शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

नश्वर भटकन के उस पार


कब से तुम्हें पुकार रहा, कब से रहा निहार,

बीत चले युगों-जन्म, करते-2 तुम्हारा इंतजार।
कब सुमिरन होगा वह संकल्प शाश्वत-सनातन,
 कब कूच करोगे अपने ध्येय की ओर महान,

ैसे भूल गए तुम अमृतस्य पुत्र का आदि स्वरुप अपना,

लोटपोट हो नश्वर में, कर रहे अपनी सत्ता का अपमान।

धरती पर भेजा था क्यों, क्या जीवन का ठोस आधार,

क्यों खो बैठे सुधबुध अपनी, यह कैसा मनमाना आचार,
संसार में ही यह कैसे नष्ट-भ्रष्ट हो चले,
आत्मन् ज़रा ठहर करो विचार।

चले थे खोज में शांति-अमृत की,
यह कैसा उन्मादी चिंतन-व्यवहार,
कदम-कदम पर ठोकर खाकर,
नहीं उतर रहा बेहोशी का खुमार

कौन बुझा सका लपट वासना की,
लोभ-मोह की खाई अपार,
अहंकार की माया निराली,
सेवा में शर्तें, क्षुद्र व्यापार।

कब तक इनके कुचक्र में पड़कर,
रौरनरक में झुलसते रहोगे हर बार,
कितना धंसोगे और इस दलदल में,
पथ यह अशांति, क्लेश, गुलामी का द्वार।

बहुत हो गया वीर सब खेल तमाशा, समेट सकल क्षुद्र स्व, मन का ज़्वार,
जाग्रत हो साधक-शिष्य संकल्प में, बढ़ चल नश्वर भटकन के उस पार।



मंगलवार, 8 जुलाई 2014

मेरी जंग-ऐ-लड़ाई


ऐ जमाने, ऐ दुनियाँ,
नहीं कोई बड़ी शिकायत-गिला-शिक्वा तुमसे मेरा,
पूरी इज्जत करता हूँ मैं तेरी 
तेरे अधिकार, तेरी स्वतंत्रता, तेरी निजता की,
कोई अपमान का ईरादा नहीं है हमारा।

लेकिन झूठ के औचक प्रहार खाकर,
तिलमिला जाता हूँ अभी,
प्रत्युत्तर देना नहीं आता झूठ के स्तर पर गिरकर,
किंतु झूठ का प्रत्युत्तर अपने स्तर से, अपने ढंग से देना,
फर्ज मानता हूँ अपना,
नहीं देना चाहता जिसकी अधिक सफाई।

जानता हूँ नहीं कोई परमहंस भगवान इस जग में,
हर इंसान है पुतला गल्तियों का, अज्ञात से संचालित,
फिर सबकी अपनी अतृप्त इच्छाएं, कामनाएं अधूरी,
चित्त के विक्षोभ, द्वन्द, कुँठा, घाव संग अपनी मजबूरी,
अपने ढंग से उलझा है खुद से हर इंसान, 
हैं सबके अपने गम घनेरे,
और गहरा नहीं करना चाहता हूँ इनको अपने कर्म से।

फिर हर इंसान की अपनी मंजिल अपना सफर,
नहीं किसी से तुलना-कटाक्ष में है बड़ी समझ,
है सबका अपना मौलिक सच, मौलिक झूठ,
चित्त की शाश्वत वक्रता, अंतर की अतल गहराई,
हैं सबके सामने शिखर आदर्शों के उत्तुंग पड़े अविजित,
ऐसे में किसको करुं तलब, किससे माँगू विफलता की सफाई,  

जीवन की पहेली सुलझा रहा हूँ, परत दर परत ,
लड़ रहा हूँ खुद से अपनी लडाई।।
ऐसे में परिस्थितियों के प्रहार अपनी जगह,
चुनौतियों के जवाब अपनी जगह,

लेकिन, इनके स्रोत-समाधान पाता हूँ अंतर में,
खुद से मेरी जंग-ऐ-लड़ाई,
दुनियाँ को जीतने का रखता था ईरादा कभी,
लेकिन खुद को जीतने में समझता हूँ आज भलाई,
अपने तय मानक हैं, शिखर हैं, आदर्श हैं, 
स्व के साथ, स्व के पार कर रहा हूँ जिनका आरोहण,
खुद से है मेरी असल जंग-ऐ-लड़ाई।
 


सोमवार, 30 जून 2014

कभी किसी का मजाक मत उडाना


हर इंसान की अपनी कथा-व्यथा,

है अपनी एक अनकही कहानी,

वह जैसा है, उसका सम्मान करना।

पूरा इतिहास है हर इंसान का,

कुछ सुलझा, तो बहुत कुछ अलसुलझा,

वह क्यों है वैसा?

समय हो, धीरज हो तो,

कभी पास बैठ, सुनना-समझना,

उसकी कथा-कहानी, उसकी अपनी जुबानी।

ठोस कारण हैं उसके, कुछ भूल-चूकें, कुछ मजबूरियाँ,

कुछ अपने गम-ज़ख्म हैं उसके,

वो जो है, जैसा है, उसके कारण हैं,

यदि संभव हो तो तह तक जाना,

अन्यथा, कभी किसी का मजाक मत उड़ाना।



मंगलवार, 24 जून 2014

इन्हीं पलों को बना दें निर्णायक क्षण (Perfect moments)


परफेक्ट मोमेंट्स कभी-कभी ही आते हैं, लेकिन इनके इंतजार में अंतहीन अनिर्णय की स्थिति जीवन का एक कटु सच है। परफेक्ट क्षणों के इंतजार में न जाने कितनी प्रतिभाएं अपनी चमक बिखेरे बिना ही इस संसार से विदा हो जाती हैं। कितने ही जीवन ऐसे में कुंद इच्छाओं के साथ कुँठित जीवन जीने के लिए विवश होते हैं। कितने ही विचारकों के विचार, भावनाशीलों के भाव, कलाकारों की कल्पनाएं इस इंतजार में बिना प्रकट हुए चित्त की अंधेरी गुहा में खो जाती हैं। फिर, दूसरों को वही दिलचाहा काम करते देख, एक कुढ़न-जलन और पश्चाताप के सिवा कुछ नहीं बचता। यह सही समय के इंतजार में सही निर्णय न ले पाने की कष्टप्रद स्थिति है और दीर्घसूत्रता के रुप में व्यक्तित्व विकास की एक बड़ी बाधा भी, जिससे निज़ात पाना जरुरी है।

     इसलिए जब भी कोई सशक्त विचार मस्तिष्क में कौंधे, दमदार भाव दिल में प्रस्फुटित हो, कल्पना का उद्दात झोंका चिदाकाश में तैर जाए, उसे पकड़ लें और क्रिया रुप में परिणत करने की कार्ययोजना बना डालें। हो सकता है इसे क्रिया रुप देने में कुछ समय लगे, कुछ तैयारी करनी पड़े, लेकिन ऐसा न हो कि परफेक्ट क्षण के इंतजार में यह किसी अंजाम तक पंहुचे बिना ही दम तोड़ ले। यह जीवन की एक बड़ी दुर्घटना होगी। ऐसे में अधूरे सपनों, बिखरे विचारों, अमूर्त कल्पनाओं, टूटे संकल्पों से भरे चित्त का मरघट सा सन्नाटा, किसी सुखी, सफल व संतुष्ट जीवन की परिभाषा नहीं हो सकती।

     और इस सामान्य से सच को समझना भी जरुरी है कि हर बड़ा कार्य पहले किसी व्यक्ति के अंतःकरण में एक विचार-भाव-कल्पना बीज के रुप में प्रकट होता है। फिर इसे खाद-पानी देने के लिए संकल्पित प्रयास करने पड़ते हैं और इसे पुष्पित-पल्लवित करने के लिए साहस भरे सरंजाम जुटाए जाते हैं। साथ ही, जिन ऊँचाइयों तक व्यक्ति उड़ान भर सकता है, इसकी कोई सीमा नहीं। अधिकाँशतः इंसान अपना मूल्याँकन कमतर करता है, क्योंकि उसके सोचने का तरीका अपने अहं की परिधि में सिमटा होता है। लेकिन जब व्यक्ति एक विराट भाव के साथ जुड़कर आगे बढ़ता है, तो उसकी जिंदगी के मायने बदल जाते हैं। उन क्षणों में सृष्टि की तमाम् शक्तियां उसके साथ जुड़ जाती हैं और सामने संभावनाओं के असीम द्वार खुलते जाते हैं। ऐसे में जो घटित होता है वह आशा से परे आश्चर्यजनक और अद्भुत होता है।


     माना बचपन की कल्पनाएं बहुत ही अनगढ़ व मासूम हो सकती हैं, जवानी का जोश बहुत मदहोशी भरा व रुमानी हो सकता है, लेकिन इन्हीं में व्यक्ति की मौलिक संभावनाओं का सच भी छिपा होता है। इस बीजमंत्र को तलाशने व तराशने भर की जरुरत होती है। आश्चर्य नहीं कि इस प्रयास में शुरुआती तौर-तरीके बहुत ही एकांकी, अनगढ़ व अतिवादी हो सकते हैं। दुनियाँ को मध्यम मार्ग का उपदेश देने वाले भगवान बुद्ध की शुरुआत एक कठोर त्याग-तपस्या भरे अतिवाद से होती है। स्वामी विवेकानंद का शुरुआती दौर कट्टर संन्यासी के रुप में था, लेकिन भावों की उद्दातता क्रमशः प्रकट होती है। इसी तरह विराट से जुड़कर महत् कार्यों को अंजाम देने वाले हर इंसान की शुरुआत कुछ ऐसी ही कथा व्यां करती है, जो समय के साथ परिष्कृत, परिपक्व एवं पुष्ट होती है।

     अगर ये परफेक्ट समय के इंतजार में रहे होते, समय रहते अपने साहसिक निर्णय न लिए होते, तो इंसानियत इनके वरदानों से वंचित रह जाती। यही तमाम शोध, आविष्कारों से लेकर जीवन के हर क्षेत्र की खोजों, उपलब्धियों व सफलताओं से जुड़ा सच है। यहीं से एक बड़ा सच प्रकट होता है कि अपने बचपन व जवानी के सपनों, कल्पनाओं, संकल्पों के बीच रुहानी बीज को समझने की जरुरत है, जिन्हें हम प्रायः असंभव मानकर, ढर्रे के जीवन जीने के लिए अभिशप्त होते हैं। इसकी बजाए अपने मौलिक सच को खोज कर, उसे निष्कर्ष तक पहुँचाने की साहसिक शुरुआत ही इस नश्वर जीवन का सच्चा पुरुषार्थ हो सकता है।

     इसके लिए किनारों पर लहरों को गिनते हुए सागर पार करने के सपने लेते रहने भर से काम चलने वाला नहीं। पथिक को उफनते सागर में कूदने का साहस करना होगा, नाव पर सवार होने का इंतजाम करना होगा। ठोस एक्शन का शुरुआती जोखिम उठाना होगा। इसी के साथ जीवन अपने स्वप्न-सच को जीवंत करते हुए एक सार्थक अभियान बन सकता है और समाधान का एक हिस्सा बनकर व्यापक जनहित का महत कार्य सध सकता है। 


गुरुवार, 12 जून 2014

शांति सुकून भरा बुलंदी का सफर

समग्र सफलता का राजमार्ग
जीवन में हर जिंदा इंसान कुछ ऐसी बुलंदी भरी चाह रखता है, जिससे उसे एक विशिष्ट पहचान मिले, सफलता का नया आयाम मिले और साथ ही सुख-शांति, सुकून भरा अपना जहां मिले। लेकिन उत्कर्ष और अभ्युदय का ऐसा संगम-समन्वय किसी विरले को ही नसीब होता है। अधिकाँश तो सफलता की बुलंदी पर खुद को अकेला पाते हैं; संसार से कटा हुआ और खुद से भी अलग-थलग।

एकांकी सफलता का अभिशाप ऐसे में आश्चर्य नहीं कि सफलता के शिखर पर भी व्यक्ति खुद को सार्थकता के बोध से वंचित पाता है और तमाम उपलब्धि, समृद्धि व शोहरत के बावजूद एक खालीपन से अशांत-क्लाँत रहता है। फिर इस खालीपन को भरने के लिए व्यसनों से लेकर नशों का जो सहारा लिया जाता है, वह व्यक्ति को शांति-सकून से ओर दूर ले जाता है। ऐसे में, सफलता पर संदेह पैदा होता है और इसके सही मायनों की खोज शुरु हो जाती है। जीवन के मर्मज्ञ सत्पुरुषों का सत्संग सफलता के प्रति समग्र समझ पैदा करता है।

समग्र सफलता का राज मार्ग - ज्ञानियों के सत्संग में मिली जीवन दृष्टि के आधार पर पता चलता है कि जीवन में सफलता, बुलंदी के सही मायने क्या हैं। अधिकाँश लोग इस समझ के अभाव में दुनियाँ की भीड़ का एक हिस्सा बनकर एक अंधी दौड़ में शामिल रहते हैं, बिना जाने की कहाँ जा रहे हैं। परिणाम यह होता है कि हर सफलता के साथ व्यक्ति का गरुर एवं बेहोशी बढ़ती जाती है और व्यक्ति अपना शांति-संतुलन खोता जाता है। सफलता के चरम पर भीतर एक शून्य और अंतर को कचोटती पीड़ा-अशाँति के साथ जीने के लिए अभिशप्त होता है। अनवरत बाहरी दौड़ में अंतर का इतना कुछ खो चुका होता है कि जीवन को नए सिरे से परिभाषित करने की जरुरत अनुभव होती है। विज्ञजनों के अनुसार, इस दुर्घटना से बचने का राज मार्ग है, समय रहते अपने मौलिक सच को जानने की ईमानदार कोशिश, उसे जीने की साहस भरी पहल और उस पर कायम रहने की धैर्यपूर्ण दृढ़ता।

शुरुआत – अपने मौलिक बीज की खोज, शुरुआत अपनी मूल इच्छा की पहचान और उसके सम्मान से होती है। स्व-संवाद स्थापित करते हुए अपना आंतरिक अवलोकन करना पड़ता है, कि बचपन से ही कुछ करने की कुलबुलाहट, क्या रही है? अंदर की कुछ खास बातें, मौलिक विशेषताएं, जो दुनियाँ की भीड़ से हमें अलग करती हैं, वे क्या हैं? मन की गहराईयों में दबे, सतहों पर तैरते सपने, सशक्त विचार, दमदार भाव जो यदा-कदा अभिव्यक्त होने के लिए कुलबुलाते रहते हैं, वो क्या हैं? इन सब के बीच अपने जीवन के मौलिक सच का बीज प्रकट होता है।

प्रारम्भिक चुनौती - इससे जुड़ा एक सत्य यह भी है, कि प्रायः एकदम नया होने के कारण ये विचार बीज इस संसार के लिए विचित्रता लिए, समझ से परे हो सकते हैं। और इस कारण प्रायः हंसी, उपहास का कारण बन सकते हैं। इसे उपेक्षा-अवमानना, और विरोध-बहिष्कार का सामना भी करना पड़ सकता है। लेकिन यही तो अपने मौलिक सच की कसौटी है। जितना अधिक अवाँछनीय प्रतिरोध, उतना ही बड़ी आगे बढ़ने की चुनौती और अपने स्वप्न-सच को साबित करने की रोमाँचभरी जिद्द। ऐसे उदाहरणों से मानव विकास का इतिहास भरा पड़ा है, जिसमें समय से आगे सोचने व चलने वालों को काल ने कसौटी पर सका और फिर अग्नि परीक्षा से पार होने के बाद व्यापक स्वीकृति के साथ उचित स्थान दिया।  

निताँत वैयक्तिक प्रक्रिया – इस मार्ग में राह की चुनौतियों का सामना करने का बल आंतरिक स्रोत से आता है जहां अस्तित्व की गुत्थी को सुलझाने के तमाम सूत्र जुड़े होते हैं, जिसमें लोककल्याण के तत्व भी छुपे होते हैं। इसकी व्यवहारिक अभिव्यक्ति हर व्यक्ति के लिए पूर्णतः भिन्न होती है। व्यक्ति की भावनात्मक, बौद्धिक, क्रियात्मक संरचना, पारिवारिक पृष्ठभूमि, सामाजिक परिवेश, जेनेटिक रचना, पूर्व जन्म के संस्कार आदि कारक, हर व्यक्ति को दूसरे से भिन्न रुप देते हैं। हर व्यक्ति का अपना मौलिक सच है, जिसका उत्खनन उसे अपने अंतःकरण की गहराईयों से करना होता है। तमाम बाहरी मदद के बावजूद यह नितांत वैयक्तिक प्रक्रिया है, आत्मा के अनावरण की एक निजी विधि।

अगला चरण – इसे गीताकार के शब्दों में अपने स्वधर्म की खोज भी कह सकते हैं। जिसके बोध के लिए पर्याप्त मशक्कत करनी पड़ती है। इसके लिए नित्य अपना निरीक्षण-परीक्षण करना पड़ता है। इस तरह दीर्घकालीन आत्म समीक्षा के साथ क्रमशः अपना मौलिक स्वप्न-सच स्पष्ट होता जाता है। इसी प्रक्रिया में सही समय पर अनुभवी गुरुजनों का सत्संग मार्गदर्शन भी प्राप्त होता है, जो इस कार्य को सरल बना देता है। लेकिन अपने मौलिक सच को जीने का अंदाज निहायत अपने दम-खम और जिम्मेदारी के बल पर शुरु होता है, आगे बढ़ता है और निष्कर्ष तक पहुँचाना होता है। गुरुजनों का सहयोग राह में उत्प्रेरक व दिशाबोधक भर होता है। मूलतः अपने बूते ही इस रोमांचक सफर को तय करना होता है।

उधारी सपनों का बोझ – सामान्यतः इसकी राह में जो व्यवधान आते हैं वे प्रायः अपनी मूल प्रेरणा की उपेक्षा के परिणाम होते हैं, जिनके चलते हम उधारी सपनों को जीने के लिए अभिशप्त होते हैं। इसमें कभी परिवारजनों की अपेक्षाओं का दबाब, तो कभी अधिक धन का प्रलोभन, कभी समाज का चलन, तो कभी झूठी प्रतिष्ठा का जाल। लेकिन ये बाहरी निर्धारण जब तक अंतर्वाणी से मेल न खाएं तब तक इनका अधिक मोल नहीं। जीवन की राह, जीवन का ध्येय, जीवन की खोज अंतःप्रेरित हो, आत्मा की गहराईयों से प्रस्फुटित हो, दिल के गहनतम भावों की अभिव्यक्ति हो, तभी उनमें जीवन को सार्थकता का बोध देने की क्षमता होती है। अन्यथा उधारी सपनों का बोझ तथा विषम परिस्थितियों के प्रहार राह में ही पथिक को विचलित कर देते हैं।  

हर श्रेष्ठता को आत्मसात करने की तत्परता – राह में यह भी आवश्यक है कि दूसरों से अनावश्यक तुलना से बचें और किसी जैसा बनने की कोशिश न करें। ऐसा करना अपने मौलिक सच के साथ बेइंसाफी है। इसकी बजाए हर श्रेष्ठ व्यक्ति से प्रेरणा लेते हुए उनकी श्रेष्ठता को अपने ढ़ंग से आत्मसात करें। इसके साथ अपने मौलिक एवं अद्वितीय स्वरुप के विकास तथा अभिव्यक्ति में ही सार्थक-सफलता का मर्म छिपा है। इसी राह पर अपने स्वभाव के अनुरुप अपनाया गया कर्तव्य-कर्म अंतर्निहित क्षमताओं से साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है। शनैः-शनैः उधारी सपनों का बोझ हल्का होता है और अपनी आत्मा को खोए बिना, शांति सुकून भरी बुलंदी की चाहत मूर्त रुप लेने लगती है।


शनिवार, 31 मई 2014

वो पल दो-चार


मई माह में बाद दोपहरी की शीतल वयार,


सूरज अस्ताचल की ओर बढ़ रहा,




झुरमुट के आंचल में बैठा चाय का कर रहा था इंतजार,

गगनचुम्बी देवतरु के सान्निध्य में बैठा विचारमग्न,

घाटी की गहराईयों से चल रहा था कुछ मूक संवाद,

बाँज-बुराँश के हिलते पत्ते झूम रहे थे अपनी मस्ती में,

आकाश में घाटी के विस्तार को नापती बाज़ पक्षियों की उड़ान,

वृक्षों पर वानरसेना की उछलकूद, घाटी से गूंजता पक्षियों का कलरव गान,

मन में उमड़-घुमड़ रही थी संकल्प-विकल्प की बदलियाँ,

चिदाकाश पर मंडरा रहे थे अवसाद के अवारा बादल दो-चार,

विदाई के नजदीक आते दिनों के लिए, कर रहा था मन को तैयार।

लो आ गई प्रतीक्षित प्याली गर्म चाय की,

चुस्की के साथ छंटने लगी आकाश में छाई काली बदलियाँ,

अड़िग हिमालय सा ध्यानस्थ हो चला गहन अंतराल,

थमने लगी चित्त की चंचल लहरें,

शांत हो चली प्राणों की हलचल, मन का ज्वार,

भूत भविष्य के पार स्मृति कौंध उठी अंतर में कुछ ऐसे,

वर्तमान में चैतन्य हो चला अंतस तब जैसे,

नई ताज़गी, नई स्फुर्ति का हो चला संचार,

बढ़ चले कदम कर्मस्थल (लाइब्रेरी) की ओर,

आज भी याद हैं शीतल दोपहरी में,

चाय की चुस्की के साथ, ध्यान के वे पल दो-चार।


(स्मृति, IIAS, Shimla, May 2013)




गुरुवार, 15 मई 2014

नीलकंठ महादेव – श्रद्धा और रोमाँच का अनूठा संगम

- नीलकंठ महादेव मंदिर, ऋषिकेश
हरिद्वार के समीप, ऋषिकेश क्षेत्र का भगवान शिव से जुड़ा सबसे प्रमुख तीर्थ स्थल। स्थल का पुरातन महत्व, प्राकृतिक सौंदर्य और मार्ग की एकांतिकता, यात्रा को श्रद्धा और रोमाँच का अद्भुत संगम बना देती है, जिसका अपना आध्यात्मिक महत्व है।

पुरातन पृष्ठभूमि – पौराणिक मान्यता है कि जब भगवान शिव ने समुद्र मंथन के बाद कालकूट विष को कण्ठ में धारण किया तो वे नीलकंठ कहलाए। विष की उष्णता के शमन हेतु, शिव इस स्थल पर हजारों वर्ष समाधिस्थ रहे। उन्हीं के नाम से इसका नाम नीलकंठ तीर्थ पड़ा।

भौगोलिक स्थिति – यह स्थान समुद्र तल से 5500 फीट(1300 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित है और गढ़वाल हिमालय की ब्रह्मकूट, विष्णुकूट और मणिकूट पर्वत श्रृंखलाओँ के बीच पंकजा और मधुमति नदियों के संगम पर बसा है।

मंदिर – मंदिर सुंदर नक्काशियों से सजा है, जिसमें समुद्र मंथन का दृश्य अंकित है। मंदिर में दक्षिण भारत का वास्तुशिल्प स्पष्ट है। मंदिर परिसर में शिवलिंग के साथ अखंड धुना भी विद्यमान है, जो अनादि काल से अनगिन सिद्ध-संतों की साधना का साक्षी रहा है। पीपल का अति विशाल एवं वृहद वृक्ष स्थल की पुरातनता की साक्षी देता है, जिसमें श्रद्धालु अपनी मन्नत का धागा बाँधते हैं और पूरा होने पर उसे निकालते हैं।

यात्रा मार्ग – नीलकंठ की यात्रा के चार मार्ग हैं, जिनमें दो प्रचलित हैं -

पहला, मोटर मार्ग – सबसे सरल मोटर मार्ग ऋषिकेश में गंगाजी के पार रामझूला या लक्ष्मण झूला से होकर जाता है। वहाँ से 45-50 किमी की यात्रा महज डेढ़ दो घंटे में पूरी हो जाती है। रास्ते में गंगाजी का पावन तट, आगे हिम्बल नदि के किनारे बसे गाँव का मनोरम दृश्य, बलखाती सर्पीली सड़कें, निकटवर्ती घाटियाँ, पहाड़ी गाँव व शिखर पर स्थित मंदिर के दृश्य यात्रा को यादगार बनाते हैं।


दूसरा, ट्रेकिंग मार्ग -  यह अपेक्षाकृत कठिन पैदल मार्ग है, जो रामझूला के पार, स्वर्गाश्रम से होकर जाता है। 7-8 किमी का यह ट्रैक मार्ग भी नयनाभिराम दृश्यावलियों से भरा है। चढ़ाई झर-झऱ बहते पहाड़ी नाले के किनारे से जाती है। मार्ग में सज्जन, शर्मीले व दोस्ताना लंगूरों का सामना सहज है, जो चन्ना खाने के लिए यात्रियों से हिलमिल जाते हैं। थोड़ा चढ़ाई पर नीचे गंगाजी के किनारे बसे ऋषिकेश शहर का विहंगम दृश्य दर्शनीय रहता है। सामने उत्तर की ओर शिखर पर बसा कुंजा देवी का मंदिर आश्चर्यचकित करता है। 4-5 किमी की चढ़ाई पार होते ही पहाड़ी के दूसरी ओर नीचे घाटी में नीलकंठ महादेव की झलक मिलती है। ढलती शाम के साथ परिसर से झिलमिलाती रोशनी में यहाँ एक स्वर्गीय दृश्य का सृजन होता है। 2 किमी की ढलान के बाद पहले भैंरो मंदिर आता है और फिर नीलकंठ महादेव।

तीसरा, शॉर्ट कट मार्ग – ऋषिकेश बैराज से होकर जाने वाला यह मार्ग सबसे छोटा किंतु सबसे खतरनाक है। खतरनाक इस मायने में कि यह घने जंगल से होकर जाता है, जिसमें कहीं भी हाथी, गुलदार, बाघ व अन्य वन्य पशुओं से साक्षात्कार हो सकता है। अतः बैराज में प्रवेश द्वार पर अंधेरे में या अकेले इसे पार न करने की चेतावनी दी जाती है। खड़ी चढ़ाई से भरा यह रास्ता प्रायः स्थानीय वासियों या एडवेंचर प्रेमियों द्वारा पसंद किया जाता है। महज 2-3 घंटे में यह पार हो जाता है। रास्ते में बहते नालों-झरनों व हरे-भरे घने जंगल के बीच से होकर निकलता मार्ग एक रोमाँचक अनुभव दे जाता है। ऊपर यह रास्ता गंगा दर्शन ढावा के पास मिलता है, जो झिलमिल गुफा और भुवनेश्वरी मंदिर के बीच स्थित है। यहाँ से नीचे गंगाजी की धाराओं का विहंगम दृश्य अवलोकनीय रहता है और सुदूर हरिद्वार तक का विस्तार दूर्बीन से देखा जा सकता है।

चौथा, सबसे लम्बा ट्रेकिंग मार्ग – भोगपुर गाँव व विंध्यवासनी से होकर जाने वाला सबसे लम्बा ट्रेकिंग मार्ग है, और शायद सबसे रोमाँचक भी। प्रायः शिवरात्रि में कांबड़धारी शिवभक्त इस रास्ते से वापिस आते हैं। चीलारेंज की नीलधारा नहर के किनारे भोगपुर गाँव से इसका प्रवेश होता है। 3-4 किमी के बाद पहाड़ की चोटी पर बसा मनोरम विंध्यवासनी मंदिर आता है। यहाँ तक वाहनों के लिए कच्चा मार्ग है। यहाँ से आगे 12-14 किमी पैदल ट्रैकिंग करनी पड़ती है। रास्ते में पहाड़ी नदी के किनारे 4-6 किमी तक मैदानी रास्ता चलता है। दोनों ओर अर्जुन व भोजपत्र के घने वनों से ढकी पहाड़ियाँ सफर को रोमाँचक बना देती हैं। 4-6 किमी के बाद चढ़ाई शुरु होती है। 2-3 किमी के बाद पहाड़ी बस्तियाँ आती हैं। यहीँ देवली इंटर कालेज रास्ते में पड़ता है। यहाँ वाईँ ओर से गाँव से होकर झिलमिल गुफा की ओर चढ़ाईदार रास्ता जाता है। पहाड़ी नाले, सुंदर गाँव, वहाँ के सीधे-सादे व मिलनसार लोगों के बीच 3-4 किमी के बाद झिलमिल गुफा आती है। इसे शिवपुत्र कार्तिकेय की तपःस्थली माना जाता है। मान्यता यह भी है कि यहाँ गुरु गोरखनाथ ने शाबर मंत्रों को साधा था। गुफा उपर से खुली है, लेकिन आश्चर्य जनक तथ्य इससे जुड़ा यह है कि कितनी भी बारिश हो, गुफा में रमायी गई धुनी में पानी नहीं गिरता। यहाँ कई गुफाएं हैं। जहाँ पर स्थानीय साधु-संतों की अनुमति से ध्यान-साधना के कुछ यादगार पल बिताए जा सकते हैं।
मंदिर के ही आगे गणेशजी का मंदिर है। जिसे लगता है पिछले की कुछ वर्षों में रुपाकार दिया गया है। यह इस घाटी के अंतिम छोर पर है, जहाँ से आगे के घने वनों व सुदूर घाटी के दर्शन किए जा सकते हैं।
झिलमिल गुफा से नीलकंठ की ओर रास्ते में 2-3 किमी की दूरी पर भुवनेश्वनरी माता का मंदिर पड़ता है। यह पहाड़ी पर स्थित है। मान्यता है कि जब भगवान शिव समाधिस्थ थे तो माता पार्वती यहीं पर उनकी समाधि खुलने का इंतजार करती रही। मंदिर से थोड़ा नीचे खेत में, पीपल के पेड़ के नीचे शीतल व निर्मल जल की एक बावड़ी भी है। मान्यता है कि माँ पार्वती इसी जल का उपयोग करती थीं।
मार्ग में पौढ़ी-गढ़वाल की सुदूर पर्वत श्रृंखलाओं व घाटियों के साथ इनमें बसे गाँव, क्षेत्रीय फसलें, घर-परिवार, रहन-सहन व संस्कृति का दर्शन, रोमाँच के साथ एक ज्ञानवर्धक अनुभव बनता है।
भुवनेश्वरी मंदिर से ढलान के साथ 2 किमी की दूरी पर नीचे घाटी में नीलकंठ महादेव का मंदिर स्थित है। मंदिर के नीचे प्राकृतिक झरना बह रहा है, जिसमें स्नान यात्रियों की थकान को छूमंतर कर देता है। हालाँकि तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के साथ इसका जल प्रदूषित हो चला है, जिस पर ध्यान देने की जरुरत है। 


इस तरह से पूरा शिव परिवार, नीलकंठ महादेव के इर्द-गिर्द 4-5 किमी के दायरे में बसा है। तीर्थयात्री अपनी रुचि, क्षमता व समय के अनुरुप किसी एक मार्ग का चयन कर सकता है।

आगमन हेतु निकटम स्टेशन -

यहाँ आने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश है, जहाँ से यह 32 किमी की दूरी पर है। हवाई मार्ग से जोली ग्रांट, देहरादून निकटम एयरपोर्ट है, जो यहाँ से 49 किमी है। पैदल यात्रियों के लिए यह रामझूले को पार कर 22 किमी की दूरी लिए है। हरिद्वार से महज एक दिन में सुबह जाकर शाम तक वापिस आया जा सकता है। ट्रेकरों के लिए क्षेत्र के व्यापक अवलोकन  के लिए दो दिन पर्याप्त होते हैं।

ठहरने की व्यवस्था – नीलकंठ में ठहरने व भोजनादि की उचित व्यवस्था है। मंदिर परिसर में मंदिर की ओर से धर्मशाला है। पास ही कालीकम्बली व अन्य धर्मशालाएं हैं।

मौसम – बारह महीने इस स्थल की यात्रा का आनंद लिया जा सकता है। हालाँकि मार्च से अक्टूबर सबसे बेहतरीन माने जाते हैं। वर्ष में दो बार यहाँ विशेष भीड़ रहती है। फरवरी-मार्च में महाशिवरात्रि तथा साबन में जुलाई-अगस्त के दौरान शिवरात्रि के अवसर पर लाखों कांवड़धारी शिवभक्त यहाँ शिव आराधना के लिए आते हैं।

इस तरह नीलकंठ महादेव श्रद्धालुओं, प्रकृति प्रेमी, खोजी घुमक्कड़ों को वर्ष भर आमंत्रण देता रहता है। यहाँ की शाँत प्रकृति की गोद में लाखों यात्री जहाँ अपार सुकून पाते हैं, वहीं भावपूर्ण की गई इस सिद्धक्षेत्र की यात्रा, जीवन के पाप-ताप व संताप को हरने वाली है। हो भी क्यों न, आखिर हजारों वर्ष यहाँ समाधिस्थ रहकर नीलकंठ महादेव ने कालकूट का शमन जो किया था।
 
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