मंगलवार, 31 मार्च 2026

चरित्र निर्माण की प्रक्रिया

चरित्र निर्माण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता


चरित्र निर्माण के बिना हम अपने पुरुषार्थ, भाग्य या किसी समर्थ की कृपा-आशीर्वाद के फलस्वरुप तथाकथ सफलता या बुलन्दी के शिखर पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन वहां टिके रहें, यह सिर्फ और सिर्फ चरित्र बल के आधार पर ही संभव होता है। अतः जीवन में टिकाऊ सफलता के साथ शांति एवं सद्गति के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग एवं गंभीर हो जाए, ताकि वह शिखर से रसातल की ओर लुढ़कने की त्रास्द बिडम्बना से बच सके।

इसके लिए चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के चरणों की तात्विक समझ आवश्यक है। महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के आधार पर इसके आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार - जैसा हम सोचते हैं, बैसा ही हमारा संकल्प बनता है, क्रियाएं सम्पन्न होती हैं, क्रमशः आदतें बनती हैं और संस्कार पुष्ट होते हैं तथा चरित्र का निर्माण होता है, जो हमारे आचरण-व्यवहार को प्रभावित करता है। युगऋषि पं.श्री रामशर्मा आचार्यजी के शब्दों में जैसा हम सोचते व करते हैं, बैसे ही बनते जाते हैं। और इस तरह चरित्र ही हमारी नियति एवं भविष्य को तय करता है।

इस प्रक्रिया को समझते हुए चरित्र निर्माण के संदर्भ में निम्न चरणों को अपनाया जा सकता है –

स्वाध्याय-सत्संग – महापुरुषों का स्वाध्याय एवं सत्संग सबसे महत्वपूर्ण है, जिसके प्रकाश में चिंतन-मनन करते हुए आत्म-चिंतन संभव हो पाता है। आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया गति पकड़ती है, आत्म-सुधार के साथ आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चरण आगे बढ़ते हैं और व्यक्तित्व विकास के साथ चरित्र गठन की महान प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

आध्यात्मिक आदर्श का वरण – जीवन में कैरियर एवं पेशेवर लक्ष्यों के अनुरुप अपने क्षेत्र से सम्बन्धित महानतम एवं श्रेष्ठतम आदर्शों का चयन किया जा सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण के संदर्भ में आध्यात्मिक आदर्शों का वरण आवश्यक है। लौकिक आदर्श सामाजिक सफलता के प्रेरक हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रुपाँतरण एवं चरित्र गठन की प्रेरणा, त्वरा एवं प्रकाश तो आध्यात्मिक आदर्श से ही प्राप्त हो पाते हैं। अतः आध्यात्मिक आदर्श का वरण पहला चरण है।

श्रेष्ठ संग-साथ एवं वातावरण – दिन भर हम किन व्यक्तियों, विचारों व संग-साथ के साथ विचरण कर रहे हैं, किस वातावरण में रह रहे हैं, यह चरित्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। कुसंग और दूषित वातावरण में हम किन्हीं श्रेष्ठ विचारणा एवं प्रेरणा की आशा नहीं कर सकते। ऐसे में बुरी संगत से अकेला भला की उक्ति को अपनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के वर्तमान युग में यहाँ डिजिटल संयम के महत्व को भी समझा जा सकता है।

अनुशासित जीवनशैली – चरित्र गठन के संदर्भ में जीवनशैली का अनुशासित होना आवश्यक है। बिना खान-पान, दिनचर्या, विचार एवं व्यवहार को साधे चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में संयमित आहार, कसी हुई दिनचर्या, सकारात्मक-श्रेष्ठ विचार एवं संतुलित-उदात वाणी-व्यवहार के माध्यम से चरित्र निर्माण की जड़ों का पोषण किया जा सकता है।


जीवन साधना – चरित्र निर्माण के लिए अन्ततः चित्त के स्तर पर उतर कर स्वयं पर कार्य करना पड़ता है। मात्र वाणी, व्यवहार एवं विचारों पर कार्य करने भर से चरित्र गठन की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो पाती। दीर्घकाल से जड़जमा कर बैठी आदतों एवं हठीले कुसंस्कारों का परिष्कृत करने में समय लगता है। इसके लिए जप, ध्यान प्रार्थना से लेकर प्रायश्चित तप के आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन लेना पड़ता है। समूचे जीवन को साधनामय बनाना पड़ता है।

निसंदेह रुप में चरित्र निर्माण एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है (Character building is a lifelong process) और युगनायक स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में हजारों ठोकरें खाने के साथ चरित्र का गठन होता है। (Character has to be established through a thousand stumbles.) इसकी दुरुहता, जटिलता, गंभीरता एवं महत्व को समझते हुए हम चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग हो जाएं, इसको जीवनचर्या का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यही हमारे गौरव-गरिमा की रक्षक है, यही हमारे गुरुत्व की पौषक है, यही हमारे आत्मिक उत्थान की नींव है और यही हमारे जीवन की टिकाऊ सफलता, सुख-शांति, संतुष्टि एवं परिपूर्णता का आधार है।

यात्रा वृतांत - मानाली से कुल्लू वाया लेफ्ट बैंक

रुट के मुख्य पडावों का विहंगावलोन करता सफर

इस वार मार्च 2026 के दूसरे-तीसरे सप्ताह के मध्य एक सप्ताह का संक्षिप्त प्रवास का संयोग बना। पाँच दिन तो बारिश-बर्फवारी के बीच बीते। अंत में एक दिन साफ मौसम देखते हुए घाटी का एक फील लेने के उद्देश्य से मानाली के लिए निकल पड़ता हूँ। सरवरी कुल्लू बस स्टैंड से राइट बैंक की कुल्लू-मानाली बस को पकड़ता हूँ।

बस अखाड़ा बाज़ार होते हुए रामशिला से आगे बैष्णों माता, पुलिस स्टेशन, बाशिंग जैसे पड़ावों को पार करती हुई सेऊवाग, बवेली, बंदरोल, रायसन जैसे स्टेशनों को कवर होती हुई कटराइं पहुँचती है। मकसद इस सुंदर घाटी के अवलोकन के साथ पिछली बरसात के बाद हुए नुकसान का मुआइना करना था व साथ ही  रूट की वीडियो रिकॉर्डिंग भी चलती रही, लेकिन ठीक कटराईं पहुँचते ही मोबाइल का स्टोरेज फुल हो जाता है। इसे दैवीय संदेश मानते हुए वीडियोग्राफी बंद कर देता हूँ। और आगे मात्र आवश्यक फोटो से काम चलाते हुए क्लाथ होते हुए मानाली पहुँचता हूँ।

रास्ते में बरसात में हुई तबाही का मंजर साफ था, रायसन के आगे और फिर पतलीकुहल के आगे स्पेन रिजॉर्ट तथा आगे क्लाथ व मानाली के आसपास प्राकृतिक प्रकोप के जख्म साफ दिख रहे थे। लगा काफी कुछ हीलिंग हो चुकी है, लेकिन पूरी तरह से रिक्वरी अभी वाकि है। लेफ्ट बैंक में छरुहड़ू के पास तो स्थिति और भी विकट बनी हुई थी। हालाँकि निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन कूपित प्रकृति की मार का दंश अभी भी स्पष्ट दिख रहा था।

राइट बैंक के ऊपर बताए पड़ावों को पार करते हुए एक समानान्तर दृष्टि उस पार लेफ्ट बैंक की घाटी पर भी टिकी हुई रही। घाटी की दो से चार किमी चौड़ी बसावट, हल्की ढलान पर बसे सेब व अन्य फलों के वागान, गाँव-कस्वों के पीछे के देवदार जंगल और उनके पीछे बर्फ से ढके पर्वत शिखर, सब मिलाकर घाटी के मनोरम दृश्य हमारे चित्त को आल्हादित कर रहे थे।


मानाली शहर की शीतल आवोहवा, पर्य़टकों का जमावड़ा, स्थानीय लोगों की अपने उत्पादों के साथ व्यापारिक चहल-पहल और ट्रैफिक की व्यस्तता, सब मिलाकर एक जीवंत हिल स्टेशन के दिग्दर्शन करवा रहे थे।

मानाली के कुछ यादगार पलों को समेटते हुए व आवश्यक खरीददारी के बाद मानाली से लेफ्ट बैंक की बस में बैठता हूँ। इस पड़ाव के मुख्य पड़ावों का वर्णन यहाँ कर रहा हूँ, शायद इस रूट में रूचि रखने वाले नये पाठकों का कुछ ज्ञानबर्धन हो सके व कभी यहाँ से गुजरे, तो एक नए नज़रिए से वे इस घाटी का आवलोकन कर सकें।

मानाली, बस स्टैंड से ठीक चार बजे बस चल पड़ती है। ब्यास नदी पर पुल पार करते हुए लेफ्ट बैंक में दायीं ओर मुड़ती है। वायीं ओर की सड़क आगे वाहंग, पलचान, सोलांग घाटी व अटल टनल की ओर जाती है। पलचान से दायां रूट कोठी, गुलावा, मढ़ी होते हुए रोहतांग दर्रे की ओर जाता है।

हम इस रूट के विपरीत कुल्लू की ओर बढ़ रहे थे। पहला पड़ाव अलेऊ आता है, जो पर्वतारोहण संस्थान के लिए जाना जाता है, यह मुख्य मार्ग से दायीं ओर आधा किमी नीचे देवदार के घने जंगलों के बीच ब्यास नदी के किनारे स्थित है। ट्रेकिंग, पर्वतारोहण एवं रोमाँचप्रेमियों के लिए यह संस्थान किसी तीर्थ से कम नहीं। हमें स्वयं 1991 में यहाँ से एडवेंचर और बेसिक कोर्स करने का सौभाग्य मिल चुका है। यहाँ से जुड़े यादगार अनुभवों को आप दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (पर्वतारोहण का विधिवत प्रशिक्षण, भाग-1)

अलेऊ के साथ ही प्रीणी आता है, जहाँ अटल विहारी वाजपेयीजी का सीजनल निवास माना जाता है। आगे शुरु में शवरी माता का सिद्ध पीठ है, जिसका सम्बन्ध महाभारत काल के अर्जुन-किरात युद्ध से जुड़ा हुआ माना जाता है। जगतसुख भी एक पुरातन गाँव है, जो कभी कुल्लू की राजधानी भी रहा और यह अपने पौराणिक एवं दुर्लभ गायत्री मंदिर के लिए जाना जाता है। इसके बाद गोजरा में निर्मल जल के झरने (पाणी रा मोगरा) के दर्शन किए जा सकते हैं तथा खखनाल गाँव कार्तिकेय स्वामी के मंदिर के लिए प्रख्यात है।

सजला में भगवान विष्णु का पौराणिक मंदिर है और इसके आगे देवदार के घने जंगल को पार करते हुए धोमसू गाँव आता है, जिसके बाद करजाँ के रुप में एक बड़ा गाँव आता है। इसके नीचे गजां दोचो-मोचो के मंदिर के लिए जाना जाता है। इसके आगे मनसारी और ऊपर सोयल जैसे प्राकृतिक पर्यटन गांव आते हैं। इन्हीं के साथ हरिपुर डिग्री कॉलेज के लिए जाना जाता है। इसके आगे सरसेई और नीचे बटाहर गाँव आते हैं, आगे छाकी गाँव पड़ता है। यहाँ से नीचे सीढीदार खेतों की सेरी का दृश्य देखने लायक रहता है, कभी धान की खेती के लिए प्रख्यात यह पूरी घाटी अब सेब के बगानों से पटी दिखती है।

इसके आगे आता है कुल्लू-मानाली मार्ग का मध्य पड़ाव नगर जो कुल्लू के अधिकाँश राजाओं की राजधानी रहा। यहीँ पर कुल्लू की शान लालचंद प्रार्थीजी का निवास स्थान है और थोड़ा ऊपर रशियन संत कलाकार निकोलाई रोरिक का समाधी स्थल और आर्ट गैलरी। यहीं से बिजली महादेव के लिए लिंक रोड़ भी जाता है, जिसके मार्ग में नशाला घाटी, नथान सेरी, नथान गाँव, जाणा, बनोट जैसे गाँव आते हैं और आगे कायस वन विहार। इस रुट की जानकारी दिए गए लिंक में पड़ सकते हैं। (बिजली महादेव जीप सफारी वाया नग्गर,जाणा-भाग1)

नगर के ही ऊपर चचोगी व रूमसू जैसे गाँव पड़ते हैं, जो चंद्रखणी पास के लिए ट्रेकिंग रुट का हिस्सा हैं जो आगे मलाना के प्रख्यात गाँव तक जाता है। नगर के आगे भगवान गणेशजी के मंदिर के लिए प्रख्यात घोरदौड़ गांव आता है, जहाँ सुधांशुजी महाराजजी का भव्य आश्रम सडक के साथ सटा है, जो अब संभवतः एक भव्य होटल में रुपाँतरित है। आगे लरांकेलो स्टेशन आता है, जहाँ थोड़ा नीचे देवदार के गगनचुम्बी वृक्षों के बीच लराई महादेव स्थित हैं। आगे हिरनी गाँव आता है, जिसके पीछे छेती, पारशा, शोर्न जैसे गाँव आते हैं। आगे अरछंडी पड़ाव आता है, जहाँ सड़क के साथ काली माता का सिद्ध मंदिर स्थित है।

इसके आगे राउगी नाला आता है, जहाँ माना जाता है कि जाणा फाल का पानी बहता है, इसके किनारे पिकनिक स्पॉट में जलक्रीड़ा का आनन्द लिया जा सकता है। इसके आगे बलोगी, कराड़सू जैसे गाँव आते हैं व आगे कुकड़ी सेरी जो बौद्ध गोंपा के माना जाता है। इसके ठीक उस पार है बंदरोल गाँव, जो हिमाचल में सबसे पहले कैप्टन ली द्वारा स्थापित सेब बगान के लिए माना जाता है।

इसके बाद काईस गाँव आता है, जो भगवती दशमी वारदा का सिद्ध स्थान है और आगे उनके बाहन बरिंडी देवता का स्थान। जिसके बाद मलाहर गाँव आता है, जहाँ जिला का एकमात्र पॉलिटेक्निक कॉलेज स्थित है। जो पहले भेड़ू फार्म व वेटेनरी अस्पताल के लिए जाना जाता था।

इसके आगे आता है सेऊबाग गाँव, जहाँ कुल्लू में अंग्रेजों द्वारा सेब के बगान लगाने के बाद स्थानीय प्रगतिशील बागवानों द्वारा सेब के खनोर (चेस्टनट) के ऐतिहासिक प्रयोगों के लिए जाना जाता है, जिस कारण गाँव का नाम सेऊबाग पड़ा। मानाली से चार बजे चली हमारी बस ठीक छः बजे सेऊबाग पहुँचती है, जिसमें कुछ लेट-लतीफी सरसेई में मेले के कारण हुए जाम के कारण रही।

इसके आगे छरूहड़ू नाला आता है, जो हर वर्ष भूस्खलन के कारण लेफ्ट बैंक के लिए समस्या का सबब बना रहता है, जहाँ वर्ष 2025 में आई भयंकर बाढ़ के दंश आज भी स्पष्ट दिख रहे थे।


हालाँकि निर्माण कार्य तेजी से चल रहा था, लेकिन सड़क अनवरत भूस्खलन के कारण क्षतिग्रस्त दिखी। इसके आगे लुगड़ी भट्टी आती है, जहाँ ऊपर प्रेमनगर चदौहल में रिसर्च सेंटर के रुप में बागवानी फार्म स्थित है, जिसके ऊपर गाहर, छाड़गड़ी, सूईरोपा, पारली बेड जैसे गाँव आते हैं।

इसके आगे जुआंणी रोपा आता है, जहाँ पीछे थरमाहण, नेउली गाँव, बराधा, सराहन जैसे गाँव आते हैं, यहाँ जुआणी महादेव क्षेत्र के जाने-माने देवता हैं। यहीं पर गैमन पुल लेफ्ट और राइट बैंक को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण संरचना है। यहीं से बिजली महादेव के लिए खराहल घाटी के आर-पार जाने वाला लिंक रोड़ शुरु होता है। इस रुट से बिजली महादेव का यात्रा वृतांत आगे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (बिजली महादेव का यादगार रोमाँचक सफर)

इसके ठीक बाद आता है रामशीला जहाँ उस पार हनुमानजी का प्रसिद्ध मंदिर मौजूद है। माना जाता है कि बरसात की प्रलयंकारी बाढ़ में यही शिला अखाड़ा बाजार की रक्षा करती है। इसके नीचे आता है टापू जो लेफ्ट बैंक का पुराना बस स्टैंड था, जिससे हमारे बचपन व स्कूल-कालेज के दिनों की अनगिन यादें जुड़ी हुई हैं। अभी यहां से लिंक रोड़ उस पार दाईँ ओर ऊपर मुड़ने पर पुराने बस स्टैंड की ओर जाता है, जहाँ अखाड़ा बाजार कुल्लू की मुख्य मार्केट मौजूद है। नीचे आगे बढ़ने पर ढुग्गी लग घाटी से आने वाली सरवरी नदी के किनारे बना सरबरी बस स्टैंड आता है, जो कुल्लू का नया बस स्टैंड है, यहाँ से हिमाचल के विभिन्न जिलों के साथ अंतर्राजीय बसों की बुकिंग की जा सकती है।

सरवरी नदी को पार करते हुए ऊपर आता है ढालपुर मैदान, जिसे ठारा करड़ू की सोह भी कहा जाता है। अर्थात घाटी के मुख्य देवताओं की क्रीडा स्थली। आश्चर्य़ नहीं वर्ष में एक बाद यहीं पर कुल्लू का विश्व प्रख्यात दशहरा मनाया जाता है। इसी मैदान के ऊत्तरी छोर पर ही सीनियर सैकेंडरी स्कूल और दक्षिणी छोर पर ही डिग्री कॉलेज कुल्लू, जहाँ हमें अपने जीवन के कुछ महत्वपूर्ण बिताने का संयोग-सौभाग्य मिला। यहीं नीचे लालचंदी प्रार्थी कलाकेंद्र है, जहाँ दशहरे में रात को सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और इसी के बग्ल में है जिला पुस्तकालय, जिसको कवर करता ब्लॉग दिए लिंक में पढ़ सकते हैं। (मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026))

मेरा गाँव और मेरा देश - मार्च में बारिश और बर्फ का आगाज़ (2026)


धरती के लिए किसी वरदान से कम नहीं

जन्म स्थल पर यह वर्ष 2026 का पहला प्रवास था। सेमेस्टर ब्रेक दिसम्बर 2025 में जाने की योजना थी, जो कार्य की अति व्यस्तता के चलते टलते-टलते मार्च में ही संभव हो पायी। इसके पीछे भी कोई दैवीय विधान था, यह अंत में स्पष्ट होता है। पिछले तीन माह से बारिश नहीं हो रही थी, गर्मी का मौसम जैसे शुरु हो चुका था। फोन से पता चला कि घरों में तंदूर जलने बंद हो चुके थे, इसलिए ह्ल्की-फुल्की तैयारी के साथ घर जाता हूँ। मुख्य उद्देश्य अपने बुजुर्ग माता-पिता के दर्शन थे और साथ ही पारिवारिक मिलन भी।

हरिद्वार से हिमाचल पथ परिवहन निगम की अंतिम बस हरिद्वार बस स्टैंड से रात्रि आठ बजकर दस मिनट पर जाती है, इसी में चढ़ता हूँ। यह वाया देहरादून जाती है, जो आगे पौंटा साहिब, नाहन, काला अम्ब होती हुई पंचकुला, चण्डीगढ़ पहुँचती है। सफर सदैव की तरह खशनुमा रहा। बस में अधिक भीड़ नहीं थी। देहरादून में चाय आदि के लिए आधा घंटा रुकती है। फिर काला अम्ब में रात को पौने एक रात्रि भोजन के लिए बस रुकती है।

रात को तीन बजे चण्डीगढ़ बस पहुँचती है, सबारियों को बिठाते हुए फिर आगे पंजाब के मोहाली, रोपड़, कीरतपुर साहिब जैसे शहरों को पार करती है और हिमाचल में प्रवेश करती है। टनल से नया रुट बना होने के कारण स्वारघाट का पुराना व लम्बा रूट नहीं आता। सुरंग के पार बिलासपुर जिला आता है, इसमें सतलुज नदी को पार करते हुए सुबह छः बजे सुंदरनगर बस रुकती है, फिर नैरचौक से होते हुए सात बजे मंडी पहुँचती है।

यहाँ से आगे पंडोह डैम के आगे कई सुरंगों को पार करते हुए हम आउट पहुँचते हैं, फिर कुल्लू घाटी में प्रवेश होता है। पनारसा, बजौरा, भूंतर, शमसी, ढालपुर होते हुए सुबह नौ दस तक सरवरी कुल्लू बस अड्डा पहुँचता हूँ।


यहीं से लेफ्ट बैंक की बस पकड़कर दस बजे तक अपने गाँव-घर पहूंचता हूँ। इस तरह रात को सात बजे देसंविवि, हरिद्वार से शुरु हुआ सफर सुबह दस बजे पूरा होता है। कुल पंद्रह घंटे में घर पहुँचता हूँ।

हालाँकि मौसम विभाग ने अगले सप्ताह बारिश की चेतावनी दे रखी थी, इसी के अनुरुप अभिसिंचन के साथ हमारा गाँव में प्रवेश होता है। यहाँ की शीतल शुद्ध आवोहवा, खुशनुमा माहौल, चिरपरिचित खेत-खलिहान, बगीचे, आसमान छूते पहाड़, फिर घर, गांववासी और परिवारजन, सब बचपन की यादों को ताजा कर रहे थे।  

आज ही गांव के मेले स्यो जाच का अंतिम दिन भी था। बारिश के कारण यहाँ दिन के खेल व रात के सांस्कृतिक कार्यक्रम बाधित ही रहे, लेकिन देवकार्य यथासमय संपन्न होते रहे। मेले में पधारी भगवती दशमी वारदा एवं जुआणी महादेव के दुर्लभ दर्शन करते हुए उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दिन भर और रात को बारिश होती रही। ऊंचे पहाड़ों पर बर्फवारी का क्रम चल रहा था। रात्रि तापमान शून्य से नीचे था।

ऐसे लग रहा था कि हमारी सर्दी में यहाँ के मौसम को फील करने की दबी इच्छा जैसे प्रकृति माँ पूरा कर रही थी। घर में बंद पड़े तंदूर एक्टिवेट हो चुके थे, जिसके किनारे बैठने का अलग ही आनन्द रहता है। वास्तव में वहाँ बैठते ही बचपन से अब तक की अनगिन यादें झंकृत हो उठती हैं, जिसमें नानाजी, नानीजी, मामाजी सहित दादीजी, ताउजी एवं अनगिन परिवारजनों से हुए मिलन, संवाद आदि सहज ही चिकादाश में उमड़ पड़ते हैं।

फिर इस बार भतीजे सोहम की अपेंडिक्स सर्जरी के चलते गाँव भर से लोग मिलने के लिए आ रहे थे, सो कई परिचित लोगों से मिलन व नए चेहरों से परिचय का क्रम चलता रहा। क्षेत्रीय लोकजीवन, यहाँ के चल रहे घटनाक्रम, गाँव-घाटी के ज्वलंत मुददे, देव-संस्कृति से जुड़ी बातें सब चर्चा के विषय थे।

अगले पाँच दिनों लगातार बारिश होती रही, ऊँचे पर्वतों में तो बर्फवारी शुरु हो गई थी, चारों ओर पर्वत घाटी ने जैसे सफेद बर्फ का श्रृंगार कर लिया था।


लगा जैसे प्रकृति माँ की विशिष्ट उपहार अपनी आकुल संतानों के लिए दिल खोल कर लूटा रही हों। एक दिन तो घर-गाँव में भी बर्फ का आगाज होता है, लेकिन मात्रा कम होने के चलते यह टिक नहीं पाती। चारों ओर हिमशिखरों में बर्फ जमने के कारण घाटी में रात का तापमान माइनस में जाता रहा। दिन का तापमान 3-5 डिग्री सेल्सियस तक रहा। सो घर में एक्टिव तंदूर के चलते तंदूर से गर्म कमरे में पारिवारिक मिलन व संवाद का क्रम चलता रहा।

मालूम हो कि तंदूर कक्ष हिमालच के पहाड़ी इलाकों में सर्दी का एक बहुत बड़ा आश्रय-स्थल रहता है, जहाँ का गर्माहट भरा कोजी वातावरण एक अलग ही भावलोक में विचरण की अनुभूति देता है। सर्दी में ठिठुरते जीवन को एक अलग ही सुख व आनन्दमयी संसार में विचरण का आलौकिक अहसास दिलाता है।

इसी बीच बारिश कम होने के कारण एक दिन जिला पुस्तकालय, कुल्लू भी चले गए, जहाँ पर क्षेत्रीय जीवन एवं साहित्य पर लिखी पुस्तकों का अवलोक किया। हमारी खोज कुल्लूत देश की कहानी थी, जिसकी एक ही प्रति संदर्भ कक्ष में थी और आज छुट्टी होने के नाते हमें यह उपलब्ध न हो सकी। इसी के साथ हमने देव भारथा और कुल्लू के शान लालचंद्र प्रार्थीजी पर एक (मात्र) पुस्तक इश्यू की। पुस्तकालय में पाठकों का तांता लगा था, अधिकाँश लगा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष कक्ष में अध्ययनरत थे। कुछ समाचार कक्ष में अखबार एवं पत्रिकाओं को बाँच रहे थे। कुछ बाहर कैफिटेरिया में यार-दोस्तों के साथ रिलेक्स हो रहे थे।

पुस्तकालय में विषय की तमाम पूस्तकें उपलब्ध हैं, हमारी खोज क्षेत्र के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक अतीत की थी, जिस पर अधिक शोधपरक सामग्री नहीं मिली। इस विषय पर लालचंद प्रार्थीजी के ऐतिहासिक कार्य़ (कुल्लूत देश की कहानी) की तक एक प्रति काफी आग्रह के बाद संदर्भ कक्ष में उपलब्ध हो पायी है। ऐसे में युवा पीढ़ी अपने इतिहास व संस्कृति से कैसे परिचित होंगे, सोचने का विषय है। हमारा अपनी रुचि के अनुरुप इस विषय पर अपने ढंग से शोध-अनुसंधान जारी है।

इसी तरह हमारे पूर्वजों के इतिहास के संदर्भ में हम अधिक दूर नहीं जा पाते, अपने घरों में ही पारिवारिक इतिहास पर चर्चा करें, तो चार-पाँच पीढी से पीछे नाम नहीं बता सकते। उनका विस्तार तो और भी नहीं। इस संदर्भ में इस बार हम अपनी वंदनीया माताजी का सहज-स्फुर्त प्रयास देखकर चकित हो गए। वे परिवार की सात पीढियों का पूरा हिसाब-किताब कागज पर लिख कर बैठी हैं। इसी क्रम में घाटी में सेब व फलों के प्रवेश की गाथा पिताजी से चर्चा करने पर स्पष्ट हुई, जिसको अगले किसी ब्लॉग में प्रस्तुत करुँगा।

दो घंटे में पुस्तकालय से बाहर निकलने पर देखा ह्ल्की-हल्की बारिश हो रही है, जो हमें देव अभिसिंचन जैसे फील दे रहा था। ढालपुर मैदान को बैसे भी ठारा करड़ू की सोह कहा जाता है। लगा जैसे हमारे नेक इरादों को देव आशीष मिल रहा है।


पूरी घाटी ईधऱ-ऊधर उड़ते अवारा बादलों के फाहों से साथ ढकी हुई थी, दायीं ओर सूदूर बिजली महादेव तो मानाली की ओर सेऊबाग-गाहर साइड के पहाड़ और सामने खराहल घाटी सभी बादलों के सघन आच्छादन से ढके हए बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। आज दोपहर तक बारिश से कुछ राहत रही थी, लेकिन शाम से फिर इसका अनवरत क्रम प्रारम्भ होता है।

इस बार की चार-पाँच दिनों की बारिश-बर्फवारी फसल व फलों के हिसाब से किसी वरदान से कम नहीं थी। ऊँचे पहाड़ों में बर्फ की मोटी परत जमने से घाटी के नाले दनदनाते हुए व्यास नदी की जलराशि को समृद्ध कर रहे थे। निसंदेह रुप में गर्मी के आने वाले मौसम में घाटी के घर-गाँव में इससे जल की उचित व्यवस्था हो सकेगी, जो हर गर्मी में एक विकट समस्या रहती है।

19 मार्च के दिन नव संवत्सर का पर्व था। इसमें कुल पुरोहित घर-घऱ जाकर नए वर्ष की पत्री वाँचते हैं, इसी क्रम में युवा पंडित जोगिंद्रजी से मुलाकात हुई। पता चला कि नए संवत का नाम रौद्र है, इसके राजा गुरु, मंत्री मंगल हैं आदि। विभिन्न राशियों का लेना-देना व धर्म-अधर्म की स्थिति तथा विभिन्न घटनाओं के प्रतिशत आदि से परिचित हुए। साथ ही घाटी की देवपरम्परा पर कुछ सार्थक चर्चा भी हुई।

इस तरह मार्च 2026 में एक सप्ताह का संक्षिप्त प्रवास कई सुखद स्मृतियों को बटोरने का संयोग रहा। दीर्घकालीन संयम व प्रतिक्षा का मीठा फल जैसे इन सुखद अनुभूतियों के रुप में मिल रहा था। बारिश, बर्फवारी के बीच ठंड व तंदूर के आसपास लोकजीवन की बचपन की यादें सब जीवंत हो रहीं थीं व गहन-गंभीर मंथन के साथ इस शेष बचे नश्वर जीवन के सार्थक नियोजन की रुपरेखा ओर स्पष्ट हो रही थी। 

इसी प्रवास के दौरान सम्पन्न कुल्लू-मानाली घाटी के यात्रा वृतांत को पढ़ सकते हैं आगे दिए लिंक पर। (मानाली से कुल्लू वाया लेफ्ट बैंक)

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

जीवन गीत

हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए

 


हम रहें या न रहें, सच जिंदा रहना चाहिए,

धर्म-मर्यादा संग इंसानियत को स्थान मिलना चाहिए।1

आदर्श सिद्धान्तों की बातें अच्छी,

व्यवहारिक धरातल का भी अहसास होना चाहिए।2

 

काम बनें या बिगड़े, या थोड़ी देर में होते हैं पूरे,

आपसी प्यार-सद्भाव-भाईचारा बना रहना चाहिए।3

नहीं कोई परमहंस इस रंग बदलती दुनियाँ में,

मानवीय दुर्बलताओं के प्रति उदार भाव रहना चाहिए।4

 



       नहीं संत बनता यहाँ कोई एक दिन में इस धरा पर,

सुधरने का मौका सबको मिलता रहना चाहिए।5

अपनी मूढ़ता की आँधी में हो सवार कोई अगर,

तो उस लाइलाज मर्ज़ का उपचार होना चाहिए।6

 

नहीं समाधान मर्ज का अपने हाथ में को,

 इस सृष्टि के मालिक पर छोड़ देना चाहिए।7

हर व्यक्ति जिम्मेदार है अपने चिंतन व कर्म के लिए,

अपने कर्तव्य के प्रति सबको ईमानदार-जिम्मेदार रहना चाहिए।8

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग 4

पितर : हमारे शुभचिन्तक सच्चे मार्गदर्शक

पितर आत्माएँ देव सत्ता का ही पर्याय कही जा सकती हैं। वे समय समय पर जीवित अवस्था की ही तरह सेवा सहायता कर अपना धर्म निबाहती रहती हैं। भले ही ऐसी परोक्ष सहायता को दैवी अनुदान नाम दे दिया जाय, पर एक तथ्य तो अटल है ही कि वे श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा सुपात्रों को ही मिलते हैं।

अनेक सिद्ध पुरुष अपने दूरस्थ शिष्यों को अपनी सूक्ष्म सत्ता से प्रत्यक्ष मदद पहुँचाते हैं। प्रसिद्ध आर्य समाजी सन्त स्व० श्री आनन्द स्वामी के पुत्र लेखक-पत्रकार श्री रणवीर ने अपने संस्मरण-लेख में यह बताया था कि किसी प्रकार उनके पिता ने उन दिनों, जबकि वे जीवित थे और भारत में थे तथा रणवीर विदेश में प्रवास पर थे, एक बार भयानक खड्डे में गिर पड़ने से चेतावनी देकर उन्हें रोका था। अन्य कई अवसरों पर भी उनकी मदद व मार्गदर्शन का कार्य उनके पिता ने किया था। जबकि वे उस समय उनसे सैंकड़ों मील दूर हुआ करते थे।

विकसित आत्म सामर्थ्य के ये लाभ सिद्ध पुरुषों द्वारा आत्मीय जनों को अनायास ही पहुँचाए जाते रहते हैं। यही स्थिति पितरों की है। ऐसी शरीरी अशरीरी उच्च आत्माओं के प्रति श्रद्धा-भाव रखना उचित भी है और आवश्यक भी।

अधिक उच्चकोटि की पितर आत्माएँ तो जीवित महामानवों-महायोगियों की तरह ही उदात्त होती हैं। उनके लिए अपने-पराए जैसा कोई भेदभाव होता ही नहीं। जहाँ भी आवश्यकता एवं पात्रता दिखी, वहीं उनके अनुग्रह अनुदान बरसने लगते हैं। जरूरत उनके अनुकूल बनने, उत्कृष्ट जीवन और प्रगाढ़ श्रद्धा-भाव अपनाने से होती है।

मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है। परिपक्व मृत्यु होने पर चेतना कुछ समय के लिए विश्राम में चली जाती है। जिस प्रकार दिन भर का थका माँदा व्यक्ति प्रगाढ निद्रा में सो लेता है तो उसे फिर से नयी ताजगी मिल जाती है, उसी प्रखार मृत्यु के बाद जीवन की अवस्था के अनुरूप वह दो माह से दो वर्ष तक विश्राम ले लेने के फिर से नयी ताजगी मिल जाती है. उसी प्रकार मृत्यु के बाद जीव की पश्चात् नया जन्म धारण कर लेता है। पर कई बार नींद पूरी तरह नहीं आती। अफीमची और शराबी लोगों की नींद उखडी उखडी होती है। ऐसे लोगों को मृत्यु के समय भी पूरी नींद नहीं आती और वे नया जन्म लेने पर भी थके-थके से अस्त-व्यस्त होते है। जिन्हें नींद पूरी आ जाती है और जिनके मन शुद्ध और पवित्र होते हैं, वे अन्य जन्मों में बाल्यावस्था से ही पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ दोहराने लगते हैं।

जिनकी इन्द्रिय वासनाएँ प्रबल होती हैं या जिनकी मृत्यु हत्या या आत्महत्या जैसी होती है वे एक प्रकार से निचोड़े गये शहद की भाँति होते हैं। शहद का छत्ता काटकर रख दिया जाये तो उसका शहद अपने आप टपक आता है। वह नितान्त शुद्ध होता है पर निचोड़े जाने पर उसमें मोम आदि का अंश भी आ जाता है, उसी प्रकार ऐसी मृत्युओं में स्थूल अवयव भी बने रहते है। ऐसी ही आत्माएँ प्रेत, पिशाच, भूत, बैताल, किन्नर और यक्ष होते हैं। यह मरघट, अपने शवों तथा जिनके प्रति उनकी स्वाभाविक आसक्ति होती है, उनके पास घूमते आते जाते भी रहते हैं, पर जिनके शरीर में आग्नेय-अणु अधिक होते हैं, उनके पास इस तरह की गन्दी आत्मायें नहीं जा पाती हैं और जब नींद टूटती है तो वे अपनी आसक्ति के अनुरूप निम्न गामीयोनियों में चले जाते हैं।

विश्राम के बाद देव आत्मायें या जिनकी गति ऊर्ध्वमुखी-अच्छे कामों में रही होती है, जिनके शरीरों का आणविक विकास प्रकाश पूर्ण हो गया होता है, वे दिव्य लोगों को चली जाती हैं और जब तक वहाँ रहने की इच्छा होती है तब तक रहती हैं। पीछे इच्छानुसार अच्छे घरों में जन्म लेकर लोकसेवा पुण्य परमार्थ और नेतृत्व आदि उत्तरदायित्व सम्भालती हैं, पर जिनका मन अशुभ संस्कारों वाला रहा होता हैं, वे अधोगामी लोकों में रहकर निम्नगामी योनियों में चले जाते हैं। इस प्रकार संसार में गुण कर्म का यह प्रवाह, प्रकृति की जटिलता के समान स्वयं भी जटिल रूप में चलता रहता है।

पितर आत्माएँ वे हैं जिनकी ऊर्ध्वमुखी गति होती है। वे कई बार विश्राम की अवधि में कुछ लम्बे समय तक भी रही आती हैं। उस अवधि से वे स्वयं तो प्रकाशपूर्ण वातावरण में रहते ही हैं, दूसरे स्वजनों या जिनके प्रति उनके मन में आकर्षण होता है, उनको भी समय-समय पर प्रकाशपूर्ण मार्गदर्शन एवं अनुग्रह अनुदान देते रहते हैं।

पितरों की दैवी सहायता एवं ममत्व भरा मार्गदर्शन-

श्री लेडबीटर अपनी पुस्तक "इनविजिबल हेल्पर्स" में ऐसे अनेकों उदाहरण देते हैं, जिससे सावित होता है कि सत्संस्कार सम्पन्न पितर आत्माऐं भी आत्मीयों से सम्पर्क की इच्छुक रहती हैं। और सत्परामर्श एवं विवेकपूर्ण मार्गदर्शन देकर सच्चे सात्विक अनुराग का परिचय देती रहती हैं।

 थियोसाफी के जाने माने परोक्ष विद्या के अन्वेषणकर्त्ता सी० डब्ल्यू० लेडवीटर आजीवन मरणोत्तर जीवन पर अनुसंधान में निरत रहे। अपने शोध ग्रंथों में उन्होंने लिखा है कि उच्चतर लोकों में क्रियाशील अशरीरी पितर-सत्ताएं सुपात्र लोगों को सहायता देने के लिए सदैव जागरुक रहती हैं। निर्दोष बच्चों तथा सज्जनवृत्ति के लोगों को संकट के समय में ये पितर-सत्ताएं आकस्मिक सहायता प्रदान करती हैं और विपत्तियों के पहाड़ के नीचे दबने पर भी बालबाँका नहीं होता। इस तरह पित्तरों की दैवीय सहायता एवं परोक्ष मार्गदर्शन सत्पात्रों को मिलता रहता है। (जारी...)

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