शनिवार, 19 सितंबर 2026

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-5 (अंतिम किश्त)

                                                                     श्राद्धकर्म का तत्वदर्शन

पितरों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता की अभिव्यक्ति

भारतीय संस्कृति ने यह तथ्य घोषित किया है कि मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता। अनन्त जीवन श्रृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है। इसलिए संस्कारों के क्रम में 'जीव' की उस स्थिति को भी बाँधा गया है, जब वह एक जन्म पूरा करके अगले जीवन की ओर उन्मुख होता है। कामना की जाती है कि सम्बन्धित जीवात्मा का अगला जीवन पिछले की अपेक्षा अधिक सुसंस्कारवान् बने। इस निमित्त जो कर्मकाण्ड किए जाते हैं, उनके लाभ जीवात्मा की क्रिया-कर्म करने वालों की श्रद्धा के माध्यम से ही मिलते हैं। इसीलिए मरणोत्तर संस्कार को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है।

इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वालों को जिस इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्मों से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति अनुभव करता है। उनकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सानिध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं। श्रद्धा ही उनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध एवं तर्पण किए जाते हैं। 

मुक्त आत्माओं और पितरों के प्रति मनुष्यों को वैसा ही श्रद्धाभाव दृढ़ रखना चाहिए, जैसा देवों-प्रजापतियों तथा परमात्म-सत्ता के प्रति। मुक्तों, देवों, प्रजापतियों एवं ब्रह्म को तो मनुष्यों की किसी सहायता की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु पितरों को ऐसी आवश्यकता होती है। उन्हें ऐसी सहायता दी जा सके, इसीलिए मनीषी-पूर्वजों ने पितर-पूजन, श्राद्ध-कर्म की परम्परायें प्रचलित की थीं। उनकी सही विधि और उनमें सन्निहित प्रेरणा को जानकर पितरों को सच्ची भावना श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने पर वे प्रसन्न पितर बदले में प्रकाश, प्रेरणा, शक्ति और सहयोग देते हैं। पितरों को स्थूल सहायता की नहीं, सूक्ष्म भावात्मक सहायता की ही आवश्यकता होती है। क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर में ही अवस्थित होते हैं। इस दृष्टि से मृत्यु के पश्चात् पितृपक्ष में, मृत्यु की तिथि के दिन अथवा पर्व-समारोहों पर श्राद्ध कर्म करने का विधान देव-संस्कृति में है।

श्राद्ध किस तत्त्व पर टिका है? शरीर के नष्ट हो जाने पर भी जीव का अस्तित्व नहीं मिटता। वह सूक्ष्म रूप में हमारे चारों ओर वातावरण में घूमते रहते हैं। जीव का फिर भी अपने परिवार के प्रति कुछ-न-कुछ ममत्व रह जाता है। सूक्ष्म आत्मायें आसानी से सब लोकों से आकर हमारे चारों ओर चक्कर लगाया करती हैं। हमारे विचार और भावनायें इस सूक्ष्म वातावरण में फैलते हैं। इन्हें हम जिस तेजी से बाहर के वातावरण में फेंकते हैं, ये उसी गति से दूर-दूर फैल जाते हैं। अतः श्राद्ध में किए गए पूर्वजों के प्रति हमारे आत्मीय, स‌द्भावना, कृतज्ञता के भाव उन आत्माओं के पास पहुँच जाते हैं। उसे उनसे सुख शान्ति, प्रसन्नता और स्वस्थता मिलती है।

श्राद्ध में हविष्यान्न पिण्डों के द्वारा श्रद्धाभिव्यक्ति की जाती है। ये पिण्ड साधन-दान के प्रतीक होते हैं। स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। जल की एक अञ्जलि भरकर कृतज्ञता के भाव से भरकर हम स्वर्गीय पितृ-देवताओं के चरणों में उसे अर्पित कर देते हैं। इस प्रकार श्रद्धा, प्रेम, कृतज्ञता, अभिनन्दन सभी का मिश्रित रूप श्राद्ध है।

योगवासिष्ठ के अनुसार मरने के समय प्रत्येक जीव मूर्छा का अनुभव करता है। वह मुर्छा महाप्रलय की रात्रि के समान होती है। उसके उपरान्त प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही अपने स्वप्न और संकल्प के अनुसार अपने परलोक की सृष्टि करता है, यह बात इन श्लोकों में कही गयी है-

मरणादिमयी मूर्च्छा प्रत्येकेनानुभूयते। यैषा तां विद्धि सुमते महाप्रलययामिनीम्।। तदन्ते तनुते सर्ग सर्व एव पृथक् पृथक्। सहज स्वप्नसंकल्पान्संभ्रमाचल नृत्यवत्।। - योगवासिष्ठ ३।४०।३१ व ३२

इसी सन्दर्भ में आगे बताया गया है कि- स्ववासनानुसारेण प्रेता एतां व्यवस्थितम्। मूर्छान्तेऽनुभवन्त्यन्तः क्रमेणैवाक्रमेण च।। - योगवासिष्ठ ३।५५।२६

अर्थात्, प्रेत अपनी-अपनी वासना के अनुसार ही भावनात्मक उतार-चढ़ावों का अनुभव करते हैं। मरे हुए व्यक्ति की प्रेतावस्था में जिन लोगों से आसक्ति जुड़ी रहती है, उनकी भाव संवेदनायें और उनकी परिस्थितियाँ-मनःस्थितियाँ प्रेतों को तीव्रता से प्रभावित करती हैं। पिण्डदान और श्राद्ध कर्म का महत्त्व यही है कि उन क्रियाओं के साथ-साथ जो भावनायें जुड़ी होती हैं, वे प्रेतों-पितरों को स्पर्श करती हैं। इसी प्रकार पितरों के संस्कारों के अनुभव अपने प्रियपात्रों की स्थितियाँ उन्हें आन्दोलित करती हैं।

योगवासिष्ठ में बताया गया है कि मृत्यु के उपरान्त प्रेत यानी मरे हुए जीव अपने बन्धु बान्धवों के पिण्डदान द्वारा ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं-

आदौ मृता वयमिति बुध्यन्ते तदनुक्रमात्। बंधु पिण्डादिदानेन प्रोत्पन्ना इति वेदिनः।। - योगवासिष्ठ ३।५५।२७

अर्थात्, प्रेत अपनी स्थिति इस प्रकार अनुभव करते हैं कि हम मर गये हैं और अब बन्धुओं के पिण्डदान से हमारा नया शरीर बना है।

स्पष्ट है कि यह अनुभूति भावनात्मक ही होती है। अतः पिण्डदान का वास्तविक महत्त्व उससे जुड़ी भावनाओं के कारण होता है। जिसके प्रति आत्मीयता होती है, उसके भावनात्मक अनुदान से प्रेत प्रभावित होता है। क्योंकि मरणोत्तर जीवन की अनुभूतियाँ वासना और संस्कारों के प्रभाव की ही प्रतिच्छाया होती हैं। इसलिए जिससे आत्मीयता का संस्कार अंकित हो, उसकी भावनायें परलोकस्थ जीव को प्रभावित करती हैं।

गीता के ८ वें अध्याय में कहा गया है- हे अर्जुन! जो अन्त समय में जिन भावों का स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, उन्हीं भावों से अनुप्राणित होकर वैसा ही नया शरीर, नया व्यक्तित्व प्राप्त करता है।

संन्यासी से इसीलिए संन्यास लेते समय उसके श्राद्ध-संस्कार भी उसी के द्वारा करा दिए जाते हैं, कि उसकी कोई भी आकांक्षा आसक्ति सूक्ष्म रूप में भी शेष न रहे।

मरे हुए व्यक्तियों का श्राद्ध-कर्म से कुछ लाभ है कि नहीं? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि होता है, अवश्य होता है। संसार एक समुद्र के समान है, जिसमें जलकणों की भाँति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है, तो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से सम्बद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हों, तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाडे और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्यगन्ध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुँचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शान्तिमयी स‌द्भावना की लहरें पहुँचाता हैं। यह सूक्ष्म भाव तरंगे तृप्तिकारक और आनन्ददायक होती हैं। सद्भावना की तरंगें जीवित मृत सभी को तृप्त करती हैं, परन्तु अधिकांश भाग उन्हीं को पहुँचता है, जिनके लिये वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।

शास्त्रों की तर्पण व्यवस्था -

श्राद्ध प्रक्रिया में देव तर्पण, ऋषि तर्पण, दिव्य मानव तर्पण, दिव्य पितृ तर्पण, यम तर्पण, मनुष्य पितृ तर्पण नाम से ६ तर्पण कृत्य किये जाते हैं। इन सबके पीछे भिन्न-भिन्न दार्शनिक पृष्ठभूमि है।

देव तर्पण अर्थात् ईश्वर की उन सभी महान् विभूतियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जो मानव कल्याण हेतु निःस्वार्थ भाव से प्रयत्नरत हैं। वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् एवं अवतारी ईश्वर अंशों की मुक्त आत्माएँ इसके अन्तर्गत आती हैं।

ऋषि तर्पण व्यास, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, जमदग्नि, अत्रि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनि, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है।

दिव्य मानव तर्पण अर्थात् उनके प्रति अपनी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति, जो लोकमंगल के प्रति समर्पित हो, त्यागी जीवन जिए एवं विश्वमानव के लिये प्राणोत्सर्ग कर गए। 

दिव्य पितृ तर्पण, दिव्य पितर वे, जो कोई बड़ी लोकसेवा तो न कर सके, पर व्यक्तिगत रूप से आदर्शवादी जीवन जी कर अनुकरणीय पवित्र सम्पत्ति अपने पीछे छोड़ गए।

यम तर्पण, यम अर्थात् जन्म मरण का नियंत्रण करने वाली शक्ति। कुमार्ग पर चलने से रोक लगाने वाली विवेक शक्ति ही यम है। इसकी निरन्तर पुष्टि होती रहे, मुत्यु का भाव बना रहे, इसलिये यमतर्पण किया जाता है।

अन्त में मनुष्य पितृ तर्पण की व्यवस्था है। इससे परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर-नारी, पिता, बाबा-परबाबा, माता, दादी, परदादी, पत्नी, पुत्र, पुत्री, चाचा, नाना, परनाना, भाई, बुआ, मौसी, सास-ससुर एवं अन्त में गुरु-पत्नी, शिष्य एवं मित्रगण आते हैं।

इस प्रकार श्राद्ध तर्पण की सार्वभौम व्यवस्था में सारे समुदाय के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति समाहित है। यह मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतरे, वसुधा एक विराट् परिवार है, इस भावना के रूप में साकार हो, उदार दानशीलता के रूप में लोकमंगल के कार्य बन पड़ें, तो ही इनकी सार्थकता है।

पितृपक्ष का हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में विशेष माहात्म्य है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी, सच्चा देव संस्कृति का अनुयायी नहीं माना जा सकता। शास्त्र मान्यतानुसार मृत्यु होने पर मनुष्य की जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती व ऊपर उठकर पितृलोक में पहुँचती हैं। उन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुँचने की शक्ति प्रदान करने-शान्ति देने के निमित्त ही पिण्डदान एवं श्राद्ध का विधान किया गया है। श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। हमारे अदृश्य सहायक पितर गण गुरुजनों एवं पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के निमित्त मात्र श्राद्ध-तर्पण के रूप में ही बन पड़ता है। मृत पितरों के प्रति कृतज्ञता के उन भावों का स्थिर रहना हमारी संस्कृति के अनुयाइयों ने वर्ष में पंद्रह दिन का समय पृथक् निकाल लिया है। पितृभक्ति का इससे उज्ज्वल उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है।

यह बात सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यदि पितरों को सच्ची श्रद्धा दी जाएगी. उन्हें तृप्त रखा जाएगा तो वे निश्चय ही शक्ति, प्रकाश, प्रेरणा मार्गदर्शन सहयोग व भावनात्मक अनुदान देंगे। पितरों के प्रति व्यक्त की गयी कृतज्ञता उलटे लौटकर बहुगुणित होकर स्वयं पर बरसती है। अपनी मोटी बुद्धि को तार्किक बनाते हुए हमें परोक्ष जगत् के अस्तित्व को श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए तथा वहाँ विद्यमान सहायक आत्माओं से सम्पर्क स्थापित कर उनके अनुदानों से लाभान्वित होना चाहिए। (अंतिम किश्त)

बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेरा गाँव मेरा देश – देवभूमि की एक भूली बिसरी विरासत

शेर-ए-कुल्लू, लाल चंद प्रार्थी, चाँद कुल्लवी

कुल्लू-मनाली लेफ्ट बैंक सड़क के मध्य में एक मनोरम पड़ाव पड़ता है नग्गर, जो कभी कुल्लू के राजघराने का निवास स्थान रहा है और कुल्लू की राजधानी भी, जिसके अवशेष नग्गर कैसल, हेरिटेज होटेल के रुप में आज भी मौजूद हैं। हम जब भी अपनी जन्म-भूमि पधारे, तो वहाँ से महज 10 किमी की दूरी पर स्थित नग्गर जाने का मौका कई बार मिला, कभी सीधे नग्गर को एक्सप्लोअर करने के वहाने, तो कभी मानाली की ओर बढते हुए।

नग्गर बस स्टॉप से मुश्किल से 200 मीटर पहले सड़क के ऊपर दायीं ओर लालचंद प्रार्थीजी का पुश्तैनी बंगला पड़ता है। लोकजीवन में प्रार्थीजी की चर्चा बचपन में अपने बढ़े-बुजुर्गों से सुनते आए, लेकिन उनके बारे में अधिक जानने की इच्छा तब जागी, जब उनका देहावसान (1982) हो चुका था। नग्गर में रोरिक गैलेरी जाते तो उनके संदर्भ में काफी सामग्री मिलती रही, लेकिन नग्गर में प्रार्थीजी की विरासत को संजोता कोई ठिकाना नहीं दिखा, न ही उनके नाम से प्रचलित साहित्य मिला।

हमारी खोज मूलतः उनकी कालजयी रचना कुल्लूत देश की कहानी को लेकर थी, जब इसका सार संदेश कहीं पढ़ने को मिला था। इस संदर्भ में चर्चा इस लेख के अंत में मिलेगी, पहले प्रार्थीजी के जीवन के मुख्य पहलुओं से परिचय करवाती कुछ बातें शेयर करना चाहूंगा, जो हमें उपलब्ध साहित्य के अवलोकन पर मिली।

लाल चंद प्रार्थी हिमाचल प्रदेश के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, प्रख्यात लेखक, कलाकार, कवि और संस्कृति प्रेमी थे। लाल चंद प्रार्थी को उनकी बेहतरीन काव्य और साहित्यिक रचनाओं के कारण 'चांद कुल्लवी' के नाम से भी जाना जाता था और उनकी अद्भुत शायरी के लिए उन्हें हिमाचल का 'मिर्ज़ा ग़ालिब' भी कहा जाता है। अपने संघर्षपूर्ण जीवन में उन्होंने राजनीति और संस्कृति के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की।

अपनी विशेषताओं एवं योगदान के लिए उन्हें हिमाचल के लाड़ले, कुल्लवी चाँद, शान-ए-कुल्लू, शेर-ए-कुल्लू जैसे नामों से संबोधित किया गया। हिमाचल प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री वीरभद्रजी के शब्दों में, प्रार्थी जी देशभक्त, लोक संगीत प्रेमी, लेखक तथा कवि थे। उन्होंने हिमांचल के सांस्कृतिक जीवन में नयी प्रेरणा जगाई तथा पहाड़ी भाषा और साहित्य के लिए अनथक कार्य किया। वह हिमाचल मन्त्रीमण्डल के सदस्य के रूप में जितने लोकप्रिय थे, साहित्यिक क्षेत्र में उससे कम लोकप्रिय नहीं थे।

जन्म एवं शिक्षा – प्रार्थीजी का जन्म 3 अप्रैल 1916 को कुल्लू जिले के नग्गर गाँव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद में डिग्री प्राप्त की थी और स्वतंत्रता संग्राम आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। लाल चंद प्रार्थी को हिमाचल प्रदेश में 'भाषा विभाग' और 'कला संस्कृति अकादमी' की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। इस कारण उन्हें हिमाचल की कला-संस्कृति का जनक भी माना जाता है।

सामाजिक राजनैतिक जीवन - प्रार्थीजी एक आयुर्वेदाचार्य थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी। वे कुल्लू क्षेत्र से तीन बार (1952, 1962, और 1967) विधानसभा सदस्य चुने गए और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। इस तौर पर वे कुल्लू से हिमाचल विधान सभा में, भाषा संस्कृति एवं कला मंत्री के रुप में सुशोभित रहे। इसके साथ वे समाज सेवा में भी अग्रणी रहे।

साहित्य सृजन एवं सांस्कृतिक अवदान – प्रार्थीजी एक उम्दा साहित्यकार, उर्दू, फारसी, हिंदी, अंग्रेजी में समान अधिकार रखते थे। प्रो. नारायण चन्द पराशर के शब्दों में, श्री लाल चन्द प्रार्थी का स्मरण आते ही पहाड़ी भाषा साहित्य तथा संस्कृति के प्रति जागरूक करने तथा अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाले प्रेरक व्यक्तित्व की तस्वीर उभर कर सामने आती है। डॉ० यशवन्त सिंह परमार के साथ मिलकर उन्होंने जिस स्वप्न को साकार करने के लिए सफल प्रयत्न किए, वह हिमाचल के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। न केवल पंजाब के कांगड़ा, कुल्लू, लाहुल-स्पीति तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल हुए, अपितु प्रथम नवम्बर, 1966 से पहाड़ी भाषा, साहित्य तथा संस्कृति का युग भी आरम्भ हुआ।

प्रार्थीजी जीवन भर पहाड़ी भाषा-संस्कृति के विकास के लिए प्रयत्नशील रहे। आयुर्वेद की भी उन्होंने उल्लेखनीय सेवा की। प्रार्थीजी न केवल एक सफल राजनीतिज्ञ थे, अपितु लेखक, चिन्तक, कवि और आयुर्वेद विशेषज्ञ भी थे। लाल चन्द प्रार्थी 'चान्द कुल्लवी' के नाम से पहाड़ी तथा उर्दू में लिखते रहे। "हिमत केरिया अपणे देसा री किस्मत बणाणी असा" उनकी यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। पत्रकारिता और सम्पादन के माध्यम से उन्होंने प्रदेश की भरपूर सेवा की। कुलूत देश की कहानी उनकी एक प्रसिद्ध कृति है, जिसमें इतिहास और संस्कृति, धर्म तथा दर्शन का तथ्यपरक वर्णन है। इस प्रकार प्रार्थीजी पहाड़ी संस्कृति के प्रबल उद्घोषक थे और वे महाराजा संसार चन्द, पहाड़ी गान्धी बाबा कांशीराम तथा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के स्वप्नों को साकार करना चाहते थे। यही दायित्व आज हमारे ऊपर है कि हम उनके मार्गदर्शन पर चलते हुए उनके संदेश को दोहराएं –

शबे गम के अन्धेरे से न घबरा ए-मुसाफिर।

तेरे लिए बेताब है आगोश सहर का।।

(प्रो० नारायण चन्द पराशर, शिक्षा, भाषा-संस्कृति मन्त्री एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, हिमाचल अकादमी, चैत्र १ शक सम्वत् १६१६)

कालजयी साहित्यिक रचना - "कुलूत देश की कहानी" लाल चंद प्रार्थी द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक एवं कालजयी पुस्तक है। वर्ष 1971 में प्रकाशित यह कृति आज के कुल्लू (प्राचीन नाम: कुलूत) क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास, लोक-संस्कृति, राजनीति और विरासत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

कुलूत (कुल्लू) को भारत के प्राचीनतम गणराज्यों में से एक माना जाता है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत और रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। लेखक ने इस पुस्तक में ऋग्वेद के समय से लेकर आधुनिक युग तक के कुल्लू के इतिहास को संजोया है। पुस्तक में ऋग्वेद, महाभारत और प्राचीन पुराणों के संदर्भों के आधार पर कुलूत देश (कुल्लू) के उद्गम और इसकी कोल, दस्युराज शम्बर जैसी प्राचीन जातियों के इतिहास को रेखांकित किया गया है। साथ ही इसमें महाभारत काल, विभिन्न जातियों (कोल, किरात, नाग, खश आदि) के संघर्ष व फैलाव तथा प्राचीन राजवंशों और शासन प्रणाली पर प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक में कुल्लू के स्थानीय राजाओं के शासन, उनकी वंशावली, क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, पारंपरिक वेशभूषा, लोककथाओं, वहाँ के समाज और स्थानीय देवी-देवताओं की परम्परा से युक्त समृद्ध देव-संस्कृति का व्यापक और रोचक वर्णन है। यह पुस्तक सांस्कृतिक धरोहर के रुप में हिमाचल प्रदेश की लोक-संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।

इसके साथ वजूद-ओ-अदम उनका प्रसिद्ध उर्दू ग़ज़ल संग्रह है, जो उनकी दार्शनिक सोच और उत्कृष्ट काव्य कला को दर्शाता है।

प्रार्थीजी का अमर संदेश - इस पुस्तक का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित करवाना था। पुस्तक के समर्पण में प्रार्थी जी की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ शामिल हैं:

"निज गौरव का कुछ ज्ञान रहे।

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।

सब जाए अभी पर मान रहे।

मरणोत्तर गुंजित गान रहे॥"

प्रार्थीजी का यह सांस्कृतिक संदेश निश्चित रुप से पहाड़ी समुदाय को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

विरासत - उनकी याद में और कुल्लू की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कुल्लू में एक प्रसिद्ध ओपन-एयर थिएटर का नाम लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र रखा गया है। यहाँ हर वर्ष प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। निसंदेह रुप में इस कला केन्द्र के निर्माण से संस्कृति तथा कला प्रेमियों को प्रोत्साहन मिला है।

कुल्लू के कलाकेंद्र एवं हिमाचल प्रदेश में भाषा, संस्कृति विभाग की स्थापना के अतिरिक्त कुल्लूत देश की कहानी जैसी एक शोध प्रधान कालजयी रचना उनकी एक अनुपम देन है, जिस पर कार्य अभी शेष है।

ठाकुर सत्यप्रकाशजी के शब्दों में, अपनी सशक्त लेखनी से प्रार्थीजी ने 'कुल्लूत देश की कहानी' पुस्तक रची, जिसमें यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया है कि कुल्लू से गढ़‌वाल तक के लोगों की भाषा एवं संस्कृति एक है, इसलिए यहां के लोगों का रहन-सहन, खान पान, रीति-रिवाज, लोक नृत्य, गीत की शैली एक सी है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोक-संस्कृति को जीवित बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वे स्वयं प्रसिद्ध लोकनर्तक, कलाकार, कवि, लेखक, तथा राजनीतिज्ञ थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व सभी के लिए प्रेरणादायी था।

प्रार्थी जी भक्ति प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और अपना अधिकांश समय भगवान के ध्यान में लगाते थे। देवी-देवताओं में उनकी पूर्ण आस्था थी। वह कुल्लू को अठारह करडुओं का देश कहते थे। वे हिमाचल को पहाड़ी प्रदेश के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए भी हमेशा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के कन्धे से कंधा मिलाकर कार्य करते रहे। (सत्य प्रकाश ठाकुर, मुख्य संसदीय सचिव, 3 अप्रैल 1994)

समाज, संस्कृति व अपनी मातृभूमि की अथक सेवा साधना करते हुए 11 दिसम्बर 1982 को प्रार्थीजी का देहावसान होता है और भावी पीढ़ी के लिए एक अनमोल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत छोड़ जाते हैं।

हिमाचल के यशस्वी मनीषी-साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ट के शब्दों में, साहित्यकार समाज की अमूल्य निधि हुआ करती हैं। अपनी पूरी जीवन यात्रा के अनुभव सारांश वे रचनाओं के रूप में पीछे छोड़ जाते हैं। जीवन सत्य सार के रूप में कही गई उनकी बातें हमें भटकी राह दिखाती हैं। उनकी कृतियों को हम देर तक याद करते हैं।

कई बार ऐसा भी हुआ है कि ढेरों पृष्ठ सामग्री समाज को देने पर भी हम रचनाकार के विषय में कुछ नहीं जानते। महर्षि व्यास का उदाहरण हमारे सामने है। जिस व्यास ने वेदों का विस्तार किया, महाभारत जैसा पंचम वेद रच डाला। उस श्रीकृष्ण द्वैपायन के जीवन के विषय में हम बहुत कम जानते हैं। बहुत ढूंढने पर भी उनके जीवन के क्षण अज्ञात ही रह जाते हैं। ऐसे ही महाकवि कालिदास के विषय में आज इतिहास अटकलें लगाता है। हम अपने रचनाधर्मी युग पुरुषों को नहीं जानते, यह हमारा दुर्भाग्य है।

प्रार्थी जयन्ती 3 अप्रैल, 1994 के पावन अवसर पर, सुदर्शन वशिष्ठ, सचिव, हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के ऊपर कहे शब्द इतिहास का एक कटु सत्य है। हम स्वयं जब प्रार्थीजी की कालजयी रचना कुलूत देश की कहानी को पढ़ने के लिए प्रेरित हुए, तो हम चकित रह गए कि कुल्लू के किसी पुस्तक भंडार में यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। फिर हम जिला पुस्तकालय पहुँचे, इस आशा के साथ कि यहाँ तो यह अवश्य उपलब्ध मिलेगी। लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। हमारे कई बार के आग्रह पर कहीं से उपलब्ध इसकी पीडीएफ के आधार पर प्रिंट प्रति तैयार हुई, जो पुस्ताकलय के संदर्भ कक्ष में आज उपलब्ध है। प्रार्थी जी की कालजयी पुस्तक की मूल प्रति का उपलब्ध न होना हमारी साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना की कुंद पड़ती दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का द्योतक है।

पुस्तक के अध्ययन उपरान्त हमें लगा कि इस पर कार्य़ शेष है। प्रार्थीजी अपने अथक प्रयास के साथ इस पुस्तक में बहुत ही अहम एवं महत्वपूर्ण सुत्र-संकेत दे गए हैं, लेकिन इन पर शोध करते हुए इनकी पुष्टि एवं इतिहास लेखन वाकि है, जिसे प्रबुद्ध एवं जागरुक भावी पीढ़ी को करना है। ईश्वर कृपा से मिली अंतःप्रेरणा के आधार पर इस संदर्भ में प्रय़ास जारी हैं, देखते हैं कि यह किस अंजाम तक पहुँचता है।

निष्कर्ष रुप में आवश्यकता प्रार्थीजी की अनमोल विरासत को संजोने व आगे बढ़ाने की है। कुलूत देश की कहानी में वर्णित देवसंस्कृति की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत जाग्रत एवं प्रतिष्ठित करने का कार्य अभी शेष है।

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