सोमवार, 10 जुलाई 2017

यात्रा वृतांत - हेमकुंड़ साहिब का रोमाँचक सफर-1




गोविंदघाट से घाघरिया, 14 किमी ट्रैकिंग मार्ग
खोज गुरुगोविंद सिंहजी की आत्मकथा की
गुरुगोविंद सिंहजी से बचपन से ही गहरा लगाव रहा है। घोड़े पर सवार, हाथ में बाज लिए एक यौद्धा संत की छवि जहाँ भी दिखती, अंतरमन को झंकृत कर देती। जब स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में गुरुसाहिबान का बखान सुना तो श्रध्दा और भी बढ़ गई। कहीं पढ़ा कि गुरुजी ने पूर्वजन्म में हिमालय में घोर तप किया था, जिसका जिक्र उनकी आत्मकथा में मिलता है। मूल उद्धरण को जानने के लिए अब आत्मकथा खोजने की कवायद शुरु हो गई। कई वर्षों तक पुस्तक स्टालों पर खाक मारता रहा, पर मिली नहीं। अंत में दिल्ली के विश्व पुस्तक मेला में अमृतसर से आए एक सिक्ख सज्जन को जब हमारी खोज का अहसास हुआ, तो वो सुंदर नीले मखमली कपड़े में लिपटा विचित्र नाटक हमको भेंट कर गए। लगा जैसे हमारे मन की मुराद पूरी हो गई।
यात्रा की पृष्ठभूमि
पुस्तक पढ़ते-पढ़ते स्पष्ट हुआ कि पूर्व जन्म में गुरु गोविंद सिंहजी ने किस स्थल पर कैसे योग साधा था। उस स्थल, हेमकुण्ड साहिब को देखने का ध्रुव लक्ष्य बन चुका था। विभाग के पत्रकारिता छात्रों के यात्रा वृतांत पाठ्यक्रम के अंतर्गत किसी स्थल का चयन करना था। जब घूमेंगे तभी तो यात्रा वृतांत बनेगा। लगभग 15 छात्र-छात्राओं व 4-6 शिक्षकों के दल के साथ हेमकुंड साहिब यात्रा का निर्णय हुआ। 2012 का सितम्बर का महीना था। तिथि निर्धारित हो चुकी थी। इस तीर्थ स्थल के मार्ग की दुर्गमता का पूरा बोध नहीं था। मोटा अनुमान था कि काफी ऊँचाई पर है, ठंड़ काफी होगी। हवा का दवाब अधिक व ऑक्सीजन कम होगी। 
 हम अपने दल की शारीरीक-मानसिक दशा से परिचित थे। मोटा अनुमान था कि कुछ तन व मन से कमजोर बच्चों को गोविंद घाट में ही रोकना पड़ सकता है और कुछ को घाघरिया बेस कैंप में। हेमकुंड की 15500 फीट बर्फीली ऊँचाई तक कुछ गिने-चुने रफ-टफ लोग ही जा पाएंगे। जो जितना घूम लिया, उसका वर्णन ही तो करना है, यात्रा वृताँत बन जाएगा और मन की इच्छा भी पूरी हो जाएगी।

विषम परिस्थितियों की चुनौती का पहाड़
यात्रा की तिथि निर्धारित हो चुकी थी। इसके 2-4 दिन पहले ही रास्ते में गढ़वाल क्षेत्र के दो गाँव बादल फटने से पूरी तरह से ध्वस्त हो चुके थे। देहरादून में अपने पत्रकार मित्र से क्षेत्र का हालचाल पता करने को कहा तो रिपोर्ट आई कि इस सीजन में यहाँ जाना मूर्खता होगी। लेकिन प्रकृति प्रकोप की ये दुश्वारियाँ अटल संकल्प के साथ मचल रहे मन को कहाँ रोकने वाली थी। मन में अदम्य उत्साह के सामने चुनौतियों का पहाड़ बौना साबित हो रहा था। अगाध आस्था थी ह्दय में कि गुरु के धाम में, प्रकृति माँ की गोद में ही तो जा रहे हैं सब ठीक हो जाएगा। बाकि जो होगा देखा जाएगा। अच्छे से अच्छे की संभावना और बुरी से बुरी परिस्थिति के लिए मन से तैयार होकर तैयारी में जुट पड़े।
आश्चर्य तब लगा जब पूरे रास्ते भर कहीं बारिश, भूस्खलन और किसी तरह की प्राकृतिक आपदा का कोई सामना नहीं करना पड़ा। अखबार पढ़कर जो भयावह धारणा बनी थी, वह रास्ते में तिरोहित होती रही। पूरी यात्रा भर प्रकृति जैसे हमारे साथ थी। दैवी कृपा का अहसास हर पड़ाव पर होता रहा।  
20-22 पथिकों के काफिले को लिए अपना वाहन देसंविवि से चल पड़ा। ऋषिकेश से होते हुए हमारा गढ़वाल हिमालय में प्रवेश हुआ। गंगा के किनारे, हल्की धुंध की चादर ओढ़े पर्वतों के बीच सफर खुशनुमा अहसास देता रहा।
पहली बार पहाड़ों का सफर कर रहे पथिकों का उत्साह, उमंग और मस्ती देखते ही बन रही थी। इस तरह ऋषिकेश, देवप्रयाग, श्रीनगर से होते हुए रुद्रप्रयाग, जोशीमठ के रास्ते अंत में हम शाम तक लगभग 8-10 घंटे के सफर के बाद गोविंदघाट पहुँचे।  
 
सफर का पहला पड़ाव - गोविंदघाट से पुलना गाँव तक
गोबिंदघाट गुरुद्वारा हमारे रात का ठिकाना बना। यहाँ गुरुद्वारे में ठहरने-भोजनादि की उत्तम व्यवस्था है। यहीँ पर गुरुद्वारे में रात्रि विश्राम किए। अपनी योजना के अनुसार तन-मन से कमजोर बच्चों को यहीं रुकने की योजना थी, लेकिन कोई भी रुकने को तैयार न था। सब आगे बढ़ने के लिए मचल रहे थे। इनका उत्साह देखकर लगा कि इन्हें यहाँ छोड़ना अन्याय होगा। 
प्रातः भोर होते ही काफिला गोविंदघाट से घाघरिया की ओर चल पड़ा। भोर के धुंधलके में पर्वत जैसे समाधिस्थ ध्यानमग्न तपस्वी जैसे लग रहे थे। प्रातः की इस नीरवता में बद्रीनाथ धाम से उतर रही गर्जन-तर्जन करती हुई अलकनंदा नदी के सांय-सांय करते घनघोर स्वर एक अलग ही स्थल पर होने का तीखा अहसास दे रहे थे। अलकनन्दा के तंग पुल को पार करते हुए हम अब हल्की चढ़ाई के साथ आगे बढ़ रहे थे। 

पहली वार पहाड़ की चढाई कर रहे पथिकों को थोड़ी ही देर में अहसास हो चुका था कि पहाड़ की चढ़ाई दौड़ कर पार नहीं की जा सकती। उत्साह के साथ अपार धैर्य का संगम और सांस की लय के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ना होता है। यही जीवन में लम्बी दूरी तय करने बाले लोगों की भी रीत है।  शनै-शनै पर्वत लंघे की उक्ति यहाँ चरितार्थ हो रही थी।
 रास्ते की पहली मानव बस्ती पुलना गाँव है, काफिला इसी ओर बढ़ रहा था। 3-4 किमी की चढ़ाई के बाद दम फूल रहा था, बदन पसीने से तर-बतर हो रहा था और कुछ थकान हावी हो रही थी। अतः अल्प विश्राम के लिए एक ढावे पर रुक गए। ढ़ाबे में बैठकर चाय की चुस्की के बहाने आगे की यात्रा के लिए दम भरते रहे।
पुलना गाँव सड़क के साथ ही नीचे पु्ष्पावती नदीं तक फैला था। गाँव के पीछे आसमान छूता पहाड़ खड़ा था तो इसके पार पहाड़ों से झरते झरने। और गाँव के नीचे तेजी से अलकनंदा में मिलने के लिए जोर-शोर के साथ आगे बढ़ती हुई पुष्पावती, जो क्रमशः फूलों की घाटी और हेमकुंड से बहती हिमनदियों का सम्मिलित रुप है।

अगली मानव बस्ती भ्यूंडर गाँव की ओर बढ़ते पग
आगे का रास्ता लगभग सीधा था। सामने दाईं ओर नदी के पार पहाड़ों से झरते झरनों का नजारा सबको आकर्षित कर रहा था। राह तंग घाटी से होकर आगे बढ़ती है। राह भर निर्मल जल के स्रोत पथिकों का स्वागत करते हैं। अपनी यात्रा से बापिस आ रहे पथिक, बाहे गुरुजी का खालसा बाहे गुरुजी की फतह के गुंजार के साथ स्वागत कर रहे थे। रास्ते में ही सूर्योदय का अद्भुत नजारा देखने लायक था। 

उत्तुंग शिखरों से नीचे उतर रही इसकी स्वर्णिम आभा चित्त को आल्हादित कर रही थी। इन्हीं दृश्यों को निहारते हुए रास्ते में एक विश्राम स्थल मिला, जिसे स्नो व्यू प्वाइंट नाम दिया गया है। यहाँ से बर्फ ढ़के पर्वत शिखरों का नजारा देखते हुए थकान से कुछ हल्का हुए।
यहाँ से हेमकुंड की ओर के पर्वत शिखर की पहली झलक मिल रही थी। मंजिल की पहली झलक यात्रा के रोमाँच और उत्साह को बढ़ा रही थी। आगे कुछ किमी के बाद हम एक ऐसे बिंदु पर थे जहाँ एक नदीं पुष्पावती नदी में दाईं ओर से मिल रही थी। पता चला कि यह नदी काकभुशुंडी ताल की ओर से आ रही है। काकभुशुण्डी ताल के वारे में पौराणिक मान्यता है कि इसी के किनारे रामभक्त काकभुशुण्डी ने पक्षीराज गरुड़ का संशय दूर किया था। सिक्खों के प्रथम गुरु नानकदेवजी की भी यहाँ के यात्रा के जिक्र मिलते हैं। इस ओर भारी बर्फ से लदे हाथी पर्वत के दर्शन हमें रोमाँचित कर रहे थे।

कुछ देर सीधे रास्ते पर चलते हुए आगे अब कुछ चढाई के साथ बढ़ रहे थे। यह भ्यूंडर गाँव का प्रवेश था। गाँव में पुष्पलता(हेमगंगा) विकराल वेग के साथ भयंकर गर्जन करती हुई नीचे बह रही थी। चट्टानों के बीच इसका दुधिया जल एक अलग ही नजारा पेश कर रहा था। यहीं पर नदी के किनारे बने ढ़ाबे में हल्के चाय-नाश्ता के साथ काफिला तरोताजा हुआ।
घाघरिया बेसकेंप की ओर
आगे भ्यूंडर गाँव के पुल को पार कर दाईं और से मार्ग अब घाघरिया की ओर बढ़ता है। पुल से नीचे बह रही हेमगंगा का निर्मल जल नेत्रों को गहरी शांति व शीतलता दे रहा था। आगे चढ़ाई क्रमशः बढ़ती जाती है। खड़ी चढ़ाई के साथ हम पत्थरों की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए आगे बढ़ रहे थे। रास्ते में जंगली अखरोट के बड़े-बड़े पेड़ हमारा स्वागत कर रहे थे। पुष्पलता(हेमगंगा) अब दिख तो नहीं रही थी, लेकिन इसकी सांय-सांय की आवाज कानों तक स्पष्ट थी। 


नदी के उस पार पर्वत शिखर व संकरी घाटी एक अलग ही दुनियाँ में प्रवेश की अनुभूति दे रहे थे। काफिले में कुछ सदस्य अपना ही बोझ नहीं संभाल पा रहे थे, अतः इनका सामान टीम के मजबूत सदस्यों के कंधों पर चढ़ रहा था। इस तरह टीम भावना के साथ पूरा काफिला घाघरिया बेसकेंप में दोपहर बाद तक पहुँच गया था। सभी थककर चूर थे। स्थानीय गुरुद्वारे में डोरमेट्री में ठहरने की व्यवस्था हो चुकी थी। यहीं पर विश्राम भोजन के बाद बाहर आसपास घूमने निकले। (....ज़ारी) 
यात्रा का अगला भाग आप  आगे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैंहेमकुण्ड साहिब यात्रा, भाग-2

शुक्रवार, 30 जून 2017

बाल विकास



अभिभावक समझें अपनी जिम्मेदारी
परिवार व्यक्ति एवं समाज को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण कडी है। शिशु के निर्माण की यह प्राथमिक ईकाई है। इसी के साय में शिशु का निर्माण होता है, यह उसकी पहली पाठशाला है।  माँ-वाप एवं अभिभावक की छत्रछाया में शिशु का लालन-पालन होता है। शिशु के भावनात्मक विकास की नींव अधिकांशतः इस दौरान पड़ जाती है, जो जीवनपर्यन्त उसके व्यक्तित्व का एक अहं हिस्सा बनकर उसके साथ रहती है। इस प्रकार घर-परिवार का वातावरण बहुत अहम है।


शिशु का विकास सही दिशा में हो इसके लिए आवश्यक है कि घर का वातावरण ठीक हो। जैसे कोई भी फसल सही वातावरण में ही पूरा विकास पाती है, और प्रतिकूल आवो-हवा में मुरझा जाती है। बैसे ही शिशु मन, अंकुर सा पनपता एक नन्हें पौध जैसा होता है, जिसको अपने सही विकास के लिए उचित वातावरण एवं खाद-पानी की जरुरत होती है, जिसकी व्यवस्था करना अभिभावकों का पावन कर्तव्य है। शिशु मन मिट्टी के लौंदे की तरह कोमल, सुकुमार होता है, जिसे आप मनचाहा रुप दे सकते हैं।

लेकिन उस बीज की अपनी एक प्रकृति भी होती है, उसका अपना मौलिक स्वरुप एवं विशेषता भी होती है, उसको भी पहचानना है। उस पर अपनी मर्जी थौंप कर उस पर अनावश्यक दवाब डालना  अत्याचार करना होगा। इस दौरान मन पर पड़े जख्म जीवन भर नहीं मिट पाते। यदि ये मधुर व सुखद हैं तो जीवन के संघर्ष में ये हर मोड़ पर प्रेरक शक्ति बन कर साथ देते हैं और यदि स्मृतियाँ कटु, दुखद एवं त्रास्द हैं तो इसके जख्म जीवन पर्यन्त नासूर बन कर रिस्ते रहते हैं।

यदि हम सही मायने में अपनी संतान से प्यार करते हैं, उनका हित चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि कुछ मूलभूत बातों का ध्यान रखें – 
1.     आपसी प्रेम भाव – माँ-बाप के बीच मधुर प्रेम की स्नेहिल एवं शीतल छाया में विकसित हो रहा शिशु मन ऐसा पोषण पाता है, जिससे उसका सशक्त भावनात्मक विकास होता है, जो जीवन भर उसको सकारात्मक दृष्टिकोण, आंतरिक स्थिरता एवं मजबूती देता है। इसके विपरीत मन-मुटाव, क्लह-कलेश से भरा घर का वातावरण शिशु मन पर बहुत ही विषाक्त असर डालता है। उसका सही विकास नहीं हो पाता। मन असुरक्षा के भाव से पीड़ित रहता है। अंदर एक अतृप्ति-खालीपन कचोटता रहता है, जिसकी खोज में वह जिंदगी भर भटकता रहता है।
अतः यह महत्वपूर्ण है कि आपस में प्रेम भाव से रहें, मिल-जुलकर रहें। स्वतः ही संतान का भाव सिंचन एवं पोषण गहनतम स्तर पर होता जाएगा।
2.     सात्विक व्यवहार – शिशु के सामने जो भी व्यवहार करते हैं, वह उसे सीधा ग्रहण करता है। उसमें सही-गल्त को जानने समझने का विवेक नहीं होता है। वह तो कोरी पट्टी की तरह होता है, आस-पास के वातावरण का आचार, व्यवहार एवं विचार सीधे उस पर छपते जाते हैं। आपका सात्विक व्यवहार उसके मन पर ऐसी छाप डालेगा, कि जीवन पर्यन्त वह चरित्र बन कर उसको स्थिरता-शक्ति देता रहेगा और बड़ों की नादानियाँ भी उसी तरह से उनके जीवन को चौपट कर सकती हैं।

यह अभिभावकों का निर्णय है कि वह क्या चाहते हैं। यदि इस कार्य में शुरु में लापरवाही बरती गई, तो बाद में बच्चों के कुसंस्कारी होने व अवांछनीय गतिविधियों में संलिप्त होने के लिए दोषी ठहराने का कोई औचित्य नहीं। समय रहते आपके हाथ में बहुत कुछ था, जिसे आपको करना था।

3.     बच्चों पर अपनी महत्वाकाँक्षा न थोंपे  - शिशु पर कुछ थोपें नहीं। उसके  स्वतंत्र व्यक्तित्व को समझें व उसका सम्मान करें। आशा-अपेक्षाओं का अनावश्य बोझ न लादें। प्रायः यह देखा जाता है। अभिभावक संतान को अपने मन की कुण्ठा, महत्वाकाँक्षा और स्वार्थ का शिकार बनाते हैं। यदि माँ-बाप अफसर न बन पाए तो अब वे वच्चे को अफसर बना कर ही रहेंगे। यदि बड़े डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस न बन पाए तो अब वे अपनी इस दमित इच्छा को बच्चों पर थोंपेंगे। अविभावक यह ध्यान दें कि यदि संतान की रुचि, योग्यता इस काबिल है तो ठीक है अन्यथा उसके स्वभाव के अनुरुप ही उसे पनपने दें। प्रतिभाएँ स्वतंत्र वातावरण में पनपा करती हैं। यदि सचिन पर संगीत थोंपा जाता और लता मुंगेश्कर को क्रिकेट के मैदान में धकेला जाता, तो क्या उनकी प्रतिभा उस रुप में पनप पाती जैसा कि वे आज सभी के लिए एक वरदान सिद्ध हो रहे हैं।
अतः यह माँ-बाप का पावन कर्तव्य है कि अपनी संतान की मूल प्रकृति, स्वभाव एवं रुचि को समझें व उसके अनुरुप उसको बढ़ने में अपना भरपूर सहयोग दें। यही घर में खिल रही नन्हीं कली पर सबसे बड़ा उपकार होगा।

4.     बनाएं आस्तिकता का माहौल – घर-परिवार में आस्तिकता का वातावरण तैयार करें। घर का एक कौना पूजा-पाठ एवं ध्यान-सतसंग आदि के लिए सुरक्षित हो। स्वयं नित्य ध्यान-भजन एवं स्वाध्याय आदि का न्यूनतम् क्रम अपनाएं। और परिवार जनों को भी इसके लिए प्रेरित करें। संभव हो तो सभी मिलकर प्रातः या सांय एक साथ मिल कर साधना-भजन आदि करें। इससे घर में सात्विक विचार तरंगों का संचार होगा और परिवार में दैवीय वातावरण बनेगा। कोमल मन पर इसकी पड़ रही छाप और इसके दुरगामी सुखद परिणाम की आप कल्पना कर सकते हैं। इसे आगे बढ़ाते हुए सामूहिक सतसंग, विचारगोष्ठी आदि का उपक्रम भी सप्ताह अंत में किया जा सकता है। अध्यात्मपरायण माहौल की ही तरह महत्वपूर्ण है बड़ों का आदर्शनिष्ठ आचरण-व्यवहार।

5.     अपने उदाहरण से दें शिक्षण – बच्चों में हम जिन सदगुणों को देखना चाहते हैं, जिस चरित्र की आशा करते हैं, वैसा उदाहरण स्वयं प्रस्तुत करने की कोशिश करें। यह बच्चों के चरित्र निर्माण एवं नैतिक विकास का सबसे प्रभावी एवं सुनिश्चित मार्ग है। जब बड़े खुद अपनी कहे पर अमल करेंगे, तो छोटे स्वतः ही उसका अनुकरण करेंगे। क्योंकि बिना आचरण में लाया गया उपदेश निरर्थक होता है। और सबसे बड़ा उपदेश वह होता है जो वाणी से नहीं अपने आचरण द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
यदि माँ-बाप एवं घर के बड़े लोग इन सरल-सामान्य से सुत्रों का ध्यान रखेंगे और निष्ठापूर्वक पालन करेंगे, तो कोई कारण नहीं कि परिवार का वातावरण शांति, सौहार्द्रय एवं सात्विकता से भरा-पूरा न होगा। इसके साय में पलता बढ़ता शिशु मन ऐसा भावनात्मक पोषण पाएगा, जो उसे जीवन पर्यन्त प्रतिकूलताओं से जुझने की मजबूती देगा। उसके जीवन के भावी रणक्षेत्र में आगे चलकर विचलित होने, भटकने-बहकने का कोई आधार न रहेगा। अपने कृत्यों द्वारा वह न केवल अपने जीवन को धन्य वनाएगा, बल्कि माता-पिता का भी नाम रोशन करता हुए पूरे संसार-समाज के लिए एक वरदान साबित होगा।

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