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रविवार, 29 नवंबर 2020

गढ़वाल हिमालय की गोद में बसा देहरादून

 हिमालय के आँचल में बसा देहरादून

Dehradun Valley from Landour, By Paul Hamilton, Wiki

उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून गढ़वाल हिमालय की तराई में बसा एक महत्वपूर्ण शहर है, जो राष्ट्रीय महत्व के कई शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों के लिए जाना जाता है। शहर बहुत पुरातन है। द्रोण नगरी के नाम से माना जाने वाला देहरादून अपना पौराणिक इतिहास लिए हुए है। सहस्रधारा की गुफा में स्थित द्रोणाचार्य की गुफा व उनका विग्रह आज भी इसकी गवाही देते हैं।

द्रोणाचार्य गुफा मंदिर, सहस्रधारा

टपकेश्वर में स्थित गुफा में माना जाता है कि द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का जन्म हुआ था। आज भी यहाँ की गुफा से गिरता जल शिवलिंग का अभिषेक करता है। इसी परम्परा में भारतीय सैन्य संस्थान (IMA - इंडियन मिलिट्री एकादमी) की स्थापना देहरादून में की गई, जहाँ से भारतीय सेना के लिए कमिशन्ड अफसर तैयार किए जाते हैं। इसके साथ यहाँ कई मिलिट्री स्कूल और कालेज भी हैं। गढ़ी कैंट में पूरी आर्मी की छावनी यहाँ स्थित है।

देहरादून का नाम सिखों के गुरु राम राय से भी जुडा हुआ है। जब वे पंजाब से आकर इस क्षेत्र में बसे तो उनके डेरों के नाम पर यहाँ का नाम देहरादून पड़ा। आज भी गुरु रामराय के आश्रम के साथ इनकी स्थापित शैक्षणिक संस्थाओं की भरमार है। जिसमें स्कूल, कालेज, युनिवर्सिटी से लेकर मेडिक्ल संस्थान एवं अस्पताल यहाँ मौजूद हैं।

गढ़वाल तथा शिवालिक पहाड़ों की तराई पर बसे होने के कारण यहाँ की आवोहवा न अधिक गर्म है और न अधिक ठण्डी। साथ ही घने वनों के बीच बसे होने के कारण प्रारम्भ में इस जगह को स्वास्थ्यबर्धक एवं बेहतरीन माना गया। हालाँकि राजधानी बनने के बाद यहाँ आबादी का दबाव बढ़  गया है तथा प्रदूषण से लेकर घिच-पिच आबादी और ट्रैफिक समस्याएं आए दिन सरदर्द बनती रहती हैं। हालाँकि कई फ्लाईओवर और वाईपास बनने से इससे निजात पाने के प्रयास जोरों से चल रहे हैं।

इसके बावजूद देहरादून में कई दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें व्यक्ति दो-तीन दिन में देख सकता है। सहस्रधारा का जिक्र पहले हो चुका, जो शहर के बाहर मसूरी बाईपास पर रायपुर से लगभग 8 किमी दूरी पर स्थित है। यहाँ गुफा व मंदिरों के अतिरिक्त सहस्रों धाराओं में बह रहे झरनों का प्राकृतिक दृश्य देखने लायक रहता है, जिसके आधार पर इसका नाम सहस्रधारा पड़ा है।

सहस्रधारा

झरनों के बीच कुछ गुफाएं भी हैं, जिनमें फिसलने से बचते हए आनन्द लिया जा सकता है। नीचे नाला बहता है, जिसको रोककर स्नान योग्य छोटी-छोटी झीलें बनाई गई हैं, जिसमें डूबकी का लुत्फ गर्मियों में उठाया जा सकता है। इसके तट पर गंधक का जलस्रोत भी है, जिसका जल चर्म रोगों के लिए उपयोगी माना जाता है।

यहीं से बापसी में मसूरी बाईपास से होकर सीधे साईं मंदिर आता है, जहाँ के शांत-एकांत वातावरण में कुछ भक्तिमय पल बिताए जा सकते हैं। इसके साथ ही बौद्ध गोम्पा के दर्शन किए जा सकते हैं, जिसमें कालेज भी है। सांईं मंदिर के आगे श्रीअरविंद आश्रम भी है, जहाँ ध्यान के कुछ पल विताए जा सकते हैं। इसके आगे माता आनन्दमयी का आश्रम है, माना जाता है कि माता आनन्दमयी ने उत्तराखण्ड में सबसे पहले इस स्थल पर पदार्पण किया था, जो उनकी कई लीलाओं का साक्षी रहा है। इस मार्ग पर नीचे किशनपुर चौराहे के आगे रामकृष्ण मिशन पड़ता है। यहाँ के आध्यात्मिक ऊर्जा से चार्ज शाँत परिसर में मंदिर दर्शन के बाद पुस्तकों का अवलोकन किया जा सकता है, जिसमें रामकृष्ण परमहंस व स्वामी विवेकानन्द की पुस्तकें उपलब्ध रहती हैं। यहाँ पुस्तकाय भी है, जिसमें बैठकर स्वाध्याय का लाभ लिया जा सकता है।

रामकृष्ण मंदिर

यहाँ से थोड़ा नीचे दायीं ओर लिंक रोड़ से टपकेश्वर पहुंचा जा सकता है जो तमसा नदी पर बसा है। इसी के पीछे कुछ किमी पर गुच्चु पानी पड़ता है, जिसे रोबर्ज केव भी कहा जाता है। अंग्रेजों के समय यह सुल्ताना डाकू के छिपने का ठिकाना था। ऊपर से खुले गुफनुमा मार्ग से इसके अंदर प्रवेश होता है। प्रायः घुटनों तक पानी के बीच इसमें चलना पड़ता है, जो बरसात में बढ़ जाता है। अंदर बैठने के कई ठिकाने हैं और जल-पान की व्यवस्था भी। कुछ स्टुडेंटस यहाँ के एकांत स्थल में परीक्षा की तैयारी करते देखे जा सकते हैं और साथ ही प्रेमी जोड़ों के लिए भी यह मिलने का एक आदर्श स्थल रहता है। अंदर 2-3 किमी तक पैदल चलते हुए दूसरी ओर से बाहर निकलने का रास्ता है। लेकिन इस एडवेंचर को ग्रुप में ही करना उचित रहता है, अकेले में व्यक्ति भटक सकता है और घबराहट में परेशान भी हो सकता है।

गुच्चु पानी गुफा प्रवेश

यहीं से वाहन से आर्मी केंटोनमेंट को पार करते हुए बन अनुसंधान संस्थान (FIR-द फोरेस्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट) आता है, जिसे अब डीम्ड-यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया है। वन से सम्बन्धित यह भारत का सबसे बड़ा प्रशिक्षण संस्थान है और अधिकाँश फोरेस्ट अफसर यहाँ से तैयार किए गए हैं। इसका परिसर 450 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। ग्रीको रोमन शैली में बना इसका भवन बास्तुशिल्प का एक उत्कृष्ट नमूना है, जो बहुत भव्य लगता है। इसमें वनों का बेहतरीन म्यूजियम बना हुआ है, जिसमें 700 साल पुराने वृक्ष के तने को तक संरक्षित रखा गया है। कुछ फीस के साथ यहाँ के हरे-भरे परिसर में यादगार पल बिताए जा सकते हैं। इसी के आगे आईएमए (इंडियन मिलिट्री एकेडमी) है, जिसके बाहर से दर्शन किए जा सकते हैं।

भारतीय सैन्य संस्थान (IMA)

इसके साथ देहरादून में तमाम राष्ट्रीय महत्व के संस्थान मौजूद हैं, जिन्हें अपनी रुचि के अनुसार भ्रमण किया जा सकता है। जैसे यूकोस्ट, सर्वे ऑफ इंडिया, वाइल्ड लाइफ इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया, वाडिया इंस्टीच्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, ओएनजीसी, इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग, नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ विजुअली हैंडिकेप (एनआईवीएच), बोटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, सेंट्रल सोइल एण्ड वाटर कंजर्वेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट आदि। इसके साथ कई सरकारी तथा प्राईवेट विश्वविद्यालय एवं कॉलेज यहाँ स्थापित हैं, जैसे – दून विश्वविद्यालय, इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ पैट्रोलियम, उत्तराँचल यूनिवर्सिटी, उत्तराँचल टेक्निकल यूनिवर्सिटी, ग्राफिक ईरा यूनिवर्सिटी, आईएमएस यूनिसन यूनिवर्सिटी, डीआईटी, जी हिमगिरि यूनिवर्सिटी, पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी, द राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कालेज (आरआईएमसी), बीएफआईटी, डीएवी कालेज आदि।

घंटाघर - देहरादून का केंद्रिय स्थल


खरीददारी के लिए पलटन बाजार यहाँ की प्रमुख मार्केट हैं, जहाँ वीक-एंड में काफी भीड़ और हलचल रहती है। यहाँ पर घरेलु उपयोग की लगभग हर बस्तु उपलब्ध हो जाती है। यदि समय बिताना हो तो गाँधी पार्क में पेड़ों की छाया तले आराम से समय बिताया जा सकता है, जिसके बग्ल में पैरेड ग्राउंड है, जहाँ आए दिन कई तरह के मेले, उत्सब चलते रहते हैं। यहीं पर प्रेस क्लब के साथ एक बड़ी लाइब्रेरी भी है, जहाँ पुस्तक प्रेमी सदस्य बनकर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं। इसके आस पास खाने-पीने के तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। रेड़ी से लेकर ढावे एवं रेस्टोरेंट में आपके खानी-पीने की हर जरुरत पूरी हो जाती है।

बुद्धा टेम्पल, क्लेमेंटाउन

देहरादून का एक विशेष आकर्षण है बुद्धा टेम्पल, जिसका जिक्र किए बिना शायद देहरादून की यात्रा अधूरी मानी जाएगी। यह देहरादून के दक्षिणी छोर में क्लेमेंनटाउन में स्थित है, जहाँ बुद्ध भगवान का भव्य मंदिर है और एक तिबतन मार्केट भी। इसके पीछे साल का घना जंगल है। यहाँ कुछ पल शांति के साथ बिताए जा सकते हैं।

आईएसबीटी देहदरादून में बसों की बेहतरीन सर्विस रहती है, जहाँ से उत्तराखण्ड के किसी भी कौने तथा दूसरे प्राँतों के लिए बस उपलब्ध रहती हैं। यहाँ से मसूरी की पहाड़ियों के दर्शन सहज ही किए जा सकते हैं। रात को इसकी टिमटिमाटी रोशनी बहुत खूबसूरत लगती है। बर्फ पड़ने पर देहरादून से इसके सुन्दर नजारे देखे जा सकते हैं।

इसके अतिरिक्त देहरादून के थोड़ा बाहर हरिद्वार सड़क पर लक्ष्मण सिद्धबली मंदिर, आगे लच्छीवाला पिकनिक स्थल दर्शनीय हैं।

लच्छीवाला

मसूरी रोड़ पर माल्सी डीयर पार्क, क्रिश्चियन रिट्रीट सेंटर पड़ते हैं। ट्रैकिंग प्रेमी यहाँ से थोड़ी आगे शेखर फॉल की पैदल यात्रा कर सकते हैं, जो देहरादून में जल का एक प्रमुख स्रोत है। रायपुर साईड में मालदेवता भी दर्शनीय स्थल है। सांतला माता का मंदिर भी ट्रेकिंग व तीर्थाटन के हिसाब से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

देहरादून में पुस्तक प्रेमियों के लिए कई बुक शॉप्स भी हैं, जैसे – बुक वर्ल्ड, इंग्लिश बुक डिपो, रमेश बुक डिपो आदि। लेखकों के लिए विंसर पब्लिकेशन, समय साक्ष्य जैसे प्रकाशन भी यहाँ उपलब्ध हैं। इसके साथ कई एनजीओ यहाँ के परिसर में हैं, जैसे नवधानिया, हेस्को आदि। जो जैविक खेती, बीज एवं जैव विविधता संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, जिनकी ज्ञानबर्धक जानकारी आप आगे दिए गए लिंक्स में पढ़ सकते हैं।

नवधान्या विद्यापीठ

हेस्को - प्रकृति-पर्यावरण एवं ग्रामीण विकास की अभिवन प्रयोगशाला

ऑर्गेनिक फार्मिंग, जैव विविधता संरक्षण की प्रयोगशाला - नवधान्या विद्यापीठ 

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

यात्रा वृतांत – हरिद्वार से मसूरी, कैंप्टिफॉल वाया देहरादून


12 घंटों में जैसे सफर तीन लोकों का
हरिद्वार से अक्सर लोग एक दिन में बहुत कुछ घूमने का प्लान करते हैं, खासकर पास के पहाड़ उन्हें आकर्षित करते हैं। ऐसे पर्यटकों के लिए हरिद्वार से मसूरी, कैंप्टीफॉल का टूर इच्छा पूर्ण करने वाला साबित हो सकता है। अगर सस्ते में टूर करना हो तो स्थानीय किसी भी टूर-ट्रैब्ल से महज 250 रुपए में बुकिंग हो जाती है, रास्ते में खाने-पीने व कुछ विजिट टिक्टस को मिलाकर बजट 4-6 सौ के अंदर पूरा हो जाता है, यदि शॉपिंग भी करनी हो तो फिर तो कोई सीमा नहीं। हजार रुपए के अंदर एक बेहतरीन ट्रिप का प्लान किया जा सकता है।
हरिद्वार से बसें सुबह 8,9 बजे शुरु हो जाती हैं, जो शाम को 8,9 बजे तक पहुँचा देती हैं अर्थात् 12 घंटे में आप देहरादून से होते हुए मसूरी पहुँचते हैं और कैंप्टीफॉल से होकर बापिस आ जाते हैं। रास्ते में फन बैली, प्रकाशेश्वर महादेव, मसूरी सिटी लैक, मॉल रोड़, केंप्टीफॉल स्टेशन आते हैं। यदि पूरी बस बुक हो तो स्टेशनों को अपने अनुसार जोड़, घटाया जा सकता है। जैसे फन वैली की जगह सहस्रधारा को जोड़ा जा सकता है। समय बचने पर बापसी में देहरादून पलटन बाजार में शॉपिंग का समय निकाला जा सकता है।

हरिद्वार से हरकी पौड़ी पार करते ही वाईं और शिवालिक पहाड़ियों और दाईं ओर गढ़वाल हिमालय के दर्शन शुरु हो जाते हैं। वाईं ओर गगनचुम्बी भगवान शिव की प्रतिमा और नीचे गंगाजी की निर्मल धारा के दर्शन के साथ यात्रा का शुभारम्भ हो जाता है। आगे शांतिकुंज, देसंविवि से होते हुए रेल्वे फाटक पार करते ही रायवाला की ओर सफर बढ़ता है। रास्ते में ही पहाड़ों की गोद में बसे नरेंद्रनगर सहित शिखर पर स्थित सिद्धपीठ कुंजादेवी ध्यान आकर्षित करते हैं। देहरादून से आ रही सोंग नदी को पार करते ही नेपाली फार्म से सड़क वाईं ओर देहरादून की ओर मुड़ जाती है। जबकि सीधी सड़क ऋषिकेश जाती है, जो आगे बद्रीनाथ, केदारनाथ आदि के लिए बढ़ती है।


नेपाली फार्म से बाई ओर मुड़ते ही सड़क कुछ दूरी तक सोंग नदी से कुछ दूरी बनाए बढ़ती है, नदी में मिलती एक छोटी सी जलधार के किनारे सदावहार हरे-भरे जंगल और दायीं ओर फसलों से लदे खेत-खलिहान यात्रियों का स्वागत करते हैं। बारहों महीनों जल से आवाद यह नाला सुना है कि बीच में घने जंगल से प्रकट होता है, जिसके उद्गम स्रोत की खोज स्वयं में एक रोचक एवं रोमाँचक ट्रेकिंग एडवेंचर का मसाला हो सकता है। आगे छिद्दरवाला कस्वा पड़ता है, इसको पार करते ही फेक्ट्री के आगे फन वैली आती है। 


इसमें कन्शेसन में 200 की एंट्री फीस के साथ अंदर के सुंदर नजारों एवं नाना प्रकार के खेलों का लुत्फ उठाया जा सकता है। प्रवेश करते ही वायीं ओर हनुमान मंदिर और सामने फब्बारा आपका स्वागत करते हैं। अंदर कई तरह की खेलों का इंतजाम है, जैसे स्ट्राइकिंग कार, जंपिंग फ्रॉग, गो कार्ट आदि। 


बीच-बीच में सागर की कृत्रिम लहरें यहाँ के स्वीमिंग पूल में देखी जा सकती हैं। कई तरह के झूलों का यहाँ इंतजाम है, जिनका रफ-टफ लोग ही आनन्द उठा सकते हैं। स्लाइंडिंग वाटर स्पोर्ट्स सर्दी में हालांकि बंद रहते हैं, गर्मियों में इनका भी आनन्द लिया जा सकता है। फन वैली का लैंडस्केप वेहतरीन है, हराभरा, फूलों से सजा। जिसके बीच में फब्बारे के सामने बेहतरीन यादगार फोटो ली जा सकती हैं। कुल मिलाकर फन वैली की दुनियां में एक वार अवश्य पधारकर कुछ यादगार पलों को सहेजा जा सकता है।

यहाँ 1 घंटे के बाद बस आगे बढ़ती है। रास्ते में दोनों ओर गन्ने, बास्मती चाबल के खेत मिलेंगे। दूर गढ़वाल की पहाड़ियां मौसम साफ होने पर आपके समानान्तर चलती प्रतीत होती हैं। नरेंद्रनगर से आगे मसूरी तक की पहाडियों के दर्शन रास्ते भर सहज ही होते हैं। भानेवाले त्रिराहे से वाईं ओर सड़क आगे डोईवाला की ओर बढ़ती है, जिसके आगे लच्छीवाला फ्लाईऑवर पुल के साथ घने जंगल में प्रवेश होता है। 

सड़क के किनारे यात्रियों द्वारा फैंकी जा रही सामग्री को बटोरते बंदरों की फोज को देखा जा सकता है। घना हरा-भरा साल के वृक्षों से जड़ा जंगल अगले कुछ किमी आपके सफर को सुकूनदायी बनाता है, जिसके अंतिम छोर पर आप देहरादून में प्रवेश करते हैं। रास्ते में हाल ही में बने जोगीवाला फ्लाईओवर से देहरादून के विस्तार को दायीं ओर पहाड़ों के तल तक देखा जा सकता है।


जोगीवाला से बाईपास सीधा राजपुर मसूरी रोड़ पर निकलता है। बीच में रायपुर कस्वे को पार करना होता है। रास्ते में राजधानी बनने के बाद बढ़ती आवादी के साथ फूलते देहरादून के दर्शन किए जा सकते हैं। रास्ते में साल के जंगल मिलेंगे, साथ ही कुछ वेहतरीन संस्थान और साथ ही घिच-पिच आवादी की बसावट। आधे पौन घंटे में बस उस पार राजपुर रोड़ पर निकलती है।
वहाँ से मसूरी की ओर मूड़ जाती है। यदि वाईपास की वजाए देहरादून शहर से प्रवेश किया जाए तो रास्ता रिस्पियाना पुल से होकर पलटन बाजार या फिर पैरेड ग्राऊँड से होकर किशनपुर मसूरी रोड़ तक पहुँचता है। इस सड़क पर भीड़ के बावजूद देहरादून शहर की भव्यता के दर्शन किए जा सकते हैं। रास्ते में कई राष्ट्रीय महत्व के प्रतिष्ठित संस्थान राजपुर सड़क के दोनों ओर पड़ते हैं।


यहाँ से चढ़ाई के साथ जंगल से आच्छादित हरी-भरी पहाडियाँ भी शुरु हो जाती हैं, जो नेत्रों को ठंड़क व मन को शांति देती हैं। इसी रुट पर वाईँ और डीआईटी, आईएमएस जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान और दायीं ओर डीयर पार्क और क्रिश्चियन रिट्रीट सेंटर रास्ते में पड़ते हैं। 

देहरादून से मसूरी की ओर आगे बढ़ते हुए रास्ते में आता है प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर, जहाँ स्फटिक शिवलिंग स्थापित है। 


इसके साथ ही है शाक्या कालेज, जो बौद्धधर्म का उच्च शिक्षा का केंद्र है, यदि समय हो तो इसके शांत परिसर में तिब्बती कला, स्थापत्य एवं अध्यात्म की झलक पायी जा सकती है। प्रकाशेश्वर शिवमंदिर में चाय नाश्ते की निशुल्क व्यवस्था रहती है, जिसके अंदर मार्केटिंग की सुविधा भी है। जिनमें तरह-तरह की मालाएं, रत्न, स्फटिक, ज्बैलरी आदि खरीदी जा सकती हैं।



आगे जलेबी रोड़ के साथ 4000 फीट से ऊपर 6500 फीट की ऊँचाई का मसूरी तक का आरोहण शुरु हो जाता है। । क्रमशः नीचे देहरादून के दर्शन, विहगम दृश्य व विस्तार बहुत स्पष्ट दिखाई देता है, ऐसे लगता है जैसे मैदान में पन्नियों को फैला रखा हो। रास्ते में ही देवदार व बांज के वृक्षों के दर्शन शुरु हो जाते हैं, साथ ही हवा में ठंडक का अहसास भी। लगता है कि हम पहाड़ी के आगोश में आ गए हैं। मसूरी से 6 किमी पहले ही बस रुकती है। नीचे 400 मीटर उतर कर मसूरी लेक आती है।


 यहाँ गढवाली परिधानों में फोटो की सुविधा रहती है, जिसमें पर्यटकों को खासी दिलचस्पी लेते देखा जा सकता है। साथ ही छोटी सी मार्केट है, जहाँ शाल, मफलर, स्वैटर जैसे गर्म कपड़े और लेडीज पर्स आदि खरीदे जा सकते हैं। साथ ही भोजन के ढावे हैं, जहाँ लंच किया जा सकता है। यात्रियों की राहत के लिए साथ ही सुलभ शौचालय की भी व्यवस्था है।


झील में बोटिंग की भी सुविधा है। पहाड़ों से झर रहे झरने के जल से यह झील बनी है। पानी एक दम ठंड़ा, हिमालयन टच लिए रहता है। यहाँ आधा घंटा घूमने-फिरने, फोटो खींचने व चाय-भोजन के बाद बापिस बस की ओर काफिला कूच करता है। रास्ते में तीव्र वेग से झर-झर बहता पानी दर्शनीय रहता है। पूछने पर कि यह पानी कहाँ से आता है, जबाव था कि पहाड़ों से। उसके उद्गम की सही जानकारी हमें नहीं मिल पायी। मेन रोड़ में बड़ा झरना पाईप से झर रहा था औऱ शेष जल तीव्र वेग के साथ नीचे वह रहा था।

यहाँ से बस आगे चल पड़ती है, कुछ ही देर में हम मसूरी चौराहे पर लगभग 6500 फीट की ऊँचाई पर थे, जिसके दायीं ओर माल रोड़ है, तो वायीं ओर पुरानी मार्केट।


हम सीधा आगे बढ़े मसूरी के उस पार, जहाँ से गंगोत्री-यमुनोत्री की ओर की हिमाच्छादित पर्वतश्रृंखलाएं दिख रही थीं। मसूरी शहर की छायादार जगहों में जमीं बर्फ के सफेद अवशेष दिख रहे थे। जैसे-जैसे हम आगे केंप्टीफॉल की ओर बढते गए, दूर बर्फ से ढकी पहाड़ियों का नजारा ओर निखरकर सामने आ रहा था। और साथ ही बादलों के बीच लुकाछपी करते धूप की रोशनी में जगमगाते पहाड़ भी। इन पहाड़ों की गोद में नीचे घाटी में बसे गाँव बरवस ध्यान आकर्षित करते हैं और किसी रुमानी दुनियाँ में ले जाते हैं। अधिकाँश दूर-दूर बसे इन गाँव में कच्ची सड़कें दिख रही थी। कुछ के लिए लगा पैदल ही चलना पड़ता होगा। 




अब हम केंप्टीफॉल के लिए नीचे उतर रहे थे। रास्ते में सड़क के दोनों ओर पिछले दिनों हुई बर्फवारी के अवशेष दिख रहे थे। मौसम में ठंडक थी। बांज-देवदार के जंगल के बीच सफर आगे बढ रहा था। रास्ते में पहाड़ी पर एक भव्य मंदिर के दर्शन हुए। उसके आगे कुछ ही मिनटों में मोड के बाद हम केंप्टीफाल के पास सामने थे। यहाँ बस स्टॉप पर बस खड़ी हो गई, सवारियाँ, नीचे केंप्टीफाल का नजारा लेती हैं।


यहाँ स्नान तो गर्मी में ही कोई सोच सकता है, ठंड में तो महज दर्शन कर सवारियाँ फोटो सेशन के बाद बापिस आ जाती हैं। रास्ते में कुछ यादगार मार्केंटिंग। समय हो तो मालरोड़ पर शांपिग की जा सकती है, हालाँकि खरीददारी यहाँ काफी मंहगी पड़ती है। फिर मसूरी से होकर नीचे उतरते हुए बापसी में सूर्यास्त का नजारा सफर में एक नया अध्याय जोड़ता है। 


सांय कालीन रोशनी में जगमगाते शिखरों के बीच देहरादून शहर का अद्भुत दृश्य रोमाँचित करता है और अस्त होते सूर्य की स्वर्णिम आभा ढलते सफर को आलोकित करती है। प्रकाशेश्वर मंदिर में चाय प्रसाद के बाद यात्रा आगे बढ़ती है। राह में अंधेरा शुरु जाता है। गाड़ी वाईपास से होते हुए हरिद्वार गन्तव्य पर छोड़ देती हैं।
12 घंटे के एक ही सफर में व्यक्ति इतने सारे अनुभव वटोर आता है, ऐसे लगता है जैसे कि तीनों लोकों का भ्रमण कर आए और यात्री सुखद स्मृतियों के साथ अपने गन्तव्य की ओर कूच कर जाते हैं।

 

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