बुधवार, 30 नवंबर 2016

सुनसान के सहचर



युगऋषि पं. श्रीरामशर्मा आचार्य की हिमालय यात्रा के प्रेरक प्रसंग
युग निर्माण आंदोलन के प्रवर्तक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य गायत्री के सिद्ध साधक के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार, साहित्यकार, लोकसेवी, संगठनकर्ता, दार्शनिक एवं भविष्यद्रष्टा ऋषि भी थे। गहन तप साधना, साहित्य सृजन हेतु वे चार वार हिमालय यात्रा पर गए। 1958 में सम्पन्न दूसरी हिमालय यात्रा का सुंदर एवं प्रेरक वर्णन सुनसान के सहचर पुस्तक के रुप में संकलित है, जिन्हें शुरुआत में 1961 के दौर की अखण्ड ज्योति पत्रिका में प्रकाशित किया गया था
पुस्तक की विशेषता यह है कि आचार्यश्री का यात्रा वृताँत प्रकृति चित्रण के साथ इसमें निहित आध्यात्मिक प्रेरणा, जीवन दर्शन से ओत प्रोत है। प्रकृति के हर घटक में, राह की हर चुनौती, ऩए दृश्य व घटना में एक उच्चतर जीवन दर्शन प्रस्फुटित होता है। पाठक सहज ही आचार्यश्री के साथ हिमालय क दुर्गम, मनोरम एवं दिव्य भूमि में पहुंच जाता है और इसके प्रेरणा प्रवाह को आत्म सात करते हुए, जीवन के प्रति एक न अंतर्दृष्टि को पा जाता है। 

आचार्यश्री के अनुसार, सामान्य सड़क पर जहाँ पथिक आपस में हंसते बात करते हुए चलते रहे थे, वहीं संकरी घाटी को पार करते हुए, सब चुप हो जाते, सारा ध्यान पगड़ंडी पर पढ़ रहे अगले कदम पर रहता। नीचे गर्जन तजर्न करती भगीरथी के ऊपर दिवार का सहारा लेकर सुरक्षित पार होना पड़ता और इस बीच मन केंद्रित रहता। इसी तरह जीवन के संकरे मार्ग में कितनी सावधानी की जरुरत है। धर्म की दीवार का सहार लिए चलना पड़ता है, अन्यथा थोड़ी सी भी लापरवाही कितनी घातक हो सकती है। कर्म की एक चूक, कुकर्मों की कितनश्रृंखला को जन्म दे सकती है औऱ अन्ततः नागपाश की तरह असावधान पथिक को जकड़ लेती है।
भैंरों घाटी की तंग घाटी में भगीरथी नदी का प्रचण्ड वेग, तीस फीट ऊँची जल राशि के रुप में प्रकट होता है। जबकि अन्यत्र कई दिशाओं में बिखरी नदी की धारा सामान्य शांत रहती। आचार्य़श्री के शब्दों में इसी प्रकार कई दिशाओं में बिखरा मन कोई विशिष्ट उपलब्धि नहीं हासिल कर पाता है, जबकि सीमित क्षेत्र में ही अपनी सारी शक्तियों को केंद्रित करने पर आश्चर्यजनक, उत्साहबर्धक परिणाम उत्पन्न होते देखे जाते हैं। मनुष्य को अपने कार्यक्षेत्र को बहुत फैलाने, अधूरे काम करने की अपेक्षा अपने लिए एक विशेष कार्यक्षेत्र चुन ले तो, कितना उत्साहबर्धक रहे।
राह में चीड़, देवदारु के गगनचुम्बी वृक्ष यही संदेश दे रहे थे कि यदि शक्ति को एक ही दिशा में लगाए रखें तो ऊँच उठना स्वाभाविक है। जबकि तेवार, दादरा, पिनखु जैसे वृक्षों की टेढ़ी मेढी, इधर-उधर फैलती शाखाएं चंचल चित, अस्थिर मन की याद दिला रही थी, जो अभीष्ट ऊँचाईयों तक नहीं बढ़ पात और बीच में ही उलझ कर रह जाते हैं।
आचार्यश्री के अनुसार, यूँ तो बादलों को रोज ही आसमाँ में देखते, लेकिन आज हिमालय के संग हम दस हजार फीट की ऊँचाईयों में विचरण कर रहे थे, लगा जैसे बादल हमारे चरणों को चूम रहे हैं। कर्तव्य कर्म का हिमालय भी इतना ही ऊँचा है। अगर हम उस पर चलें तो साधारण भूमिका में विचरण करने वाले शिश्नोदर परायण जीवन की अपेक्षा बैसे ही अधिक ऊँचे उठ सकते हैं, जैसे कि निरंतर चढ़ते चढ़ते दस हजार फुट ऊँचाई पर पहुँचे।

गोमुख में गगाजी की पतली स धार आगे हरिद्वार, कानपुर, बनारस में आकर कितना वृहद रुप ले लेती है। विचार आया कि, परमार्थ के उद्देश्य से जब गंगा की शीतल धार आगे बढ़ती है तो कितने ही नाले व छोटी जल धाराएं अपना अस्तित्व मिटाकर इसमें मिलकर आगे बढ़ती हैं। अपना अलग अस्तित्व कायम रखने की व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा, कीर्ति स्थापित करने की लालसा का दमन कर सकें तो कितना लोक उपयोगी हो।..गंगा और नदी-नालों के सम्मिश्रण के महान् परिणाम सर्वसाधारण के नेता और अनुयायियों की समझ में आ जाएं ,लोग सामूहिकता-सामाजिकता के महत्व को ह्दयंगम कर सकें  एक ऐसी ही पवित्र पापनाशिनि,लोकतारिणी संघशक्ति का प्रादुर्भाव हो सकता है, जैसा गंगा का हुआ


तपोवन में पहुँच कर भागीरथ शिखर, सूमेरु पर्वत से घिरे स्थान पर शिवलिंग पर्वत से दर्शन, भावना की आँखों से ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे भुजंगधारी शिव साक्षात खड़े हों। तपोवन के इसी क्षेत्र को हिमालय का ह्दय कहा जाता है, यहीँ वाईं ओर भगीरथ पर्वत है। कहते हैं कि यहीं पर बैठकर भगीरथ जी ने तप किया था, जिससे गंगावरतण सम्भव हुआ।...इस तपोवन को स्वर्ग कहा जाता है, उसमें पहुँचकर मैंने यही अनुभव किया, मानो सचमुच स्वर्ग में ही खड़ा हूँ।

वन के नीरव एकांत में, आचार्यश्री के लिए झींगुरों की वेसुरी ध्वनि भी प्रेरक बनती है। इकतारे पर जैसा बीतराग ज्ञानियों की मण्डली मिलजुलकर कोई निर्वाण का पद गा रही हो, वैसे ही यह झींगुर निर्विघ्न होकर गा रहे थे, किसी को सुनाने के लिए नहीं। स्वान्तः सुखाय ही उनका यह प्रयास चल रहा था। मैं भी उसी में विभोर हो गया’ ‘...मनुष्य के साथ रहने के सुख की अनूभूति से बढ़कर अन्य प्राणियों के साथ भी वैसी ही अनुभूति करने की प्रक्रिया सीख ली। अब इस निर्जन वन मे भी कही सूनापन दिखाई नहीं देता। इस सुनसान नें सभी सहचर प्रतीत हो रहे थे।

भोजपत्र के दुर्लभ वृक्षों एवं गंगनचुंबी देवदारु के बीच आचार्यश्री चारों ओर सहचर दिखाई देने लगे। विशाल वृक्ष पिता औऱ पितामह जैसे दीखने लगे। कषाय बल्कलधारी भोज पत्र के पेड़ ऐसे लगते थे, मानो गेरुआ कपड़ा पहने कोई तपस्वी महात्मा खड़े होकर तप कर रहे हों। देवदारु और चीड़ के लम्बे-लम्बे पेड़ प्रहरी की तरह सावधान खड़े थे। इस भावभूमि में हिमाच्छादित पर्वत शिखर आचार्यश्री को आत्मीय सहचर प्रतीत होते हैं। वयोवृद्ध राजपुरुषों और लोकनायकों की तरह पर्वत शिखर दूर-दूर ऐसे बैठे थे, मानो किसी गम्भीर समस्याओं को सुलझाने में दत्तचित्त होकर संलग्न हों। जिधर भी दृष्टि उठती, उधर एक विशाल कुटुम्ब अपने चारों ओर बैठा हुआ नजर आता था।


हिमालय का स्वर्णिम सूर्योदय आचार्यश्री को आत्मजागरण का दिव्यबोध दे जाता है। सुनहरी धूप ऊँचे शिखरों से उतरकर पृथ्वी पर कुछ देर के लिए आ गई थी, मानो अविद्याग्रस्त ह्दय में प्रसंगवश स्वल्प स्थाई ज्ञान उदय हो गया। ऊँचे पहाड़ों की आड़ में सूरज इधर-उधर ही छिपा रहता है, केवल मध्याह्न को ही कुछ घण्टों के लिए उनके दर्शन होते हैं। उनकी किरणें सभी सिकुड़ते हुए जीवों में चेतना की एक लहर दौड़ा देती है। सभी में गतिशीलता और प्रसन्नता उमड़ने लगती है। आत्मज्ञान का सूर्य भी प्रायः वासना औऱ त्रिष्णा की चोटियों के पीछे छिपा रहता है। पर जब कभी, जहाँ कहीं वह उदय होगा, उसकी सुनहरी रश्मियाँ एक दिव्य हलचल उत्पन्न करती हुई अवश्य दिखाई देंगी।

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

सूचना से बेहाल, संदेशों का अकाल, समाधान की राह




 सूचना विस्फोट के युग में सकारात्मक संचार की चुनौती
आज हम सूचना विस्फोट के युग में जी रहे हैं, जिसमें हर पल विभिन्न जन माध्यमों से सूचनाओं की बौछार (बम्बार्डमेंट) हो रही है। ऐसे में जो सूचनाएं इंसान के ज्ञानबर्धन का माध्यम रही हैं, मानवीय सभ्यता-संस्कृति के विकास का आधार रही हैं, वेही आज इंसान के लिए तनाव, अवसाद और शांति हनन का अहम् कारण बन गई हैं। सूचना विस्फोट से उपजे तनाव व दबाव के बीच अपनी शांति-संतुलन खोए बिना सृजनात्मकता बर्करार रखना और सार्थक संदेश की खोज एक दुष्कर कार्य बन गया है, जिसका समाधान एक युग प्रश्न की भांति हर पल ताल ठोंकता रहता है। 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सूचनाओं के इस विस्फोट का तकनीक (टेक्नोलॉजी) से सीधा सम्बन्ध है। शुरुआत प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार से होती है, इसके बाद बौद्धिक पुनर्जागरण (रिनेसाँ) और औद्योगिक क्राँति के साथ पुस्तकों के प्रकाशन में तेजी आती है। इस युग में भी लोगों को शिकायत थी कि सूचनाओं का दबाव बढ़ रहा है। एक शोध के अनुसार, 1930 के दशक तक प्रिंट मीडिया के दौर में हर 30 वर्षों में सूचनाएं दुगुना हो रहीं थीं। इसके बाद इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ इस प्रवाह में और तेजी आती है। और 1960-70 के दशक तक यह बृद्धि 10 वर्षों में दोगुना हो जाती है। इसके बाद प्रिंटिंग टैक्नोलॉजी में कम्पयूटर जुड़ जाता है औऱ फिर इंटरनेट का आगमन होता है। प्रसिद्ध विचारक एवं भविष्यद्रष्टा एल्विन टॉफ्लर ने संचार क्राँति के इसी दौर को भाँपते हुए अपनी बेस्ट सेलर पुस्तक फ्यूटर शॉक में इंफोर्मेशन लोड़ की बात की। जिसे आज सोशल मीडिया के वर्तमान युग में हम सूचना विस्फोट के रुप में प्रत्यक्ष देख रहे हैं। एक शोध आंकलन के अनुसार आज हर दस घंटे में सूचना का प्रवाह दौगुना हो रहा है। 

 
सोशल मीडिया का सूचना विस्फोट
आज सोशल मीडिया पर करोड़ों लोग जुड़े हैं और हर व्यक्ति यहाँ एक संचारक की भूमिका में है, जो इन माध्यमों पर कुछ भी पोस्ट और शेयर करने के लिए स्वतंत्र है। आश्चर्य नहीं कि सबसे लोकप्रिय सोशल नेटवर्क फेसबुक पर हर मिनट लगभग 30 लाख सूचनाएं पोस्ट हो रही हैं। माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर प्रत्येक मिनट 422,340 ट्वीट हो रहे हैं। यू-ट्यूब में हर मिनट 400 घंटों के वीडियोज अपलोड़ हो रहे हैं। ईमेल पर हर मिनट 20 करोड़ मेल का आदान-प्रदान हो रहा है। इंस्टाग्राम पर हर मिनट 55,555 फोटो पोस्ट हो रहे हैं। व्हाट्स-अप की बात करें, तो इस पर हर मिनट लगभग 4 करोड़ से अधिक संदेश शेयर हो रहे हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर दैनिक जीवन में सूचनाओं का यह दबाव जीवन की क्या गति बनाए हुए है इन माध्यमों से जुड़ा हर भुगतभोगी बखूबी अनुभव करता है।

पारम्परिक माध्यमों का सूचना दबाव -
इसके अलाबा पारम्परिक माध्यमों का अपना सूचना दबाव है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। देश में 1790 टीवी चैनल्ज और 190 सरकारी चैनल्ज हैं, जिनमें हर विषय पर दर्जनों से लेकर सैंकड़ों चैनल्ज हैं। टीआरपी की दौड़ में ये अपनी ब्रेकिंग न्यूज औऱ मनोरंजन के साथ हर पल आपके रिमोट बटन का इंतजार कर रहे हैं। आकाशवाणी व सामुदायिक रेडियो के साथ एफएम चैनलों की बाढ़ अपने नित नूतन संदेशों के साथ आपके दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। रोज छप रहे सैंकड़ों-हजारों पत्र-पत्रिकाएं अपनी जगह हैं। हर रोज रिलीज हो रही फिल्मों को इसमें जोड़ा जा सकता है। इसके अतिरिक्त हर दिन प्रकाशित हो रही पुस्तकों, रोज छप रहे शोध पत्रों, रिसर्च जर्नलों को भी जोड़ें तो सूचनाओं के दबाब की कल्पना का जा सकती है। 
लेकिन सूचना दबाव में सशल मीडिया अग्रणी भूमिका में है।

 
तनाव-अवसाद के अंधेरे में धकेलता सूचना दबाव
कुल मिलाकर हम सूचना विस्फोट के युग में आज एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहाँ सूचनाओँ का हाहाकार मचा हुआ है, सूचनाओं की बाढ़ एक शोर का रुप ले चुकी है, जिसमें जीवन का संगीत लुप्त प्राय है। इस शोर में अधिकाँश सूचनाएं विरोधाभासी है, अधकचरी हैं, भ्रमित करने वाली हैं, नकारात्मकता को लिए हुए हैं, सनसनाहट भरी हैं, समस्याओं को और उल्झाने वाली तथा निराशा और उन्माद की ओर ले जाने वाली हैं। संक्षेप में कहें तो सूचनाओं का यह विस्फोट वैचारिक प्रदूषण को जन्म दे रहा है, जिसमें अधिक देर तक कोई भी इंसान स्वस्थ-संतुलित नहीं रह सकता। इसके बीच एक स्वस्थ इंसान का भी तनाव, अवसाद और अंततः मनोविक्षिप्तता की ओर बढ़ना तय है। आज पश्चिम में इस मर्ज से पीढ़ित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। इनके जीवन की खोई लय व संतुलन को ठीक करने के लिए डिजिटल डिटोक्शीकेशन सेंटर व मनो-चिकित्सालय खुल चुके हैं। भारत में भी स्थिति इसी ओर बढ़ रही है। 

सृजनात्मक संचार की चुनौती -
इस सूचना विस्फोट के बीच बाँछित सूचनाओं का चयन एक चुनौती बन गया है। सीमित समय में इस सूचनाओं के बाढ़ का सामना एक दुष्कर कार्य बनता जा रहा है और यह दबाव टेक्नोलॉजी के विकास के साथ बढ़ता जा रहा है। बाकि मानवीय मस्तिष्क की सूचनाओं को प्रोसेस करने की अपनी क्षमता है, अपनी सीमाएं हैं। सूचनाओं के दबाव एवं तनाव से एक ओर जहाँ मानवीय क्षमताएं बाधित-प्रभावित हो रही हैं, वहीं जीवन पहले से अधिक अशांत, अस्थिर, असंतुलित और ढगमग हो चला है। व्यक्ति की एकाग्रता इसके चलते बुरी तरह से प्रभावित हो रही है, मन की शांति-स्थिरता की जड़ों पर जैसे कुठाराघात हो रहा है। गंभीर सृजनात्मक कार्य के अनुकूल मनोभूमि इसके बीच दुष्कर होती जा रही है। इसके आगोश में इंसान जैसे एक मनो-विक्षिप्तता के बीच जीने के लिए विविश-बाध्य है।

समाधान की राह
सोशल मीडिया और मोबाइल के इस युग में हर व्यक्ति सूचना उपभोक्ता के साथ सूचना का संवाहक व प्रसारक है। अतः वह एक संचारक की भूमिका में भी है। इस नाते उसके अपने दायित्व भी हैं फेसबुक, ब्हाट्सअप, ट्विटर, ब्लॉग आदि पर सक्रियता के साथ वह एक नागरिक पत्रकार, एक सीटिजन जर्नलिस्ट की भूमिका में भी है। वह चाहे तो सूचनाओं से बेहाल इस युग में सार्थक संदेशों का सृजन कर सूचनाओं के प्रदूषण को कुछ कम करने में अपनी कुछ सार्थक भूमिका निभा सकता है। इसके लिए उसे दूसरों को कोरा उपदेश देने से पहले अपने सुधार का ईमानदार प्रयास करना होगा। दूसरों की खबर लेने से पहले अपनी खबर लेनी होगी। समस्याओं को अनावश्यक तूल देने की बजाए, इनके समाधान का हिस्सा बनने का साहस करना होगा। अंधेरे को अंधेरे से पीटने की बजाए, अंधेरे के बीच एक दीपक जलाने क प्रसाय करना होगा।
 बाकि, सूचनाओं की बाढ़ के बीच बिना मन की शांति, स्थिरता व संतुलन खोए किस हद तक जनमाध्यमों से जुड़े रहना है, किस तरह से इनका प्रभावी उपयोग करना है, यह हर व्यक्ति के लिए एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। अपने विवेक के आधार पर उसे अपनी आचारसंहिता तय करनी है। (मीडिया चौपाल, हरिद्वार - 2016 में प्रकाशित)

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

छंट जाएगा सघन कुहासा



आएगी सुबह नवल सुहानी

प्रकृति की गोद में बैठ अंतस्थ, छेड़ तान तू मधुर सुहानी,
छंट जायेगा सघन कुहासा, आएगी सुबह नवल सुहानी।

बन हिमालय सा अडिग अविचल, गढ़ तू जीवन की नई कहानी,
हिमनद सा बहता चल अविरल, चीर हर बाधा रख चाल मस्तानी।

वृक्ष सा बन मौन धीर तपस्वी, नम्र विनीत राजहंस सा मनस्वी,
सीख मिटकर जीने की कला, बढ़ चल डगर जिसकी मंजिल रूहानी।

अखंड-दीप सी रखना लौ अदम्य अप्रकंपित, कौन रोक सका फिर रुत दीवानी,
पुष्प सा खिलना, चंदन सा महकना, कितना सफर, छोटी सी जिंदगानी।

कर्म में भरना मर्म कुछ ऐसे, छोड़ पीछे अपनी अमिट निशानी,
जब संग सर्वसमर्थ ईष्ट का वरदहस्त, आदिशक्ति माँ काली भवानी।

ज्ञानरूप सद्गुरू ह्द्यस्थ जब, गा ईश्वर के गीत नूरानी,
छंट जाएगा सघन कुहासा, आएगी सुबह नवल सुहानी।


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