मंगलवार, 31 मार्च 2026

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-5

 Coming soon...

मनाली से कुल्लू (via left bank)

 जल्द आ रहा है...

मेरा गाँव और मेरा देश - मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026)


धरती के लिए किसी वरदान से कम नहीं

जन्म स्थल पर यह वर्ष 2026 का पहला प्रवास था। सेमेस्टर ब्रेक दिसम्बर 2025 में जाने की योजना थी, जो कार्य की अति व्यस्तता के चलते टलते-टलते मार्च में ही संभव हो पायी। इसके पीछे भी कोई दैवीय विधान था, यह अंत में स्पष्ट होता है। पिछले तीन माह से बारिश नहीं हो रही थी, गर्मी का मौसम जैसे शुरु हो चुका था। फोन से पता चला कि घरों में तंदूर जलने बंद हो चुके थे, इसलिए ह्ल्की-फुल्की तैयारी के साथ घर जाता हूँ। मुख्य उद्देश्य अपने बुजुर्ग माता-पिता के दर्शन थे और साथ ही पारिवारिक मिलन भी।

हरिद्वार से हिमाचल पथ परिवहन निगम की अंतिम बस हरिद्वार बस स्टैंड से रात्रि आठ बजकर दस मिनट पर जाती है, इसी में चढ़ता हूँ। यह वाया देहरादून जाती है, जो आगे पौंटा साहिब, नाहन, काला अम्ब होती हुई पंचकुला, चण्डीगढ़ पहुँचती है। सफर सदैव की तरह खशनुमा रहा। बस में अधिक भीड़ नहीं थी। देहरादून में चाय आदि के लिए आधा घंटा रुकती है। फिर काला अम्ब में रात को पौने एक रात्रि भोजन के लिए बस रुकती है।

रात को तीन बजे चण्डीगढ़ बस पहुँचती है, सबारियों को बिठाते हुए फिर आगे पंजाब के मोहाली, रोपड़, कीरतपुर साहिब जैसे शहरों को पार करती है और हिमाचल में प्रवेश करती है। टनल से नया रुट बना होने के कारण स्वारघाट का पुराना व लम्बा रूट नहीं आता। सुरंग के पार बिलासपुर जिला आता है, इसमें सतलुज नदी को पार करते हुए सुबह छः बजे सुंदरनगर बस रुकती है, फिर नैरचौक से होते हुए सात बजे मंडी पहुँचती है।

यहाँ से आगे पंडोह डैम के आगे कई सुरंगों को पार करते हुए हम आउट पहुँचते हैं, फिर कुल्लू घाटी में प्रवेश होता है। पनारसा, बजौरा, भूंतर, शमसी, ढालपुर होते हुए सुबह नौ दस तक सरवरी कुल्लू बस अड्डा पहुँचता हूँ।


यहीं से लेफ्ट बैंक की बस पकड़कर दस बजे तक अपने गाँव-घर पहूंचता हूँ। इस तरह रात को सात बजे देसंविवि, हरिद्वार से शुरु हुआ सफर सुबह दस बजे पूरा होता है। कुल पंद्रह घंटे में घर पहुँचता हूँ।

हालाँकि मौसम विभाग ने अगले सप्ताह बारिश की चेतावनी दे रखी थी, इसी के अनुरुप अभिसिंचन के साथ हमारा गाँव में प्रवेश होता है। यहाँ की शीतल शुद्ध आवोहवा, खुशनुमा माहौल, चिरपरिचित खेत-खलिहान, बगीचे, आसमान छूते पहाड़, फिर घर, गांववासी और परिवारजन, सब बचपन की यादों को ताजा कर रहे थे।  

आज ही गांव के मेले स्यो जाच का अंतिम दिन भी था। बारिश के कारण यहाँ दिन के खेल व रात के सांस्कृतिक कार्यक्रम बाधित ही रहे, लेकिन देवकार्य यथासमय संपन्न होते रहे। मेले में पधारी भगवती दशमी वारदा एवं जुआणी महादेव के दुर्लभ दर्शन करते हुए उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दिन भर और रात को बारिश होती रही। ऊंचे पहाड़ों पर बर्फवारी का क्रम चल रहा था। रात्रि तापमान शून्य से नीचे था।

ऐसे लग रहा था कि हमारी सर्दी में यहाँ के मौसम को फील करने की दबी इच्छा जैसे प्रकृति माँ पूरा कर रही थी। घर में बंद पड़े तंदूर एक्टिवेट हो चुके थे, जिसके किनारे बैठने का अलग ही आनन्द रहता है। वास्तव में वहाँ बैठते ही बचपन से अब तक की अनगिन यादें झंकृत हो उठती हैं, जिसमें नानाजी, नानीजी, मामाजी सहित दादीजी, ताउजी एवं अनगिन परिवारजनों से हुए मिलन, संवाद आदि सहज ही चिकादाश में उमड़ पड़ते हैं।

फिर इस बार भतीजे सोहम की अपेंडिक्स सर्जरी के चलते गाँव भर से लोग मिलने के लिए आ रहे थे, सो कई परिचित लोगों से मिलन व नए चेहरों से परिचय का क्रम चलता रहा। क्षेत्रीय लोकजीवन, यहाँ के चल रहे घटनाक्रम, गाँव-घाटी के ज्वलंत मुददे, देव-संस्कृति से जुड़ी बातें सब चर्चा के विषय थे।

अगले पाँच दिनों लगातार बारिश होती रही, ऊँचे पर्वतों में तो बर्फवारी शुरु हो गई थी, चारों ओर पर्वत घाटी ने जैसे सफेद बर्फ का श्रृंगार कर लिया था।


लगा जैसे प्रकृति माँ की विशिष्ट उपहार अपनी आकुल संतानों के लिए दिल खोल कर लूटा रही हों। एक दिन तो घर-गाँव में भी बर्फ का आगाज होता है, लेकिन मात्रा कम होने के चलते यह टिक नहीं पाती। चारों ओर हिमशिखरों में बर्फ जमने के कारण घाटी में रात का तापमान माइनस में जाता रहा। दिन का तापमान 3-5 डिग्री सेल्सियस तक रहा। सो घर में एक्टिव तंदूर के चलते तंदूर से गर्म कमरे में पारिवारिक मिलन व संवाद का क्रम चलता रहा।

मालूम हो कि तंदूर कक्ष हिमालच के पहाड़ी इलाकों में सर्दी का एक बहुत बड़ा आश्रय-स्थल रहता है, जहाँ का गर्माहट भरा कोजी वातावरण एक अलग ही भावलोक में विचरण की अनुभूति देता है। सर्दी में ठिठुरते जीवन को एक अलग ही सुख व आनन्दमयी संसार में विचरण का आलौकिक अहसास दिलाता है।

इसी बीच बारिश कम होने के कारण एक दिन जिला पुस्तकालय, कुल्लू भी चले गए, जहाँ पर क्षेत्रीय जीवन एवं साहित्य पर लिखी पुस्तकों का अवलोक किया। हमारी खोज कुल्लूत देश की कहानी थी, जिसकी एक ही प्रति संदर्भ कक्ष में थी और आज छुट्टी होने के नाते हमें यह उपलब्ध न हो सकी। इसी के साथ हमने देव भारथा और कुल्लू के शान लालचंद्र प्रार्थीजी पर एक (मात्र) पुस्तक इश्यू की। पुस्तकालय में पाठकों का तांता लगा था, अधिकाँश लगा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष कक्ष में अध्ययनरत थे। कुछ समाचार कक्ष में अखबार एवं पत्रिकाओं को बाँच रहे थे। कुछ बाहर कैफिटेरिया में यार-दोस्तों के साथ रिलेक्स हो रहे थे।

पुस्तकालय में विषय की तमाम पूस्तकें उपलब्ध हैं, हमारी खोज क्षेत्र के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अतीत की थी, जिस पर अधिक शोधपरक सामग्री नहीं मिली। इस विषय पर लालचंद प्रार्थी जी के ऐतिहासिक कार्य़ (कुल्लूत देश की कहानी) की तक एक प्रति काफी आग्रह के बाद संदर्भ कक्ष में उपलब्ध हो पायी है। ऐसे में युवा पीढ़ी अपने इतिहास व संस्कृति से कैसे परिचित होंगे, सोचने का विषय है। हमारा अपनी रुचि के अनुरुप इस विषय पर अपने ढंग से शोध-अनुसंधान जारी है।

इसी तरह हमारे पूर्वजों के इतिहास के संदर्भ में हम अधिक दूर नहीं जा पाते, अपने घरों में ही पारिवारिक इतिहास पर चर्चा करें, तो चार-पाँच पीढी से पीछे नाम नहीं बता सकते। उनका विस्तार तो और भी नहीं। इस संदर्भ में इस बार हम अपनी वंदनीया माताजी का सहज-स्फुर्त प्रयास देखकर चकित हो गए। वे परिवार की सात पीढियों का पूरा हिसाब-किताब कागज पर लिख कर बैठी हैं। इसी क्रम में घाटी में सेब व फलों के प्रवेश की गाथा पिताजी से चर्चा करने पर स्पष्ट हुई, जिसको अगले किसी ब्लॉग में प्रस्तुत करुँगा।

दो घंटे में पुस्तकालय से बाहर निकलने पर देखा ह्ल्की-हल्की बारिश हो रही है, जो हमें देव अभिसिंचन जैसे फील दे रहा था। ढालपुर मैदान को बैसे भी ठारा करड़ू की सोह कहा जाता है। लगा जैसे हमारे नेक इरादों को देव आशीष मिल रहा है।


पूरी घाटी ईधऱ-ऊधर उड़ते अवारा बादलों के फाहों से साथ ढकी हुई थी, दायीं ओर सूदूर बिजली महादेव तो मानाली की ओर सेऊबाग-गाहर साइड के पहाड़ और सामने खराहल घाटी सभी बादलों के सघन आच्छादन से ढके हए बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। आज दोपहर तक बारिश से कुछ राहत रही थी, लेकिन शाम से फिर इसका अनवरत क्रम प्रारम्भ होता है।

इस बार की चार-पाँच दिनों की बारिश-बर्फवारी फसल व फलों के हिसाब से किसी वरदान से कम नहीं थी। ऊँचे पहाड़ों में बर्फ की मोटी परत जमने से घाटी के नाले दनदनाते हुए व्यास नदी की जलराशि को समृद्ध कर रहे थे। निसंदेह रुप में गर्मी के आने वाले मौसम में घाटी के घर-गाँव में इससे जल की उचित व्यवस्था हो सकेगी, जो हर गर्मी में एक विकट समस्या रहती है।

19 मार्च के दिन नव संवत्सर का पर्व था। इसमें कुल पुरोहित घर-घऱ जाकर नए वर्ष की पत्री वाँचते हैं, इसी क्रम में युवा पंडित जोगिंद्रजी से मुलाकात हुई। पता चला कि नए संवत का नाम रौद्र है, इसके राजा गुरु, मंत्री मंगल हैं आदि। विभिन्न राशियों का लेना-देना व धर्म-अधर्म की स्थिति तथा विभिन्न घटनाओं के प्रतिशत आदि से परिचित हुए। साथ ही घाटी की देवपरम्परा पर कुछ सार्थक चर्चा भी हुई।

इस तरह मार्च 2026 में एक सप्ताह का संक्षिप्त प्रवास कई सुखद स्मृतियों को बटोरने का संयोग रहा। दीर्घकालीन संयम व प्रतिक्षा का मीठा फल जैसे इन सुखद अनुभूतियों के रुप में मिल रहा था। बारिश, बर्फवारी के बीच ठंड व तंदूर के आसपास लोकजीवन की बचपन की यादें सब जीवंत हो रहीं थीं व गहन-गंभीर मंथन के साथ इस शेष बचे नश्वर जीवन के सार्थक नियोजन की रुपरेखा ओर स्पष्ट हो रही थी।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जीवन गीत

हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए

 


हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए,

धर्म-मर्यादा संग इंसानियत को स्थान मिलना चाहिए।1

आदर्श सिद्धान्तों की बातें अच्छी,

व्यवहारिक धरातल का भी अहसास होना चाहिए।2

 

काम बनें या बिगड़े, या थोड़ी देर में होते हैं पूरे,

आपसी प्यार-सद्भाव-भाईचारा बना रहना चाहिए।3

नहीं कोई परमहंस इस रंग बदलती दुनियाँ में,

मानवीय दुर्बलताओं के प्रति उदार भाव रहना चाहिए।4

 



       नहीं संत बनता यहाँ कोई एक दिन में इस धरा पर,

सुधरने का मौका सबको मिलता रहना चाहिए।5

अपनी मूढ़ता की आँधी में हो सवार कोई अगर,

तो उस लाइलाज मर्ज़ का उपचार होना चाहिए।6

 

नहीं समाधान मर्ज का अपने हाथ में को,

 इस सृष्टि के मालिक पर छोड़ देना चाहिए।7

हर व्यक्ति जिम्मेदार है अपने चिंतन व कर्म के लिए,

अपने कर्तव्य के प्रति सबको ईमानदार-जिम्मेदार रहना चाहिए।8

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग 4

पितर : हमारे शुभचिन्तक सच्चे मार्गदर्शक

पितर आत्माएँ देव सत्ता का ही पर्याय कही जा सकती हैं। वे समय समय पर जीवित अवस्था की ही तरह सेवा सहायता कर अपना धर्म निबाहती रहती हैं। भले ही ऐसी परोक्ष सहायता को दैवी अनुदान नाम दे दिया जाय, पर एक तथ्य तो अटल है ही कि वे श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा सुपात्रों को ही मिलते हैं।

अनेक सिद्ध पुरुष अपने दूरस्थ शिष्यों को अपनी सूक्ष्म सत्ता से प्रत्यक्ष मदद पहुँचाते हैं। प्रसिद्ध आर्य समाजी सन्त स्व० श्री आनन्द स्वामी के पुत्र लेखक-पत्रकार श्री रणवीर ने अपने संस्मरण-लेख में यह बताया था कि किसी प्रकार उनके पिता ने उन दिनों, जबकि वे जीवित थे और भारत में थे तथा रणवीर विदेश में प्रवास पर थे, एक बार भयानक खड्डे में गिर पड़ने से चेतावनी देकर उन्हें रोका था। अन्य कई अवसरों पर भी उनकी मदद व मार्गदर्शन का कार्य उनके पिता ने किया था। जबकि वे उस समय उनसे सैंकड़ों मील दूर हुआ करते थे।

विकसित आत्म सामर्थ्य के ये लाभ सिद्ध पुरुषों द्वारा आत्मीय जनों को अनायास ही पहुँचाए जाते रहते हैं। यही स्थिति पितरों की है। ऐसी शरीरी अशरीरी उच्च आत्माओं के प्रति श्रद्धा-भाव रखना उचित भी है और आवश्यक भी।

अधिक उच्चकोटि की पितर आत्माएँ तो जीवित महामानवों-महायोगियों की तरह ही उदात्त होती हैं। उनके लिए अपने-पराए जैसा कोई भेदभाव होता ही नहीं। जहाँ भी आवश्यकता एवं पात्रता दिखी, वहीं उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं। जरूरत उनके अनुकूल बनने, उत्कृष्ट जीवन और प्रगाढ़ श्रद्धा-भाव अपनाने से होती है।

मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है। परिपक्व मृत्यु होने पर चेतना कुछ समय के लिए विश्राम में चली जाती है। जिस प्रकार दिन भर का थका माँदा व्यक्ति प्रगाढ निद्रा में सो लेता है तो उसे फिर से नयी ताजगी मिल जाती है, उसी प्रखार मृत्यु के बाद जीवन की अवस्था के अनुरूप वह दो माह से दो वर्ष तक विश्राम ले लेने के फिर से नयी ताजगी मिल जाती है. उसी प्रकार मृत्यु के बाद जीव की पश्चात् नया जन्म धारण कर लेता है। पर कई बार नींद पूरी तरह नहीं आती। अफीमची और शराबी लोगों की नींद उखडी उखडी होती है। ऐसे लोगों को मृत्यु के समय भी पूरी नींद नहीं आती और वे नया जन्म लेने पर भी थके-थके से अस्त-व्यस्त होते है। जिन्हें नींद पूरी आ जाती है और जिनके मन शुद्ध और पवित्र होते हैं, वे अन्य जन्मों में बाल्यावस्था से ही पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ दोहराने लगते हैं।

जिनकी इन्द्रिय वासनाएँ प्रबल होती हैं या जिनकी मृत्यु हत्या या आत्महत्या जैसी होती है वे एक प्रकार से निचोड़े गये शहद की भाँति होते हैं। शहद का छत्ता काटकर रख दिया जाये तो उसका शहद अपने आप टपक आता है। वह नितान्त शुद्ध होता है पर निचोड़े जाने पर उसमें मोम आदि का अंश भी आ जाता है, उसी प्रकार ऐसी मृत्युओं में स्थूल अवयव भी बने रहते है। ऐसी ही आत्माएँ प्रेत, पिशाच, भूत, बैताल, किन्नर और यक्ष होते हैं। यह मरघट, अपने शवों तथा जिनके प्रति उनकी स्वाभाविक आसक्ति होती है, उनके पास घूमते आते जाते भी रहते हैं, पर जिनके शरीर में आग्नेय-अणु अधिक होते हैं, उनके पास इस तरह की गन्दी आत्मायें नहीं जा पाती हैं और जब नींद टूटती है तो वे अपनी आसक्ति के अनुरूप निम्न गामीयोनियों में चले जाते हैं।

विश्राम के बाद देव आत्मायें या जिनकी गति ऊर्ध्वमुखी-अच्छे कामों में रही होती है, जिनके शरीरों का आणविक विकास प्रकाश पूर्ण हो गया होता है, वे दिव्य लोगों को चली जाती हैं और जब तक वहाँ रहने की इच्छा होती है तब तक रहती हैं। पीछे इच्छानुसार अच्छे घरों में जन्म लेकर लोकसेवा पुण्य परमार्थ और नेतृत्व आदि उत्तरदायित्व सम्भालती हैं, पर जिनका मन अशुभ संस्कारों वाला रहा होता हैं, वे अधोगामी लोकों में रहकर निम्नगामी योनियों में चले जाते हैं। इस प्रकार संसार में गुण कर्म का यह प्रवाह, प्रकृति की जटिलता के समान स्वयं भी जटिल रूप में चलता रहता है।

पितर आत्माएँ वे हैं जिनकी ऊर्ध्वमुखी गति होती है। वे कई बार विश्राम की अवधि में कुछ लम्बे समय तक भी रही आती हैं। उस अवधि से वे स्वयं तो प्रकाशपूर्ण वातावरण में रहते ही हैं, दूसरे स्वजनों या जिनके प्रति उनके मन में आकर्षण होता है, उनको भी समय-समय पर प्रकाशपूर्ण मार्गदर्शन एवं अनुग्रह अनुदान देते रहते हैं।

पितरों की दैवी सहायता एवं ममत्व भरा मार्गदर्शन-

श्री लेडबीटर अपनी पुस्तक "इनविजिबल हेल्पर्स" में ऐसे अनेकों उदाहरण देते हैं, जिससे सावित होता है कि सत्संस्कार सम्पन्न पितर आत्माऐं भी आत्मीयों से सम्पर्क की इच्छुक रहती हैं। और सत्परामर्श एवं विवेकपूर्ण मार्गदर्शन देकर सच्चे सात्विक अनुराग का परिचय देती रहती हैं।

 थियोसाफी के जाने माने परोक्ष विद्या के अन्वेषणकर्त्ता सी० डब्ल्यू० लेडवीटर आजीवन मरणोत्तर जीवन पर अनुसंधान में निरत रहे। अपने शोध ग्रंथों में उन्होंने लिखा है कि उच्चतर लोकों में क्रियाशील अशरीरी पितर-सत्ताएं सुपात्र लोगों को सहायता देने के लिए सदैव जागरुक रहती हैं। निर्दोष बच्चों तथा सज्जनवृत्ति के लोगों को संकट के समय में ये पितर-सत्ताएं आकस्मिक सहायता प्रदान करती हैं और विपत्तियों के पहाड़ के नीचे दबने पर भी बालबाँका नहीं होता। इस तरह पित्तरों की दैवीय सहायता एवं परोक्ष मार्गदर्शन सत्पात्रों को मिलता रहता है। (जारी...)

साधु संग


अन्तरात्मा की आवाज सुनें

अन्तरात्मा के जिज्ञासु को चाहिये कि वह मन के कोलाहल की ओऱ से कान बन्द कर अन्तरात्मा का निर्देश सुनने और पालन करने लगे, निश्चय ही उस दिन से यथार्थ सुख-शांति का अधिकारी बन जायेगा। जिज्ञासा की प्रबलता से मनुष्य के कान उस तन्मयता को सरलता से सिद्ध कर सकता है। आत्मा मनुष्य का सच्चा मित्र है। वह सदैव ही मनुष्य को सत् पथ पर चलने और कुमार्ग से सावधान करने की चेतावनी देता रहता है, किन्तु खेद है कि मनुष्य मन के कोलाहल में खोकर उसकी आवाज नहीं सुन पाता। किन्तु यदि मनुष्य वास्तव में उसकी आवाज सुनना चाहे तो ध्यान देने से उसी प्रकार सुन सकता है, जिस प्रकार बहुत सी आवाजों के बीच भी उत्सुक शिशु अपनी माँ की आवाज सुनकर पहचान लेता है।                      - पं.श्रीराम शर्मा आचार्य


                                समाधि के सोपान

वत्स, प्रभु को पुकारो! सदैव प्रभु को पुकारो!! उनके और केवल उनके विषय में ही विचार करो और वह असीम शक्ति तुम्हारे चारों ओर एकत्र हो जायेगी तथा अनन्त प्रेम तुम्हारा आलिंगन करेगा। तथा प्रभु तुम्हारी आत्मा में अनुभव की वाणी बोलेंगे।

भगवान पर सच्ची निर्भरता सभी कठिनाइयों को दूर कर देती है। व्यक्ति-निर्माण की सच्ची प्रक्रिया परम प्रेम के प्रति पूर्ण समर्पण में है, यह अबाध ध्यान में प्रगट होती है। जब जीवन मिथ्या प्रतीत होता है, जब मृत्यु उपस्थित होती है, जब पीड़ा से हृदय ऐंठता है, तथा मनुष्य का संताप चूड़ान्त हो उठता है, तुम स्मरण रखने की चेष्टा करो, स्मरण रखो कि यह सब बातें शरीर की हैं; तुम आत्मा हो। प्रत्येक दिन को इस प्रकार ग्रहण करो मानो यह जीवन का अंतिम दिन है। जीवन के प्रत्येक क्षण में जप करो। प्रतिदिन अपना जीवन भगवान के चरणों में समर्पित कर दो। उनकी इच्छा की सर्वज्ञता को देखो, और तब बाघ के मुँह में भी, मृत्यु की उपस्थिति में भी, नरकद्वार में भी तुम ईश्वर को प्राप्त करोगे।

और यदि प्रभु का स्मरण ही तुम्हारा जीवन-श्रम हो तो एक महान् आनंद तथा निर्विकार शांति तुम्हें प्राप्त होगी; तथा जो बीभत्स लगता था, वह सुन्दर प्रतीत होगा और जो भयंकर लगता था वह सर्वप्रेममय प्रतीत होगा। और तब उस सन्त के साथ जिसने नाग द्वारा डसे जाने पर कहा था देखो, देखो, मेरे प्रीतम का संदेशवाहक आया है, तुम भी वही कहोगे; या उस सन्त के समान जिसने बाघ के मुँह में भी कहा था, शिवोऽहम् ! शिवोऽहम् ! तुम भी कहोगे, शिवोऽहम् ! शिवोऽहम् ! यही आत्मा की शक्ति है। यही वास्तव में उसका प्रगटीकरण है। यही दिव्यता का भाव है क्योंकि यही दिव्यता का दर्शन है।

मातृभूमि की रक्षा के लिए योद्धा तोप के मुँह में दौड़ जाता है। माँ अपने बच्चे की प्राणरक्षा के लिए अग्नि में दौड़ जाती है, गहरे जल में कूद पड़ती है, बाघ के मुँह में समा जाती है। मित्र अपने मित्र के लिए प्राण दे देता है। संन्यासी अपने आदर्श के लिए सभी प्रकार के कष्ट सहता है। तुम भी सभी प्रकार की कसौटियों को सहो, विपत्तियों का सामना करो, आदर्श का जीवन जीओ तथा ईश्वर के नाम पर निर्भीक बनो। तुम मेरे पुत्र हो। जीवन या मृत्यु में, पुण्य या पाप में, सुख या दुःख में, भले या बुरे में, जहाँ भी तुम जाओ, जहाँ भी तुम रहो, मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। क्योंकि मैं तुमसे बँधा हुआ हूँ। ईश्वर के प्रति मेरा प्रेम मुझे तुम्हारे साथ एक कर देता है। मैं तुम्हारी रक्षा करता हूँ। मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ। मैं तुम्हारी आत्मा हूँ। वत्स ! तुम्हारा हृदय मेरा निवास स्थान है। (पृ.16-17)

अपरिग्रह की संतान बनो। पवित्रता की तीव्र इच्छा जागृत करो! काम कांचन ही सांसारिकता के ताने बाने हैं। इन्हें अपने स्वभाव से निर्मूल कर दो। इनकी सभी प्रवृत्तियों को विषवत् समझो। अपने स्वभाव से सभी मलिनताओं को निकाल फेंको। अपनी आत्मा की सभी अपवित्रताओं को धोकर साफ कर डालो। जीवन जैसा है, उसे उसी रूप में देखो और तब तुम समझ पाओगे कि यह माया है। यह न तो अच्छा है और न ही बुरा। किन्तु यह सर्वथा त्याज्य वस्तु है, क्योंकि यह शरीर तथा शरीरबोध से ही उत्पन्न होता है। अपने उच्च स्वभाव के प्रत्येक शब्द को ध्यान पूर्वक सुनो। अपनी आत्मा के प्रत्येक सन्देश को आग्रहपूर्वक पकड़ो। क्योंकि आध्यात्मिक अवसर एक अत्यन्त विरल सुयोग है तथा जब यह आध्यात्मिक वाणी मन के मौन में प्रवेश करती है उस समय यदि तुम इन्द्रिय-लिप्साओं में व्यस्त रहो और इसे न सुनो तो तुम्हारा व्यक्तित्व उन आदतों के पंजे में पड़ जायेगा जो तुम्हारे विनाश के कारण होंगे।

तुम्हारे लिए मेरा केवल एक ही सन्देश हैः- स्मरण रखो कि तुम आत्मा हो। तुम्हारे पीछे शक्ति है। निष्ठावान होना मुक्त होना है। अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकार के प्रति प्रमाणिक रहो, क्योंकि प्रमाणिक होना मुक्त होने के समान है। तुम्हारा प्रत्येक पद आगे बढ़ने की दिशा में ही हो तथा जैसे जैसे तुम जीवन के राजपथ में बढ़ते जाओगे, वैसे वैसे ही तुम अधिकाधिक अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करते जाओगे। यदि तुम्हारे पीछे प्रामाणिकता है तो तुम सभी व्यक्तियों का सामना कर सकते हो। स्वयं के प्रति ईमानदार बनो तब तुम्हारे शब्द सत्य की ध्वनि से गुंजित होंगे, तुम अनुभूति की भाषा बोलोगे तथा तुम वह शक्ति प्राप्त करोगे, जो दूसरों को भी पूर्ण बना देगी। (पृ.32)

शनिवार, 31 जनवरी 2026

मेरा गाँव मेरा देश: प्राकृतिक फ्लोरा-फोना संग यादें बचपन की

                                                   गाँव का फ्लोरा-फोना और जैव-विविधता

यहाँ चर्चा हो रही है गाँव के फ्लोरा-फोना की, अर्थात् वनस्पति, जीव-जंतु आदि की, जो बचपन में हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे। जिनसे बचपन की कई यादें जुड़ी हुई हैं और बदलते समय के साथ इनके भौतिक स्वरुप व अस्तित्व में आए परिवर्तन के साथ इन भावों का झंकृत होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत है इसी का लेखा-जोखा, जिससे उस दौर से गुजरे लोग भली-भाँति स्वयं को जोड़ सकते हैं और हिमालय की जैव-विवधता रुचि रखने वाले सुधी पाठक भी इस परिवर्तन में निहित शाश्वत तत्व को ह्दयंगम कर अपना ज्ञानबर्धन कर सकते हैं।

गाँव व इलाके के प्राकृतिक फल व सब्जियाँ - बचपन के दौर में घर-गाँव में सबकुछ प्राकृतिक रुप में उपलब्ध होता था, अपने खेत व क्यारियों में आवश्यकता की सब्जी-भाजी व तरकारियाँ उग आती थीं। भिंडी, टमाटर, खीरा, कद्दु, लौकी, घिया, करेला, वैंगन आदि सब घर की ही क्यारियों, आंगन व छत पर उगते थे। मौसमी सरसों का साज सीजन में सहज ही खेतों में उपलब्ध रहता। ये सब अपने साथ दूसरों के भी काम आते थे। जरुरत से अधिक हुए तो पड़ोसी, रिश्तेदारों के साथ इनका आदान-प्रदान चलता था। बाज़ार से इनको खरीदने का तब कोई चलन नहीं था।

कभी घर के बड़े-बुजुर्ग बाज़ार गए तो कुछ विशेष सब्जियाँ व फल ही वहाँ से खरीदते, जो घरों में नहीं उगते थे। जैसे आलू, प्याज आदि से लेकर केला, आम, पपीता जैसे फल।

जंगल व वनक्षेत्र भी कुछ विशिष्ट सब्जियों व वनस्पतियों के उर्बर स्रोत रहते। लिंगड़ी इसमें प्रचलित थी, जो आज भी जंगल में नमी व छायादार स्थानों पर बहुतायत में मिल जाती है। 


इससे सब्जी से लेकर आचार बनता। खेत के मेढ़ों में देसी आढू व विदाना के पेड़ों से तोड़े फलों से आढ़ू-विदाना का आचार बनता, जिसका कोई सानी नहीं रहता। इनके साथ बिच्छू बूटी की मुलायम पत्तियों की सब्जी व चटनी भी नाश्ते का हिस्सा बनती। 
 

यहाँ गुच्छी का नाम लिए बिना चर्चा अधूरी रहेगी। फरवरी-मार्च माह में खेतों के किसी कौने में या जंगल में गुच्छी के झुंड मिलते। इसे विश्व की सबसे पौष्टिक और मंहगी सब्जी माना जाता है। यह कैसे व कब जंगल में उगती है, यह लम्बे समय तक एक पहेली रही है, हालाँकि अब कुछ वैज्ञानिक इसे प्रयोगशाला में तैयार करने की बात करने लगे हैं। 


सुबह-सुबह पुराने सेब-जापानी के पेड़ के नीचे ओंस भरी घास से झांकते गुच्छी के दर्शन रोमाँचित करते। फिर थोड़ा बड़ा होने पर ही इनको तोड़ते।

खेतों में ही मेढ़ों पर उगे शहतूत, अंजीर जैसे फलदार पेड़ बच्चों के लिए मौसम का फल सावित होते। इसके साथ काली और लाल रंग की आंछा (झाडियों में उगने वाली जंगली बैरी), शांभल (किल्मोड़ा) के खट्टे-मीठे बेंगनी दानेदार फल व जंगली दाडू (अनार) भी दोपहर को भूख लगने पर नाश्ता बनते, जब गाय व भेड़ों के साथ हम ग्वाल धर्म निभाते जंगल जाते। शेगल के पके काले फल भी चीकू से कम स्वादिष्ट नहीं रहते थे। जंगल में ये बंदर, लंगूर व भालू का प्रिय आहार रहते। 

घर में जैविक रुप से परम्परागत गैंहू, धान, मक्का, जौ आदि अन्न उगाए जाते। गाय का गौबर उर्बरक के रुप में काम आता। हालांकि धीरे-धीरे रसायन खाद का चलन भी हमने बढ़ते देखा। दाल में अपने ही खेत में माष, राजमाष, सोयावीन, चना, मूँग, मसूर, रोंगी जैसी फसलें घर की आवश्यकता को पूरा करती।

तिल की फसल भी बचपन में होती, जिसका तेल तैयार होता। खिचडी के साथ इसका बहुत जायकेदार कम्बिनेशन रहता। तिल की चटनी का उपयोग भटूरे व सिड्डू में होता। इसके सूखे लट्ठों को जलाकर दिवाली की सर्द रातों में जलाते, जिसका आनन्द दीपपर्व के उत्सव में एक नया ही रंग घोलता था। सरसों की खेती के संग पीले रंग से अटे खेत एक अलग ही नज़ारा पेश करते। बागवानी के बढ़ते चलन के कारण अब ऐसे दृश्य कम ही रह गए हैं।   

मोटे अनाज में कोदरा, चीणी, काउणी, टाक, सरयारा (रामदाणा) की फसलें हमने घर में ही उगती देखी। सरयारा से तैयार होने वाली धाणा व फैंबड़ा (नकमीन खीर) का स्वाद नहीं भूल सकते। पूर्वजों द्वारा उगाए जाने वाले ये मोटे अनाज धीरे-धीरे लुप्त होते गए। जैसे-जैसे बागवानी का चलन बढता गया, सब्जियों में केश क्रॉप का चलन शुरु हुआ, किसानों का ध्यान अर्थ उपार्जन में अधिक हो चला व पारंपारिक विरासत का संरक्षण-संवर्धन कहीं पीछे छूटता गया।

इसी क्रम में ब्रौकली, सेलरी, पक्चोई, जुग्नी, स्कवैश जैसी एग्जोटिक सब्जियों का चलन बढ़ता चला। 


इसी के साथ टमाटर, फूलगोभी, बंद गोभी आदि का उत्पादन अपनी आवश्यकता तक सीमित न होकर, नकदी फसल (केश क्रोप) के रुप में होने लगा। यह किसानों के आर्थिक स्वावलम्बन की दृष्टि से आवश्यक भी था, लेकिन इनके साथ सब्जियों से जुड़ा प्राकृतिक एवं जैविक स्वाद पीछे छूटता गया। रसायन से लेकर कीटनाशकों को बहुतायत में छिड़काव होने लगा।

आज बचपन की यादों का वह प्राकृतिक जीवन स्मृतियों की गोद में दबा पड़ा है और थोड़ा कुरेदने पर भावुक एवं रोमांचित करता है और दुबारा उसे जीने का भाव जगाता है। हालाँकि किचन गार्डनिंग के रुप में उस चलन को दुवारा शुरु किया जा सकता है। लेकिन समय का प्रभाव तो घटनाओं व परिस्थितियों पर स्पष्ट है। 

गाँव व इलाके के जीव-जंतु - गाँव व इलाके के जीव-जंतुओं की चर्चा किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। घर में पाले गए कुत्ते, बिल्ली, भेड-बकरियाँ व गाय-बैल तो परिवार का अनिवार्य हिस्सा रहते। कुछ समय मुर्गियों के पालन को भी देखा। धीरे-धीरे भेड़-बकरियों का चलन कम होता गया। फिर टिल्लर मशीन आने से बैल भी दुर्लभ होते हुए। अब गाय पालन शेष बचा है। उससे भी कई लोग अब गुरेज करने लगे हैं व दूध खरीद कर आवश्यकता पूरा कर रहे हैं।

घर-आंगन में सबसे रोचक पक्षियों में गौरेया व मैना रहते। 


गौरेया झुंडों में फुदकते व चहचहाते हुए वातावरण में एक रौनक लाए रहती। खास कर धान के टूहके के पास ये झुंडों में दाना चुगती और हम इनको पकड़ने का असफल प्रय़ास करते। आज गौरेया के दर्शन दुर्लभ हो चले हैं ऊँचाई वाले गाँवों में ही इनके दर्शन किए जा सकते हैं, वहीं मैना आज भी बैसे ही घर की शोभा बढ़ा रही हैं।

कौआ तो सदावहार पक्षी रहा है। सर पर कल्गी धारी पिक्लटूरु भी अपना दर्शन देते थे। उपउपड़े अपनी मधुर हुपहुप ध्वनि के कारण एक नई मिठास घोलते, जिनके दर्शन अब दुर्लभ हो चले हैं। इसी तरह वसंत में पहाड़ी कोयल कुप्पू चिडिया अपनी मीठी व सुरीली आवाज से एक मंगलमयी रस बिखेरती। जो आज भी जारी है। घूघती का अपना ही जल्बा रहता, जो बिजली की तार पर जोड़ें में शोभायमान रहती। फलों के सीजन में तोतों की मौज रहती, जो झुंडों में एक बगीचे से दूसरे बगीचे में उड़ान भरते रहते। उल्टा कौआ (चमगादड़) भी बाल मन के लिए एक कौतुक का विषय रहते, क्योंकि दिन में इनके दर्शन नहीं होते थे और रात को खाली हवा में उड़ते दिखते और बगीचों में फलों का भक्षण करते। 

खेत के कौनों में तीतर की तिरक-तिरक-तितरी आवाज भी सभी का ध्यान आकर्षित करती। कड़ेशे (जंगली मुर्गे) जंगल व खेतों में जहाँ-तहाँ मिलते, जो आज भी बहुतायत में पाए जाते हैं। जंगल की शान मोनाल पक्षी के बारे में सुनते थे, लेकिन उसकी सुंदर एवं सतरंगी कलगी के लिए शिकार के चलते आज उसका अस्तित्व संकट में है तथा उसके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। ऐसे ही चकोर पक्षी भी शिकार के कारण दुर्लभ हो गए हैं। सफाई करने वाले गडिल्ण (गिद्ध) पक्षी भी आज दुर्लभ श्रेणी में आ गए हैं। 

जंगलों में गीदड़, तेंदुआ, बाघ, भालू आदि की चर्चा बचपन में होती, जिनके प्रत्यक्ष दर्शन दुर्लभ थे। रात को गीदड़ों के चिल्लाने की आवाजें गाँव के कुत्तों को चौकन्ना कर देती। तेंदुए व बाघ के दर्शन तो दुर्लभ ही रहे। हाँ भालूओं से जुड़ी घटनाओं को किवदंतियों के रुप में अपने बुजुर्गों से सुनते। जंगल में जाने पर भालुओं द्वारा खोदी जमीं के दर्शन प्रायः होते रहे। बर्फ में उनके पंजों के निशान भी दिखते रहे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष इंसान पर हमले की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो चिंता का विषय है। हालाँकि जंगली जानवरों के संदर्भ में प्रचलित है कि वे बिना कारण हमला नहीं करते। जब अचानक किसी से सामना होता है, तो वे आत्मरक्षा में हमला करते हैं। जब मादा भालू अपने शाबकों के साथ होती है, तो वह आक्रमक होती है।

पिछले कुछ वर्षों से वन्य विभाग द्वारा जंगलों में तेंदुए छोड़े जाने से इनकी संख्या में वृदिध हो रही है, दूसरा जंगलों के घटते दायरे से उनके भोजन का अभाव हो चला है, जिससे ये इंसानी वस्तियों की ओर आने के लिए मजबूर हो रहे हैं। अतः आए दिन पालतू कुत्तों व मवेशियों पर इनके हमले बढ़ रहे हैं।

जंगलों में बंदर, लंगूर आदि के दर्शन होते है तथा उंचाई के गाँव में फसलों व फलों को ये नुकसान पहुँचाते है। नीचे हमारे घर के आसपास इनके दर्शन दुर्लभ ही रहे। जंगल में तो गडीहण (उड़न गिलहरी) के दर्शन भी होते रहते।

इसके साथ मधुमक्खियों का पालन भी पुश्तों से बुजुर्गों का एक शग्ल रहता। हर घर में इनके छत्ते (मडाम) मिलते। आज इनकी संख्या कम हो चुकी है। हालाँकि कुछ शौकिया तौर पर, तो कुछ बागवानी के चलते फ्रेम जड़े बक्सों में मधुमक्खियों का पालन करन लगे हैं।

गांव व इलाके के वृक्ष-वनस्पति – में भेखल, शांभल, टिम्बर आदि लोकप्रिय़ थे, जिनसे कई तरह की यादें जुड़ी हुई हैं। भेखल की खाली पाइप को हम बंदूक की तरह इस्तेमाल करते। शांभल के छोटे-छोटे खट्टे-मीठे जांमुनी फल खाते और बाद में पता चला कि दारु हल्दी के रुप में इससे कैंसर की दबा बनती है। टिम्बर (तिरमिरा) का उपयोग हम माउथ फ्रेशनर के रुप में करते।

कोउश (अतीश) के पेड़ गाँव के नाले व ब्यास नदी के किनारे कतार में दर्शन देते तथा शीतलता व छाया देते। शेगल व बाँज के सदावहार पेड़ चारे के रुप में काम आते। इसके जंगल गाँव वासियों के लिए सर्दी में चारा का एक मह्त्वपूर्ण विकल्प रहते। मोहरु का इकलौता हराभरा पेड़ खेत के कौने में शौभा देता। ऊँचाइयों में काईल, रई, तोश, देवदार के गगनचूंबी पेड़ों की तो बात ही कुछ ओर रहती। जिनके दर्शन हमें एक दूसरी ही दुनियाँ में विचरण की अनुभूति देते। 

इस तरह अपने गाँव व क्षेत्र में जीव-जंतुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों का यह पिछले साढ़े पाँच दशक का मुआइना स्पष्ट करता है कि चीजें काफी बदल गई हैं। कुछ ग्लौबल वार्मिंग के चलते जलवायु परिवर्तन, तो कुछ जीवन में मशीनों के हस्तक्षेप व अधिक धन कमाने की दौड़ तथा प्रकृति के साथ इंसान का बढ़ता हस्तक्षेप, सब मिलाकर हिमालय के इस सुंदर क्षेत्र की जैव-विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा रहा है। जिसका संरक्षण हर स्तर पर किए जाने की आवश्यकता है। पहाड़ी क्षेत्रों का प्राकृतिक सौंदर्य, स्वास्थ्यबर्धक आवोहवा व सुख-शांतिपूर्ण जीवन बहुत कुछ इससे जुड़ा हुआ है। 

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