सोमवार, 6 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-3

रांसी से गौंदार

8जून2026, सोमवार - रांसी से 2 किमी आगे अगतोलीधार पड़ता है, जहाँ गाड़ियों की कतारें सड़क के साथ खड़ी थीं और उसके आगे बाइक्स की कतारें लगीं थी। सभी यात्री अपने बाहन यहीं छोड़कर मदमहेश्वर ट्रेक के लिए निकले थे। सुरक्षा की दृष्टि से हम अपना वाहन कोमल होमस्टे के पास खड़ा कर दिए थे।

अगतोलिधार से लगभग 250 मीटर के बाद बैरिकेट लगा मिला, जहाँ से आगे किसी भी प्रकार के वाहनों का प्रवेश निषिद्ध है। वैरिकेट को पार कर हम सभी पैदल चलते हैं। यहीं से सूर्योदय का दृश्य देखकर हम थोड़ा ठिठक जाते हैं और इसको कैप्चर करने का प्रय़ास करते हैं। लेकिन यहाँ का सूर्योदय समय ले रहा था, लगा कई पहाड़ियों के पीछे से उसका उदय हो रहा है, सो हम चलते रहे।


फिर कुछ मिनट बाद रास्ते में सूर्य भगवान के दर्शन होते हैं, उनको प्रणाम कर अपना यात्रा अभियान जारी रखते हैं। बीच में दायीं ओर नीचे उतरता एक पैदल रास्ता दिखा, जो रांसी-मदमहेश्वर के पुराने रुट का एक लिंक रोड़ था।

रास्ते का प्राकृतिक परिवेश – हम हरे-भरे पहाड़ की गोद में आगे बढ़ रहे थे। कच्ची सड़क के दोनों ओर चीड़ के ऊंचे-ऊंचे वृक्षों का दीदार हो रहा था, साथ में ऊतीश, जंगली झाडियां व हरे-भरे पेड़ सफर का खुशनुमा अहसास दे रहे थें। पक्षियों की चहचाहट इस अहसास में मस्ती और शांति का एक नया रंग घोल रही थी।


रास्ते में छोटे झरने व जलस्रोत मार्ग की शोभा बढ़ा रहे थे। ट्रेकरों व तीर्थयात्रियों के समूह आगे-पीछे पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ रहे थे। इस रुट पर युवाओं की संख्या अधिक देखकर सुखद आश्चर्य़ हुआ कि वे अपने समय का सार्थक नियोजन कर रहे हैं, क्योंकि ऐसी यात्राएं जीवन में वो अनुदान-वरदान दे जाती हैं, जो घर बैठे संभव नहीं। घर में व्यक्ति परिवार और समाज की मोह माया में ही उलझा रहता है, जबकि इससे बाहर निकलकर प्रकृति की गोद में विताए कुछ पल जीवन में सार्थकता का गहरा बोध देने वाले सावित होते हैं।

रास्ते में नीचे मधुगंगा के दर्शन बीच-बीच में हो रहे थे और उसके पार दूसरी ओर गगनचुम्वी हरे-भरे पर्वतों के साथ संकरी घाटियों से निकलते झरने ध्यान आकर्षित कर रहे थे। लगा जून में जब इतने झरने रास्ते में दिख रहे हैं, तो जुलाई-अगस्त के मोनसून सीजन में तो यहाँ इनकी भरमार रहती होगी। और इसके साथ भूस्खलन की कल्पना का भय भी आशंकित कर रहा था।

मार्ग में एक बड़ा नाला दूर से ही अपने कल-कल निनाद के साथ रोमांचित करता है, इसी पर एक छोटी सी झील बनी थी।


आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते के इस विशिष्ट आकर्षण के संग यात्रियों का जमाबड़ा इसके किनारे सेल्फी के साथ ग्रुप फोटो लेने में मश्गूल था। हम लोग भी इसका लोभ संवरण नहीं कर पाए और कुछ यादगार फोटो खींचते हैं। इसके साथ ही थोड़ी दूर पर चाय-नाश्ते का एक ढावा मिला, जहां कुछ यात्री विश्राम के साथ पेट-पूजा कर रहे थे।

यहाँ के हरे-भरे परिवेश के आगे का मार्ग चट्टान काट कर बना है,

रास्ते में इन चट्टानों पर पहाड़ी छिपकली के दर्शन होते हैं, जो मटमेले या घूसर रंग की होती है, हम तो इसे स्थानीय भाषा में चपाड़ कहते हैं। छिपकली से अधिक इसे गोह परिवार का छुठभई सदस्य मान सकते हैं। स्वयं में मस्त-मगन यह जीव किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाता। यह सामान्य छिपकली की तरह घरों में नहीं पाया जाता। रास्ते भर चट्टानों पर, स्लेट वाले घर की छतों पर इसके दर्शन होते हैं। यह इन चट्टानी आवास में क्या खाता-पीता होगा, एक शोध का विषय लगा।

चट्टानी रास्ते को पार कर सामने दूर गोंडार के दर्शन शुरु हो जाते हैं, साथ ही नीचे मधुगंगा के दर्शन व सांय-सांय निनाद बीच-बीच में सुनने को मिल रहा था।   और थोड़ी देर में पास ही ऊँचाई में विरान स्थल पर एक पहाड़ी गाँव दिखता है। कल्पना करता रहा कि यहाँ लोग प्रकृति की गोद में कितनी शांति-सुकून से रहते होंगे। रास्ते में सड़क के चौड़ीकरण का काम चल रहा था, कुछ सिविल इंजीनियर धागे व यंत्रों से नाप ले रहे थे।


जिगजैग सड़क के साथ हम आधे घंटे में ऐसे स्थान पर पहुँचते हैं, जहाँ रास्ता काटने वाली जेसीबी मशीन खड़ी थी। अर्थात इसके आगे अभी रास्ता कटना शेष था।

यहीं से पतली पगडंडी के सहारे नीचे उतरते हैं। बीच में 20 मीटर का खड़ी ढलान वाला छोटी सीढ़ियाँ काटकर बनाया रास्ता मार्ग की पहली चुनौती लगा। यहाँ एक कदम की लापरवाही घातक सिद्ध हो सकती थी। दिन के उजाले में ही जब यह इतना चुनौतीपूर्ण लग रहा था, तो रात को तो किसी नौसिखिए या बिना गाइड़ के यात्री को इस रास्ते पर चलने की सलाह नहीं दी जा सकती। किसी तरह हम सब व शेष यात्री सही सलामत यहाँ से नीचे उतरते हैं। नीचे कुछ दूरी पर हमारी पगडंडी पुराने समतल रास्ते से मिलती है, जहाँ से आगे का मार्ग चौड़ा व सीधा गौंडार की ओर बढ़ता है।

बीच में एक झरना व नाला पड़ता है, जिसपर लौहे का पुल बना है।


इसके दाएं किनारे पर एक ढावा कहें या चट्टी यात्रियों के चाय-नाश्ते की उचित व्यवस्था दिखी। पानी के स्रोत के पास ऊतीश के हरे चमकीले पत्तों वाले पेड़ वहुतायत में दिखे, जो इसके लिए आदर्श स्थल रहते हैं। झरने के बाद थोडी देर में एक मोड़ पर भगवती का छोटा सा मंदिर पड़ता है, जहाँ माथा नवाकर हम आगे बढ़ते हैं। यहाँ से गौंडार बिल्कुल पास ही सामने दिख रहा था। और नीचे मधुगंगा का दुधिया जल पूरी गर्जन-तर्जन के साथ आगे बढ़ रहा था। 

थोड़ी देर में हम गौंडार गाँव में प्रवेश कर रहे थे। यहाँ पर्यटकों की पूरी चहल पहल थी। कुछ यहाँ से राँसी की ओर बापिस चल रहे थे और अधिकाँश महमहेश्वर की ओर, कुछ यहाँ के होम-स्टे व ढावों में नाश्ता के लिए रुके थे। हम भी यहीं सड़क के साथ लगे एक ढावे में विश्राम करते हैं, चाय-बिस्कुट की हल्की रिफ्रेशमेंट लेते हैं।

यहीं के नल से बोटल में पहाड़ी चश्में का जल भरते हैं। और यहाँ पर एक पालतु सफेद कुतिया को बिस्कुट खिलाते हैं, जो अनजान लोगों के साथ घुलमिल कर अपना काम चलाने की अभ्यस्त दिखी। यहाँ आठ बज चुके थे। अर्थात दो घंटे में हम अगतोलीधार से, व अढ़ाई घंटे में रांसी से यहाँ पहुंच चुके थे। पांच किमी हम तय कर चुके थे और एक किमी आगे संगम तक शेष था। 7000 फीट से लगभग 5000 फीट की ऊंचाई तक उतर चुके थे।


आगे का रास्ता पहले सीधा, फिर ढलानदार, फिर सीधा व अंत में झुले के पास सीधे नीचे उतरता है। पहली ढलान वाला रास्ता संकरा और लैंडस्लाइड जोन में बना है। दाईं ओर गहरी खाई सीधे मधुगंगा तक जा रही थी। मार्ग के अंत में संगम के ठीक ऊपर झूला अभी नहीं चल रहा था, जो सीधे बनतोली से जोड़ता है। पहले यहाँ पुल था, जो पिछले वर्षों बाढ़ में बह गया। इसलिए अब संगम तक नीचे उतराई वाला रास्ता तय करना पड़ा, और इसका अंतिम छोर दो समांनांतर पत्थऱ सीमेंट की मेढ़ से होकर पुरा किया।

रास्ते की दूसरी चुनौती - पहले आसान मानकर इसके बीच के मिट्टी वाले रास्ते पर चल दिए, आगे पता चला कि ये तो खच्चरों का मार्ग है, जो उनकी लीद से भरा था। जिस पर चलना लीद की दुर्गंध के साथ जुत्तों को पूरा कीचड़ में डुबो रहा था। किसी तरह डंडे के सहारे सहयात्री का हाथ पकड़ ऊपर मेड़ पर चढ़ते हैं और आगे बढ़ते हैं। यहां से निकलने के बाद फिर मिट्टी व पत्थरों में झटककर जुत्ता साफ करने की कवायद चलती रही।

यात्रियों को रात को व अंधेरे में इस रुट पर न चलने का सुझाव दिया जाता है। एक तो इसमें पहले ढलान वाले रास्ते व फिर रिज वाले बिंदु पर अंधेरे में फिसल कर चोटिल होने का खतरा है। इसी कारण अगले दिन मदमहेश्वर की ओर जा रहा एक दल रात को यहीं से गौंदार बापिस हो गया था। रांसी से बनतोली तक यह दूसरा चुनौतीपूर्ण बिंदु है, जो अंधेरे में अकेले चलने लायक नहीं है। आगे यदि यह दुरुस्त हो जाता है, तो बात दूसरी है।

पचास मीटर उतराई के बाद हम संगम से थोड़ा ऊपर बनी लकड़ी की पुलिया के पास थे, जहाँ मदमहेश्वर के दायीं ओर से आ रही मार्कंड गंगा अपने दुधिया जल राशि को लिए पूरे वेग के साथ जैसे हर-हर महादेव का गुंजार करती हुई नीचे मधुगंगा से मिलन के लिए आगे बढ़ रही थी।


पुलिया से इसका दृश्य एक अलौकिक अनुभव दे रहा था, जो इस रूट का एक विलक्षण पल था। लगभग सभी यात्री यहाँ कुछ पल रुककर इस अद्भुत दृश्य व इसके दिव्य निनाद को आत्मसात करते हुए किसी दूसरे लोक में विचरण करते नज़र आ रहे थे। इसको पार कर कुछ साहसी लोग मधुगंगा के बर्फीले जल में डुबकी लगा रहे थे। निश्चित रुप से इसका ग्लेशियरों से निकला जल अपने हिमालयन टच के साथ उनको रिफ्रेश और रिचार्ज कर रहा था।

यहाँ से गौंड़ार पीछे दिख रहा था और आगे सामने ऊँचा पर्वत जिसकी गोद में बनतौली गाँव बसे हैं, जिनको पार करते हुए हमें मदमहेश्वर की ओर बढ़ना था। यहाँ से कुछ ही दूरी पर बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे। यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे, यहां भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं। यहाँ परौंठा, चाय, अचार और घर की दहीं के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं, संयोग से बापिसी में अगले दिन यहीं हमारे रात को रुकने का भी ठिकाना बनता है। (जारी, शेष अगले ब्लॉग-4 में)


मंगलवार, 30 जून 2026

जीवन दर्शन

 


कृपा उसकी परम मंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास

अल्पज्ञ मनुष्य  नासमझ मूढ़, सर्वज्ञ होने का भ्रम पाल बैठा,

लेकिन प्रकृति की विराटता विकरालता के समक्ष बौना हो बैठा।


माना ईश्वर का अंश, ईशतुल्य, जीव अविनाशी,

लेकिन अपनी मानवीय सीमाओं का भी तो बोध होना चाहिए।


मदहोशी में, अपने सम्यक बोध के अभाव में हो जाती हैं गलतियाँ,

कोई बड़ी बात नहीं, समझ आने पर भूल सुधारने में क्या देरी।

वह सर्वज्ञ सर्वसमर्थ, तुम्हारा सब जाने, अतीत वर्त और भविष्य,

उसकी कालजयी योजना का तुम क्या पार पाओगे।


उसकी दुर्भेद्य प्रकृति का एक झटका लगे कठिन परीक्षा,

जन्मों के संचित कर्म, प्रारब्ध चटकेंगे पल भर में कुछ ऐसे।

तत्काल प्रकृति का क्रूर विधान, अत्याचार, अन्याय लगेगा,

समय के साथ इसके पीछे का करुणा विधान समझ आएगा।


जो नहीं कर पा रहे जन्मों से, वह इसी जन्म में हो जाएगा,

चटांक बुद्धि से न लगाओ तड़का परिस्थितियों के चक्रव्यूह पर।


वह है सत्य शिव सुन्दर, अणु विभू सौम्य, अखण्ड प्रचण्ड विकराल,

उसकी कृपा है परममंगलमयी, रखना बस उस पर अटल विश्वास।


सोमवार, 29 जून 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-2

 

उखीमठ से रांसी

7 जून रविवार, 2026 - उखीमठ समुद्रतल से 1311 मीटर (4301 फुट) फीट की ऊँचाई पर बसा कस्बा है व यह सर्दियों के दौरान जब ऊंचाईयों में भारी बर्फवारी पड़ती है, तो उस दौरान भगवान केदारनाथ और भगवान मदम्हेश्वर के शीतकालीन प्रवास और पूजा स्थान के रुप में जाना जाता है। उखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर इसीलिए जाना जाता है। उखीमठ पौराणिक महत्व का स्थान भी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह हुआ था। इसी कारण इस स्थान का नाम उषामठ पड़ा। मालूम हो कि उखीमठ ही चोपता, तुंगनाथ और देवरियाताल जैसे ट्रेकिंग, पर्यटन और तीर्थ स्थलों का मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।

उखीमठ से आगे बढ़ते ही बाहर हवा में हिमालय टच वाला शीतल अहसास मिलना प्रारम्भ हो जाता है। हरी-भरी वादियों में प्रवेश के साथ लग रहा था कि हम एक नए परिवेश में आ गए हैं। रास्ते में गिरिया, मोनसुना मार्केट आते हैं। इस राह पर प्राकृतिक झरने स्वागत करते हैं।


रास्ते का प्राकृतिक दृश्य धीरे-धीरे अपने पूरे शबाव की ओर बढ़ता जा रहा था। सीढ़ीदार खेत, झरने, नाले और दूर पर्वतों की अंतहीन श्रृंखलाएं रास्ते को खुशनुमा बना रही थीं। मोनसुना मार्केट से बारिश से बचने के लिए एक रेनकोट खरीदते हैं।

आगे नीचे उतरते हुए एक पहाड़ी नदी पार करते हैं।


रास्ते में विराने में एक क्रिकेट मैदान ध्यान आकर्षित करता है। रांसी की ओर बढ़ता सफर एक नए प्रदेश में प्रवेश की सघन अनुभूति दे रहा था। सीढ़ीदार खेतों की अंतहीन श्रृंखला, घने जंगल, प्रकृति की गोद में बसे घर, आसमान छूते हरे-भरे पर्वत और सबसे ऊपर शहर के शौर-शराबे, किच-किच व प्रदूषण से रहित गाँव की शुद्ध आवोहवा और शांत एकांत परिवेश में स्वय को पाकर ऐसे लग रहा था कि कुछ दिन यहीं रुकें। एकांतिक रिट्रीट के लिए यह क्षेत्र एक आदर्श स्थल प्रतीत हो रहा था।

रास्ते में पहाड़ी कस्बे उनियाणा से होकर गुजरते हैं, जहाँ होमस्टे की बहुतायत दिखी। आगे खड़े पहाड़ को काटकर बनाए गई सड़क के साथ हम साढ़े चार बजे राँसी पहुंचते हैं।


यहां हल्के अभिसिंचन के साथ हमारा स्वागत होता है। पहले भवन पर ही हमारा वाहन खड़ा होता है, पास के ढावे के मालिक भट्ट साहब की सज्जनता और ईमानदारी को देखकर पहाड़ी मानुष का अक्स जेहन में कहीं गहरे छू जाता है। और यहीं चाय नाश्ते के लिए रुकते हैं।

थकान के चलते इसी ढावे में मैगी और चाय के लिए कहा, जिसका लाजबाव स्वाद देख हम लोग कायल हो गए। इनका पूरा परिवार इस कार्य़ में सहयोग दे रहा था। यहीं पर सामने कोमल टूरिस्ट एंड ट्रेकिंग प्वाइंट में रुकने की भी व्यवस्था हो जाती है और यहीं रात के भोजन की भी बात पक्की कर लेते हैं।


साथ ही राँसी के बार में मोटा-मोटी जानकारी बटोर लेते हैं। पता चला कि राँसी की अधिष्ठाक्षी माता राकेशवरी देवी के दर्शन से आगे की यात्रा शुभ मानी जाती है। इन्हीं के दर्शन के बाद बाबा मदमहेश्वर के दर्शन फलित होते हैं। हो भी क्यों न, आखिर शिव-शक्ति के युग्ल से ही सृष्टि संचालित है और उन्हीं की कृपा से जीवन की पूर्णता सुनिश्चित होती है।

सो हम कमरे में सामान रखकर, फ्रेश होकर मंदिर में माता के दर्शन करने निकल पड़ते हैं। मुख्य मार्ग से मुश्किल से 300 मीटर ऊपर मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर के बाहर जूत्ता स्टैंड पर जुत्ते उतारते हैं, अंदर कौने में लगे वाश-वेसिन से हाथ धोकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।


मंदिर के पूजारी भट्ट साहब का सज्जनोचित्त एवं नेक व्यवहार प्रभावित करता है। मंदिर में विभिन्न विग्रहों से परिचय होता है। राकेश्वरी माता के साथ विष्णु भगवान, सत्यनारायण भगवान, मन्नणी माता, हनुमानजी, गणेशजी आदि के दर्शन होते हैं। पता चला कि मन्नणी माता का मूल स्थान यहाँ से 30 किमी ऊपर है, जो कठिन ट्रेक के बाद ही पूरा होता है। इसी स्थान पर भगवती ने महिषासुर का बध किया था।

राकेशवरी माता की पौराणिक कथा भी कम रोचक नहीं है। पता चला कि चंद्रदेव ने अपने दुराचार के पाप का प्रायश्चित यहीं पर किया था और माता की कृपा से अमृत तत्व की प्राप्ति हुई थी। इस तरह से प्रायश्चित तप की पौराणिक स्थली के रुप में इस मंदिर का महत्व स्वयं में महत्वपूर्ण है। नैष्ठिक साधक नौरात्रि में विशेषरुप से यहाँ आकर साधन-अनुष्ठान करते हैं।

राकेश्वरी माता के दर्शन के बाद हम बाहर परिसर में कुछ यादगार पलों को कैप्चर करते हैं। छोटे बच्चे परिसर में उछलकूद कर रहे थे। यहाँ से गाँव का नजारा देखने लायक था। प्रकृति की गोद में बसा एक पारंपरिक पहाड़ी गाँव स्वयं में परिपूर्ण प्रतीत हो रहा था। लोकल लोगों से बातचीत करने पर उनकी चिंता का अहसास भी हुआ। उनका मानना था कि गाँव का प्राकृतिक एवं पारम्परिक स्वरुप धीरे-धीरे खो रहा है। जैसे-जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही है, व्यापार बढ रहा है, पारंपरिक सरलता तरलता धीरे-धीरे कम हो रही है।

रास्ते से मदमहेश्वर साइड का नज़ारा देखने लायक था। बर्फ से ढकी चोटियाँ, कुछ बादलों से ढकी व कुछ स्पष्ट।


जानकारों के अनुसार उन्हीं की गोद में नंदी कुंड है। मदहेश्वर बाबा यहाँ से नहीं दिखते। इनका क्षेत्र यहाँ से वाईं ओर पहाड़ों के पीछे पड़ता है। नीचे गहराई में पुष्पगंगा नदी और सीढ़ीदार खेत, सामने जंगलों से लदे पहाड़। लगा जैसे प्रकृति अपने सारे रुप दिखाने के लिए तत्पर थी।

पहले साफ मौसम, फिर अचानक नीचे घाटी से बादलों का उमड़ना गुब्बार और पूरा कस्बा इसमें समाहित। बादलों का गुब्बार हम सबको छूते हुए, आलिंग्न करते हुए पार हो जाता है। कुछ ही देर में उस पार पहाड़ी के शिखर से इंद्रधनुष के दर्शन। लगा जैसे प्रकृति अपनी सतरंगी छटा के साथ सारे रुपों का दर्शन करवाकर हमें कृतार्थ कर रही हो।  

अंत में यहां की मार्केट का अवलोकन करते हैं। रास्ते में बारिश से बचने के लिए जुत्तों की खोज करते हैं, लेकिन साइज के जुत्ते नहीं मिलते, सो मज़बूरी में प्लास्टिक की चप्पल खरीद लेते हैं, कि आपात में काम जाएगी। नहीं मालूम था कि यही आगे यात्रा का पासा पलटने वाली थी। यहीं से रिंगाल की मजबूत लाठी 50 रुपए में खरीदते हैं। फिर शहर के उस छोर पर आगे झरने तक जाते हैं।


बीच में टैंट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी।

खच्चरों पर रस्द सामग्री आगे जा रही थी। कुछ मिलाकर इस छोटे से पहाड़ी कसवे में यात्रियों की चहल-पहल देखने योग्य थी। जिनमें बंगाली ट्रेक्करों की बहुतायत दिखी। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर-प्रदेश, मध्य्-प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखण्ड व हिमाचल से भी यात्री दिखे। लोक्ल लोगों से बातचीत पर सुनने में आ रहा था कि अबकी बार मदमहेश्वर के लिए काफी पर्यटक व तीर्थयात्री आ रहे हैं। अगले साल से यह कहीं दूसरा केदार न बन जाए।

अपने होटल में आकर रात का भोजन करते हैं। रोटी, आलू की सब्जी, दाल और चाबल, साथ में आचार और पहाड़ी खीरे का सलाद।


भोजन से तृप्त होकर कमरे में रात को सो जाते हैं, सुबह तड़के जो आगे चलना था। रात को पुष्पगंगा के जल की सांय-सांय की ध्वनि नादयोग का अहसास दिला रही थी।

सुबह ब्रह्ममुहुर्त के अंधेरे में ही नींद खुल गई थीं। बाहर आकर देखते हैं कि अंधेरे में दूर व नीचे गाँव में रोशनी टिमटिमा रही थी।


सड़क में नीचे चहल-पहल थी। यात्री आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे थे। सुबह चार बजे ही जागरुक यात्री बढ़ निकलते हैं। हम भी टीम के साथ साढ़े पाँच बजे तक नहा धोकर, सन्ध्या वंदन कर टीम के साथ चल पड़ते हैं।

एक जीप प्रति व्यक्ति 30 रुपए के हिसाब से अगतोलिधार छोड़ती है, जो राँसी के आगे 2 किमी दूरी पर है। यही वाहनों का अंतिम पड़ाव है, यहाँ से आगे पैदल चलना पड़ता है। हाथ में छड़ी और पीठ में रक्सैक व कंधे पर बैग लिए कदम बढ़ रहे थे मदमहेश्वर की ओर। आज का पहला प़डाव था यहाँ से छः किमी दूर गौंडार गाँव। हम राँसी के 7000 फीट की ऊँचाई से गौंदार के 5000 फीट ऊंचाई तक उतरने वाले थे। और फिर यहाँ से 12,500 फीट की ऊँचाई तक 10 किमी चढ़ाई करने वाले थे। (जारी...शेष अगले खण्ड-3 में)

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