शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

यात्रा वृतांत - मेरी पहली मुम्बई यात्रा, भाग-1


मायानगरी से पहला परिचय

बचपन के बम्बई और आज के मुम्बई का नाम सुनते दशकों बीत गए, लेकिन यहाँ की यात्रा का कभी कोई संयोग नहीं बन सका। सुनी-सुनाई बातों और बहुत कुछ मीडिया की जुबानी, इस महानगर की छवि एक घिच-पिच शहर की बन गयी थी, जहाँ शोर-शराबा, भाग-दौड़ भरी हाय-हत्या, प्रदूषण और नरक सा जीवन होगा। फिर मायानगरी नाम से इसके घोर भौतिकवादी स्वरुप का अक्स जेहन में उभरता था। लेकिन अक्टूबर माह में जब अचानक मुम्बई के भ्रमण का संयोग बना, तो 3-4 दिन में ही मुम्बई के प्रति हमारे सारे भ्रम के बादल छंटते गए। महानगर से हल्का सा ही सही, किंतु ऐसा गाढ़ा परिचय हुआ कि मुम्बई हमारे सबसे मनभावन महानगरों की श्रेणी में शुमार हो गया।
इस महानगर में प्रकृति, संस्कृति, इतिहास, भूगोल, परम्परा, अध्यात्म और एडवेंचर की जो झलक मिली, संभावनाएं दिखीं, वो हमारी कल्पना से परे थी। साथ ही अहसास हुआ कि पुरुषार्थी एवं जुझारू प्रतिभाओं के लिए यह महानगर संभावनाओं का द्वार है, जहाँ प्रतिभा एवं कला के कदरदानों की कमी नहीं। और यदि व्यक्ति विवेक से काम ले तो मुम्बई स्वर्ग से कम नहीं है, जहाँ व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थों को साध सकता है और यह मायानगरी माया के बीच रहते हुए व्यक्ति को इससे पार जाने का रास्ता भी दिखा सकती है।

प्रगतिशील बागवान भाई के संग भारत की सबसे बड़ी फल एवं सब्जी मण्डियों में एक - एपीएमसी फल एवं सब्जी मंडी, नवी मुम्बई, वाशी को एक्सप्लोअर करने के उद्देश्य के साथ इस यात्रा का संयोग बन रहा था। सितम्बर 2019 के अंत में बनी इस यात्रा का शुभारम्भ चण्डीगढ़ एयरपोर्ट से होता है। इससे पहले हिमाचल से चले भाई से हमारी मुलाकात प्रातः सेक्टर-43 में स्थित चण्डीगढ़ बस स्टैंड पर होती है।
अभी फ्लाईट को 4-5 घंटे शेष थे, सो इस खाली समय का सदुपयोग करने के उद्देश्य से हम चण्डीगढ़ के कुछ दर्शनीय स्थलों का विहंगावलोकन करने निकल पड़ते हैं। 17 सेक्टर से सटे रोज गार्डन से गुजरते हुए यहाँ रुकने का विचार करते हैं, लेकिन सुबह की ओंस को देखकर फिर आगे चल देते हैं। आगे शहर के उत्तरी छोर पर मानव निर्मित सुखना लेक ही हमें सही ठिकाना मालूम पड़ता है। इसके बाहर बाहन खड़ा कर हम सीढियों को चढ़कर झील का दिग्दर्शन करते हैं।
हम यहाँ संभवतः तीन दशक बाद आ रहे थे। 1980 के प्रारम्भिक दशक में डीएवी कालेज चण्डीगढ में पढ़ते हए हम एक बार यहाँ आए थे। तब और अब में इसमें बहुत अंतर दिख रहा था। इसके किनारे बनी पक्की सड़क व पगडंडियों पर लोग मोर्निंग वाक कर रहे थे। यहाँ के लोगों की फिटनेस के प्रति सजगता उत्साहबर्धक लगी, जिसमें स्त्री-पुरुष, युवा, प्रौढ़, बुजुर्ग सभी शामिल दिखे। कुछ बरगद के वृहद पेड़ के नीचे योगासन कर रहे थे।

हम लगभग एक-डेढ़ किमी पैदल चलते हुए झील की अर्द्दपरिक्रमा करते हैं, झील की शुद्ध आवोहवा और प्राकृतिक दृश्यावली मन को प्रमुदित कर रही थी। इसके किनारे कुछ यादगार फोटो लेते हैं, इसके छोर पर बने रेस्टोरेंट में नाश्ता करते हैं और फिर चण्ड़ीगढ़ एयरपोर्ट की ओर चल देते हैं। चण्डीगढ़ शहर के बीच से होकर सफर हमेशा ही एक बहुत ही सुखद अनुभव रहता है। चौडी सुव्यवस्थित सड़कें, हरी-भरी झाड़ियों, फूल एवं वृक्षों से सजे चौराहे (जिन्हें शहर के फेफडों की संज्ञा दी जाती है), सड़क के दोनों ओर खड़े बड़े-बड़े पेड़ – इस सीटी ब्यूटीफुल को विशेष पहचान देते हैं। 

इस तरह आधा-पौन घण्टे में हम एयरपोर्ट में प्रवेश कर रहे थे, जो शहर के बाहर ऐयरफोर्स के बेसकेंप के साथ स्थित है, जहाँ एयरफोर्स के हवाई जहाज कतारों में खड़े थे व यदा कदा उड़ान भर व उतर रहे थे।

चण्डीगढ़ एयरपोर्ट में प्रवेश की प्रक्रिया सरल है और यह छोटे आकार का है। यहाँ से इंडिगो सर्विस में हम मुम्बई के लिए उड़ान भरते हैं। यहाँ के एयरपोर्ट पर सामान ढोने में ट्रेक्टर के उपयोग का ठेठ पंजाबी अंदाज हमें बहुत भाया। शायद ही किसी एयरपोर्ट पर ट्रैक्टरों का ऐसा सदुपयोग होता हो।


भाई के लिए हवाई यात्रा का यह पहला अनुभव था, जिसके रोमाँच की कल्पना हम अपनी पहली हवाई यात्रा की उत्सुक्तता का पुनरावलोकन करते हुए कर रहे थे। हवाई पट्टी पर काफी देर तक आगे सरकते हुए अंत में यान स्पीड़ पकड़ता है, जेट इंजन एक्टिवेट हो जाते हैं और कुछ ही पल में एक झटके के साथ यान हवा में उडान भरता है। कुछ ही देर में हम शहर, खेत व सड़कों को पीछे छोड़ते हुए आसमान में बादलों से बातें कर रहे थे।

रास्ते में अधिकाँश समय हम बादलों के ऊपर थे, जहाँ से हम बादलों के नाना रुपाकारों का विहंगावलोकन करते रहे, जो हमेशा ही एक रोमाँचक अनुभव रहता है। बीच में मौसम खराब होने के कारण बादलों के बीच हवाई जहाज के झटकों का अनुभव भी मिलता रहा। लगभग दो घंटे बाद मुम्बई के पास नीचे जमीं के दर्शन होना शुरु हो जाते हैं, बीचों बीच सर्प सी बलखाती नदी व सड़कों की रेखा बहुत सुंदर लग रही थी। सागर तट पर बसे शहर की बसावट मुम्बई में प्रवेश की सूचना दे रही थी, ऐयर होस्टेस की अनाउंसमेंट के साथ इसकी पुष्टि हो रही थी। सागर, शहर के भवन व सड़कों को नजदीक से देखते हुए अंत में एक झटके के साथ छत्रपति शिवाजी महाराज इंटरनेशनल एयरपोर्ट की पट्टी पर उतरते हैं।

मुम्बई एयरपोर्ट से फीड़र बस में चढ़कर हम हवाई अड्डे के भवन में प्रवेश करते हैं और एक्सट्रा लगेज (चेक्ड-इन-बैगेज) न होने के कारण सीधे एग्जिट गेट की ओर बाहर निकलते हैं। बाहर मुम्बई की टीवी इंडस्ट्री में काम कर रही विभाग की पास आउट प्रखर छात्रा प्रियंका इंतजार कर रही थी। एक कतार में खड़ा होकर हम आटो तक पहुँचते हैं। यहाँ की लोक्ल ट्रेन का अनुभव लेते हुए, स्थानीय ऑटो में मलाड़ स्थित अपने रुकने के ठिकाने पर पहुँचते हैं। यहाँ इनके जीवनसाथी संगम राय से मुलाकात होती है, जो एक उदियमान अभिनेता हैं और इससे भी अधिक एक शांत, गंभीर एवं सुलझे हुए व्यक्तित्व के धनी एक शानदार इंसान। 
यहाँ का एकांत-शांत प्राकृतिक परिवेेश हमें भा गया और इनके आत्मीयतापूर्ण व्यवहार के बीच लगा जैसे हम अपने ही घर आ गए हैं। खिड़की के बाहर कबूतरों की गुटरगूँ और पक्षियों की चहचाहट हमें प्रकृति की गोद में ठहरने का बहुत सुखद अहसास करा रही थी।



यहाँ प्रदूषण की कोई समस्या हमें नहीं दिखी, जिसके लिए महानगर कुख्यात होते हैं। क्रिएटिव काम करने लायक यहाँ का एकांत-शांत माहौल हमें बहुत उपयुक्त लगा। सुरक्षा की दृष्टि से भी चिंता की कोई बात यहाँ नहीं दिखी। रात को 12 बजे तक लोगों को, बच्चों बुढ़ों महिलाओं को बाहर कालोनी के पार्क में घूमते पाया, बाहर दशहरे में रामलीला की तैयारियाँ चल रही थी, हर मुहल्ले में गरबा के साथ महिलाओं व बच्चों को नाचते कूदते, एंज्वाय करते देखा। हर मुहल्ले में उत्सव का माहौल हमें चकित करने वाला लगा। प्रतीत हुआ की सामूहिक स्तर पर जीवन को एन्जवाय करना मुम्बईवासियों से सीख सकते हैं अन्यथा शहरों में सब अपने में खोए रहते हैं, किसी को दूसरे से अधिक लेना-देना कहाँ रहता है।

अगले दिनों नवीं मुम्बई, वाशी सब्जी मंडी तक आने-जाने में यहाँ के यातायात के लगभग हर तरह के तौर-तरीकों को अनुभव किया। आटो रिक्शा से लेकर उबर सर्विस, ऐसी बस से लेकर आर्डनरी बस, पैदल से लेकर लोक्ल ट्रेन व सेंट्रल रेल्वे - सभी तरह के अनुभव लिए। लोक्ल ट्रेन यहाँ की लाईफ लाईन लगी। सस्ती, किफायती, सुरक्षित और समय को बचाने वाली। ट्रेन का ढांचा पुराने स्टाईल का दिखने के बावजूद डिजिटल सुविधाओं से युक्त था, जिसमें हर स्टेशन की जानकारियाँ अनाउंस्मेंट के साथ फ्लेश होती रहती हैं।

मलाड़ से नवी मुम्बई, वाशी का किराया दो व्यक्तियों के लिए ऊबर में 550 रुपए तक रहा, वहीं ऐसी बस में 250 रुपए में निपट गया। लोक्ल बस में तो 40 रुपए में काम चल गया। वहीं ट्रेन इससे भी सस्ता विकल्प लगी। व्यक्ति अपने समय, सुविधा, आवश्यकता एवं पॉकेट के अनुसार अपने यातायात के साधन तय कर सकता है, हर तरह के विकल्प यहाँ उपलब्ध दिखे।

वाशी फल एवं सब्जी मंडी में भारत के कौने-कौने से फल व सब्जियाँ आती हैं। जहाँ तक सेब फल की बात है, तो यहाँ हिमाचल के किन्नौर, शिमला व कुल्लू इलाकों के सेब दिखे। साथ ही काश्मीर का सेब आना शुरु हो चुका था।
इसके साथ नाशपाती, केला, तरबूज, अंगूर, संतरा जैसे फलों से मंडी सजी दिखी। हमारे लिए यहाँ ड्रेगन फल एक नया आकर्षण था, जो कम ऊँचाई वाले इलाकों में उगाया जाता है। पता चला यह मूलतः एक विदेशी फल है, लेकिन अपनी पौष्टिकता के कारण भारत में खासा लोकप्रिय हो रहा है व इसका मंडी भाव भी ठीक ठाक रहता है।

दिल्ली-चण्डीगढ़ सहित उत्तर भारत की मंडियों से यहाँ पर एक अन्तर साफ दिखा, कि यहाँ फलों की क्वालिटी पर विशेष ध्यान दिया जाता है। पेटियों में लोड़ हुए फलों को पूरी तरह से चैक कर पैक किया जाता है। गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं रहता। प्रायः पैकिंग के दौरान उपर की परतें तो क्वालिटी फलों की रहती हैं, लेकिन नीचे खराब फल भी डाल दिए जाते हैं। यहाँ ऊपर से नीचे तक सारे फल क्वालिटी का रखने का प्रयास दिखा, जिसके अनुरुप यहाँ दाम भी उचित रहते हैं। व्यापक क्षेत्र में फैली यहाँ की मंडी की पृष्ठभूमि में हरे-भरे पहाड़ दर्शनीय लगे और यहाँ आकाश में उडान भरते वायुयान ध्यान आकर्षित करते रहे, क्योंकि मुम्बई एयरपोर्ट की राह का एयर ट्रेफिक वाशी क्षेत्र के ऊपर से होकर गुजरता है। 
शुरु के दो दिन वाशी मंडी के नाम रहे। अगले दिन खाली समय में ठिकाने के पास के दर्शनीय स्थल - अक्सा बीच एवं कान्हेरी गुफाओं को एक्सप्लोअर करने का प्लान था, जिसका वर्णन अगली ब्लॉग पोस्ट में पढ़ सकते हैं। (जारी...) यात्रा के अगले भाग को आप आगे दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं - मेरी मुम्बई यात्रा, भाग-2

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