रविवार, 29 अप्रैल 2018

लेखन कला


लेखन की शुरुआत करें कुछ ऐसे..
लेखन खुद को व्यक्त करने की एक चिरप्रचलित विधा है। हमारा पुरातन इतिहास, पूर्वजों-पुरखों के कारनामें, कथा-गाथाएं, जीवनियाँ-संस्मरण, साहित्य, दर्शन सब लेखन की विधा के माध्यम से ही हम तक पहुँचे हैं। इंटरनेट के युग में लेखन में थोड़ा परिवर्तन जरुर आ चला है, लेकिन मूल बातें यथावत हैं। जहाँ एक ओर संचार के माध्यम के रुप में लेखन का अपना महत्व है, वहीं स्वयं को अभिव्यक्त करने व अपनी क्रिएटिविटी को प्रकट करने का यह एक प्रभावी माध्यम है।

अगर आप अभी तक लेखन की कला को जीवन का अंग नहीं बना पाएं हों व इसकी शुरुआत करना चाहते हों, तो यह पोस्ट आपके काम आ सकती है।
1.       न करें परफेक्ट समय का इंतजार प्रायः व्यक्ति यह सोचकर लिख नहीं पाता कि उसे परफेक्ट समय का इंतजार रहता है। यह परफेक्ट समय का इंतजार ओर कुछ नहीं प्रायः एक तरह का मानसिक प्रमाद होता है जो लेखन की जेहमत से बचता फिरता है, टालमटोल करता रहता है। और यह परफेक्ट समय कभी आता नहीं। पूछने पर बहाने मिलते हैं कि हमें समय ही नहीं मिलता या रुचि ही नहीं है। यदि समय है भी तो विचार ही मन में नहीं आते कि क्या लिखें। आते भी हैं तो बेतरतीव होते हैं।

2.       लेखन का फरफेक्ट समय – वास्तव में देखा जाए तो लेखन का परफेक्ट समय वो पल होते हैं जब व्यक्ति नए विचारों एवं भाव से भरा होता है। इस पल अगर आप ठान लें कि आपको स्वयं को लेखनी के माध्यम से व्यक्त करना है और दृढ़तापूर्वक कलम उठा लें तो शब्द खुद-व-खुद झरते जाएंगे। वाक्यों का संयोजन कितना ही लचर क्यों न हो, शब्द कितने ही अनुपयुक्त क्यों न हो आपका पहला पग उठ जाएगा।
और सबसे खास बात लेखन के संदर्भ में है कि इसमें आप हैं और आपकी कलम व कॉपी या लेप्टॉप। सो इसमें अधूरेपन व कमियों को लेकर संकोच की, डरने की जरुरत कैसी। अतः ऐसे पलों को नजरंदाज न करें। ये पल आपकी लेखन की विधा में हाथ आजमाने के लिए सबसे माकूल होते हैं।

3.       करें पहला रफ ड्राफ्ट तैयार इन भाव एवं विचारों को कागज पर उतारें। यह उस विषय विशेष या टॉपिक पर आपका पहला कच्चा ड्राफ्ट है। इस ड्राफ्ट का मूल भाव या केंद्रीय विचार क्या है, उसको एक हेडिंग के अंतर्गत स्पष्ट करने की कोशिश करें। यह आपके उभर रहे विषय का मूल है। इसके ईर्द-गिर्द अब लेखन के ताने-बाने को बुनना है। यह आपका पहला रफ ड्राफ्ट है।

अब इस ड्राफ्ट को छोड़ दें। विषय पर कुछ ओर विचार करें। यथासंभव पुस्तकों, विशेषज्ञों से चर्चा करें। ब्रेन स्टोर्मिंग करें। अब इन नए विचारों को रफ ड्राफ्ट में जोडें व मूल प्रति को नए सिरे से पढ़कर रिवाइज करें। इसमें यदि संभव हो तो हेंडिंग के बाद एक इंट्रो(आमुख) हो, बीच में बॉडी(मुख्य लेखन) के अंत में एक निष्कर्ष हो तो वेहतर होगा।
इस तरह अपनी रचना को रिवाईज करते रहें, जब तसल्ली हो जाए, तो इसे फाईनल कॉपी मानकर किन्हीं विशेषज्ञों की मदद ले सकते हैं व उचित स्थान व प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित कर सकते हैं।
4.       करें नित्य डायरी लेखन का अभ्यास लेखन में अभ्यास की जड़ता को तोड़ने के लिए नित्य डायरी लेखन एक महत्वपूर्ण विधा है। दिन के फुर्सत के पलों या रात्रि को सोते समय कुछ मिनट निकाल सकते हैं। दिन भर के अनुभवों को इस समय व्यक्त करने का प्रयास करें। यह दिन भर की कोई उपलब्धि, दैनिक जीवन के संघर्ष या सबक कुछ भी हो सकते हैं।
दूसरा, जीवन को संवेदित-आंदोलित करते बाहरी मुद्दे भी हो सकते हैं। रोज अगर एक पैरा भी ऐसा कुछ लिखने का क्रम बनता हो तो एक दिन आप पाएंगे की आपकी भाषा समृद्ध हो रही है, शब्द भंड़ार बढ़ रहा है, लेखन शैली उभर रही है। और विचारों का प्रवाह बैठते ही, विषय पर केंद्रित होते ही प्रवाहित होने लगा है।
5.       करें उचित प्लेटफॉर्म पर शेयर अगर आप लिखने की विधा में नियमित हो चले, आपके लेखन का प्रवाह बन पड़ा। तो आप उचित शोध के साथ पुष्ट अपने विचारों एवं भावों को उचित प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित या शेयर कर सकते हैं। ये इंस्टाग्राम में फोटो के साथ सारगर्भित पंक्तियों के रुप में हो सकता है। ब्लॉग अपने भावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने का लोकप्रिय प्लेटफॉर्म है व इन्हें फिर फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस जैसे प्लेटफॉर्म पर शेयर कर सकते हैं।

सोशल मीडिया की खासियत यह है कि इसमें आपको पाठकों का फीड़बैक मिलता रहता है, जिसे आप उचित एनालिटिक्स पर जाँच-परख सकते हैं। आपको पता चलेगा कि आपकी कौन सी पोस्ट व विचारों को पाठक कितना पढ़ रहे हैं, कितना पसंद कर रहे हैं। यह फीड़बैक आपका उत्साहबर्धन करेगी। संभव हो तो किसी समाचार पत्र-पत्रिका में भी प्रकाशित कर सकते हैं।

6.       लेखन के साथ रखें ध्यान कुछ बातों का लेखन शुरुआत करने के संबन्ध में ध्यान रखें, कि शुरुआत ऐसे विषय से करें जिस पर आपका कुछ मायने में अधिकार हो। इससे आपकी भाषा में एक सधापन आएगा, विश्वास होगा, सहजता होगी। दूसरा अनुभव से भाषा का प्रवाह टूटेगा नहीं, शब्द सरल होंगे, वाक्य छोटे होंगे व लेखन प्रभावशाली होगा।

आपके लेखन में पाठकों के फीडबैक से मिलते उत्साहबर्धन का अपना महत्व होता है। लेकिन अंततः सृजन का आनन्द अपने आप में लेखन का प्रसाद होता है। अतः बिना अधिक आशा-अपेक्षा के साथ अपने सृजन साधना में लगे रहें, अपने सत्यानुसंधान को लोकहित में शेयर करते रहें। लोगों का इससे कितना हित होगा कह नहीं सकते लेकिन हर मौलिक सृजन के साथ आपका विकास अवश्य होगा, इतना सुनिश्चित है।
 
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शनिवार, 31 मार्च 2018

दिल करता है दुनियाँ को हिला दूँ

अभी तो महज बीज हूँ
 दिल करता है दुनियाँ को हिला दूँ,
लेकिन खुद हिल जाता हूँ,
अभी तो महज़ बीज हूँ,
देखो, कब पौध बन पाता हूँ।

देखे हैं ऐसे भी बृक्ष मैंने,
जो खिलने से पहले ही मुरझा गए,
क्या मेरी भी है यही नियति,
सोचकर घबराता हूँ।
लेकिन आशा के उजाले में,
नयी हिम्मत पाता हूँ,
बढ़ चलता हूँ मंजिल की ओर,
आगे कदम बढ़ाता हूँ।

अभी तो करने के कई शिखर पार,
देखो हिमवीर बन कहाँ पहुँच पाता हूँ।।

कुछ एकांतिक पल, बस अपने लिए


अपने संग संवाद के कुछ अनमोल पल
आज इंसान इतना व्यस्त है कि उसके पास हर चीज के लिए समय है, यदि नहीं है तो बस अपने लिए। जीवन इतना अस्त-व्यस्त हो चला कि सुनने को प्रायः मिलता है कि यहाँ मरने की भी फुर्सत नहीं है। व्यक्ति जिंदगी के गोरखधंधे में कुछ ऐसे उलझ गया है कि उसे दो पल चैन से बैठकर सोचने की फुर्सत नहीं है कि जिंदगी जा कहाँ रही है। जो हम कर रहे हैं, वह क्यों कर रहे हैं, हम किस दिशा में बह रहे हैं। आजसे पाँच साल, दस साल बाद यह दिशाहीन गति हमें कहाँ ले जाएगी, इसकी दुर्गति की सोच व सुध लेने का भी हमारे पास समय नहीं है।
कुल मिलाकर जीवन मुट्ठी की रेत की भांति फिसलता जा रहा है और हम मूकदर्शक बनकर जीवन का तमाशा देख रहे हैं। इस बहिर्मुखी दौड़ में खुद से अधिक हमें दूसरों का ध्यान रहता है, हम अपने सुधार की वजाए, दूसरों के सुधार में अधिक रुचि रखते हैं। अपनी हालत से बेखबर, दूसरों की खबर लेने में अधिक मश्गूल होते हैं। ऐसे में हम जीवन की सतह पर ही तैरने के लिए अभिशप्त होते हैं और अंदर का खालीस्थान यथावत बर्करार रहता है, जिसके समाधान के लिए गहराई में उतरने की बजाए हम फिर दूसरी बेहोशी में उलझ जाते हैं। ऐसे में जीने का, आगे बढ़ने का भ्रम होता है, लेकिन जीवन कोल्हू के बैल की भांति चलता रहता है, पहुँचता कहीं नहीं।
ऐसे में जीवन की शांति को खोजते खोजते मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे, सकल तीर्थ स्थानों को हम छान मारते हैं, लेकिन अपनी सुध नहीं ले पाते। अंतर की गुहा में बैठी आत्मा एक कौने में उपेक्षित सिसकती रहती है, जिसको हम प्रायः अनसुना किए रहते हैं। जो प्रतिभा अंदर प्रकट होने के लिए आकुल थी, उसकी ओऱ ध्यान ही नहीं जाता। जो तड़प अंदर थी कुछ करने की, उसे मौका ही नहीं मिलता और वह पड़े-पड़े शांत हो जाती है। बाहर देखा देखी में भीड़ के साथ बहते-बहते जीवन का असली मकसद हाथ से यूँ ही फिसल जाता है। उधारी सपनों का बोझ कंधे पर ढोए जीवन बिना किसी सार्थक निष्कर्ष के बस यूं ही बीत जाता है। और अंत में हाथ लगता है तो सिर्फ एक गहरी विषाद, अवसाद और पश्चाताप भरी मनोदशा।
कितना अच्छा होता यदि समय रहते अपनी सुध ली होती। नित्य कुछ पल अपने लिए विचार के, आत्म चिंतन के, मनन के, आत्म समीक्षा के विताए होते। कुछ पल बैठकर अपने सच का सामना किया होता। जीवन की बहिर्मुखता के साथ अंतर्मुखता के कुछ अंतरंग पल अपने साथ विताए होते।
क्योंकि एकांत, शांत मनःस्थिति में ही अपना सही परिचय मिलता है। अपनी खोज, विश्लेषण व समीक्षा सम्भव हो पाती है। अपनी खूबी-खामी व शक्ति-दुर्बलता का परीक्षण संभव होता है और साथ ही अपने मौलिक स्वरुप की अभिव्यक्ति संभव होती है। यही एकांत के पल गहन-गंभीर सृजन के होते हैं। जीवन की अंतर्निहित शक्तियों के प्रस्फुटन का ताना वाना इन्हीं आंतरिक पलों में बुनना संभव होता है। अंतर्वाणी इन्हीं पलों में सबसे स्पष्ट एवं मुखर होती है। जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति का अर्जन इन्हीं पलों में होता है। अंतरात्मा अपने स्रोत्र के निकट होती है, अपनी शाश्वत शांति, नीरवता एवं वैभव के साथ विराट की ओऱ उन्मुख।
हर सफल इंसान की तरह महापुरुषों के तमाम दृष्टाँत इसकी बानगी पेश करते हैं। वे अंतर्मन से जुड़कर ही खुद को जान पाए, अपने निष्कर्षों के साथ कुछ सार्थक सृजन कर पाए। भगवान बुद्ध-महावीर से लेकर महर्षि अरविंद, महर्षि रमण तक इसी एकांत में तप कर कुंदन बने थे। स्वामी विवेकानन्द ने इसी एकांत में आंतरिक जीवन को समृद्ध-सशक्त बनाया था। गाँधी जी व कवींद्र टैगोर ने क्रमशः कौसानी व शिमला की नीरवता में कालजयी सृजन किया था। गहन तप व सृजन हेतु आचार्य श्रीरामशर्मा का हिमालय प्रवास जीवन का अभिन्न अंग रहा। महान विचारक थोरो की कालजयी रचना वाल्डेन झील के किनारे विताए ऐसे ही पलों का वरदान थी।
हालाँकि जीवन की भाग-दौड़ के बीच अपने लिए समय निकालना कठिन होता है लेकिन सुबह शाम या सोते समय इसके लिए कुछ मिनट निकाले जा सकते हैं। दिन में ऑफिस के शुरु, अंत व मध्य में कुछ पल एकांतिक आत्म समीक्षा के विताए जा सकते हैं। प्रातः या दिन के किसी भी समय, जो अनुकूल हो, कुछ पल मौन रहकर मन की ऊर्जा के बिखराव को रोककर अंतर्मुख भाव को सुदृढ़ किया जा सकता है।
सप्ताह अंत में कुछ घंटे या माह में एक दिन या साल में कुछ सप्ताह सघन एकांत के प्रकृति की गोद में विताए जा सकते हैं। इसके साथ ही घर के कौने में ऐसा ध्यान या पूजा कक्ष बनाया जा सकता है, जहाँ ऐसा मनोभाव जाग्रत होता हो। बाहरी परिवेश में यदि ऐसा एकांत संभव न हो, तो मन की ह्दयगुहा में ही एकांत को तलाशा जा सकता है। भीड़ के बीच भी एकांत का यह अहसास एक आदर्श स्थिति है, जिसका अभ्यास किया जा सकता है।

इस तरह सिर्फ अपने लिए निकाले गए कुछ गहन-गंभीर पल एकतरफा बहिमुर्खी जीवन की दिशाहीन गति को थामकर, अंतर में प्रवेश के सुअवसर बन सकते हैं और अपनी परिणति में जीवन की सार्थकता का अहसास दिलाने वाले सुयोग सावित हो सकते हैं।

देहरादून –शैक्षणिक यात्रा, भाग-2


ऑर्गेनिक फार्मिंग, जैव विविधता संरक्षण की प्रयोगशाला - नवधान्या विद्यापीठ

हेस्को के बाद डेवकॉम के शैक्षणिक भ्रमण का अगला पड़ाव था प्रख्यात पर्यावरणविद, विदुषी एवं जैविक कृषि एक्टिविस्ट डॉ. वंदना शिवा की प्रयोगशाला – नवधान्या बीजपीठ, जो शिमला वाईपास के अंतिम छोर पर वायीं ओर स्थित है। प्रेमनगर से आगे मुख्यमार्ग से 4-5 किमी बढ़ने के बाद वांय मुड़ते हुए हिमगिरि जी यूनिवर्सिटी आती है, इसके आगे पुल पारकर आईएसबीटी की ओर लगभग 1 किमी दूरी परनवधान्या वीज विद्यापीठ का पट लगा है, जहाँ से अंदर मुड़ने पर थोड़ी देर बाद आम्रकुंज में प्रवेश होता है।
आम के बौर से लदे वृहद पेड़ जैसे हमारा स्वागत कर रहे थे। वाहन एक किनारे पर खड़ा कर हम पैदल ही बगीचे से होकर प्रवेश करते हैं। यहाँ का प्राकृतिक परिवेश, इसकी नीरव शांति, पक्षियों की चहचाहट यहाँ चल रहे प्रयोग की जीवंत प्रस्तुति दे रहे थे।विकाससंचार विशेषज्ञ श्री दिनेश सेमवाल अपनी चिरपरिचित मुस्कान व शालीनता के साथ ग्रुप का स्वागत करते हैं व विस्तार से नवधान्या में चल रहे प्रयोगों पर प्रकाश डालते हैं।

किन्हीं मीटिंग में व्यस्त होने के कारण संस्थान की संस्थापिका एवं मार्गदर्शक डॉ. वंदना शिवा से मुलाकात नहीं हो पायी। गेट के अंदर कुछ विदेशी प्रशिक्षु आंगन में फर्श पर बैठे फसल सुखा रहे थे, श्रमदान कर रहे थे। सेमवालजी से संस्था की पृष्ठभूमि को जानने के बाद छात्रों के दल के साथ यहाँ के ऑर्गेनिक फार्म में प्रवेश करते हैं, जिसमें गैंहूं, जौ, सरसों, राई व दूसरे तमाम अन्न व सब्जियों की किस्मों कोप्राकृतिक तरीकों से यहाँ विकसित होते देखा जा सकता है। इनमें किसी तरह के रसायन व कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता।यहाँ मिश्रित खेती पर बल दिया जाता है, जिसके कारण जमीं की उर्बरता बनी रहती है।
सेमवालजी के अनुसार मिश्रित खेती हमारी पारम्परिक खेती का तरीका रहा है, जो हमारे पूर्वजों द्वारासदियों से आजमाए गए पारम्परिक ज्ञान पर आधारित था। लेकिन आज हम जल्द से जल्द अधिक उत्पादन की दौड़ में एकल कृषि पर केंद्रित हो चले हैं। जीन संबर्धित बीजों का प्रयोग कर रहे हैं। परिणाम यह होता है की कुछ समय बाद मिट्टी की ऊर्बरता कुंद पड़ने लगती है। तमाम तरह के हानिकारक कीट-पतंगों का असर बढ़ने लगता है। लगातार रसायन व कीटनाशकों के प्रयोग से हानिकारक कीटों के साथ लाभदायक कीटों का भी सफाया हो जाता है। साथ ही हानिकारक कीटों की प्रतिरोध क्षमता बढ़ती जाती है और फसलों पर और जहरीले कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ता है, जिसकी परिणति अंततः जमीं, फसल के साथ उपभोक्ता व किसान सभी पर घातक साबित होती है। किसानों द्वारा आत्महत्या को खेती के इस नकारात्मक एवं अप्राकृतिक तौर-तरीकों से जोड़कर देखा जा सकता है। शोध के आधार पर भी यह सत्य प्रामाणिकत हो चुका है। पंजाब में हरित क्राँति के बाद किसानों की दुर्दशा इसकी कथा व्यां करती है। कैंसर ट्रेन के रुप में यहाँ की कुख्यात रेल ऐसे ही रसायनिक खेती के घातक दुष्परिणामों को दर्शाती है। इसका समाधान यहाँ चल रहे ऑर्गेनिक खेती के प्रयोगों के आधार पर समझा जा सकता है। इस परिसर के प्राकृतिक परिवेश में तमाम तरह के पक्षियों की चहचाहट यहाँ पनप रही समृद्ध जैव-विविधता का प्रत्यक्ष प्रमाण पेश करती है। एक शोध के अनुसार यहाँ के परिसर में 78 प्रकार के पक्षी मौजूद हैं।

रास्ते में शहतूत के पेड़ में पक रहे खटे-मीठे जंगली फलों का आनन्द लेते हुए, बाँश के झुरमुटों के साय में हम खेत के दूसरे छोर पर बीजबैंक तक पहुँचते हैं, जो नवधान्या पीठ की एक अनूठी पहल है, जहाँ अन्न, शाक-सब्जी व फल की 1500 से अधिक प्रजातियों को संरक्षित होते देखा जा सकता है। यहाँ गैंहूं की 222,चावल की 735प्रजातियाँ संरक्षित हैं। इसी तरहबाजरा, जंघोड़ा, कोदा, काउनी(फोक्सटेल मिल्लेट) जैसे उपेक्षित मोटे अन्न की पारम्परिक फसलों की दर्जनों किस्में संरक्षित हैं। इस समय नवधान्या के 22 राज्यों में 122 सामुदायिक बीज बैंक सक्रिय हैं। पिछले तीन दशकों से अधिक समय की विकास यात्रा में संस्था ने देशभर में 5000 से अधिक फसलों को संरक्षित किया है। और अब तक लाखों किसान यहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं।

संस्थान की शुरुआत 1987 में चिप्को आंदोलन से प्रेरित होकर हुई थी, जब बीज बचाने की मुहिम उत्तराखण्ड में चली थी। ज्ञातव्य हो कि डॉ. वंदना शिवा के जूझारु प्रयासों का ही फल था कि क्रमशः 1994 से 2004 तक नीम, बासमती और गैंहूं जैसी पारम्परिक फसलों के बीजों के पेटेंट पर भारतीयोंकोहक मिलता है, जिन पर विदेशी ठग अपने नाम का ठप्पा लगा रहे थे। 
यहाँ का बीज बैंक एक अद्भुत प्रयोग है, जिसे देखकर लगता है कि हमें पारम्परिक बीजों के संरक्षण की कितनी जरुरत है। धन्य हैं वो किसान जो तात्कालिक मुनाफे के शॉर्टकट में न पड़कर अपनी जमीं का कुछ अंश पारम्परिक बीजों के संरक्षण में लगाए हुए हैं और जैविक खेती की दूरदर्शिताभरी साहसिक पहल कर रहे हैं।


बापसी में यहाँ के अनुभवी विशेषज्ञ डॉ.किमोठी जी से मुलाकात होती है। इनके दशकों के अनुभव को सार रुप में ग्रहण करते हैं। किस तरह से ऑर्गेनिक खेती के प्रयोग देश भर में सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। किस तरह से आर्गेनिक कीटनाशक तैयार किए जाते हैं, जमीं को ऊर्बर करने व बीजों के संरक्षण के देशी तौर-तरीकों पर चर्चा हुई। पता चला कि देश ही नहीं बल्कि विदेशों में कितनें केंद्रों में ऐसे प्रयोग चल रहे हैं।
मालूम हो कि संस्थान की संस्थापिका डॉ. वंदना शिवा अपनी बेस्टसेलर पुस्तकों के साथ यह ज्ञान साझा कर रही हैं। इसके साथ उनकी प्रेरक टेड़ टॉक के साथ तमाम विडियोज यू-ट्यूब पर अपलोड़ हैं, जिनसे जिज्ञासु लाभान्वित हो सकते हैं। 
प्रकृति की गोद में ऑर्गेनिक खेती के साथ जैव विविधता के संरक्षण के प्रयोग को देखकर लगा कि कितना कुछ किया जाना शेष है। कम से कम अपने क्षेत्रों, गांव-कस्वों व आंगन-गलियारों में ऐसे प्रयोग की पहल तो कर ही सकते है। पाठ्यक्रम में ऐसी पढ़ाई का भी समावेश कितना जरुरी हो गया है। विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट्स से लेकर शोधकार्यों में ऐसे शोध-अध्ययनों को प्रोत्साहित करने की जरुरत है। विनाश की ओर जा रही मानवता को सृजन की ओर मोड़ने के लिए हर स्तर पर भगीरथी प्रयास की जरुरत है। हर संवेदनशील इंसान अपने भाव भरे अकिंचन से प्रयास के कुछ ठोस पहल तो कर ही सकता है।
इन्हीं भावों के साथ हम बापिस अपनी अंजिल की ओर कूच करते हैं। शाम हो रही थी। लेकिन नींद के झौंके में पता ही नहीं चला कि कब आईएसबीटी के आगेफ्लाईओवर पर गाड़ी आगे बढ़ चुकी है। लगा यही ईश्वर की इच्छा है, सो सीधे गाड़ी को फ्लाईऑवर पार कर वायीं ओर मोड़ते हुए कुछ ही मिनटों की भटकन के बाद हम बुद्धाटेम्पल पहुंच जाते हैं। आज हम शायद तीसरी-चौथी बार आ रहे थे। मंदिर के क्पाट आज तक हमेशा बंद ही मिले। आज पहली बार कपाट खुले मिले।लगा जैसे आज पहली बार बुद्ध मुस्कुरा रहे हैं। 
ऊपर की मंजिल में भगावन बुद्ध के अवलोकितेश्वर स्वरुप का दर्शनकर फिर नीचले तल परसामूहिक रुप में मंत्र जाप कर रहे लामाओं के कक्ष में प्रवेश किए। सैंकड़ों लामाओं के सस्वर मंत्र उच्चारण एवं पाठ का दृश्य एक अद्भुत अनुभव रहा।श्रद्धालु चारों ओर घेरा बनाकर इसमें भागीदरी कर रहे थे। बाहर मार्केट में आकर जड़ी-बूटी से बनी अग्रबती खरीदे, जो पता चला भूटान प्रदेश की दुर्लभ जड़ी-बूटियों से बनी थी। घर-परिवार के लिए कुछ तिब्बती उत्पाद भी खरीदते हैं, जो प्रायः उच्च गुणवत्ता के व बेहतरीन रहते हैं।मैदान में विश ड्रम को रोल कर अपना भाव निवेदन किया। बाहर बैंच पर बैठे नन्हें-नन्हें लामाओं से लेकर किशोर एवं युवा लामाओं से संवाद की कोशिश की लेकिन समयाभाव के कारण कुछ अधिक बात नहीं हो पायी।

यात्रा की सुखद स्मृतियों के साथ काफिला देहरादून शहर को पार करते हुए देसंविवि की ओर चल पड़ता है। सार रुप में शैक्षणिक भ्रमण प्रकृति-पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, ऑर्गेनिक कृषि व समावेशी विकास को लेकर एक नई समझ दे गया। विश्वास है कि ऊर्वर अंतःकरणों में किन्हीं बीजों का रोपण इस शैक्षणिक भ्रमण के माध्यम से हुआ, जो भविष्य में समय आने पर अपने ढंग से अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित होकर अपने सत्परिणामों से समाज, देश व विश्व-वसुधा को कृतार्थ करेगा।
 
शैक्षणिक यात्रा के पहले भाग को आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं - पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण विकास की प्रयोगशाला, हैस्को
 

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