शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

मेरी यादों का पहाड़ - झरने के पास, झरने के उस पार- भाग 1



 बचपन की मासूम यादें और बदलते सारोकार

जिंदगी का प्रवाह कालचक्र के साथ बहता रहता है, घटनाएं घटती रहती हैं, जिनका तात्कालिक कोई खास महत्व प्रतीत नहीं होता। लेकिन समय के साथ इनका महत्व बढ़ता जाता है। काल के गर्भ में समायी इन घटनाओं का अर्थ व महत्व बाद में पता चलता है, जब सहज ही घटी इन घटनाओं से जुड़ी स्मृतियां गहरे अवचेतन से उभर कर प्रकट होती हैं और वर्तमान को नए मायने, नए रंग दे जाती हैं। अक्टूबर 2015 के पहले सप्ताह में हुआ अपनी बचपन की क्रीडा-भूमि का सफर कई मायनों में इसी सत्य का साक्षी रहा।

याद हैं बचपन के वो दिन जब गांव में पीने के लिए नल की कोई व्यवस्था नहीं थे। गांव का नाला ही जल का एक मात्र स्रोत था। घर से आधा किमी दूर नाले तक जाकर स्कूल जाने से पहले सुबह दो बाल्टी या केन दोनों हाथों में लिए पानी भरना नित्य क्रम था। इसी नाले में दिन को घर में पल रहे गाय-बैलों को पानी पीने के लिए ले जाया करते थे। नाला ही हमारा धोबीघाट था। नाले की धारा पर मिट्टी-पत्थरों की दीवाल से बनी झील ही हमारा स्विमिंग पुल। गांव का वार्षिक मेला इसी के किनारे मैदान में मनाया जाता था। इसी को पार करते हुए हम कितनी बार दूसरे गांव में बसी नानी-मौसी के घर आया जाया करते थे। बचपन का स्मृति कोष जैसे इसके इर्द-गिर्द छिपा था, जो आज एक साथ जागकर हमें बालपने के बीते दिनों में ले गया था।

इसके पानी की शुद्धता को लेकर कोई गिला शिक्वा नहीं था। कितनी पुश्तें इसका जल पीकर पली बढ़ी होंगी। सब स्वस्थ नीरोग, हष्ट-पुष्ट थे। (यह अलग बात है कि समय के साथ सरकार द्वारा गांव में जगह-जगह नल की व्यवस्था की गई। आज तो गांव क्या, घर-घर में नल हैं, जिनमें नाले का नहीं, पहाड़ों से जलस्रोतों का शुद्ध जल स्पलाई किया जाता है)

इसी नाले का उद्गम कहां से व कैसे होता है, यह प्रश्न बालमन के लिए पहेली से कम नहीं था। क्योंकि नाला गांव में एक दुर्गम खाई भरी चढ़ाई से अचानक एक झरने के रुप में प्रकट होता था। झरना कहाँ से शुरु होता है व कैसे रास्ते में रुपाकार लेता है, यह शिशुमन के लिए एक राज था। बचपन इसी झरने की गोद में खेलते कूदते बीता। कभी इसके मुहाने पर बसे घराट में आटा पीसने के वहाने, तो कभी इसकी गोद में लगे अखरोट व खुमानी के पेड़ों से कचे-पक्के फल खाने के बहाने। और हाँ, कभी जायरु (भूमिगत जल स्रोत) के शुद्धजल के बहाने। झरने से 100-150 मीटर के दायरे में चट्टानों की गोद से जल के ये जायरू हमारे लिए प्रकृति प्रदत उपहार से कम नहीं थे। गर्मी में ठंडा जल तो सर्दी में कोसा गर्म जल। उस समय यहाँ ऐसे तीन चार जायरु थे। लेकिन अब एक ही शेष बचा है। सुना है कि बरसात में बाकी भी जीवंत हो जाते हैं।

झरना जहाँ गिरता था वहाँ झील बन जाती थी, जिसमें हम तैरते थे। लगभग 300 फीट ऊँचे झरने से गिरती पानी की फुआरों के बीच सतरंगी इंद्रधनुष अपने आप में एक दिलकश नजारा रहता था। झरने की दुधिया धाराएं व फुआरें यहां के सौंदर्य़ को चार चांद लगाते थे। गांव वासियों के लिए झरना एक पवित्र स्थल था, जिसके उद्गम पर झरने के शिखर पर वे योगनियों का निवासस्थान मानते थे व इनको पूजते थे, जो चलन आज भी पूरानी पीढ़ी के साथ जारी है।

आज हम इसी झरने तक आए थे। घर-गाँव से निकलने के दो दशक बाद इसके दर्शन-अवलोक का संयोग बना था। अखरोट के पेड़  में सुखते हरे कव्च से झांक रहे पक्के अखरोट जैसे हमें अपना परिचय देते हुए बचपन की यादें ताजा करा रहे थे। झरने में पानी की मात्रा काफी कम थी। लेकिन ऊपर से गिरती जलराशी अपनी सुमधुर आवाज के साथ एक जीवंत झरने का पूरा अहसास दिला रही थी। पता चला की पर्यटकों के बीच आज यह झरना खासा लोकप्रिय है। हो भी क्यों न, आखिर यह गहन एकांत-शांत गुफा नुमा घाटी में बसा प्रकृति का अद्भुत नाजारा आज भी अपने आगोश में दुनियां के कोलाहल से दूर दूसरे लोक में विचरण की अनुभूति देता है। ऊपर क्या है, पीछे क्या है, सब दुर्गम रहस्य की ओढ़ में छिपा हुआ, बालमन के लिए बैसे ही कुछ था, जैसे बाहुबली में झरने के पीछे के लोक की रहस्यमयी उपस्थिति।
................
झरने का घटता हुआ जल स्तर हमें चिंता का विषय लगा। इसका सीधा सम्बन्ध एक तरफे विकास की मार झेलते प्रकृति-पर्यावरण से है। पिछले दो दशकों में क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ है, जिसका इस नाले से सीधा सम्बन्ध रहा। याद हैं बचपन के वो दिन जब गांव के युवा अधिकाँश वेरोजगार घूमते थे। शाम को स्कूल के मैदान में सबका जमाबड़ा रहता था। बालीवाल खेलते थे, मस्ती करते थे। इसके बाद गावं की दुकानों व सड़कों पर मटरगश्ती से लेकिर शराब-नशे का सेवन होता था। कई बार मारपीट की घटनाएं भी होती थीं। गांव के युवा खेल में अब्बल रहते थे, लेकिन युवा ऊर्जा का सृजनात्मन नियोजन न होना, चिंता का विषय था। इनकी खेती-बाड़ी व श्रम में रुचि न के बरावर थी।

लेकिन इन दो दशकों में नजारा बदल चुका है। बीच में यहाँ सब्जी उत्पादन का दौर चला। तीन माह में इस कैश क्रांपिक से झोली भरने लगी। गोभी, मटर, टमाटर, गाजर-शलजम जैसी सब्जियों उगाई जाने लगी। इसके अलावा ब्रोक्ली, स्पाइनेच, सेलेड जैसी विदेशी सब्जियां भी आजमायी गईं।

सब्जियों की फसल बहुत मेहनत की मांग करती हैं। दिन रात इनकी देखभाल करनी पड़ती है। निंडाई-गुडाई से लेकर समय पर सप्रे व पानी की व्यवस्था। जल का एक मात्र स्रोत यह नाला था। सो झरने के ऊपर से नाले के मूल स्रोत से सीधे पाइपें बिछनी शुरु हो गईं। इस समय दो दर्जन से अधिक पाइपों के जाल इसमें बिछ चुके हैं और इसका जल गांव में खेतों की सिचांई के काम आ रहा है। स्वाभिवक रुप से झरने का जल प्रभावित हुआ है।

दूसरा सेब की फसल का चलन इस दौरान क्षेत्र में बढ़ा है। पहले जिन खेतों में गैंहूं, चावल उगाए जाते थे, आज वहाँ सेब के पेड़ देखे जा सकते हैं। कुल्लू मानाली घाटी की अप्पर वेली को तो हम बचपन से ही सेब बेल्ट में रुपांतरित होते देख चुके थे। लेकिन हमारा क्षेत्र इससे अछूता था। बचपन में हमारे गाँव में सेब के गिनती के पड़े थे। जंगली खुमानी भर की बहुतायत थी, जो खेत की मेंड़ पर उगी होती थी। धीरे-धीरे नाशपाती व प्लम के पेड़ जुड़ते गए। लेकिन आज पूरा क्षेत्र सेब के बागानों से भर चुका है, जिसके साथ यहाँ आर्थिक समृद्धि की नयी तिजारत लिखी जा रही है। इसमें जल का नियोजन अहम है, जिसमें नाले का जल केंद्रीय भूमिका में है। 

पाईपों से फल व सब्जी के खेतों में पानी के नियोजन से बचपन का झरना दम तोड़ता दिख रहा है। जो नाला व्यास नदी तक निर्बाध बहता था, वह भी बीच रास्ते में ही दम तोड़ता नजर आ रहा है। इस पर बढ़ती जनसंख्या, मौसम में परिवर्तन व विकास की एकतरफा दौड़ की मार स्पष्ट है। ऐसे में जल के बैकल्पिक स्रोत पर विचार अहम हो जाता है। उपलब्ध जल का सही व संतुलित नियोजन महत्वपूर्ण है। सूखते जल स्रोतों को कैसे पुनः रिचार्ज किया जाए, काम बाकि है। क्षेत्र के समझदार एवं जिम्मेदार लोगों को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे, अन्यथा विकास की एकतरफा दौड़ आगे अंधेरी सुरंग की ओर बढ़ती दिख रही है। ..(जारी..शेष अगली ब्लॉग पोस्ट में..)

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला (IIAS Shimla)

प्रकृति की मनोरम गोद में इतिहास को समेटे एक शोध केंद्र

शिमला की पहाडियों की चोटी पर बसा भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला का एक विशेष आकर्षण है, जो शोध-अध्ययन प्रेमियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। उच्चस्तरीय शोध केंद्र के रुप में इसकी स्थापना 1964 में तत्काकलीन राष्ट्रपति डॉ.एस राधाकृष्णन ने की थी। इससे पूर्व यह राष्ट्रपति भवन के नाम से जाना जाता था और वर्ष में एक या दो बार पधारने वाले राष्ट्र के महामहिम राष्ट्रपति का विश्रामगृह रहता था, साल के बाकि महीने यह मंत्रियों और बड़े अधिकारियों की आरामगाह रहता। डॉ. राधाकृष्णन का इसे शोध-अध्ययन केंद्र में तबदील करने का निर्णय उनकी दूरदर्शिता एवं महान शिक्षक होने का सूचक था।

आजादी से पहले यह संस्थान देश पर राज करने वाली अंग्रेजी हुकूमत की समर केपिटल का मुख्यालय था। सर्दी में कलकत्ता या दिल्ली तो गर्मिंयों में अंग्रेज यहाँ से राज करते थे और इसे वायसराय लॉज के नाम से जाना जाता था। अतः यह मूलतः अंग्रेजी वायसरायों की निवासभूमि के रुप में 1888 में तैयार होता है, जिसमें स्कॉटिश वास्तुशिल्प शैली को देखा जा सकता है। इसे शिमला की सात पहाड़ियों में से एक ऑबजरवेटरी हिल पर बसाया गया है।

मालूम हो कि शिमला में ऐसी सात प्रमुख पहाड़ियाँ हैं, जिन पर यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल बसे हैं। पश्चिमी शिमला का प्रोस्पेक्ट हिल, जिस पर कामना देवी मंदिर स्थित है। सम्मर हिल, जहाँ हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का कैंपस पड़ता है। ऑबजर्वेटरी हिल, जहाँ इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी स्थित है। इन्वेरार्रम हिल, जहाँ स्टेट म्यूजियम स्थित है। मध्य शिमला का बेंटोनी हिल जहाँ ग्राँड होटल पड़ता है। मध्य शिमला की जाखू हिल, जहाँ हनुमानजी का मंदिर स्थित है। यह शिमला की सबसे ऊँची पहाड़ी है, जहाँ हनुमानजी की 108 फीट ऊँची प्रतिमा लगी है, जिसके दर्शन शिमला के किसी भी कौने से किए जा सकते हैं, यहाँ तक कि रास्ते में सोलन से ही इसके दर्शन शुरु हो जाते हैं। और उत्तर-पश्चिम दिशा का इलायजियम हिल, जहाँ ऑकलैंड हाउस और लौंगवुड़ स्थित हैं।

शिमला की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक विशेषता, फ्लोरा-फोना सब मिलाकर इसको विशिष्ट हिल स्टेशन का दर्जा देते हैं। एडवांस्ड स्टडी के संरक्षित परिसर में इनके विशेष दिग्दर्शन किए जा सकते हैं। यहाँ देवदार के घने जंगल हैं। इनके बीच में बुराँश के सघन पेड़ लगे हैं, जो अप्रैल-मई के माह में सुर्ख लाल फूलों के साथ यहाँ के वातावरण की खुबसूरती में एक नया रंग घोलते हैं। इसके साथ जंगली चेस्टनेट के पेड़ बहुतायत में मिलेंगे, जिनके फूलों के गुच्छे सीजन में यात्रियों का स्वागत करते हैं। इनके बीच बाँज के वन तो यहाँ आम हैं। इन वृक्षों पर उछल-कूद करते बंदर लंगूरों के झुण्ड भी इस परिसर की विशेषता है। बंदर हालाँकि थोड़े खुराफाती जीव हैं, खाने पीने की चीजें देख छीना झपटी करना अपना अधिकार मानते हैं, जबकि लंगूर बहुत शर्मीला और शांत जीव है। जो झुँड में रहता है और किसी को अधिक परेशान नहीं करता। लम्बी पूँछ लिए इस जीव को एक पेड़ से दूसरे पेड़ में लम्बी छलाँग लगाते यहाँ देखा जा सकता है।

संस्थान प्रायः सर्दियों में दिसम्बर से फरवरी तक शोधार्थियों के लिए बन्द रहता है। बाकि समय इसके यहाँ कई तरह के शोध अध्ययन से जुड़े कार्यक्रम चलते रहते हैं। जिनमें एक माह का एशोसिएटशिप कार्यक्रम पीएचडी स्कोलर्ज के बीच लोकप्रिय है। इसके बाद एक से दो वर्ष का फैलोशिप प्रोग्राम, जिसमें यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्ज एवं अपने क्षेत्र के विद्वान लोग आते हैं। इसके साथ बौद्धिक गोष्ठियां, सेमीनार आदि यहाँ चलते रहते हैं, जिसमें अपने क्षेत्र के चुडान्त विद्वान एवं विषय विशेषज्ञ यहाँ पधारते हैं, बौद्धिक विमर्श होते हैं और विचार मंथन के साथ समाज राष्ट्र को दिशा देने वाली नीतियाँ तय होती हैं।

यहाँ का पुस्तकालय संस्थान की शान है, जो प्रातः नौ बजे से रात्रि सात बजे तक शोधार्थियों के लिए खुला रहता है। इसमें लगभग दो लाख पुस्तकें हैं और इसके साथ समृद्ध ई-लाइब्रेरी, जिसमें विश्वभर की पुस्तकों एवं शोधपत्रों को एक्सेस किया जा सकता है। जब पढ़ते-पढ़ते थक जाएं तो तरोताजा होने के लिए पास ही एक कैंटीन और एक कैफिटेरिया की भी व्यवस्था है। प्रकृति की गोद में बसा परिसर स्वयं में ही एक प्रशांतक ऊर्जा लिए रहता है, जिसमें टहलने मात्र से व्यक्ति तरोताजा अनुभव करता है। संस्थान की अपनी शोध पत्रिका सम्मर हिल रिव्यू है। यहाँ का अपना प्रकाशन भी है, जिसके प्रकाशनों का किसी भी बड़े पुस्तक मेले में अवलोकन किया जा सकता है।

परिसर में लाइब्रेरी के पीछे विशाल बाँज का पेड़ लगा है, जहाँ कभी कामना देवी का मंदिर था, जिसे अब पास की पहाड़ी में विस्थापित किया गया है। इसी के साथ दो भव्य मैपल पेड़ हैं, जो शिमला में रिज पर एक कौने में भी स्थित हैं। मौसम साफ होने पर इसके पास ही एक स्थान से दूर हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों का अवलोकन किया जा सकता है, जहाँ इनकी ऊँचाई व नाम भी अंकित है। इसी के नीचे बहुत बड़ा बगीचा और पार्क है। उसके पार खेलने का बंदोवस्त है, जहाँ एक इंडोर स्टेडियम है। उसके आगे अंडरग्राउण्ड जेल है, जहाँ गाँधीजी को कुछ दिन नजरबंद किया गया था।

इसके साथ यहाँ का अपना समृद्ध बोटेनिक्ल गार्डन है, जिसमें तैयार किए जा रहे फूलों के गमलों से पूरा परिसर शोभायमान और सुवासित रहता है। संस्थान में जल संरक्षण की बेहतरीन व्यवस्था है। मुख्य भवन की छत से गिरता बारिश का पानी सीधे छनकर लॉन के नीचे बने स्टोरेज टैंक में जाता है और इसका उपयोग फूलों, पौधों व लॉन की सिंचाई में किया जाता है।

रहने के लिए यहाँ परिसर में भव्य भवन हैं, जिनमें वेहतरीन कमरों की व्यवस्था है। भोजन के लिए पहाड़ी पर मेस है, जिसमें उम्दा नाश्ता, लंच और डिन्नर परोसा जाता है। यहीं आगंतुकों के लिए अतिथि गृह भी है। फिल्म देखने के लिए छोटा सा ऑडिटोरियम भी है। जरुरत का सामान खरीदने के लिए परिसर के नीचे बालुगंज में तमाम दुकानें हैं। यहाँ का कृष्णा स्वीट्स दूध-जलेबी के लिए प्रख्यात है। थोड़ी ही दूरी पर शिमला यूनिवर्सिटी है, जहाँ बस व पैदल मार्ग दोनों तरीकों से जाया जा सकता है। दोनों मार्ग घने देवदार, बुराँश व बाँज के जंगल से होकर गुजरते हैं।

यहाँ पर रुकने व अध्ययन के इच्छुक शोधार्थियों के लिए ऑनलाइन प्रवेश की सुविधा है। एक माह से लेकर दो साल तक इस सुंदर परिसर में गहन अध्ययन, चिंतन-मनन एवं सृजन के यादगार पल बिताए जा सकते हैं। हमें सौभाग्य मिला 2010,12 और 2013 में तीन वार एक-एक माह यहाँ रुकने का और अपने एसोशिएटशिप कार्य़क्रम पूरा करने का, जिसमें हमने अपने पीएचडी के विषय को गंभीरता एवं व्यापकता में एक्सप्लोअर किया। भारत भर से आए विद्वानों से चर्चा होती रही, फैलोज के साप्ताहिक सेमीनार में खुलकर भाग लिया और कई सारी नई चीजें सीखने को मिलीं। उस बक्त यहाँ के निर्देशक थे, प्रो. पीटर रोनाल्ड डसूजा, जिनके सज्जन एवं भव्य व्यक्तित्व, प्रखर विद्वता, बौद्धिक ईमानदारी, शोधधर्मिता एवं भावपूर्ण संवाद से हमें बहुत कुछ सीखने को मिला, जिसे समरण करने पर मन आज भी पुलकित हो उठता है।

चुनींदी पोस्ट

Travelogue - In the lap of Surkunda Hill via Dhanaulti-Dehradun

A blessed trip for the seekers of Himalayan touch Surkunda is the highest peak in Garwal Himalayan region near Mussoorie Hills wi...