अल्मोड़ा
से मुनस्यारी, मदकोट
दौलताघट
से अल्मोड़ा की ओर – दौलताघट से हम लोक्ल बस से होते हुए अल्मोड़ा
की ओर चल दिए। हालांकि हम रानीखेत के विपरीत चल रहे थे, लेकिन मोड़ पर रानीखेत की
ओर की हिमध्वल पर्वत श्रृंखलाएं घाटी के पार एक मनोरम
नजारा पेश कर रही थी।
नजारा पेश कर रही थी।

इस नदी के किनारे सफर आगे बढ रहा था। रास्ते में
ऊर्बर खेत मिले। लेकिन वही विडम्बना दिखने को मिली जिसकी चर्चा मैं कर चुका हूँ।
आर्थिक स्वावलम्बन देने वाले फल सब्जी के व्यापक प्रयोग से यह उर्बर क्षेत्र बंचित
दिखा।



अब हम उच्चतर हिमालय में पहुँच चुके थे। गगनचुम्बी
देवदार के बृक्ष इसका आभास दे रहे थे। ऊँचाई बढ़ती जा रही थी। अब देवदार के वृक्ष
भी बिरल हो रहे थे। रई तोस जैसी देवदार की कोनीफर वृक्षों की प्रजातियाँ और इस
ऊँचाई की स्वच्छ-विरल हवा एक नए प्रदेश में विचरण की दिव्य अनुभूति दे रही थी।
इनके जंगलों के बीच यात्रा का सुखद अहसास वर्णनातीत है। साथ में पहाड़ी नालों व झरनों
का शुद्ध निर्मल औऱ शीतल जल एक ताजगी का अहसास दे रहा था। यह क्षेत्र बहुत ही
सुंदर है। आगे सब वृक्ष समाप्त हो चुके थे। केबल भोज वृक्ष शेष थे। यह यहाँ की
ऊँचाई को दर्शा रहे थे। भोजपत्र के वृक्ष कोनीफर बनों के बाद ही उगते हैं। अब हम
लगभग पहाड़ के शिखर पर थे। उसको पार करने वाला द्वार साफ दिख रहा था। यह लो अंतिम
मोड़ और हम शिखर पर थे। दायीं और माँ काली का मंदिर था। कई बसें, बाहन खड़े थे।
हमारी जीप भी यहाँ रुकी। इस प्वाइंट पर काली मंदिर का तत्वदर्शन स्पष्ट हो चला। साक्षात मौत के दर्शन करते हुए सुरक्षित सफर के बाद महाकाली को धन्यवाद करने हम भी मंदिर में पहुंचे व माथा टेके। यहीं बाहर आंगन में बाबाजी के भी दर्शन हुए।
हमारी जीप भी यहाँ रुकी। इस प्वाइंट पर काली मंदिर का तत्वदर्शन स्पष्ट हो चला। साक्षात मौत के दर्शन करते हुए सुरक्षित सफर के बाद महाकाली को धन्यवाद करने हम भी मंदिर में पहुंचे व माथा टेके। यहीं बाहर आंगन में बाबाजी के भी दर्शन हुए।
यहाँ से उस पार पंचाचूली शिखर साफ दिख रहे थे और
इतना पास, जिनका विहंगम दृश्य अवलोकनीय था। यहाँ कुछ यादगार फोटो भी लिए। ढाबे में
गर्मागर्म चाय के साथ सर्दी का उपचार किया। शाम ढल रही थी। ढलती शाम के साथ हमारा
सफर भी पूरा होने वाला था। अब मुनस्यारी शहर कुछ ही कि.मी. की दूरी पर था। उस
पहाड़ के पार हमे जाना था। जीप देवदार के घने जंगलों के बीच उस पहाड़ को भी पार कर
गयी। अब हम नीचे उतर रहे थे, घने जंगल के बीच। अब तक की सबसे सुंदर प्राकृतिक
दृश्यावली के बीच सफर मंजिल की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में मिश्रित बनों से जड़ा
जंगल इस क्षेत्र के समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का सुखद अहसास दे रहा था।

कुछ पहाड़ी गाँव सूर्य की रोशनी में जगमगा रहे
थे। पहाड़ों मे सामने की घाटी में बने सीसे की खिड़कियों का जगमगाना हमें बचपन से
ही अविभूत करता रहा है, ऐसा ही दृश्य यहाँ भी दिखा। पूरी मुनस्यारी शहर और घाटी
धीरे धीरे जाग रही थी। घरों से उठता धुँआ इसका संदेश दे रहा था। सुबह के गर्म
स्नान के बाद चाय नाश्ता के बाद हम अगली मंजिल की ओर चल पड़े, जो यहाँ से 20
की.मी. दूरी पर स्थित गर्मपानी का स्रोत मदकोट था।
जीप में स्थानीय यात्रियों के साथ यात्रा आगे
बढ़ती है। कर्णप्रिय गीत सफर को खुशनुमा बना रहे थे। यहाँ भी आगे मुनस्यारी घाटी
के विहंगम दर्शन मिले। यहाँ भी वेमौसमी फूलों से लदे पाजा के वृक्ष आकर्षण का
केंद्र थे। पता चला की यहाँ लोग इसे बहुत पवित्र फूल मानते हैं और मंदिर में चढाते
हैं। यहाँ भी इस पर चैरी फल लगाने की
जानकारी का अभाव दिखा। स्थानीय लोगों से पता चला की आगे पहाडों के बीच संकरी घाटी
को पार करते हुए जौहार घाटी आती है, जो कि तिब्बत के साथ व्यापार का एक ऐतिहासिक
केंद्र रहा है। यहाँ का मिलम ग्लेशियर भी प्रसिद्द है, जो पर्वतारोही व ट्रैकिंग
प्रेमियों को आकर्षित करता रहता है। इसी ग्लेशियर से निसृत गौरी गंगा के किनारे मुनस्यारी शहर वसा है। यहाँ मूलतः भोटिया लोग निवास करते हैं, नंदा देवी इनकी ईष्ट आराध्य हैं। 7200 फीट की ऊँचाई पर वसा मुनस्यारी आज पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। सामने की गगनचुम्बी पंचचूली पर्वतश्रृंखलाएं, वाईं ओर नंदा देवी और त्रिशूल पर्वत, दाईं और अन्य पर्वत यहाँ के नजारे को चिताकर्षक और सुकूनदायी बनाते हैं। लोकमान्यता है कि पाँचों पाण्डव स्वर्गारोहण इसी स्थान से किए थे, इन्हीं के प्रतीक बिम्ब के रुप में पंचचुली शिखर आज भी विराजमान हैं।
मुनस्यारी के पार घाटी में कई पहाड़ी गांंव दिखाई देते हैं। यहाँ तक यातायात के कोई साधन नहीं हैं। पैदल ही पहाड़ों की चढाई करनी पड़ती है। जीप में सामने पहाड़ों पर बसे गाँव का एक युवक भी बैठा था। बातचीत करने पर पता चला की वह यहीं इंटर पढ़ रहा है। डेली अपडाउन करता है। इनका मोबाईल इंटरनेट सुबिधा से लैंस था। देखकर अहसास हो रहा था कि इस क्षेत्र में तकनीकी विकास गाँव तक पहुँच चुका है। लेकिन विकास की समग्र धारा से अभी यह क्षेत्र वंचित है, क्योंकि पढ़ा लिखा युवा नौकरी की तलाश में मैदानों या शहरों की ओर कूच कर रहा है। बाहर स्थापित लोग फिर बापिस गाँव की ओर मुड़ने को तैयार नहीं हैं। इस पर्वतीय क्षेत्र को विकास की पटड़ी पर लाने के लिए अभी कितना कुछ किया जाना शेष, यह समझ आ रहा था।
मुनस्यारी के पार घाटी में कई पहाड़ी गांंव दिखाई देते हैं। यहाँ तक यातायात के कोई साधन नहीं हैं। पैदल ही पहाड़ों की चढाई करनी पड़ती है। जीप में सामने पहाड़ों पर बसे गाँव का एक युवक भी बैठा था। बातचीत करने पर पता चला की वह यहीं इंटर पढ़ रहा है। डेली अपडाउन करता है। इनका मोबाईल इंटरनेट सुबिधा से लैंस था। देखकर अहसास हो रहा था कि इस क्षेत्र में तकनीकी विकास गाँव तक पहुँच चुका है। लेकिन विकास की समग्र धारा से अभी यह क्षेत्र वंचित है, क्योंकि पढ़ा लिखा युवा नौकरी की तलाश में मैदानों या शहरों की ओर कूच कर रहा है। बाहर स्थापित लोग फिर बापिस गाँव की ओर मुड़ने को तैयार नहीं हैं। इस पर्वतीय क्षेत्र को विकास की पटड़ी पर लाने के लिए अभी कितना कुछ किया जाना शेष, यह समझ आ रहा था।
रात को चर्चा के दौरान पता चला की यहाँ कभी सेब
के बगान हुआ करते थे और यहां जंगली भालू सेब खाने आया करते थे। इसी के चलते एक
व्यक्ति की जान गई। तबसे यहाँ के लोगों ने सारे पेड़ ही काट डाले और फिर यहाँ सेब
के फल या बगीचे नहीं दिखे। गायत्री चेतना केंद्र में सेब के पेड़ लगा कर एक पहल
हुई है, जो कुछ ही वर्षों में इस क्षेत्र में सेब की समृद्ध संभावनाओं को साकार
करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा सकता है।
यात्रा के अंतिम भाग को आप पढ़ सकते हैं, आगे दिए लिंक पर - मेरी पहली कुमाऊँ यात्रा, भाग-3, एडवेंचर भरी मस्ती का रोमाँच।