इसके सात साल के पौधे में एक क्विंटल तक सेब तैयार हो रहे हैं व जून की शुरुआत में ही फसल तैयार हो जाती है। इस सेब का रंग कुछ लालिमा लिए सुनहरा तथा स्वाद खट्टा-मीठा है।
नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन के सहयोग से इस प्रजाति का ट्रायल देश भर के 31 राज्यों में चल रहा है। कर्नाटक, पंजाब व हरियाणा जैसे प्रांतों में इसका सफल ट्रायल हो चुका है। इस प्रयोग के लिए इनको बिलासपुर में एप्पलमैन के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा इनको पुरस्कार मिल चुका है। राष्ट्रपति भवन में हरमन 1999 सेब की पौध लगा चुके हैं।
प्रांतीय स्तर पर इनको मुख्यमंत्री द्वारा प्रेरणा स्रोत के रूप में नवाजा गया है। इनके प्रयोगों का परिणाम है कि हिमाचल के कांगड़ा, हमीरपुर जैसे गर्म मैदानी इलाकों में बागवान सेब उगा रहे हैं। यही चलन प्रदेश व अन्य गर्म मैदानी इलाकों में शुरू हो चला है।
ऐसे और भी अभिनव प्रयोग चल रहे हैं जो साबित करते हैं कि इनसान अपनी लगन, अथक श्रम, प्रयोगधर्मिता व साहसिक पहल के आधार पर इसी माटी से सोना उगल सकता है। (दैनिक ट्रिब्यून चण्डीगढ़,7मई,2018 को प्रकाशित)

प्रकृति से तालमेल में छिपे समाधान युग के


कुदरत संग दोस्ती से हासिल मंज़िलें

कहावत प्रसिद्ध है कि जितना हम प्रकृति से जुड़ते हैं उतना हम संस्कृति से जुड़ते हैं। जितना हम प्रकृति व संस्कृति से जुड़ते हैं उतना हम अपनी अंतरात्मा से जुड़ते हैं। ऐसे में हमारा संवेदशनशीलता जाग्रत होती है, समाज सेवा सहज रुप में बन पड़ती है। चारों ओर सुख-समृद्धि व शांति का माहौल तैयार होता है, परिवेश में स्वर्गीय परिस्थितियाँ हिलौरें मारती हैं। आज अगर देश-समाज व विश्व में परिस्थितियाँ नारकीय बनी हुई हैं, वातावरण में अशांति, बिक्षुव्धता, दहश्त व घुटन फैली है तो कहीं न कहीं हम प्रकृति व संस्कृति से हमारा अलगाव कारण है। जिसके चलते अंतरात्मा से हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो चला है और समाज के प्रति संवेदशनशीलता कुंद पड़ चुकी है।
ऐसे में प्रकृति के दौहन-शौषण का सिलसिला ब्दस्तूर जारी है, जिसके परिणाम हमारे सामने हैं। नदियाँ सूख रही हैं, जलस्रोत्र दूषित हो रहे हैं। गंगा नदी हजारों करोड़ रुपयों के खर्च के बाद भी मैली की मैली पड़ी है। जमुना का पानी गंदे नाले में तबदील हो चुका है। ऐसे ही कितनी ही नदियों का अस्तित्व खतरे में है, कितनी प्रदूषण की मार से दम तोड़ रही हैं। संवेदनहीनता का आलम कुछ ऐसा है कि इन नदियों में डुबकी लगाकर, आचमन कर अपने पाप-संताप हरने का भाव तो करते हैं, लेकिन इनके अस्तित्व से खिलबाड़ करते सीवरेज के गंदे द्रव्य, कारखानों के बिषैले अवशिष्ट, प्लास्टिक कचरे जैसे विजातीय एवं घातक तत्वों को इसमें विसर्जित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। जीवन का आधार इन जलस्रोत्रों के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता से हीन ऐसी श्रद्धा-भक्ति समझ से परे है।
जबकि श्रद्धा-भक्ति में तो प्रकृति के घटकों के प्रति सहज रुप में संवेदनशीलता एवं आदर का भाव रहता है, क्योंकि प्रकृति के माध्यम से भक्त ईश्वर को झरता महसूस करता है। ऐसा ही भाव जागा तो बाबा बलवीर सिंह सिचेवाला का जब उन्होंने अपने इलाके में दम तोड़ती नदी काली बेईं को देखा। 

यह वही नदी है जिसकी गोद में सिखधर्म का आदि मंत्र गुरु नानकदेव के मानस में प्रकट हुआ था। लेकिन कालक्रम में मानवीय हस्तक्षेप ने 160 किमी लम्बी इस पावन नदी की दुर्गति कर दी। सीवरेज से लेकर कारखानों का गंदा व विषैला जल इसमें गिरने लगा, जिसके चलते गंदे नाले में तबदील हो गई।  इसकी दुर्दशा ने बाबाजी को झकझोर कर रख दिया था। गुरुग्रंथ साहिव की गुरुवाणी - पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत, दिवस रात दुई दाई दया, खेलाई सकल जगत  उनका जाग्रत संकल्प बना और नदी को शुद्ध करने का बेड़ा लिया।
जनसहयोग जुटा औऱ तमाम बिरोध एवं विषमताओं के बीच वे इसके कायाकल्प करने में सफल हुए। इस अथक श्रम का नतीजा रहा कि नदि का जल नल के जल से अधिक शुद्ध है। जल जीवन इसमें लहलहा रहा है, इसके किनारे हजारों हरेभरे वृक्ष लहलहा रहे हैं, इसके सुंदर घाट और इसके पावन तट तीर्थ का रुप ले चुके हैं। बाबाजी का कहना है कि आज जरुरत है कुदरत के साथ जुड़ने की, इसके सत्कार करने की। साथ ही दरिया और धरती को हराभरा करने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने की। यहि आने वाली पीढ़ी के हमारा सर्वोत्तम उपहार हो सकता है। 
 
इसी तरह एक सेवानिवृत फोजी जब अपने गाँव में महिलाओं को दूर जंगल से घास लाता देखता है, पानी के लिए दूर भटकते देखता है, इससे होने वाले कष्ट पीड़ा से संवेदित होता है, तो वह अपने गाँव के चारों ओर जंगल लगाने की ठान लेता है। इस प्रयास में वर्षों बीत जाते हैं। अकेले दम पर वह एक मिश्रित बन तैयार करता है, इस तरह 10-15 वर्षों के अथक श्रम के बाद जब बन तैयार होता है तो गाँव की समस्याओं का समाधान होने लगता है।
आज इस जंगल में पशुओं के लिए चारा उपलब्ध है। वनीय पशु-पक्षियों का यह बसेरा बना हुआ है, जिसमें इनकी चहक व हलचल एक जीवंत प्राकृतिक परिवेश का अहसास होता है। जल स्रोत रिचार्ज हो चुके हैं, गाँव का झरना बारहों मास झर रहा है, पानी की समस्या का समाधान हो चुका है। साथ ही जड़ी-बूटियों से लेकर कैश क्रोप की खेती के साथ गांववासियों के आर्थिक स्वाबलम्बन का पुख्ता आधार यहाँ तैयार है। 

ग्लोबल वार्मिंग के दौर में मिश्रित वन का यह प्रयोग समाधान की उज्जली किरण के रुप में प्रकाश स्तम्भ की भाँति सामने खड़ा है। इस प्रयोग के लिए जगत सिंह जंगली को उत्तराखण्ड के ग्रीन एम्बेसडर सहित तमाम पुरस्कार मिल चुके हैं, लेकिन वे जंगली उपनाम को ही अपनी पहचान मानते हैं। दूर-दूर से आकर लोग इस अद्भुत प्रयोग को देखने आते हैं और अपने क्षेत्रों में लागू कर रहे हैं। प्रकृति के साथ सामंज्य बिठाकर किस तरह सामाजिक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, यहाँ देखा व समझा जा सकता है।
इसके साथ ही प्रकृति की गोद में जीवन के उच्चतर दर्शन को भी समझा जा सकता है। अमेरिकन दार्शनिक, राजनैतिक विचारक एवं प्रकृतिविद हेनरी डेविड थोरो का जीवन इसका एक जीवंत उदाहरण है। गाँधीजी ने थोरो के सिविल डिसओविडिएंस की अवधारणा को असहयोग आंदोलन के रुप में प्रयोग किया था। जीवन को समग्र रुप से समझने के लिए थोरो मेसाच्यूट्स शहर से सटे कोंकार्ड पहाडियों की गोद में स्थित बाल्डेन सरोवर के किनारे आ बसते हैं। 

दो वर्ष, दो माह और दो दिन वहाँ सरोवर के किनारे कुटिया बनाकर वास करते हैं। खेत में मटर, बीन्स, मक्का, शलजम आदि की खेती करते हैं। कुदाल लेकर एक किसान की भूमिका में अपने लिए आहार तैयार करते हैं। कृषि के साथ ऋषि जीवन जीते हैं। आध्यात्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय करते हैं और प्रकृति की गोद में आत्मचितन-मनन के गंभीर पलों को जीते हैं।

बन्य जीवों को अपना सहचर बनाते हैं, झील में नाव के सहारे नौकायान करते हैं, झील की गहराई से लेकर इसके बदलते रंगों का मुआईना कर वैज्ञानिक दस्तावेज तैयार करते हैं। बर्फ पड़ने पर सर्द ऋतुओं में यहाँ के प्रकृति परिवेश की विषम परिस्थियों के बीच पूरी तैयारी के साथ जीवन के रोमाँचक पलों को जीते हैं। यहाँ की सुबह, दोपहरी शाम व रात्रि के पलों की बदलती परिस्थियोँ व मनःस्थिति को बारीकी से निहारते हैं। प्रवास के अनुभवों को वाल्डेन ग्रंथ के रुप में एक कालजयी रचना भावी पीढ़ी को दे जाते हैं।
 
सार रुप में प्रकृति के साथ सामंजस्य में ही जीवन के शांति, सृजन व समाधान के राज छिपे हैं। समाज का कल्याण भी इसी में निहित है। जितना हम प्रकृति से जुड़ेंगे, इसका संरक्षण करेंगे, इससे तालमेल बिठाकर रहेंगे, उतना ही हम इसके वरदानों को अनुभव करेंगे। जितना हम इसका दोहन-शौषण करेंगे, इससे खिलबाड़ करेंगे, उतना ही हमें इसके कोपों को भोगने के लिए तैयार रहना होगा। यह हम आप पर पर निर्भर है कि हम किस रुप में प्रकृति के साथ बरताव करते हैं, इसी में हमारा, समाज व धरती का भविष्य छिपा हुआ है। (दैनिक ट्रिब्यून, चण्डीगढ़, 29जनवरी,2018 को प्रकाशित)

सोमवार, 26 नवंबर 2018

स्वाध्याय संदोह - महापुरुषों की साधु संगत


आत्म-कल्याण की भी चिंता की जाए


आत्मिक कल्याण आवश्यक होने के साथ-साथ थोड़ कठिन भी है। कठिन इसलिए कि मनुष्य प्रायः जन्म-जन्म के संस्कार अपने साथ लाता है। ये संस्कार प्रायः भौतिक तथा सांसारिक ही होते हैं। इसका प्रमाण यह है कि जब मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है तो वह मुक्त हो जाता है। उसे शरीर धारण करने की लाचारी नहीं रहती। चूँकि सभी मनुष्य की अभिव्यक्ति शरीर से हुई, इसलिए यह सिद्ध है कि उसमें अभी शारीरिक संस्कार बने हुए हैं। पूर्व संस्कारों पर विजय पाकर इन्हें आधुनिक रुप में मोड़ लेना-या यों कह लिया जाए कि शारीरिक संस्कारों का आत्मिक संस्कारों से स्थानापन्न कर लेना सहज नहीं होता। संस्कार बड़े प्रबल व शक्तिशाली होते हैं। इन दैहिक संस्कारों को बदलने का सरल सा उपाय यह है कि जिस प्रकार सांसारिक कार्यों और शारीरिक आवश्यकताओं की चिन्ता की जाती है, उसी प्रकार आत्म-कल्याण की चिंता की जाए। जिस प्रकार सांसारिक सफलताओं के लिए निर्धारित एवं सुनियोजित कार्यक्रम बनाकर प्रयत्न तथा पुरुषार्थ किया जाता है, उसी प्रकार मनोयोगपूर्ण आध्यात्मिक कार्यक्रम बनाए और प्रयत्नपूर्वक पूरे किए जाते रहें। इस प्रकार मनुष्य अपने विचारकोण के साथ-साथ पुरुषार्थ की धारा बदल डाले तो निश्चत ही उसके संस्कार परिवर्तित हो जायेंगे और वह शरीर की ओर से मुड़कर आत्मा की ओर चल पड़ेगा।                   - युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य






अंतस का दीपक जलता रहे


क्या केवल ध्यान के समय ही ईश्वर का चिंतन करना चाहिए और दूसरे समय उन्हें भूले रहना चाहिए। मन का कुछ अंश सदा ईश्वर में लगाए रखना चाहिए। तुमने देखा होगा, दुर्गापूजन के समय देवी के पास एक दीपक जलाना पड़ता है। उसे लगातार जलाए रखा जाता है, कभी बुझने नहीं दिया जाता। उसके बुझ जाने पर गृहस्थ का अमंगल होता है। इसी प्रकार ह्दयकमल में इष्टदेवता को प्रतिष्ठित करने के बाद उनके स्मरण-चिन्तनरुपी दीपक को सदा प्रज्वलित रखना चाहिए। संसार के कामकाज करते हुए बीच-बीच में भीतर की और दृष्टि डालकर देखते रहना चाहिए कि वह दीपक जल रहा है या नहीं।                           -  श्रीरामकृष्ण परमहंस

प्रेम का पथ


आत्मनिरीक्षण का पथ कठिन है। प्रेम का पथ सहज है। शिशु के समान बनो। विश्वास और प्रेम रखो तब तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। धीर और आशावान बनो, तब तुम सहज रुप से जीवन की सभी परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ हो सकोगे। उदार ह्दय बनो। क्षुद्र अहं और अनुदारता के सभी विचारों को निर्मूल कर दो। पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं  को ईश्वर के प्रति समर्पित कर दो। वे तुम्हारी सभी बातों को जानते हैं। उनके ज्ञान पर विश्वास करो। वे कितने पितृतुल्य हैं। सर्वोपरि वे कितने मातृतुल्य हैं। अनन्त प्रभु अपनी अनन्ता में तुम्हारे दुःख के सहभागी हैं। उनकी कृपा असीम है। यदि तुम हजार भूलें करो तो भी प्रभु तुम्हें हजार बार क्षमा करेंगे। यदि दोष भी तुम पर आ पड़े तो वह दोष नहीं रह जाएगा। यदि तुम प्रभु से प्रेम करते हो तो अत्यन्त भयावह अनुभव भी तुम्हें प्रेमास्पद प्रभु के सन्देशवाहक ही प्रतीत होंगे। वस्तुतः प्रेम के द्वारा ही तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे। क्या माँ सर्वदा प्रेममयी नहीं होती। वह आत्मा का प्रेमी भी उसी प्रकार है। विश्वास करो। केवल विश्वास करो। फिर तुम्हारे लिए सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुमसे जो भूलें हो गई, उनसे भयभीत न होओ। मनुष्य बनो। जीवन का साहसपूर्ण सामना करो। जो भी हो होने दो। तुम शक्तिशाली बनो। स्मरण रखो तुम्हारे पीछे अनन्त शक्ति है। स्वयं ईश्वर तुम्हारे साथ है। फिर तुम्हें किस बात का भय हो सकता है।

-   एफ.जे. अलेक्जेंडर



अंतरात्मा की पुकार और समर्पण भाव




अपने कार्य को आरंभ करने के लिए ऊपर की ज्योति हमसे जो कुछ मांगती है वह है अंतरात्मा की पुकार और मन में सहारे के लिए पर्याप्त बिंदु। ........ आरंभ में विचार अपर्याप्त हो सकता है और होना भी चाहिए। अभीप्सा संकीर्ण और अपूर्ण हो सकती है, श्रद्धा धुंधली-सी हो सकती है क्योंकि वह निश्चित रुप से ज्ञान की चट्टान पर आधारित नहीं होती, इसलिए घटती-बढ़ती, अनिश्चित और आसानी से कम होनेवाली होती है। प्रायः वह बुझ भी सकती है और उसे तुफानी घाटी में मशाल की तरह फिर से कठिनाई के साथ सुलगाना होता है। लेकिन अगर एक बार भीतरी गहराईयों में दृढ़ आत्म-समर्पण हो, यदि अंतरात्मा की पुकार के प्रति जाग्रति आ जाए तो ये अपर्याप्त चीजें भागवत प्रयोजन के लिए पर्याप्त उपकरण बन  सकती हैं। इसलिए बुद्धिमान लोग हमेशा भगवान की ओर के रास्तों को सीमित करने से कतराते रहे हैं, वे उनके प्रवेश के लिए सबसे तंग दरबाजे, सबसे निचली और अंधेरी सुरंग, सबसे निचले दरीचे को भी बंद नहीं करते। कोई भी नाम, रुप, प्रतीक, कोई भी भेंट पर्याप्त मानी जाती है यदि उसके साथ समर्पण-भाव हो, क्योंकि स्वयं भगवान खोज करनेवाले के ह्दय में होते हैं और उसके नैवेद्य को स्वीकार करते हैं।     -श्रीअरविंद
 
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