शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-6

बापिसी यात्रा - मदमहेश्वर से बनतौली

महमहेश्वर की सुबह – रात को सोते-सोते 12 बज गए थे। ठंड व थकान इतनी थी कि मोटे कम्बलों के बीच घुसकर कब नींद आई पता ही नहीं चला। सुबह 6 बजे नींद खुल गई थी। तम्बू की चैन खोलकर देखते हैं, तो बाहर खोरशू के बड़े-बड़े पेड़ हमारा स्वागत कर रहे थे और मैदान का कौना जंगली पालक घास से अटा पड़ा था।

तम्बू से बाहर निकलकर एक वार पूरा नज़ारा निहारने का मन हुआ। डॉ. सौरभजी जुत्ता पहनने के लिए कह रहे थे, लेकिन हम ट्रेकिंग शूज पहनने की जटिलता से बचने के लिए राँसी से खरीदी नई चप्पल को आधा पैर में फंसाकर बाहर निकल पड़ते हैं। हमारा तम्बू खेत के कौने में था और वाकि तम्बू कतार में सजे थे। पीछे दायीं ओर बाबा का मंदिर और चारों ओऱ का विहंगम दृश्य देखकर आल्हादित था। रात भर सांय-सांय करती नदीं प्रवाहित होने की ध्वनि आ रही थी, वो मधुगंगा थी।

एक हाथ में डंडा व एक हाथ में मोबाइल लिए हम कुछ ही दूर आगे बढ़े थे, कि सामने वाले तम्बू के पीछे जल निकास के लिए बनी छोटी सी नाली की चिकनी मिट्टी में हम अचानक फिसल गए। मोबाइल व डंडा हाथ से छूट चुका था और पीठ में बिजली कौंधने के साथ एक चट्टाका सा हुआ। और गिरने के बाद उठने में बहुत दर्द हो रहा था। हमारे दोनों साथी और नीचे आ रहे एक दूसरे तम्बू के सज्जन मिलकर हमें उठाते हैं और तम्बू के अंदर लिटाते हैं। हम पीठ के बल लेट कर विश्राम करते हैं। लगा कि हम तम्बू में विश्राम करें तो वेहतर रहेगा, दो किमी ऊपर बुढ़ा केदार जाना हमारे लिए ऐसे में ठीक नहीं होगा। बाकि विश्राम के बाद ठीक होने पर मंदिर दर्शन कर लेंगे।

हमारे साथी लोग मंदिर दर्शन कर ऊपर बुढ़ा केदार के लिए निकल पड़ते हैं। हम तम्बू में लेटे विश्राम करते हैं। हम पीठ के बल लेट पा रहे थे, जबकि थोड़ी मेहनत के साथ दायीं ओर वांए भी करवट ले पा रहे थे, लेकिन उठ नहीं पा रहे थे, जिससे कि पालथी मार कर बैठ सकें। हमें लग रहा था कि लोअर बैक में चोट आयी है। ऐसे में लग रहा था कि चलना तो दूर, खच्चर की पीठ पर भी चढ़ नहीं पाएंगे, क्योंकि उसमें कदम पर सीधे झटके लगते हैं। कई बार कोशिश कर पाने के वावजूद उठ न पाने के कारण व हो रहे दर्द के चलते हम हेल्थ एंग्जाइटी के दौरे में उलझ चुके थे व एक ही विकल्प सूझ रहा था कि किसी तरह एयर लिफ्ट किया जाए। लेकिन इस दूर दराज इलाकें में यह कैसे संभव होगा। लगा कि उत्तराखण्ड तो हेली सेवा की बहुत चर्चित है, इसकी व्यवस्था कर लेंगे।

इस दृष्टि से अपने पॉकेट डायरी में मुख्य नाम व फोन लिख देते हैं, ताकि आपात सेवा में जरुरत पड़ने पर काम आ सके। इन दो-तीन घंटों में जीवन की पूरी पिक्चर रील की तरह आँखों के सामने तैर जाती है। लगा कि महादेव द्वारा हमारे प्रारब्ध कर्मों की गहन चिकित्सा हो रही है। उनके धाम में, उनके द्वार पर, उनके चरणों में आकर ऐसी घटना बिना कारण तो हो नहीं सकती। कोई बड़ी घटना छोटे में टल रही है। इसका आध्यात्मिक पक्ष समझते हुए मन को समझा रहे थे, लेकिन यक्ष प्रश्न एक ही था कि हम बापिस 16 किमी ट्रेक कर वाहन तक कैसे पहुँचेंगे।

तम्बू बंद था, धीरे-धीरे धूप निकल रही थी, तम्बू गर्म हो रहा था। और बड़े-बड़े मच्छर तम्बू में विचरण कर रहे थे, लेकिन वो काट नहीं रहे थे। किसी तरह पैर से जुराब उतारकर अंगूठे से तंबू के अंदर के फाटक की जंजीर खेंचते हैं। तम्बू में रोशनी के साथ हवा का शीतल झौंका आता है, कुछ राहत मिलती है। लाठी के सहारे उठने की तमाम कोशिश की, लेकिन नहीं उठ पा रहा था। ऐसे थक-हार कर आंखें बंद कर भोले बाबा व गुरुसत्ता को याद करता हूँ व अपने अस्तित्व का पूरा मंथन चलता है।

हमारे साथियों को भी जब वे गए थे तो इसका अनुमान नहीं था। वो सोचे थे कि कुछ चोट आई है, विश्राम करेंगे तो बापिस जाने के लायक हो जाएंगे। जब वे दो-तीन घंटे बाद आते हैं तो उनसे अपनी स्थिति को स्पष्ट करता हूँ और एयर लिफ्ट का विचार सामने रखता हूँ। बिना किसी हेलीपेड के यह कैसे संभव है, यह बात सामने आई। फिर इस विकल्प के हटते ही दूसरा विकल्प आया कि स्ट्रेचर के सहारे बापिस जा सकता हूँ। लेकिन यहाँ इसकी आपात व्यवस्था है भी कि नहीं, यह प्रश्न उठा।

हमारी स्थिति का आंकलन करते हुए दोनों साथी हमको दोनों हाथ व कंधों से पकड़कर खड़ा करते हैं, जिसमें हमें कोई विशेष दिक्कत नहीं आई। मैं दो डण्डों के सहार खड़ा हो पा रहा हूँ, देखकर मैं अचंभित था। दोनों लाठी के साथ हमें चलने में कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही थी, हाँ सीढ़ी व खाई में काफी संभलकर चलना पड़ रहा था। लेकिन गिरने व चोटिल होने का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य साथ में था। ईश्वरीय कृपा से व साथियों के सहयोग से हम धीरे-धीरे एक-एक साइकोलॉजिक्ल बैरियर टूट रहे थे।

जुत्ता पहन, दोनों हाथों में डंडे लेकर साथियों की सहायता से हम थोड़ा ऊपर आते हैं। एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं, ऊंची कुर्सी में भी बैठ पा रहा हूँ, देखकर राहत मिलती है। तम्बू का बाकि समान भी पैक होकर आता है। स्वतः ही सीट पर बैठने व चलने के विश्वास के साथ हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए, मुख्य मार्ग पर आते हैं, वहीं से बाबा को प्रणाम कर पीछे मुख्य ऑफिस तक आते हैं, वहाँ किसी तरह फ्रेश होते हैं, चाय नाश्ता करते हैं। भूख मर चुकी थी, अपनी पसंदीदा मैगी खाने का कोई मन नहीं कर रहा था, किसी तरह से कुछ चम्मच लेते हैं, चाय-विस्कुट उदरस्थ करते हैं, क्योंकि साथियों द्वारा मंदिर के पास के डॉक्टर से लाई गई पेन किल्लर लेनी थी।

कल रात को दिल्ली से आई ट्रैकर, जिसको हम लोग अंधेरे में सहायता किए थे, वह भी रास्ते में मिली, सही सलामत बापिस जा रही थी। रात के सहयोग का आभार व्यक्त करती हुई वह हमें एक स्प्रे गिफ्ट करती हैं, जो मस्ल पैन से राहत देने के लिए थी। लगा कि कुछ भी संयोग से घटित नहीं होता और अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा ही रहता है। इस तरह बाबा को दूर से ही प्रणाम कर हम लोग बापिस रांसी की ओर चल पड़ते हैं।

शुरु के सीधे रास्ते चलने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। फिर जहाँ सीढ़ी आती, वहाँ लाठी के सहारे इसको भी संभलकर पार करते गए। हम चल पा रहे हैं, हमें विश्वास नहीं हो रहा था। हम अपनी स्थिति देखकर प्रमुदित थे, कहाँ एयर लिफ्ट और स्ट्रेचर से चलने की बात और कहाँ हम दो लाठियों के सहारे चल रहे थे। लगा जैसे बाबा व गुरुसत्ता की कृपादृष्टि प्रत्यक्ष हमें चला रही है और इस तरह अढाई किमी नीचे कूनचट्टी तक पहुँच चुके थे।

कून चट्टी के नीचे बारिश शुरु हो गई थी। सो रेन कोट को ओढ़कर चलते हैं। कुछ लोग खड़ी चढ़ाई में शॉर्टकट मार रहे थे, वह भी पीठ मे समान लादे, जो हमें बहुत खतरनाक प्रयोग लग रहा था। क्योंकि बैग के साथ एक कदम भी पैर फिसलने के परिणाम बहुत घातक हो सकते थे। उन्हें इसके बार में सचेत भी करते हैं। स्थानीय लोग इन शॉर्ट कट में चलने के आदी होते हैं, उनकी नकल नहीं की जा सकती। बीच में बारिश थमती है, तो आगे नीचे घाटी का रास्ता स्पष्ट दिख रहा था।

जहाँ विश्राम करते, वहाँ से नीचे का दृश्य कैप्चर करना नहीं भूलते। क्योंकि थकने पर कुछ पल का विश्राम और प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों के देखकर नई ऊर्जा पाते। दूसरा चढ़ाई में नीचे के दृश्यों पर उतना ध्यान नहीं था, क्योंकि दृष्टि सीधा आगे व ऊपर मंजिल की ओर थी। लेकिन उतराई में नीचे घाटी और दूर पर्वत श्रृंखलाओं के नजारे बहुत स्पष्ट रुप में दिख रहे थे। सो यथासंभव इनको कैप्चर करते रहे।

इस तरह हम नानू चट्टी के पहले की दुकान तक पहुँचते हैं, जहाँ चढ़ते समय मैगी खाई थी। आज यहाँ पराँठा आर्डर करते हैं। लेकिन परांठा खाने का मन नहीं कर रहा था। किसी तरह एक तिहाई खाते हैं। हमारी भूख ही मर गई थी। इसी बीच पाँच युवा आते हैं और सीधे दस पराँठा आर्डर देते हैं। हम सोचते ही रह गए की ये कौन हैं, जो इतना पराँठा खाने का कांफिडेंस लिए हैं। 

बात करने पर पता चला कि ये छत्तीसगढ़, राजनंदगाँव से आए हैं। फिर तो उनसे चर्चा होती है तथा परिचय ओर सघन होता है। ये सुपर फिट युवा थे अपने बीस-पच्चीस की वय में। ये सुबह राँसी से चले थे, और आज ही बुढ़ा केदार से होकर नीचे बापिस हो रहे थे। यह अपवाद श्रेणी के वो ट्रेकर थे, जो लम्बे ट्रेक के अभ्यस्थ रहते हैं तथा इनकी संख्या पाँच-सात प्रतिशत रहती होगी।

यहाँ से नीचे उतरते हैं, तो बारिश और तेज हो जाती है। अब बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।


लग रहा था कि चढ़ाई में तो बाबा ने हमको वख्श दिया था, लेकिन उतराई में हमारे सारे प्रारब्ध कर्मों को धोने जा रहे थे। इसी बारिश में हम लोग खट्टरा पहुँचते हैं, यहीं रास्ते में चंडीगढ़ से आए सज्जन मिले, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता को श्रवण की भाँति तीर्थाटन के लिए लाए थे। माताजी का जीवट अभी उताराई में भी बैसे ही बर्करार था।

खट्टरा तक अंधेरा हो चुका था, हम अपने मोबाइल टॉर्च के सहारे नीचे उतर रहे थे। घुटने की नीचे की पिंडलियाँ जोर पकड़ रहीं थी और पैर शरीर का भार उठाने में असक्षमता जाहिर कर रहे थे। इसी तरह हम कल सुबह के टीन शैड़ वाले उस बिंदु को पार करते हैं। रात को यह बंद हो चुका था। सौरभजी हमें सहारा देकर नीचे उतरने में मदद कर रहे थे। रजतजी रोशनी के साथ रास्ता स्पष्ट कर हमारा सफर सरल बना रहे थे।

इस तरह तेज बारिश के बीच हम कल के रिंगाल जंगल व बुराँश पेड़ इलाके को भी पार करते हैं। इसके बाद अंतिम दो जिगजैग ट्रेक रात के इतना लम्बे लग रहे थे कि खत्म होने का ही नाम नहीं ले रहे थे। अंत में कौने पर पहुँचने पर बनलौती के  भवनों की रोशनी टिमटिमाती दिखती है, तो कुछ राहत मिलती है। लेकिन गांव में प्रवेश तक के कुछ सौ मीटर भी कई किमी जैसे लग रहे थे। पैर जैसे जबाब दे चुके थे।

इस रुट पर बिना तैयारी, हमारी तरह चल चुके यात्री इस स्थिति को भलीभाँति समझ रहे होंगे। लो वह ठिकाना आ गया, जहाँ हम कल सुबह नाश्ता किए थे, यहाँ लोगों की चहल-पहल थी, भोजन पानी चल रहा था, पता चला कि यहाँ रुकने की भी व्यवस्था है। यहाँ अंदर सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते हुए कमरे तक पहुँचते हैं। और गर्म पानी में हाथ पैर धोकर, सरसों के तेल की मालिश कर सोते हैं। चाबल रोटी, आलू-सोया बडी, दाल का बेहतरीन एवं पसंदीदा भोजन आता है, लेकिन हमारी भूख मर चुकी थी। भोलेनाथ की कृपा का आभार व्यक्त करते हुए बिस्तर मे जाते हैं कि आज की 10 किमी की यात्रा इस अवस्था में पूरी हो गयी थी। (जारी, शेष अगले भाग-7 बनतौली से रांसी वाया गौंदार और घर बापिसी)

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-5


नानू से मदमहेश्वर

अब बारिश थम चुकी थी। नानू चट्टी से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। थोड़ा आगे बढ़ने के बाद अब ऊपर का जिगजैग मार्ग दूर तक दिख रहा था, जिसमें यात्रियों का आवागमन चल रहा था। ऊपर से बापिस आ रहे यात्रियों में कुछ ही चुस्त-दुरुस्त अंदाज में नीचे उतर रहे थे। अधिकाँश की चाल में थकान व ठहराव दिख रहा था। कुछ तो नंगे पैर ही धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे, स्पष्टया पैर में छाले पड़ने के कारण उनको चलने में दिक्कत हो रही थी। कुछ किसी तरह स्वयं को नीचे घसीट रहे थे।

स्पष्ट है कि यह ट्रैक यात्रियों से पूरी तैयारी की माँग करता है। उत्साह में उठकर किसी के कहने पर चल देने वालों के लिए यह ट्रेक नहीं है। जो पहले से ही लम्बी यात्रा के अभ्यस्त हों या इसके लिए पर्य़ाप्त तैयारी करके आए हों, उनके यह ट्रेक पूरे एडवेचर एवं आनन्द से भरा हुआ है। क्योंकि इसकी खूबी इसकी प्राकृतिक समृद्धता है, जो अभी अपने नैसर्गिक रुप में बर्करार है। लेकिन ट्रैक की चढ़ाई अपनी जगह चुनौतियों के पहाड़ की तरह यात्रियों की कदम-कदम पर परीक्षा लेने के लिए तैयार दिखती है। ऐसे ट्रेक में सही जुत्तों का भी अपना महत्व रहता है। यदि जुत्ते सही न हों तो येही रास्ते का एक बड़ा व्यवधान बन जाते हैं, जो इस रुट पर दिखा रहा था। कुछ लोग जुत्ता उतारकर नंगे पैर ही नीचे उतर रहे थे।

हर-हर महादेव की गुंजार आते-जाते यात्रियों के उत्साह में बर्धन कर रहा था। थोड़ी ही देर में हम एक ऐसी जगह पहुंचते हैं, जहाँ सड़क के ऊपर नीचे दो-चार दुकानें सजीं थी। यहाँ रिफ्रेशमेंट के लिए यात्रियों की भीड़ लगी थी। हम नीचे वाले ढावे में प्रवेश करते हैं। यहाँ मैगी और चाय का आनन्द लेते हैं। हालाँकि स्वाद में राँसी वाला स्वाद नहीं था, लेकिन इस ऊंचाई व विरान इलाके में पेट भरने की यह कामचलाऊ व्यवस्था भी कम नहीं थी। यहाँ भी पूरा परिवार इस कार्य में लगा दिखा।

यहाँ से आगे का जिगजैग रास्ता काफी दूर तक स्पष्ट दिख रहा था। और बीच में काफी सीधा भी। रास्ते में खड़ी चट्टानें व गहरी खाइयाँ स्वागत कर रही थीं, जो कई हजार फीट नीचे सीधे नीचे मधुगंगा की ओर ईशारा कर रही थीं। लेकिन रास्ते का प्राकृतिक सौंदर्य़ इन खतरों पर भारी था, अतः ध्यान अपने रास्ते पर रहता है, जहाँ थोड़ा दम भरते, वहाँ से सामने व चारों ओर के नजारों पर भी एख नज़र डालते, जो काफी सुकूनदायी व ऊर्जा भरने वाला रहता।

बता दें कि इस रुट में खड़ी चढ़ाई के बाद, जहाँ भी थोडा सा सीधा रास्ता मिलता, वहीं कुछ राहत का भाव जागता, क्योंकि सीधी खड़ी चढ़ाई में सांस फूल रही थी। ऊंचाई 9000 फीट से अधिक बढ़ने के साथ ऑक्सीजन का स्तर कम होता जा रहा था, फैफड़े को अतिरिक्त ऑक्सीजन की जरुरत महसूस हो रही थी, जिस कारण दिल की धड़कनें बढ़ जाती और इस पर दबाव स्पष्ट अनुभव हो रहा था। और कुछ पल विश्राम करने पर वह सामान्य हो जाता है। और शरीर उस ऊँचाई के प्रति अभ्यस्त (acclimatize) हो जाता और फिर हम आगे बढ़ चलते। सीधे रास्ते में यह चुनौती हट रही थी। अतः सीधा मार्ग हर चढ़ाई के बाद राहत का सबब बनकर यात्रा को कुछ सरल बना रहा था।

रास्ते में अब जिगजैग मार्ग लगभग समाप्त हो रहे थे, व आगे मोड़ से वाएं मुड़ते हुए हम नए परिवेश में प्रवेश करने वाले थे। अहसास जग रहा था कि हम महमहेश्वर के समीप पहुँच रहे हैं। हालांकि वहां के दर्शन अभी नदारद थे। यहां मैखम्ब नाम की एक छोटी सी चट्टी नजर आई, जहाँ सड़क से थोड़ा हटकर एक लम्बे से भवन में दुकानें दिखीं और सड़क के किनारे पानी की टंकी व नल थे। यहाँ से पानी पीकर व बोटल में भरकर आगे ब़ढ़ते हैं।

रास्ते में साठ से ऊपर के एक बुजुर्ग दम्पति के दर्शन हुए, जो महमहेश्वर जा रहे थे। इनमें माताजी का जीवट देखते ही बन रहा था। वे इस ऊँचाई में भी सधे कदमों के साथ एकचित्त होकर आगे बढ़ रही थी।


रास्ते में इनके सुपुत्र से मुलाकात होने पर पता चला कि माताजी तन से दुबली पतली दिखने पर भी मन की बहुत मज़बूत हैं। बाबा के प्रति प्रगाढ़ आस्था के चलते ये आत्मबल की धनी हैं। निसंदेह रुप में इस रुट पर आस्था का महत्व अपनी जगह भूमिका निभाता है।

पास में ऊपर दाईँ ओऱ के वन्यक्षेत्र में पेड-पौधों का रंग व स्वरुप बदल रहा था। पास के स्थानीय लडके से पूछा कि ये किसके जंगल हैं, उत्तर संतोषजनक नहीं मिला। जबकि हमारा अनुभव कह रहा था कि ये भूरे वृक्षों के जंगल कुछ न कुछ विशेष व वेशकीमती वनसंपदा हैं, क्योंकि इस ऊंचाई पर उगने वाले सभी पेड़-पौधे व झाड़ियाँ विशिष्ट गुण लिए होते हैं। हम अपनी अज्ञानतावश इनके गुण व महत्व को न समझ पाए, वह बात दूसरी है।

आगे से हम इस राह के अंतिम जिगजैग मोड़ से मुड़ चुके थे। और कून चट्टी के समीप पहुँचने वाले थे। यहीं हमें एक गाइड मिलते हैं, जो उम्रदराज व अनुभवी प्रतीत हो रहे थे। पता चला कि वो यहीं के स्थानीय वासी हैं, पिछले कई वर्षों से गाइड का काम कर रहे हैं और आज भी एक ग्रुप के साथ गाइड की भूमिका में थे। उनसे पूछने पर पता चला की ये खोरसू के जंगल हैं, जो हिमालयन इकॉलोजी का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं।


इन्हें बाँज की ही ऊंचाइयों में उगने वाली एक प्रजाति माना जाता है, जिनके (बाँज) दर्शन हमे बनतौली के ऊपर से होना प्रारम्भ हुए थे व नानू चट्टी के ऊपर तक होते रहे।

रास्ते में इनके जंगलों के बीच यात्रा आगे बढ़ती रही। एक बिंदु पर विश्राम के दौरान नीचे घाटी से बादलों का सैलाव ऊपर उठता दिखा, जो कुछ ही पल में पूरी घाटी को ढक लता है, हम लोगों को छूता हुआ यह ऊपर बढ़ता है। निश्चित रुप से इस ट्रेक का यह एक यादगार अनुभव था, लगा जैसे बादल भी हमारा स्वागत कर रहे हों।

इस तरह हम कून चट्टी पहुँचते हैं, जो अब मदमहेश्वर से पहले इस मार्ग की अंतिम मानवीय बस्ती है। इसके प्रवेश द्वार पर ही एक बड़ी सी चट्टान के नीचे रुकने के लिए दो-तीन तम्बुओ की व्यवस्था दिखी, चाय नाश्ते का भी अस्थ्यी इंतजाम वग्ल में दिखा। हमारे पीछे आ रही दो युवतियां तो यहीं रुक गई थीं। थोड़ी आगे एक मोड़ पार कर ऊपर कून चट्टी का भवन व स्टाल मिला, शाम होने के कारण हलचल नहीं थी, अभी यहाँ का शटर बंद था, वग्ल में बस एक चूल्हा जला था। बस यात्री बेंच पर विश्राम के लिए रुके थे। यहाँ नीचे खाली स्थान में तम्बू लगे थे। यहाँ भी रुकने की व्यवस्था थी। पौने सात बज चुके थे, शाम का धुंधलका छा रहा था, हम तो अपनी गिरी हालत के चलते यहाँ भी रुकने की सोच रहे थे, लेकिन साथियों का भाव था कि दो-तीन किमी ही तो शेष बचे हैं, वहीं पहुँचकर विश्राम करते हैं। यहाँ पर स्पष्ट चेतावनी थी कि आगे के 2 किमी तक जल का कोई स्रोत नहीं है। अतः यहाँ के नल से बोटल में जल भरते हैं, और यहाँ के सुन्दर दृश्य को कैप्चर करते हुए आगे बढ़ चलते हैं।

आगे रास्ते में फिर उम्रदराज गाइड से मुलाकात होती है, जो हमें आगे मदमहेश्वर के रास्ते की स्टीक जानकारी भी मिली कि थोड़ा आगे तक तो दो तीन मोड तक कुछ चढ़ाई है, फिर अंत में सीधा रास्ता मदमहेश्वर तक जाता है। इनकी बातों को सुनकर बहुत राहत मिली। वाकि अब तक रास्ते भर बापिस लौट रहे अधिकाँश यात्रियों के निराशाजनक व हतोत्साहित करने वाले ही उत्तर मिलते रहे। खट्टरा व नानू के बीच में एक व्यक्ति ने तो यहाँ तक कह दिया कि अब तक तो वार्म अप ट्रेक था, असली चढ़ाई तो अब आने होने वाली है।

किसी तरह से अपने पूरे जीवट और साहस को वटोर कर सफर कर रहे थके पथिकों के लिए यह परामर्श उसके विश्वास की ढोर को तोड़ने वाला सिद्ध हो रहा था। कूनचटी से ऊपर एक व्यक्ति ने तो ओर भी खतरनाक परामर्श दे डाला था कि मदमहेश्वर से पहले दो-तीन सौ मीटर पानी से भरी फिसलन भरी चढ़ाई है, वहाँ संभल कर चलाना। अंधेरे में सफर कर रहे पथिकों के लिए यह एक खतरनाक चुनौती प्रतीत हो रही थी, पता नहीं अंधेरे में इसे कैसे पार करेंगे, यही पेच मन में पड़ चुका था। जबकि वहाँ से गुजरते हुए ऐसा कुछ भी नहीं निकला। रास्ते में नाले का कुछ पानी सड़क पर फैला हुआ था, जिसकी इतनी खतरनाक व्याख्या की जा रही थी।

अतः हमारा तो सुझाव है कि अपरिवक्व व नौसिखिया यात्रियों से आगे के रास्ते का परामर्श न लेंकोई अनुभवी, परिपक्व या स्थानीय व्यक्ति से ही रास्ते का हिसाब किताब पूछें, जो सही सटीक व आशावादी परामर्श के साथ आपके कदमों का सहारा बनें। वाकि अपनी अंतःप्रेरणा के हिसाब से, अपने होमवर्क के आधार पर अनुमान के सहारे चलते रहने में भी कौन सी बुराई है। रास्ता तो इन्हीं कदमों के सहारे पुरा होना है, सो धीमे-धीमे आगे बढ़ाते रहें।

कून चट्टी से बढ़ते हुए रास्ते में अंधेरा छा रहा था। आगे का रास्ता कहीं चढ़ाई भरा मिला, फिर सीधे रास्ते की राहत और फिर चढ़ाई। अंधेरा बढ़ने के कारण मोबाइल टॉर्च जलाते हैं। रास्ते में दिल्ली की दो ट्रेक्कर आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करती दिखीं। इनमें से बजनदार ट्रेकर को चढ़ने में दिक्कत हो रही थी। साथी ट्रेक्कर हौंसला बधाई कर चलने का दबाब बना रही थी।

मैं भी इसी कैटेगरी में आगे बढ़ रहा था और बच्ची की तकलीफ को अनुभव कर पा रहा था। यहाँ मात्र हौंसला फजाई या दबाव से काम चलने वाला नहीं था। यात्री की वास्तविक स्थिति को समझने की आवश्यकता थी। थोड़ा दूर चलने, जहाँ धड़कन अधिक बढ़ने लगे, वहाँ थोड़ा रुकने, श्वांस को सामान्य करने व फिर चलने का रुटीन ऐसे में काम आ रहा था, वही उसको बताया। इस तरह धीरे-धीरे अंधेरे को चीरते हुए हम लोग मोबाइल टॉर्च के सहारे आगे बढ़ रहे थे।

अंधेरे में चढ़ाई वाला रास्ता समाप्त ही नहीं हो रहा था, लग रहा था कि इस अंतहीन यात्रा की अंतिम मंजिल के दर्शन कब होंगे। अंधेरे में हमारा दल इन बच्ची के सहचर सहयोगी की भूमिका में इसको आगे बढ़ाता रहा। अब मदमहेश्वर मुश्किल से एक-डेढ़ किमी रहा होगा। इनके ग्रुप का गाइड टोर्च लाइट के साथ इनको खोजते हुए आ चुका था व धीरे-धीरे हम अंतिम चढ़ाई पार करते हैं और फिर समतल रास्ता और सामने मंदिर की टिमटिमाती रोशनी मंजिल तक पहुँचने का आश्वासन दे रही थी और कुछ ही देर में हम लोग मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं। रात के साढ़े दस बज चुके थे। शुरु में तम्बुओं की कतार स्वागत करती नज़र आ रही थी, जिसमें यात्री रुके थे, कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे।

जल्दी महदमहेश्वर पहुँचकर कमरा बुक करने के चक्कर में हमारे एक साथी कुछ घंटे पहले की यहाँ पहुँच चुके थे, लेकिन नेटवर्क बाधित होने के कारण हम लोगों का संपर्क कट चुका था। यहाँ भी मुख्य मंदिर ऑफिस से पता करने व तम्बुओं के पास आवाज देने पर भी कोई सुराग नहीं मिल पाया। लगा कि देर रात तक इंतजार करते-करते थककर सो न गया हो।

अतः एक भवन के सामने लगी कुर्सी मेज पर समान रखकर, हमारे साथी रुकने की व्यवस्था खोजते हैं। बाहर खुले में ठंड इस कदर थी, कि हवा के झौंकों के साथ वह वदन के आर-पार हो रही थी। लेकिन यहाँ इसको झेलने व इंतजार के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। रुकने की वातचीत होने पर हमारे साथी आते हैं और ऊपर मुख्य ऑफिस के बाहर लगे कुर्सी-मेज पर रात का दाल-चाबल खाते हैं। अंदर चूल्हा जल रहा था, लेकिन जुत्ता पहने अंदर प्रवेश संभव नहीं था। बाहर से ही बीरबल की आग की तरह दूरदर्शन से ही इसका ताप लेते रहे। भोजन के उपरान्त यहाँ से उपलब्ध गाइड के साथ समान लेकर नीचे एक खेत में लगे तम्बूओं की कतार की ओर बढ़ते हैं। जंगली घास और ढलानदार खेत के बीच होते हुए नीचे उतरते हैं।

इसी क्रम में हमारा एक साथी ढलान की गिली मिट्टी पर फिसल जाता है, लगा कहीं चोट ज्यादा तो नहीं आ गई। पता चला कि कंधे पर हल्की चोट आई है, बाकि सब ठीक है। फिर हम सब संभल कर आगे बढ़ते हैं और कौने पर एक खाली तम्बू में प्रवेश करते हैं। जूत्ते तम्बू के बाहर गैलरी में रखकर, अपना समान तम्बू के कौने में समेट कर मैट पर बिछे गद्दे पर लेटते हैं, मोटे-मोटे दो कम्बल ओढ़कर मदमहेश्वर बाबा का धन्यवाद ज्ञापन करते हैं कि सही सलामत उनके प्राँगण में पहुँच गए और बाबा को याद करते हुए सो जाते हैं। (जारी, शेष अगले ब्लॉग के भाग-6 में)

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-4



बनतौली से नानू चट्टी

मालूम हो कि मार्कंडगंगा बुढ़ा केदार की ओर से नीचे प्रवाहित होती हैं, जबकि मधुगंगा मदमहेश्वर की ओर से। संगम पर कुछ पल मधुगंगा और मार्कंडगंगा का आलौकिक दृश्य निहारते हुए विश्राम करते हैं। और फिर यहाँ से कुछ ही दूरी पर बसे बनतोली-1 में प्रवेश करते हैं, जहाँ सड़क के दोनों ओर घरों के साथ होमस्टे व ढावे दिखे, जो यात्रियों का स्वागत कर रहे थे।

यहाँ से एक किमी की चढ़ाई पार करते हुए हम बनतोली-2 पहुँचे। रांसी से गौंदार व संगम तक पिछले 6 किमी की उतराई के बाद अब चढ़ाई के संग यात्रा का पहला अनुभव मिल रहा था। साथ ही रास्ते से नीचे संगम व दूर गौंदार साइड के दर्शन हो रहे थे। हम नीचे लगभग 5000 फीट की ऊँचाई से चढना आरम्भ किए थे व हर दो किमी पर औसतन एक हजार फीट ऊंचाई चढ़ रहे थे। अगले 10 किमी में हम लोग लगभग 5000 फीट से अधिक ऊंचाई चढ़ने वाले थे। इसीलिए इस ट्रेक को केदारनाथ ट्रेक से अधिक टफ माना जाता है।

बनतौली-2 में भी ढावों व होमस्टे की उचित व्यवस्था दिख रही थी। यहीं के एक ढावे में हम लोग नाश्ते के लिए रुकते हैं, जहाँ परौंठा, अचार, घर की दहीं और चाय के साथ तृप्तिदायक नाश्ता करते हैं। संयोग से बापिसी में अगले दिन भी यही हमारे रात के रुकने का ठिकाना बनने वाला था। पेटभराऊ नाश्ते के बाद बनतौली से हमारा मदमहेश्वर की ओर का सफर शुरु होता है।

प्रारम्भ में ही बनतोली से दूसरी लम्बी जिगजैग सड़क के  किनारे स्थान-स्थान पर लोगों को खड़े देखा। शुरु में लोगों का यह जमाबड़ा समझ नहीं आया। लेकिन थोड़ी देर में पता चला कि यहाँ से नेटवर्क ठीक-ठाक चल रहा था। निश्चित ही सभी अपने घर-परिवार को अपनी यात्रा की कुशल-क्षेम का संदेश साझा कर रहे थे, क्योंकि आगे नेटवर्क बाधित होने वाला था। यहीं पर महमहेश्वर से आ रहे पर्यटकों से अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने की कवायद भी शुरु हो गई थी।

इस छोर पर एक बड़ी सी चट्टान के बीच से रास्ते आगे खुलता है। इससे ठीक आगे दायीं ओर एक बालक बुराँश व कोल्ड ड्रिंक्स का ठेला लगाए था। संयोग से ठीक इसके सामने सड़क के दूसरी ओर बुराँश का एक युवा पेड़ दिखा, हालांकि अभी इसमें फूल नहीं थे। फूलों का सीजन समाप्त हो चुका था, जो अमूनन अप्रैल अंत से मई तक रहता है। बुराँश के पहले पेड़ के दर्शन के साथ मैं रोमाँचित था, क्योंकि इसके गहरे हरे लम्बे पत्तों के गुच्छ इसको विशेष बनाते हैं और इसके फूलों के साथ बचपन की गई यादें जुड़ी हुई हैं, सो इसको देखकर उन सुखद स्मृतियों का उभरना स्वाभाविक था। यह भी मालूम हो कि बुराँश बर्फिली ऊँचाईयों में ही उगता है, जिसके सुर्ख लाल रंग के फूल देखते ही बनते हैं। इनसे चटनी से लेकर जूस तैयार होते हैं, जिन्हें औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है।

यहाँ एक कुर्सी पर बैठकर बुराँश का एक गिलास पीते हैं, जो पूरी तरह से स्वाद में लाजबाव और तृप्तिदायक रहा। आश्चर्य़ नहीं कि रास्ते से गुजर रहे दूसरे कितने जिज्ञासु यात्रियों को भी बुरांश के लाभ व इसके पेय के लिए प्रेरित करता रहा, लगा कि बापिसी में यहाँ से बुराँश की एक बोटल खरीद लूंगा।


यहाँ से तरोताजा होकर आगे बढ़ते हैं। इसके आगे रिंगाल का जंगल शुरु होता है। सड़क के दोनों ओर इनका हराभरा जंगल व संगसाथ अगले दो जिगजैग रास्ते तक मिलता रहा। इसके वाएं छोर पर अब मार्कंड गंगा के दर्शन हो रहे थे। जो ऊंचे पहाड़ों के होकर संकरी घाटी के संग पूरी गर्जन-तर्जन करती हुई मधुगंगा से मिलने उतर रही थी। अगले दो-तीन जिगजैग रास्तों तक वाईं ओर इसके दूरदर्शन व नैसर्गिक सांय-सांय करता निनाद हमारी यात्रा का सहचर बना रहा।

अब हम एक ऐसे मोड़ पर थे, जहाँ मार्कंडगंगा के दर्शन नहीं हो रहे थे, बल्कि दायीं ओर से मधुगंगा की गर्जन-तर्जन सुनाई दे रही थी। यहाँ हम एक ऐसे बिंदु पर थे जहाँ एक साथ देवदार, बुराँश, चीड़, रिंगाल, बाँज के वृक्षों व कुछ पहाड़ी लतादार झाडियों के दर्शन हो रहे थे। पृष्ठभूमि में मार्कण्ड गंगा की ओर के बादल से ढके बर्फ से ढके पहाड़ झाँक रहे थे।

यहाँ पास के एक सरकारी टीन शेड़ में विश्राम के लिए रुकते हैं। कई यात्री यहाँ विश्राम कर रहे थे व हल्की रिफ्रेशमेंट ले रहे थे। यहाँ वाएं कौने पर बाहर एक बड़ा सा हरा-भरा छायादार पेड़ हवा में अपने बड़े व चौड़े पत्तों को फहरा रहा था, जो हमारे लिए नया था व इसका नाम पता नहीं चल पाया। रिफ्रेश होकर हमलोग यहाँ से आगे चल देते हैं।

आगे की चढ़ाई को पार करने के बाद अगला स्टेशन था खट्टरा चट्टी पहुँचते हैं, जिसे हम अनजाने में रास्ते भर खटारा बोल रहे थे। यहाँ समतल मैदान पर दो-चार भवन बने थे। हाँ रास्ते में पिछले मोड़ पर कुछ तम्बू सड़क के ऊपर-नीचे सजे थे, जो राहगीरों के विश्राम-भोजन एवं रात को रुकने की उचित व्यवस्था किए थे। खट्टरा के गेस्ट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी। यात्रियों के लिए बाहर आंगन में तम्बु भी सजे थे।

बाहर थोड़ा आगे पानी के सिलेंडर आकार की सिमेंट टंकी दिखी, जिसमें एक लकड़ी से छेद बन्द कर रखा था और इसके खोलने पर पानी की धार बह निकलती। यहीं से अपनी प्यास बुझाकर और फिर पानी की बोतल को भर आगे बढ़ चलते हैं। यहीं छायादार पेड़ के नीचे कुछ लोग विश्राम कर रहे थे। मालूम हो कि बनतोली से लेकर महमहेश्वर तक रास्ते में कोई पानी का चश्मा नहीं मिला। ऊँचाई में किसी चश्मे के प्राकृतिक जल स्रोत से पाइप के सहारे पूरी लाइन में जल का वितरण हो रहा था, ऐसा समझ में आया।

खट्टरा से लेंडस्केप में कुछ नयापन दिखता है। एक तो भवनों के नीचे मधुगंगा की ओर ढलान पर छोटे-छोटे खेत दिखे, संभवतः यहाँ आलू व अन्य सब्जियों को उगाते होंगे। दूसरा यहाँ से थोड़ा आगे बढ़ते ही सामने मधुगंगा के प्रवाह की रेखा और पूरी घाटी के दर्शन होते हैं, जिसका नज़ारा फिर कून चट्टी से थोड़ा पहले तक अलग-अलग एंग्ल से पथिकों के मन को लुभाता रहता है।

मधुगंगा के उस पार संकरी घाटियों में नदी से बना एक बड़ा सा झरना मधुगंगा में प्रवाहित हो रहा था, जिसकी शोर करती वृहद दुधिया जलराशि के दर्शन इस पार से ही हो रहे थे। और थोड़ा आगे बढ़ने पर इनके पीछे बर्फ से ढकी चोटियों के दर्शन आल्हादित करते हैं।


महमहेश्वर की ओर के दर्शन अभी नदारद थे। अभी हम अगले स्टेशन नानू चट्टी के दर्शन के लिए वेताब थे, जो अभी दृष्टि से ओझल थी।

खट्टरा से नानू चट्टी मात्र दो किमी आगे बतायी गयी थी, लेकिन खड़ी चढ़ाई के संग चढ़ते-चढ़ते लगा कि 2 किमी खत्म ही नहीं हो रहे। रास्ते में दो-तीन चाय-नाश्ते के ठिकाने भी मिले, लेकिन नानू चट्टी दृष्टि से ओझल ही रही। नानू चट्टी कितनी दूर है, तो ऊपर से नीचे आ रहे यात्रियों का एक ही उत्तर रहता कि बस आने वाली है, थोड़ी दूर है। लेकिन नानू चट्टी के दर्शन ही नहीं हो रहे थे। थकान कुछ इस कदर हावी हो रही थी कि थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बने विश्रामस्थलों पर बैठ जाते। चट्टानी आसन पर बैठ नीचे मधुगंगा की सांय-सांय ध्वनि व उधर से इसमें गिरते झरनों को निहारते रहते।

अगले पडाव में एक बड़े से बाँज वृक्ष के नीचे आराम करते हैं, जिसकी सघन छाया में कई लोग विश्राम कर रहे थे। नीचे तो सीधी मधुगंगा की खाई थी, लेकिन उस पार के नजारे खुबसूरत थे। अगले मोड़ पर सड़क टूट गई थी, इस पर स्थानीय मिस्त्रियों द्वारा काम चल रहा था।

इसके अगला मोड़ पार कर एक समतल स्थान पर बैठते हैं, जहाँ से नीचे पास के जंगल का नजारा दर्शनीय लग रहा था। थकान के बीच इन दृश्यों को निहारते हुए नई ऊर्जा पाते रहे और अगले पड़ाव पर देवदार का छोटा सा जंगल दिखा, जिसे देख मन प्रमुदित हुआ, क्योंकि ऐसा नजारा अभी तक नहीं दिखा था। नीचे से कुछ साहसी लोग शॉर्टकट की खड़ी चढ़ाई से भी आ रहे थे, लेकिन इनमें से कुछ लोगों की हालात देखकर लग रहा था कि एक  कदम की चूक कितनी भयंकर दुर्घटना में बदल सकती थी।

ऊप से नीचे गुजर रहे यात्रियों से आश्वासन मिला कि बस 80 मीटर आगे नानू चट्टी आने वाली है। सही कहें खट्टरा से नानू की 2 किमी की चढ़ाई में नानी याद आ रही थी। हालाँकि हमें लगा कि दूरी 2 किमी से अधिक थी। 3 किमी रही होगी। चढाई में 3 किमी पीठ में लदे बड़े बेग औऱ कंधे में टंगे दूसरे बैग के साथ हमारी उम्र के यात्री के लिए यह एक कठिन परीक्षा बन गई थी।

लगा कि इस रुट की माँग अधिक फिटनेस की माँग कर रही थी। हम अचानक बने इस प्रोग्राम में उठकर चल दिए थे, सोचा था कि अब तक का ट्रेकिंग अनुभव काम आएगा। जबकि इस रुट के लिए तीन-चार सप्ताह पहले आवश्यक फिजिक्ल फिटनेस की तैयारी की जानी थी। खैर अब आधे से अधिक रास्ता पार कर चुके थे, आगे का रास्ता भी इसी तरह पार करना था।

रास्ते में कुछ संगीत प्रेमी लोग अलग-अलग संगीत यंत्रों में भजन से लेकर मनपसंदीदा फिल्मी गीतों की धुन के साथ आगे बढ़ रहे थे। हालाँकि वन विभाग का नोटिस खट्टरा के आसपास चस्पा था कि आप वन अभियारण क्षेत्र से गुजर रहे हैं और यहाँ किसी तरह का संगीत या शोर करना मना है, पकड़े जाने पर जुर्माना भी लिखा हुआ था। क्योंकि वन्य जीवन इससे परेशान हो सकते हैं। कुछ लोगों को इसके बारे में सचेत भी किया, वे मान भी गए। लेकिन आगे लगा कि भोले के भक्तों को हम इंसान क्या व कितना समझा सकते हैं, वे स्वयं ही समझा देंगे।

एक वस्ती के दर्शन होते ही लगा कि चिरप्रतिक्षित नानू चट्टी आ गई। लेकिन अभी भी वह थोडा दूर थी। हल्की बारिश शुरु हो गई थी। रास्ता थोड़ा फिस्लनभरा हो रहा था। यहाँ जल स्रोत के पास खच्चरों का झुण्ड अपनी प्यास बुझा रहा था।


हम भी ऊपर बने छत्तदार भवन में रुकते हैं। लेकिन वहाँ की भीड़ को देखकर लगा कि यहाँ किसी तरह की रिफ्रेशमेंट लेना काफी समय ले सकता है।

हमारी टीम के युवा साथी डॉ. सौरभजी तब तक पास में खच्चर वालों से मोलभाव कर रहे थे। पता चला कि एक खच्चर की कीमत हमारे बजन के व्यक्ति के लिए 5000 रुपए रहेगी। जो हमारी यात्रा के पूरे बजट से अधिक थी। लगा इससे तो बेहतर धीरे-धीरे चलते रहेंगे। अब आगे 2-3 किमी दूर कून चट्टी है और फिर 2-3 किमी पर मदमहेश्वर। बीच में डेढ़ किमी बाद एक अन्य चट्टी आने वाली थी। बैग का सामान आपस में एडजेस्ट करते हुए हमारा पीठ का बैग थोड़ा हल्का हो गया था। और हम अगले पड़ाव की ओर बढ़ रहे थे। (जारी...शेष अगले भाग-5, नानू से महमहेश्वर में)

चुनींदी पोस्ट

In the uplifting company of SWAMI VIVEKANANDA

Stick to your heartfelt CONVICTION, rest assured!                   1.      Be aware of your Divine essence & Love yourse...