शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

छंट जाएगा सघन कुहासा



आएगी सुबह नवल सुहानी

प्रकृति की गोद में बैठ अंतस्थ, छेड़ तान तू मधुर सुहानी,
छंट जायेगा सघन कुहासा, आएगी सुबह नवल सुहानी।

बन हिमालय सा अडिग अविचल, गढ़ तू जीवन की नई कहानी,
हिमनद सा बहता चल अविरल, चीर हर बाधा रख चाल मस्तानी।

वृक्ष सा बन मौन धीर तपस्वी, नम्र विनीत राजहंस सा मनस्वी,
सीख मिटकर जीने की कला, बढ़ चल डगर जिसकी मंजिल रूहानी।

अखंड-दीप सी रखना लौ अदम्य अप्रकंपित, कौन रोक सका फिर रुत दीवानी,
पुष्प सा खिलना, चंदन सा महकना, कितना सफर, छोटी सी जिंदगानी।

कर्म में भरना मर्म कुछ ऐसे, छोड़ पीछे अपनी अमिट निशानी,
जब संग सर्वसमर्थ ईष्ट का वरदहस्त, आदिशक्ति माँ काली भवानी।

ज्ञानरूप सद्गुरू ह्द्यस्थ जब, गा ईश्वर के गीत नूरानी,
छंट जाएगा सघन कुहासा, आएगी सुबह नवल सुहानी।


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