सतना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सतना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

यात्रा वृतांत – विंध्यक्षेत्र के प्रवेश द्वार में

 

बाबा चौमुखनाथ के देश में

विंध्यक्षेत्र के प्रवेश द्वार सतना में पहुँचने से लेकर इसके आसपास के दर्शनीय स्थलों का अवलोकन पिछले ब्लॉग में हो चुका है। इस कड़ी में अब चित्रकूट एवं चौमुखनाथ का वर्णन किया जा रहा है। हालाँकि इस बार कोरोनाकाल में चित्रकूट की यात्रा संभव न हो सकी, लेकिन चौमुखनाथ के एकांत-शांत ऐतिहासिक तीर्थस्थल की यात्रा, इस बार की विशिष्ट उपलब्धि रही। चित्रकूट तीर्थ का अवलोकन हम दो दशक पूर्व की यात्रा में किए थे, यहाँ उस का भावसुमरण करते हुए इसके प्रमुख स्थलों का जिक्र कर रहा हूँ। शायद नए पाठकों के लिए इसमें कुछ रोचक एवं ज्ञानबर्धक बातें मिले।

चित्रकूट सतना से 78 किमी दूरी पर स्थित है। धार्मिक महत्व के इस तीर्थस्थान का कुछ भाग मप्र में पड़ता है तथा कुछ भाग उप्र में। मालूम हो कि चित्रकूट के घने जंगलों में ही कामदगिरि पर्वत शिखर पर भगवान राम, सीता माता और भाई लक्ष्मण ने वनवास के चौदह वर्षों के साढ़े ग्यारह वर्ष बिताए थे।

इसी पुण्यभूमि में महान ऋषि अत्रि एवं सती अनुसूईया और इनकी गोद में त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश की लीला कथा घटित हुई थी।


सती अनुसूइया के तप से यहीं पर पयस्विनी नदी (जिसका दूसरा नाम मंदाकिनी भी है) का उद्गम हुआ माना जाता है। इसके साथ भगवान दतात्रेय, महर्षि मार्कंडेय, सरभंगा, सुतीक्ष्ण और अन्य ऋषि, मुनि, भक्त और विचारकों की साधना स्थली के रुप में यह क्षेत्र साधना के प्रचण्ड संस्कार लिए हुए है। हालाँकि मानवीय हस्तक्षेप एवं लापरवाही के चलते इसका स्थूल स्वरुप काफी दूषित हो चला है, लेकिन आस्थावानों के लिए इसका महत्व मायने रखता है।

मंदाकिनी नदी पर आगे रामघाट बना हुआ है। यहीं पर बाबा तुलसीदास को हनुमानजी के माध्यम से अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन हुए थे। चौपाई प्रसिद्ध है कि चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसैं, तिलक देत रघुवीर।


यहीं आसपास रामपंचायत के पात्रों से जुड़े भरत मिलाप मंदिर
, चित्रकूट जलप्रपात, जानकी कुंड, गुप्त गोदावरी, पंपापुर, हनुमान धारा जैसे स्थल मौजूद हैं, जिनका भावभरा दर्शन तीर्थयात्रियों की रामायणकालीन स्मृतियाँ जीवंत हो उठती हैं। इनमें गुप्त गोदावरी की गुफा स्वयं में एक अद्भुत एवं विलक्ष्ण रचना है, जहाँ सीता माता ने कुछ समय बिताया था। माना जाता है कि मय दानव ने इस गुफा का निर्माण किया था। 

पास में ही कामदगिरि पर्वत पड़ता है, जिसकी पावन परिक्रमा श्रद्धालुओं के बीच प्रख्यात है। चित्रकूट में ही भारत रत्न नाना देशमुखजी द्वारा स्थापित भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय पड़ता है, जिसे 1991 में स्थापित किया गया था।

इन स्थलों के अतिरिक्त सतना जिला में कुछ अन्य रामायणकालीन स्थल हैं। गृद्धराज पर्वत, सतना जिले की रामनगर तहसील के देवराजनगर गाँव में स्थित धार्मिक, पुरातत्व और पारिस्थितिक महत्व की पहाड़ी है। यह रामनगर शहर से 8 किमी दूर स्थित है। इसे गिद्धराज जटायु के भाई संपति का जन्मस्थान माना जाता है। कवि कालिदास ने अपनी पुस्तक गिद्धराज महात्म्य में लिखा है कि 2354 फीट की ऊंचाई पर स्थित गिद्धराज पर्वत से निकलने वाली मानसी गंगा नदी में एक डुबकी लगाने से सभी तरह के पाप खत्म हो जाते हैं। शिव संहिता में भी इसका उल्लेख है। चीनी यात्री फाह्यान ने भी अपने यात्रा विवरण में इसका उल्लेख किया है।

विन्ध्य पर्वत श्रेणियों के बीच सतना से पहले एनएच-75, और फिर नागोद कस्बे के आगे जसो होते हुए एनएच-943 पर पड़ता है - सलेहा क्षेत्र के नचना गाँव में स्थित - चौमुखनाथ शिव मंदिर। जो अपनी तरह का स्वयं में एक अद्वितीय शिवमंदिर है। 

इस परिसर में पार्वती मंदिर भी है, बिना शिखर शैली का स्पाट छत बाला यह मंदिर, सबसे प्राचीन मंदिरों में आता है, जिसे गुप्तकाल में पाँचवी सदी में बनाया गया था। इसी तरह नागरा शैली की शिखर कला से युक्त चौमुखनाथ मंदिर पांचवी से सातवीं सदी में बनाया माना जाता है। माना जाता है कि इसे प्रतिहार राजवंश के काल में बनाया गया था। दोनों मंदिर खालिस पत्थर के बने हैं।

परिसर में गोमुख से पहाड़ों का शुद्ध, शीतल व मीठा जल आता है। आप इस पानी को पी सकते हैं व इसमें नहा भी सकते हैं। विशाल वट, पीपल, ईमली आदि के प्राचीन वृक्षों से घिरा परिसर का प्राकृतिक नजारा बेहद खूबसूरत लगता है। यहां पर एक वॉच टावर भी बना हुआ है, जिससे आप यहां के चारो तरफ के खूबसूरत नजारों का विहंगावलोकन कर सकते हैं।

मंदिर ऊँचे चबूतरे पर बना है। गेट पर दो शेर स्वागत करते हुए प्रतीत होते हैं। द्वार पर विष्णु-लक्ष्मीं एवं द्वारपाल की प्रस्तर प्रतिमाएं दिवार में टंगी हैं। चौमुखनाथ मंदिर के शिवलिंग में चारों और शिव के चार विभिन्न भावों को दर्शाते विग्रह एक ही पत्थर से उकेरे गए हैं। प्रवेश करते ही सामने चंद्रमाँ को धारण किए विवाह के समय के सौम्य शिव, इसके वाईं ओर विषपान के समय का विकराल भाव, इसके आगे समाधि का शांत भाव और अंत में शिव का अर्धनारिश्वर रुप। 

यहाँ के एकांत परिसर में श्रद्धालु भजन-पूजन एवं ध्यान के कुछ यादगार पल बिता सकते हैं। शिव के चारमुखों के साथ जीवन, सृष्टि एवं जीवात्मा के चार आयामी रहस्यों पर चिंतन-मनन करते हुए जीवन का सम्यक दर्शन प्रकट होता है, जिसे अनुभव कर आस्थावान तीर्थयात्री जीवन को सफल एवं धन्य अनुभव करते हैं।

चोमुख्ननाथ मन्दिर के सामने ही पहाड़ी के बीच प्राचीन जैन गुफा मंदिर श्रेयांसगिरी भी मौजूद है। समय हो तो इसके दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ चाय व लंगर आदि की उचित व्यवस्था रहती है। कोई चाहे तो सतना के साथ पन्ना, खजूराहो आदि दिशा से भी चौमुखनाथ आ सकते हैं। 


यहाँ से सतना की ओर बापसी के सफर में रास्ते भर कई सौ साल पुराने पेड़ों को देख मन श्रद्धा भाव से भरता उठता है। रास्ते में पक रही गैंहूँ-जौ की फसल, इनके किनारे बीच-बीच में जल से भरे तालाब और सड़क के दोनों ओर पलाश या टेसू के चटक लाल-पीले फूलों से लदे पेड़ – सब मिलाकर सफर को खुशनुमा बनाते हैं।   

रविवार, 18 अप्रैल 2021

सतना के आसपास के दर्शनीय स्थल

इतिहास को समेटे विन्ध्यक्षेत्र का यह प्रवेश द्वार

सतना म.प्र. के एक जिला के साथ मुख्यालय शहर भी है, जो प्रमुखतया सीमेंट फेक्ट्रियों के लिए माना जाता है। पास की पहाड़ियों में लाइमस्टोन और डोलोमाइट की प्रचुरता के कारण यहाँ लगभग आधा दर्जन सीमेंट फेक्ट्रियाँ हैं। इसके अतिरिक्त सतना अपने आँचल में कई हजार साल पुराने इतिहास को भी समेटे हुए है। रामायण-महाभारत काल से इसके तार जुड़े मिलते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य बौद्ध काल के शक्तिशाली शासकों से भी इसका सम्बन्ध जोड़ते हैं। सतना अंग्रेजों के भी प्रभाव में रहा। यहाँ बहने वाली नदी सतना के नाम पर शहर का नाम सतना पड़ा, जहाँ यह शहर एक और सोन नदी, तो दूसरी ओर तमस नदी से घिरा हुआ है। हालाँकि आज जलवायु परिवर्तन के कारण इन नदियों का अस्तित्व संकट में है, जबकि आज से दो-तीन दशक पूर्व तक ये पूरे वेग के साथ बहा करती थीं।

सतना के मुख्त्यारगंज इलाके में व्यंकटेश मंदिर अपने विशिष्ट वास्तुशिल्प और प्राचीनता के चलते खास है। माना जाता है कि इसका निर्माण 1876 और 1925 के बीच देवराजनगर के शाही परिवार द्वारा किया गया था। 

यहाँ के मंदिर में तिरुपतिवालाजी के व्यंकटेश स्वामी की प्रतिकृति स्थापित हैं, जिसकी दिवारें लाल संगमरमर से बनी हुई हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने ही विष्णू भगवान के वाहन गरुढ़ की प्रतिमा स्थापित है। बाहर से मंदिर का विशाल एवं भव्य परिसर एक अलग ही छाप छोड़ता है। 

अंदर भगवान व्यंकटेश की भव्य प्रतिमा के उत्तर की ओर लक्ष्मी-नारायण तथा दक्षिण की ओर श्रीरंगनाथ भगवान के मंदिर हैं। मंदिर परिसर में ही एक तलाब भी है, जिसका हरा-भरा परिसर शांतिदायी लगता है, जहाँ प्रकृति की गोद में क्वालिटी समय विताया जा सकता है। इस बार के टूर में परिसर में भ्रमण कर रही गौमाता का विशेष सान्निध्य मिला था।

सतना के ही अंदर शिव मंदिर, जगतदेव तालाब, संतोषी माता मंदिर, सिंधी मंदिर, जैन मंदिर, धवारी साई मंदिर आदि के साथ अन्य धर्माबलम्वियों के चर्च, गुरुद्वारा, मस्जिद आदि आस्था स्थल भी विद्यमान हैं। रामकृष्ण मिशन जहाँ रीवा रोड़ पर पड़ता है, वहीं गायत्री शक्तिपीठ शहर के बीच स्थित है। 

मैत्री पार्क प्रातः सांय भ्रमण एवं आपसी मिलन का एक लोकप्रिय स्थल हैं। पार्क परिसर में बच्चों के खेलने के लिए झूलों की व्यवस्था है। इनका हरा-भरा फूलों से भरा परिसर नागरिकों के लिए शांति-सुकून भरे कुछ बेहतरीन पल उपलब्ध कराता है। मैत्री पार्क के एक ओर हवाई पट्टी है, तो दूसरी ओर एक भव्य तालाब भी है, जिसके किनारे शिव मंदिर बना है। इस पार्क में जानवरों की बहुत सारी मूर्तियां देखने के लिए मिलती हैजो बच्चों के लिए बहुत रोचक एवं ज्ञानबर्धक रहती हैं। इसी के साथ रेल्वे स्टेशन के पास सिविल लाइन पार्क भी शहरवासियों के लिए प्रातः-सांय भ्रमण से लेकर बच्चों के खेलने-कूदन व प्रकृति की गोद में विचरण का अवसर देता है।

सतना शहर में पन्नीलाल चौक मार्केटिंग का प्रमुख केंद्र है। यह रेल्वे स्टेशन के पास पड़ता है। रोजमर्रा की आवश्यकता का हर सामान यहाँ उपलब्ध रहता है। यहाँ किशोरी हल्वाई की दुकान में खोआ की जलेबी और पेड़े प्रख्यात है। ऐसी जलेबी तो शायद ही कहीं और बनती हो। सीमेंट फेक्ट्री के कारण सतना हालाँकि एक औद्योगिक शहर है, लेकिन इसको स्मार्ट सिटी के रुप में तैयार करने की कवायद जोरों पर है और एक हिस्सा इस रुप में तैयार भी हो चुका है। रीवा रोड़ पर ही यहाँ का बस स्टैंड पड़ता है, जहाँ से अंतर्राजीय बसें पकड़ी जा सकती हैं।

बस स्टैंड से ही लगभग 4 किमी दूर रीवा रोड़ पर माधवगढ़ किला पडता है। यह तमस नदी के किनारे बसा है। हालाँकि सामान्यतया इसमें पानी कम रहता है, लेकिन बरसात में पानी बढ़ने पर नदी अपने पूरे शबाव पर होती है। फिल्हाल किला खण्डहर अवस्था में है, जो यहाँ के वैभवशाली इतिहास की झलक देता है। किले के अंदर से नदी का दृश्य बहुत ही अच्छा दिखता है। खंडहर में तब्दील होते इस किले के संरक्षण की आवश्यकता है, जिस पर अभी सरकार का अधिक ध्यान नहीं दिखता। यह किला हाईवे रोड से भी अपनी भव्य उपस्थिति दर्ज करवाता है। 

इसी रास्ते पर सतना से 16 किमी दूरी पर रामवन का शांत-एकांत सुंदर परिसर है, जिसके मुख्य आकर्षण हैं, कई फीट ऊँची बज्ररंगबली हनुमानजी की लाल सिंदूर से रंगी गगनचुम्बी प्रतिमा।

माना जाता है कि भगवान राम सीता माता एवं भाई लक्ष्मण सहित इस वन से होकर गुजरे थे। यहीं पर तुलसी संग्राहलय भी हैं, जो जिला का प्रमुख विरासत स्थल है। तुलसी संग्रहालय में प्राचीन काल की कई स्थानीय कलात्मक मूर्तियाँ हैं, जिसे 1977 में स्थापित किया गया था। इसमें मिररकोट्टा, बर्च संदूक, ताड़ का पत्ता, दुर्लभ ताँबे के सिक्के व प्लेट, सोने व चाँदी की मूर्तियाँ आदि प्रदर्शित हैं। यह पुरातात्विक संग्रहालय सतना शहर के गौरवशाली अतीत का दिग्दर्शन कराता है। इस परिसर में रुकने व रिफ्रेश होने के लिए विश्राम गृह के साथ कैंटीन भी है, जिसमें चाय-काफी आदि की उम्दा व्यवस्था रहती है। पास में ही एक पार्क भी है। परिवार के साथ यहाँ के प्राकृतिक परिवेश में शाम को क्वालिटी समय बिताया जा सकता है।

इसी मार्ग पर बीच में दक्षिण की ओर मैहर के लिए सड़क जाती है, जो सतना से लगभग 40 किमी दूर पड़ता है। यहाँ त्रिचूट पर्वत पर 600 फीट की ऊँचाई पर माँ शारदा का सिद्ध शक्तिपीठ है। 

By LRBurdak - Own work, CC BY-SA 3.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=3023734

शिखर तक पहुँचने के लिए 1001 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मान्यता है कि माँ के चरणों में यौद्धा भक्त आल्हा आज भी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। (मालूम हो कि आल्हा-ऊदल बुंदेलखण्ड के महान यौद्धा भाई रहे हैं, जिनकी वीरता की गाथाएं आज भी बड़े रोमाँच के साथ गाई जाती हैं। ऊदल जहाँ पृथ्वीराज चौहान से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, वहीं माँ शारदा से अमरता का वरदान प्राप्त आल्हा पृथ्वीराज चौहान को निर्णायक युद्ध की ओर ले जाते हैं। गुरु गोरखनाथ के आदेश पर आल्हा पृथ्वीराज को प्राणदान देते हैं और फिर वैराग्य धारण करते हैं। माना जाता है कि वे अमर हैं और आज भी सबसे पहले प्रातः भगवती को शीष नवाने आते हैं।) यहाँ आधी दूरी तक रोपवे द्वारा जाया जा सकता है, बाकि रास्ता पैदल चलना पड़ता है। यहाँ से चारों ओर पहाड़ियों व नीचे शहर व मैदान-घाटियों का नजारा देखने योग्य रहता है।

सतना जिला में ही लगभग 23 किमी दूर भरहुत नामक बौद्ध संस्कृति का एक प्राचीन केंद्र है, जहाँ बौद्ध धर्म से जुड़े कई साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 

By LRBurdak - Own work, CC BY-SA 3.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=2903171

सन 1873 में भारतीय पुरातत्व के जनक कहे जाने वाले सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने इनकी खोज की थी। यहाँ प्राप्त सतूप को तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा स्थापित माना जाता है। यहाँ दूसरी सदी ई.पू. में शुंग शासकों द्वारा परिबर्धित साक्ष्य भी मिलते हैं। यहाँ से प्राप्त अवशेष भारत और विश्व के कई संग्रहालयों में प्रदर्शित हैं। इन्हें देख स्पष्ट होता है कि यहाँ कई शक्तिशाली सम्राटों का शासन रहा। 

मैहर के पास ही लगभग 11 किमी पहले नीलकंठ आश्रम पड़ता है, जहाँ सिद्ध बाबा नीलकंठजी महाराज ने तपस्या की थी। यहां प्रकृति के बहुत ही मनोरम परिवेश में राधा-कृष्ण सहित गणेश, शंकर व अन्य देवी-देवताओं के मंदिर हैं। यहाँ पर आप परिवार व दोस्तों के साथ आध्यात्मिक परिवेश में एक नया अनुभव लेकर जा सकते हैं।  यहाँ चाय व लंगर आदि की उचित व्यवस्था भी रहती है।

इसी की राह में कला को समेटे आर्ट इचोल पड़ता है, जो कलाप्रेमियों के लिए एक आदर्श स्थल है। यहां आप धातुमिट्टीपत्थर एवं लकडी से बनी कई तरह की कलात्मक वस्तुएं देख सकते हैं। यदि आपमें कलात्मक प्रतिभा है, तो आप भी यहाँ के सृजन का हिस्सा बनकर अपना योगदान दे सकते हैं। यह जगह देश-दुनियाँ से आए कलाकारों द्वारा निर्मित अद्भुत कलाकृतियों से भरी हुई हैं। आर्ट इचोल मैहर की ओर से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आप यहां पर सृजन एवं शांति के कुछ बेहतरीन पल बिता सकते हैं।

इस तरह सतना इतिहास, धर्म और कला-संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव हैजहां प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल तक के इतिहास को साक्षी बनकर देखा जा सकता है। और अपनी आस्था के अनुरुप तीर्थस्थलों में भ्रमण करते हुए अपनी श्रद्धा-आस्था क्षेत्र को सिचित किया जा सकता है। सतना के आसपास चित्रकूट एवं चौमुखनाथ जैसे अन्य ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल भी हैं, जो विंध्यप्रदेश के द्वार सतना को और खास बनाते हैं। इन तीर्थ स्थलों का को आप अगली ब्लॉग पोस्ट - बाबा चौमुख नाथ के देश में, पढ़ सकते हैं।

चुनींदी पोस्ट

Travelogue - In the lap of Surkunda Hill via Dhanaulti-Dehradun

A blessed trip for the seekers of Himalayan touch Surkunda is the highest peak in Garwal Himalayan region near Mussoorie Hills wi...