विकासपुत्रों की राह निहारती यह देवभूमि
यह मेरी पहली कुमाउं यात्रा थी। यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक संपदा के वारे में बहुत कुछ पढ़ सुन चुका था। अतः कई मायने में यह मेरी चिरप्रतीक्षित यात्रा थी, भावों की अथाह गहराई लिए, नवांतुक की गहन जिज्ञासा के साथ एक प्रकृति प्रेमी घुमक्कड़ की निहारती दृष्टि लिए। अपने युवा साथियों, पूर्व छात्रों एवं कृषि-वागवानी विशेषज्ञ भाई के साथ सम्पन्न यह रोमाँचक यात्रा कई मायने में ऐतिहासिक, शिक्षाप्रद एवं यादगार रही।
1.
अल्मोड़ा –
2. गांव की ओर –

गाँव में अंदर प्रवेश करते गए, तो चढ़ाई के साथ आगे गाँव आया। पंचायत भवन की हालात कुछ ऐसी थी कि लगा यहाँ सालभर से कोई मीटिंग नहीं हुई है। आगे रिश्तेदारी में चाचा के घर पहुँचे, जिनका एक फोजी वेटा आज ही छुट्टी पर घर आया था। पता चला कि इस क्षेत्र से फौज में जाने का चलन है। और कई महीनों बाद ही घर आना होता है। काश्मीर बोर्डर पर तैनात फौजी को आने जाने में ही सप्ताह-दस दिन लग जाते हैं। ऐसे में बर्ष भर में एक दो चक्कर ही मुश्किल से घर के लग पाते हैं। परिवार में ऐसे दुर्लभ मिलन के सुखद पलों के हम साक्षी बने और यहाँ की वीर प्रसूता भूमि में मोर्चे पर लड़ने बाले जांबाज वीरों के प्रति ह्दय श्रद्धा भाव से नत हो उठा।
गाँव को पार करते हुए हम जंगल से होकर पहाड़ी पर
बसे भगवती के मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। आढे-तिरछे रास्ते से सीधी चढ़ाई चढ़ते हुए
हम आगे बढ़ रहे थे।
ऊपर से नीचे गाँव का और दूर घाटी का विहंगम दृश्य देखते ही बन रहा था। रास्ते में यहाँ के पारम्परिक जल स्रोत के दर्शन भी हुए, जिसे हमारी भाषा में जायरु बोलते हैं। बाँज के पेड़ के नीचे से यहाँ जल एक बाबड़ी में इकट्ठा था। गाँववालों का कहना था कि कितनी भी गर्मी हो यहाँ का पानी सूखता नहीं। बास्तव में यह बाँज के पेड़ की जड़ें नमी को सोखती हैं व इसे संरक्षित रखती हैं। हमारे मन में आया कि यदि गाँव बाले इस जंगल में बाँज के पेड़ों के साथ मिश्रित बनों को बहुतायत में लगा लें तो शायद यहाँ के सूखे पड़ते जलस्रोत फिर रिचार्ज हो जाएं। संभवतः ऐसे प्रयोग हमें आगे चलकर इस क्षेत्र में देखने को मिलें। वास्तव में ऐसे प्रयोगों की साहसिक पहल की हर पहाड़ी क्षेत्रों में जरुरत है, जहाँ के जलस्रोत सुखते जा रहे हैं।
ऊपर से नीचे गाँव का और दूर घाटी का विहंगम दृश्य देखते ही बन रहा था। रास्ते में यहाँ के पारम्परिक जल स्रोत के दर्शन भी हुए, जिसे हमारी भाषा में जायरु बोलते हैं। बाँज के पेड़ के नीचे से यहाँ जल एक बाबड़ी में इकट्ठा था। गाँववालों का कहना था कि कितनी भी गर्मी हो यहाँ का पानी सूखता नहीं। बास्तव में यह बाँज के पेड़ की जड़ें नमी को सोखती हैं व इसे संरक्षित रखती हैं। हमारे मन में आया कि यदि गाँव बाले इस जंगल में बाँज के पेड़ों के साथ मिश्रित बनों को बहुतायत में लगा लें तो शायद यहाँ के सूखे पड़ते जलस्रोत फिर रिचार्ज हो जाएं। संभवतः ऐसे प्रयोग हमें आगे चलकर इस क्षेत्र में देखने को मिलें। वास्तव में ऐसे प्रयोगों की साहसिक पहल की हर पहाड़ी क्षेत्रों में जरुरत है, जहाँ के जलस्रोत सुखते जा रहे हैं।
गाँव के बाहर नल से लगा पीपा और टपकता पानी यहाँ पानी के सूखते स्रोत की व्यथा साफ दर्शा रहा था। नीचे दूर दूर तक हल से जुते हुए सूखे खेत, बहुत कुछ कह रहे थे। यह पूरा क्षेत्र बारिश पर निर्भर दिखा। यहाँ ऊँचाई में जल के स्रोत सूखे पड़े थे। इस राह में भी खेत की मेड़ के किनारे जंगली केंट के पेड़ बहुतायत में दिखे, जिनपर नाश्पाती की कलमें लगाकर सहज ही किसान अच्छी फसल ले सकते हैं।
अब रात हो चुकी थी, भूख लग रही थी। भरपेट भोजन के बाद हम सब रात्रि विश्राम के लिए निद्रा की गोद में चले गए। और सुबह तरोताजा होकर चाय-नाश्ता करके, अगली मंजिल की ओर चल पड़े, जो थी अल्मोड़ा से होते हुए मुनस्यारी की रोमाँचक यात्रा, जिसे आप आगे दिए जा रहे लिंक पर अगली ब्लॉग पोस्ट में सकते हैं - मेरी कुमाऊँ यात्रा, भाग-2, अल्मोड़ा से मुनस्यारी, मकदोट।