एक्ला चलो रे
वो तुमको कितना समझ पाएंगे, कहना कुछ कठिन
तुम अपने ह्दय के भावों को निचोड़कर भी,
जीवन भर का सार रख दो सामने तश्तरी में,
ज़रुरी नहीं कि वो उसे समझ सकें, उसकी कदर कर पाएं।।
नासमझी में, अपनी मूढ़ता की बेहोशी में,
हो सकता है वे उसे ठुकरा दें,
दुत्कार कर, लांछन तक लगाकर,
तुम्हें गुनाहगारों की पंक्ति में खड़ा कर दें।।
समय-समय की बात है ये,
किसी को इसका क्या कसूर दें,
कुछ अपने रहे शायद पुण्य क्षीण, कुछ उनका समय खास,
गहराई में झाकें, तो नियति के ये पल निर्णायक, नहीं कुछ यहाँ अनायास।।
झाँक रहा इनमें अपने जन्म-जन्मांतरों के पुण्यों का प्रसाद,
आभासित अभिशाप के बीच भी दैवीय कृपा जैसे बरस रही बनकर वरदान,
चित्त की शाश्वत बक्रता का हो रहा यहाँ जैसे गहनतम उपचार,
जन्मों से बिछड़े जीव को मिल रहा जैसे शिव का नेहभरा निमंत्रण, प्यार-दुलार।।
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