सोमवार, 31 अगस्त 2026

साधु संग - 4, प्रकाश पथ की चुनौतियाँ और साधना पाथेय

नियति की चुनौती स्वीकार करें

युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

 आगत कठिनाइयों को देखकर निढाल हो बैठना और रोते-कलपते समय गंवाना विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पडेगा कि जीवन आरोह-अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षी हलचलें होती ही रहती हैं और होती ही रहेंगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती हैं। तट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनंद लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

सदा दिन ही बना रहे, रात कभी आये ही नहीं, भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाए जाते रहें, मरण का रुदन सुनने को न मिले, यह कैसे संभव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुख के दिन कभी न आयें - यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आँखें मूंद लेने के समान है। बुद्धिमान वे हैं जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक शौर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

माता भगवती देवी शर्मा

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो, कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असंभव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक-संताप के आँखू बहाने पड़ें, यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मनचाही सफलताएँ किसे मिली हैं। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो सँजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दें और एक-एक तिनका बीनकर बनाए गए उस घरोंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनःस्थिति के लोग टूट जाते हैं ।

नियति क्रम से हर वस्तु का, हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाए इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी-अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है। 

            - युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

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सद्विचारों का कारवाँ तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था

ध्यान की घड़ियों में आत्मा ने स्वयं से कहा-मौन में ही शांति का निवास है। और शांति पाने के लिए तुम्हें बलवान होना आवश्यक है। त्याग की शक्तिशाली निस्तब्धता में जब इन्द्रियों का विक्षोभ डूब जाता है तब मौन आता है। इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ न रुकना जिससे कि तुम रास्ते में ही नष्ट न हो जाओ। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सभी त्याग कर उन पथों से जाओ जो तुम्हें स्वयं तुम्हारी अन्तर्दृष्टि के एकांत में ले जायेंगे। अनेकत्व के जाल में फँस कर उसका अनुसरण न करो। एकत्व के जिस लक्ष्य की ओर संतगण सबसे अलग और अकेले जाते हैं, उसी पथ में तुम भी जाओ। वीर होने का साहस करो। प्रारंभिक प्रयत्नों में ही असत्य को जीतो। विचलित न होओ। पवित्रता में डूब जाओ। एक उन्मत्त छलांग में स्वयं को ईश्वरीय समुद्र में डूबो दो। दिव्यत्व ही लक्ष्य है। 

ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण! प्रकृति में तुम्हारे लिए और कोई वस्तु नहीं हो सकती। शीघ्रता करो जिससे कि तुम्हें पश्चाताप न करना पड़े। धार्मिक आंतरिकता और दृढ़ विश्वास के घोड़ों को पकड़ो। यदि आवश्यक हो तो स्वयं को कुचल डालो। किसी भी वस्तु को तुम्हारे रास्ते में बाधक न होने दो। तुम्हारा भाग्य संयोग पर निर्भर नहीं है। निश्चय और आत्मशक्ति के साथ आगे बढ़ो क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य सत्य है। वस्तुतः तुम स्वयं ही सत्य हो। मुक्त हो जाओ। मुक्त हो जाओ। आत्मानुभूति की भाषा में बल के समान और कोई महत्त्वपूर्ण शब्द नहीं है। प्रारंभ में, अंत में, सदैव तुम बलवान बनो। स्वर्ग, नरक, देवता, राक्षस किसी से भी न डरते हुए आगे बढ़ो। तुम्हें कोई नहीं जीत सकेगा। ईश्वर स्वयं तुम्हारी सेवा करने को बाध्य है, क्योंकि वह स्वयं तुम्हारे भीतर विराजमान है, जिसके प्रति कि वह आकर्षित है। अतः एकत्व ही अति उदार अन्तर्दृष्टि का सार है, क्योंकि जो तुम्हारे भीतर है, जो तुम हो, वह ईश्वर है। वास्तव में तुम स्वयं ही दिव्य हो।

 – एफ जे अलक्जेन्डर, स्वामी विवेकानन्द के अमेरिकी शिष्य

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साधक सावधान 

शक्ति को व्यर्थ न जाने दो। आत्मशक्ति का अविराम संचय और उसकी सुरक्षा करते रहो। व्यर्थ विवाद, उत्तेजना, आलस्य, त्वरा, जड़ता, उहापोह के द्वारा नष्ट होने वाली शक्ति को बचाना होगा साधक।

वास्तविक विनम्रता का मतलब है, एक च्युतिरहित और निर्भूल भावात्मकता और क्रियात्मकता। अतः आत्म-महत्त्व, आत्म-प्रदर्शन, आत्मपोषण, आत्म-कारुण्य, आत्म-कथन से बचो। सही विनम्रता शक्ति-संरक्षक है। प्रतिक्षण अपनी भौतिक, मानसिक, प्राणिक सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते रहो। "नहीं सकता हूँ", से "सकता हूँ" की ओर चलना ही साधना-संतुलन का मूल है।

हम स्वयं ही हमारी सीमा हैं। एक आत्म ज्ञान, एक आत्म शक्ति, एक संचेतना-बीज हमारे भीतर बंद है। उसे लगातार ढूंढते रहो, खोजते रहो । उसका उद्घाटन कर पाना ही जीवन की एक मात्र सफलता है।

अपनी आध्यात्मिक सफलता सिद्धि के सबसे बड़े शत्रु हम स्वयं ही हैं। हमारा ही एक भाग एक भयानक व मरणान्तक विष-क्रीड़ा में लगा रहता है, जो हमारे प्रत्येक ज्ञान-प्रयास के विरुद्ध बक-बक करता रहता है। हमें उठने से रोकता रहता है। हम नहीं सुनते तो अवसाद व विषाद की काली मोटी चादर से हमें सब ओर से लपेट कर हमारी सारी गतियाँ व शक्तियाँ कुंद कर देता है। अतः स्वयं का स्वयं से उद्धार कर साधक। तुझे यह करना ही होगा।

हमारे भीतर की अंध-शक्तियाँ हमारे मन के द्वारा हमसे ही चालाकी व धूर्त्तता करती रहती हैं, कि हम अपनी ज्योतिर्यात्रा को छोड़ दें। इससे बचने का एकमात्र उपाय है हर प्रकार की बाधा और निराशा व असफलता के बावजूद लगे रहना, डटे रहना, बढ़ते रहना।

मनुष्य में यह सामर्थ्य होनी ही चाहिए कि जब चाहे मन के संकल्प-विकल्प व स्व-वार्तालाप को बंद कर सके। प्रकाश की ओर दृष्टि जमाने में यह स्व-वार्तालाप बहुत बड़ी बाधा है। एक साधक को सर्वदा योद्धाभाव में स्थित होना चाहिए। सदा चुस्त, चौकन्ना व सावधान। कहीं से भी, कभी भी, कोई भी प्रहार किया जा सकता है। प्रमाद व गफलत साधक के सबसे महान शत्रु हैं।

साधक को सदा शांत, समाहित व संगठित चित्त रहना चाहिए व अपनी पकड़-साधना विषय से कभी भी हटने देना नहीं चाहिए। - श्री माँ

सोमवार, 24 अगस्त 2026

जीवन गीत - काल की नज़ाकत समझने की समझदारी

 


मोहभंग का दर्द मीठा, बढ़ चल मोहमाया के उस पार 

एक घरोंदे में दशकों से रहने की आदत,

वहाँ से मोह का पलना है स्वाभाविक।1

लेकिन परिवर्तन का शाश्वत चक्र, प्रकृति का अपना विधान,

अपनी संतान के विकास का, जिसको है पूरा ध्यान।2

वर्तमान में ही अटके रहोगे, तो आगे कैसे बढ़ोगे,

फिर ऐसे में प्रकृति क्यों न रचे अपना कठोर सरंजाम।3

संकेत स्पष्ट उसके, एक-दो नहीं, समय-समय पर अनगिन वार,

लेकिन मोह की प्रकृति कुछ ऐसी, सहज छोड़ने को इसे कौन कहाँ तैयार।4

कई माह चोटिल रखा, शायद, मोह त्याग दोगे, संकेत समझकर अबकी वार,

ठीक होते ही फिर घरोंदा सजाने की कवायद, नहीं छूट रहा मोहविकार।5

देखो फिर प्रकृति की गहन शॉक थेरेपी, लगे जो पीड़ादायक प्रहार,

हो चला मोहग्रस्त जीवात्मा के मर्ज का जड़ से उपचार।6

होंगे तुम्हारे अनगिन परिवार से अधिक किसी कुनवे पर उपकार,

लेकिन प्रकृति प्रेरित एक गलती पर होंगे सारे उपकार कुर्वान।7


फिर नित रंग बदलती इस दुनियाँ में कौन चाहता है दिल से विचार, विमर्श, संवाद,

अगर होता हो इससे  नका रौव-दौव, रुत्वा वर्चस्व तनिक भी निराकार।8

संभलकर विचरना बदल चुकी फिजाओं में, नहीं जहाँ औचित्य का अधिक सत्कार,

नज़रंदाज कर नादानियाँ मासूमों की, बढ़ चल मोहमाया की सीमा के उस पार।9


समझना मोहभंग का यह आत्यांतिक प्रहार, माँ प्रकृति का अजस्र कृपा विधान,

रहना सजग अढिग अपने स्वधर्म पर, प्रकृति-परमेश्वर खोल रहे नए वितान।10

सबकी अपनी नियति, अपने कर्म, होंगे जो फलित पौध बनकर समय पर कटु तिक्त-मधुर क्रमवार,

तुम तो बढ़ चलो मंजिल की ओर पथिक , समेट मोह-माया सकल, ले मुट्ठी में जीवन का सवक-सार।11


शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-7 (अंतिम किश्त)

बनतोली से गौंदार, राँसी और घर बापिसी


बनतोली में रात की नींद लेकर सुबह उठते हैं, उठने में काफी मश्क्कत करनी पड़ रही थी, लोअर बैक व पीठ में चोट का तीखा अहसास हो रहा था। लेकिन पूरा जोर लगाकर हम खुद ही किसी तरह उठ गए, यह बड़ी बात थी। तैयार होकर बाहर बरामदे में बैठते हैं, तो सामने घर के बग्ल से बह रही मधुगंगा की गर्जन-तर्जन का शोर सुनने लायक था, पास के हरे-भरे पहाड़ दर्शनीय लग रहे थे, जो सुबह की धूप में खिल रहे थे। यहाँ से गौंदार साइड का नज़ारा भी स्पष्ट था। कुल मिलाकर प्रकृति की गोद में बसा यह गाँव जैसे पुनः आने का निमंत्रण दे रहा था।

यहाँ से विदा लेकर हम बनतोली संगम तक पहुंचते हैं। रास्ते में संगम व गौंदार साइड का नज़ारा देखने लायक था और दायीं ओर से बह रही मार्कण्डगंगा नदी की सांय-सांय ध्वनि। कुछ ही देर में लोअर बन्तोली से होकर संगम पहुँचते हैं। यहाँ कुछ पल रुकते हैं, सभी अपने-अपने ढंग से रिफ्रेश होते हैं। पुलिया को पार कर कुछ यादगार पल कैमरे में कैद करते हैं।

चढ़ाई को पार करना पहली चुनौती थी, जिसको दोनों साथियों की सहायता से पार करते हैं और ऊपर पहुँचकर झुला पुल के सामने विश्राम करते हैं तथा पीछे के रास्ते का अवलोकन करते हैं कि हम चोटिल अवस्था में ही कैसे 10-11 किमी पार कर चुके हैं। लगा कि ऐसे ही अगले 5-6 किमी भी पूरा कर लेंगे। थकान व चोटिल होने का अहसास गहन था, लेकिन आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था। दमभर कर यहाँ से आगे बढ़ते हैं।

यहाँ से रास्ते में लैंडस्लाइड वाले चढ़ाईदार पैच के बाद सीधे रास्ते से गौंदार पहुँचते हैं, जहाँ हमारे बिछुडे सहचर डॉ. मुकेशजी मिलते हैं। नेटवर्क बाधित होने के कारण पिछले दो दिन इनसे संपर्क-संवाद नहीं हो पाया था। आँख मिचौली करते हुए हम लोग एक दूसरे से अलग चल रहे थे। अतः इस अनुभव के आधार पर यह सीख मिली कि टीम के सभी सदस्यों को साथ चलना चाहिए, क्योंकि नेटवर्क की समस्या के चलते कहीं भी एक दूसरे से बिछुड़ सकते हैं। इस रुट पर ट्रेक करने वाले पाठक हमारे इस अनुभव से यह सीख ले सकते हैं। वाकि सब बाबा भोलेनाथ की इच्छा, वो जो करे सो कम है।

गौंदार में हिमालयन होमस्टे के ढावे में पोहा चाय का आर्डर देकर नाश्ता करते हैं। यहीं पर लम्बी दाढ़ी, सर पर हैट, आँखों पर काला चश्मा और रोबिले अंदाज बाले एक बाबाजी से भेंट होती है, लगा भोलेनाथ ही इनसे मुलाकात करवा रहे हों। क्योंकि जीवन के कुछ अनमोल विचार मोती इनसे मिलने वाले थे। भारत की सुरक्षा सेवा से रिटार्य ये सज्जन हिमालय के हर ट्रेक, दर्रे व बुग्याल का चप्पा-चप्पा छान चुके हैं और मोटर वाईक में हिमालय में स्थित मुख्य देशों को सोलो बाइक राइडर के रुप में कवर कर चुके है, जिसका इनके नाम गिन्निज बुक रिकॉर्ड दर्ज है। पहले तो हम लोग औपचारिक बात ही करते रहे, लेकिन जब बातों-बातों में इनकी खूबियों से परिचित होते हैं, तो संवाद गहरा होता गया।

धीरे-धीरे हम इनसे खुलते हैं और चाय-नाश्ते पर गहन-गंभीर चर्चा होती है, इनके सात-साढ़े सात दशक के जीवन के मंथन से निकले अनुभूत सुत्र सीधा ह्दय को भेद रहे थे, अंतरात्मा को स्पर्श कर रहे थे। हमारे हिमालय, प्रकृति व अध्यात्म प्रेम को देखते हुए इन्होंने विश्व विख्यात योगी स्वामी राम की लिविंग विद द हिमालयन मास्टर्ज पुस्तक का सुझाव दिया, जिसको ये कई बार पढ़ चुके थे। पढ़ने के वाद हम भी हिमालय प्रेमी जीवात्माओं को इस पुस्तक पढ़ने का सुझाव देते हैं। पुस्तक में हिमालय की गोद में साधु महात्माओं, सिद्धों व योगियों के दुर्लभ संस्मरण भरे हुए हैं, साथ में अध्यात्म पथ की अनुभूत सीख निहित है। साथ ही युगऋषि पं.श्रीराम शर्मा आचार्य़जी की पुस्तक सुनसान के सहचर को भी पढ़ने का सुझाव देते हैं, जिसमें आचार्य़जी के दुर्गम हिमालय में बिताए पलों को बहुत ही रोचक, रोमांचक एवं प्रेरक यात्रा वृतांत उपलब्ध हैं, जो पाठकों को हिमालय की गोद में प्रकृति के हर घटक से कुछ सीखने की प्रेरणा देती है।

इनसे बिदा लेकर फिर हमारा चार लोगों का दल एक साथ राँसी के लिए निकल पड़ता है। रास्ते में लोहे की पुलिया के उस पार पहली चुनौती पर काम चल रहा था और इस बार हम ढलानदार निर्माणाधीन चौढ़े रास्ते से होकर ऊपर मुख्य मार्ग तक पहुँचते हैं। संभवतः खच्चरों के लिए यह रास्ता तैयार किया जा रहा था। पूरे दल के सहयोग व डॉ. सौरभजी के पीठ से सहारा लेते हुए चढाई पार होती है। इस पैच पर काम देखते हुए लगा कि अगले दिनों यह रास्ता यात्रियों के लिए सरल-सामान्य हो जाएगा।

आगे जिगजैग सड़क से होते हुए वही विरान गाँव, नीचे मधुगंगा, उस पार जंगल और झरने, रास्ते का वही चट्टान काटकर बना मार्ग और फिर पहाड़ी झरने पर बना वह छोटा सा तालाव। रास्ते में जिगजैग रास्ते से कुछ साहसी युवा शॉर्टकट मार चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, जो किसी रुप में सुरक्षित नहीं था। इन पत्थरीले शॉर्टकट्स में पत्थरों के स्लाइड होने व स्वयं भी फिसल कर गिरने का खतरा किसी भी दुर्घटना का कारण बन सकता है। अतः यात्रियों को सुझाव दिया जाता है सीधे राजमार्ग से ही अपनी यात्रा भोलेनाथ को याद करते हुए कुशलतापूर्क पूरा करें।

रास्ते में प्यास कुछ इस कदर लग रही थी कि जहाँ भी जल का स्रोत दिखता, लगता कि इसे पूरा पी डालें। साथ में पहाड़ी चश्मे का जल व नींबूज हमारी इस प्यास का शमन कर रहे थे। झरने के पहले घाटी में किसी पेड़ में छिपे पपीहे पक्षी की आबाज़ का दर्द हम आज पहली बार इतनी गहराई से अनुभव कर रहे थे, जो माना जाता है कि वरसात के जल से पतों पर एकत्र होने वाली बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है।

रास्ते में एक पाइप से ऊंचे किसी चश्मे का जल सड़क तक आ रहा था, इससे अपनी बोटल भरते हैं। इसी के कुछ दूरी पर झरने से बना तलाव था। हमारे साथी इसमें डूबकी लगाने व स्नान का लोभ संवरण नहीं कर पाए। हम भी इसका जल अपनी बोटल में भरना नहीं भूले। यहीं पास के स्टाल में पहाड़ी लूण (नमक) लगे खीरे की दो प्लैट लगाते हैं, जिसका स्वाद प्यासे मन को अलग ही अंदाज में तृप्त कर रहा था।

फिर चल पड़ते हैं चीढ़, बाँज व अन्य हरे-भरे वृक्षों के बीच अगतोलिधार की ओर, जो अब मुश्किल से दो-अढाई किमी रहा होगा। रास्ते में एक छोटा सा जलस्रोत, इससे झरती जल की सहस्र धाराएं मिलती हैं, लगा कि यह इस रुट का अंतिम झरना है। यहाँ बैठकर कुछ पल बिताते हैं, इसकी कल-कल बहती धार को जेहन में उतरते अनुभव कर शांति व शीतलता का गाढ़ा अहसास पाते हैं।


साथ ही इसकी यादगार क्लिप बनाते हैं, इन अनमोल पलों को पुनः स्मरण करने के लिए। इसके स्पर्श के साथ रिफ्रेश होकर कुछ ही मिनट में हम बेरिकेट के पास थे, जहाँ से आगे यात्रियों की मोटर बाइक्स और गाड़ियां खड़ी थीं। स्टेंड पर पहुंचकर एक जीप में बैठकर राँसी पहुँचते हैं। रास्ते में दूर से ही भगवती राकेश्वरी माता को प्रणाम करते हैं, क्योंकि अब बापिसी में वहाँ तक चलना हमारे लिए संभव नहीं था।

राँसी में खड़े वाहन में समान लादकर चल पड़ते हैं, बापिसी के सफर में। हमें आश्चर्य हो रहा था कि हम सही सलाम अपनी चोटिल अवस्था के साथ 16 किमी ट्रेक पूरा कर चुके थे। हमारा व साथियों का श्रम, सहयोग, शौर्य, पराक्रम व टीम भाव किसी भी रुप में महावीर चक्र विजेता से कम नहीं लग रहा था। बाकि भोले बाबा व भगवती की कृपा, गुरुसत्ता का संरक्षण सब मिलकर हमें यहाँ तक सकुशल पहुँचा रहे थे। बाकि शरीर की टुटफूट की मुरम्मत अब घर जाकर चिकित्सा मंदिर (हॉस्पिटल) में होनी थी।

रास्ते में उनियाना के सीढ़ीदार खेत को कैप्चर करना नहीं भूले। इसी तरह मधुगंगा का पुल, फिर मोनसुना मार्केट, रास्ते का झरना व फिर ऊखीमठ। यहीं रास्ते में एक ढावे में भोजन करते हैं, लस्सी के साथ पूर्णाहुति करते हैं, अब कुछ भूख खुल गई थी। यहाँ से अगस्तमुनि होते हुए रुद्रप्रयाग पहुंचते हैं इसके आगे भयंककर बारिश शुरु हो गई थी, पहाड़ से गिरते पत्थर ने रास्ते को थाम रखा था। रास्ता जाम था, वग्ल के होटल से चाय मंगाकर चाय की चुस्की का आनन्द लेते हैं। आधे घंटे बाद रुट खुलता है, पहाड़ से सरकते पत्थरों के बीच ही किसी तरह आगे बढ़ते हैं और श्रीनगर पहुंचते हैं। यहाँ आसमान में डूबते सूरज की लालिमा बादलों के साथ एक अलग ही नजारा पेश कर रही थी। आगे रास्ते में अंधेरा हो चुका था, अंधेरे के बीच सरपट दौड़ता वाहन कब तोता घाटी पार करता है, पता ही नहीं चला और हम ऋषिकेश पहुँच चुके थे। रास्ते में रायवाला में रात का भोजन और फिर रात ग्यारह बजे परिसर में पहुँचते हैं।

बाबा का बुलावा पूरा हो चुका था, उनके दिव्य प्रसाद के साथ, लगा हमारे किसी जटिल प्रारब्ध का हल्के में उपचार हो रहा था और अब इनकी सफाई धुलाई शेष थी। इस क्रम में चिकित्सकों से परामर्श, तन की आधि का निदान, फिर तीन दिन की अस्पताल भर्ती और बेड रेस्ट। इसी के बीच कुछ समय निकालकर यात्रा की स्मृतियों की जुगाली करते हुए यह यात्रा वृतांत तैयार होकर आप तक पहुँच रहा है। लगभग डेढ़ दो माह बाद आंशिक रुप से बाहर निकलना शुरु हो गया है।

अंत मैं इस यात्रा के सार सबक एक बार पुनः एक जगह उन सुधी पाठकों के लिए शेयर करना चाहूँगा, जो हमारी तरह महमहेश्वर या किसी अन्य लम्बे ट्रेक पर ट्रेकिंग या तीर्थाटन के लिए निकलने वाले हों –

  • 1.    कभी भी हमारी तरह उठकर यात्रा पर न निकलें, विशेषकर जहाँ ट्रेक लम्बा हो। इसके लिए तीन-चार सप्ताह पहले नित्य पाँच किमी चलने का अभ्यास करें। नित्य न्यूनतम दस हजार कदमों को चलने का अभ्यास तो सदा ही करते रहें। इतना करने पर यात्रा आनन्दपूरित रहेगी, अन्यथा यात्रा एक सजा देने वाला अनुभव बन सकती है।
  • 2.    अपने बजन पर अवश्य ध्यान रखें, अपनी ऊंचाई व उम्र के हिसाब से बजन को दुरुस्त रखें। आवश्यकता से अधिक शरीर का बज़न लम्बे ट्रेक पर एक बोझ बनता है औऱ गिरने पर अधिक चोटिल होने की संभावना रहती है।
  • 3.    पीठ के बैग को जितना हल्का हो सके रखें। अति आवश्यक कपड़े व अन्य समान ही साथ रखें। खास कर लम्बी दूरी के ट्रेक पर या ऊंचाई पर चढ़ते हुए जब शरीर को ढोना ही कठिन पड़ने लगता है, तो अनावश्यक सामान का बोझ यात्रा के आनन्द पर भारी पड़ने लगता है।
  • 4.    सभी एक साथ यात्रा करें, थोड़ा आगे पीछे भी होते हैं, तो नजरों से ओझल न हों, दलनायक की देखरेख में रहें व मिलकर सफर पूरा करें। एक दूसरे से बिछुड़ने पर कई रुपों में यात्रा के आनन्द में खलल पड़ सकता है।
  • 5.    आवश्यक फर्स्ट एड व दवाईयाँ साथ में रखें, एक व्यक्ति के पास इन्हें रख सकते हैं, लेकिन आवश्यक दवाइयों सभी अपने बैग में रखें, किसी कारणवश बिछुड़ने पर फिर ये काम आ सकेंगी।
  • 6.    नए रास्ते पर स्थानीय लोगों से मार्गदर्शन लें, आवश्यक हो तो गाइड भी ले सकते हैं। रात के सफर करने से बचें, अंधेरे में ट्रेक के जोखिम भरे बिंदुओं को पार करने में दिक्कत आ सकती है, दुर्घटना भी हो सकती है।
  • 7.    एक ही दिन में यात्रा पूरी करने की जिद्द न रखें। यात्रा में मंजिल पहूंचना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, रास्ते का पूरा आनन्द लेते हुए चलना ही श्रेष्ठ नीति रहती है, अतः एक-दो दिन का मार्जन अवश्य रखें।

इतना ध्यान रखेंगे, तो आप यात्रा या ट्रेकिंग या तीर्थाटन का पूरा आनन्द ले पाएंगे और उस मकसद को बखूवी पूर्ण कर पाएंगे, जिसको लेकर आप इस यात्रा पर कदम बढ़ाए थे।

महमहेश्वर यात्रा के पिछले 6 ब्लॉग नीचे दिए लिंक्स में पढ़ सकते हैं -

भाग-1,हरिद्वार से उखीम

भाग-2,उखीमठ से रांसी

भाग-3,रांसी से गौंदार

भाग-4,वनतौली से नानू चट्टी

भाग-5, नानू से मदमहेश्वर

भाग-6, महमहेश्वर से बनतोली


शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

हमारी अविस्मरणीय पहली मदमहेश्वर यात्रा, भाग-6

बापिसी यात्रा - मदमहेश्वर से बनतौली

महमहेश्वर की सुबह – रात को सोते-सोते 12 बज गए थे। ठंड व थकान इतनी थी कि मोटे कम्बलों के बीच घुसकर कब नींद आई पता ही नहीं चला। सुबह 6 बजे नींद खुल गई थी। तम्बू की चैन खोलकर देखते हैं, तो बाहर खोरशू के बड़े-बड़े पेड़ हमारा स्वागत कर रहे थे और मैदान का कौना जंगली पालक घास से अटा पड़ा था।

तम्बू से बाहर निकलकर एक वार पूरा नज़ारा निहारने का मन हुआ। डॉ. सौरभजी जुत्ता पहनने के लिए कह रहे थे, लेकिन हम ट्रेकिंग शूज पहनने की जटिलता से बचने के लिए राँसी से खरीदी नई चप्पल को आधा पैर में फंसाकर बाहर निकल पड़ते हैं। हमारा तम्बू खेत के कौने में था और वाकि तम्बू कतार में सजे थे। पीछे दायीं ओर बाबा का मंदिर और चारों ओऱ का विहंगम दृश्य देखकर आल्हादित था। रात भर सांय-सांय करती नदीं प्रवाहित होने की ध्वनि आ रही थी, वो मधुगंगा थी।

एक हाथ में डंडा व एक हाथ में मोबाइल लिए हम कुछ ही दूर आगे बढ़े थे, कि सामने वाले तम्बू के पीछे जल निकास के लिए बनी छोटी सी नाली की चिकनी मिट्टी में हम अचानक फिसल गए। मोबाइल व डंडा हाथ से छूट चुका था और पीठ में बिजली कौंधने के साथ एक चट्टाका सा हुआ। और गिरने के बाद उठने में बहुत दर्द हो रहा था। हमारे दोनों साथी और नीचे आ रहे एक दूसरे तम्बू के सज्जन मिलकर हमें उठाते हैं और तम्बू के अंदर लिटाते हैं। हम पीठ के बल लेट कर विश्राम करते हैं। लगा कि हम तम्बू में विश्राम करें तो वेहतर रहेगा, दो किमी ऊपर बुढ़ा केदार जाना हमारे लिए ऐसे में ठीक नहीं होगा। बाकि विश्राम के बाद ठीक होने पर मंदिर दर्शन कर लेंगे।

हमारे साथी लोग मंदिर दर्शन कर ऊपर बुढ़ा केदार के लिए निकल पड़ते हैं। हम तम्बू में लेटे विश्राम करते हैं। हम पीठ के बल लेट पा रहे थे, जबकि थोड़ी मेहनत के साथ दायीं ओर वांए भी करवट ले पा रहे थे, लेकिन उठ नहीं पा रहे थे, जिससे कि पालथी मार कर बैठ सकें। हमें लग रहा था कि लोअर बैक में चोट आयी है। ऐसे में लग रहा था कि चलना तो दूर, खच्चर की पीठ पर भी चढ़ नहीं पाएंगे, क्योंकि उसमें कदम पर सीधे झटके लगते हैं। कई बार कोशिश कर पाने के वावजूद उठ न पाने के कारण व हो रहे दर्द के चलते हम हेल्थ एंग्जाइटी के दौरे में उलझ चुके थे व एक ही विकल्प सूझ रहा था कि किसी तरह एयर लिफ्ट किया जाए। लेकिन इस दूर दराज इलाकें में यह कैसे संभव होगा। लगा कि उत्तराखण्ड तो हेली सेवा की बहुत चर्चित है, इसकी व्यवस्था कर लेंगे।

इस दृष्टि से अपने पॉकेट डायरी में मुख्य नाम व फोन लिख देते हैं, ताकि आपात सेवा में जरुरत पड़ने पर काम आ सके। इन दो-तीन घंटों में जीवन की पूरी पिक्चर रील की तरह आँखों के सामने तैर जाती है। लगा कि महादेव द्वारा हमारे प्रारब्ध कर्मों की गहन चिकित्सा हो रही है। उनके धाम में, उनके द्वार पर, उनके चरणों में आकर ऐसी घटना बिना कारण तो हो नहीं सकती। कोई बड़ी घटना छोटे में टल रही है। इसका आध्यात्मिक पक्ष समझते हुए मन को समझा रहे थे, लेकिन यक्ष प्रश्न एक ही था कि हम बापिस 16 किमी ट्रेक कर वाहन तक कैसे पहुँचेंगे।

तम्बू बंद था, धीरे-धीरे धूप निकल रही थी, तम्बू गर्म हो रहा था। और बड़े-बड़े मच्छर तम्बू में विचरण कर रहे थे, लेकिन वो काट नहीं रहे थे। किसी तरह पैर से जुराब उतारकर अंगूठे से तंबू के अंदर के फाटक की जंजीर खेंचते हैं। तम्बू में रोशनी के साथ हवा का शीतल झौंका आता है, कुछ राहत मिलती है। लाठी के सहारे उठने की तमाम कोशिश की, लेकिन नहीं उठ पा रहा था। ऐसे थक-हार कर आंखें बंद कर भोले बाबा व गुरुसत्ता को याद करता हूँ व अपने अस्तित्व का पूरा मंथन चलता है।

हमारे साथियों को भी जब वे गए थे तो इसका अनुमान नहीं था। वो सोचे थे कि कुछ चोट आई है, विश्राम करेंगे तो बापिस जाने के लायक हो जाएंगे। जब वे दो-तीन घंटे बाद आते हैं तो उनसे अपनी स्थिति को स्पष्ट करता हूँ और एयर लिफ्ट का विचार सामने रखता हूँ। बिना किसी हेलीपेड के यह कैसे संभव है, यह बात सामने आई। फिर इस विकल्प के हटते ही दूसरा विकल्प आया कि स्ट्रेचर के सहारे बापिस जा सकता हूँ। लेकिन यहाँ इसकी आपात व्यवस्था है भी कि नहीं, यह प्रश्न उठा।

हमारी स्थिति का आंकलन करते हुए दोनों साथी हमको दोनों हाथ व कंधों से पकड़कर खड़ा करते हैं, जिसमें हमें कोई विशेष दिक्कत नहीं आई। मैं दो डण्डों के सहार खड़ा हो पा रहा हूँ, देखकर मैं अचंभित था। दोनों लाठी के साथ हमें चलने में कोई विशेष परेशानी नहीं हो रही थी, हाँ सीढ़ी व खाई में काफी संभलकर चलना पड़ रहा था। लेकिन गिरने व चोटिल होने का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अवश्य साथ में था। ईश्वरीय कृपा से व साथियों के सहयोग से हम धीरे-धीरे एक-एक साइकोलॉजिक्ल बैरियर टूट रहे थे।

जुत्ता पहन, दोनों हाथों में डंडे लेकर साथियों की सहायता से हम थोड़ा ऊपर आते हैं। एक कुर्सी पर बैठ जाते हैं, ऊंची कुर्सी में भी बैठ पा रहा हूँ, देखकर राहत मिलती है। तम्बू का बाकि समान भी पैक होकर आता है। स्वतः ही सीट पर बैठने व चलने के विश्वास के साथ हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए, मुख्य मार्ग पर आते हैं, वहीं से बाबा को प्रणाम कर पीछे मुख्य ऑफिस तक आते हैं, वहाँ किसी तरह फ्रेश होते हैं, चाय नाश्ता करते हैं। भूख मर चुकी थी, अपनी पसंदीदा मैगी खाने का कोई मन नहीं कर रहा था, किसी तरह से कुछ चम्मच लेते हैं, चाय-विस्कुट उदरस्थ करते हैं, क्योंकि साथियों द्वारा मंदिर के पास के डॉक्टर से लाई गई पेन किल्लर लेनी थी।

कल रात को दिल्ली से आई ट्रैकर, जिसको हम लोग अंधेरे में सहायता किए थे, वह भी रास्ते में मिली, सही सलामत बापिस जा रही थी। रात के सहयोग का आभार व्यक्त करती हुई वह हमें एक स्प्रे गिफ्ट करती हैं, जो मस्ल पैन से राहत देने के लिए थी। लगा कि कुछ भी संयोग से घटित नहीं होता और अच्छे कर्म का परिणाम अच्छा ही रहता है। इस तरह बाबा को दूर से ही प्रणाम कर हम लोग बापिस रांसी की ओर चल पड़ते हैं।

शुरु के सीधे रास्ते चलने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी। फिर जहाँ सीढ़ी आती, वहाँ लाठी के सहारे इसको भी संभलकर पार करते गए। हम चल पा रहे हैं, हमें विश्वास नहीं हो रहा था। हम अपनी स्थिति देखकर प्रमुदित थे, कहाँ एयर लिफ्ट और स्ट्रेचर से चलने की बात और कहाँ हम दो लाठियों के सहारे चल रहे थे। लगा जैसे बाबा व गुरुसत्ता की कृपादृष्टि प्रत्यक्ष हमें चला रही है और इस तरह अढाई किमी नीचे कूनचट्टी तक पहुँच चुके थे।

कून चट्टी के नीचे बारिश शुरु हो गई थी। सो रेन कोट को ओढ़कर चलते हैं। कुछ लोग खड़ी चढ़ाई में शॉर्टकट मार रहे थे, वह भी पीठ मे समान लादे, जो हमें बहुत खतरनाक प्रयोग लग रहा था। क्योंकि बैग के साथ एक कदम भी पैर फिसलने के परिणाम बहुत घातक हो सकते थे। उन्हें इसके बार में सचेत भी करते हैं। स्थानीय लोग इन शॉर्ट कट में चलने के आदी होते हैं, उनकी नकल नहीं की जा सकती। बीच में बारिश थमती है, तो आगे नीचे घाटी का रास्ता स्पष्ट दिख रहा था।

जहाँ विश्राम करते, वहाँ से नीचे का दृश्य कैप्चर करना नहीं भूलते। क्योंकि थकने पर कुछ पल का विश्राम और प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों के देखकर नई ऊर्जा पाते। दूसरा चढ़ाई में नीचे के दृश्यों पर उतना ध्यान नहीं था, क्योंकि दृष्टि सीधा आगे व ऊपर मंजिल की ओर थी। लेकिन उतराई में नीचे घाटी और दूर पर्वत श्रृंखलाओं के नजारे बहुत स्पष्ट रुप में दिख रहे थे। सो यथासंभव इनको कैप्चर करते रहे।

इस तरह हम नानू चट्टी के पहले की दुकान तक पहुँचते हैं, जहाँ चढ़ते समय मैगी खाई थी। आज यहाँ पराँठा आर्डर करते हैं। लेकिन परांठा खाने का मन नहीं कर रहा था। किसी तरह एक तिहाई खाते हैं। हमारी भूख ही मर गई थी। इसी बीच पाँच युवा आते हैं और सीधे दस पराँठा आर्डर देते हैं। हम सोचते ही रह गए की ये कौन हैं, जो इतना पराँठा खाने का कांफिडेंस लिए हैं। 

बात करने पर पता चला कि ये छत्तीसगढ़, राजनंदगाँव से आए हैं। फिर तो उनसे चर्चा होती है तथा परिचय ओर सघन होता है। ये सुपर फिट युवा थे अपने बीस-पच्चीस की वय में। ये सुबह राँसी से चले थे, और आज ही बुढ़ा केदार से होकर नीचे बापिस हो रहे थे। यह अपवाद श्रेणी के वो ट्रेकर थे, जो लम्बे ट्रेक के अभ्यस्थ रहते हैं तथा इनकी संख्या पाँच-सात प्रतिशत रहती होगी।

यहाँ से नीचे उतरते हैं, तो बारिश और तेज हो जाती है। अब बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी।


लग रहा था कि चढ़ाई में तो बाबा ने हमको वख्श दिया था, लेकिन उतराई में हमारे सारे प्रारब्ध कर्मों को धोने जा रहे थे। इसी बारिश में हम लोग खट्टरा पहुँचते हैं, यहीं रास्ते में चंडीगढ़ से आए सज्जन मिले, जो अपने बुजुर्ग माता-पिता को श्रवण की भाँति तीर्थाटन के लिए लाए थे। माताजी का जीवट अभी उताराई में भी बैसे ही बर्करार था।

खट्टरा तक अंधेरा हो चुका था, हम अपने मोबाइल टॉर्च के सहारे नीचे उतर रहे थे। घुटने की नीचे की पिंडलियाँ जोर पकड़ रहीं थी और पैर शरीर का भार उठाने में असक्षमता जाहिर कर रहे थे। इसी तरह हम कल सुबह के टीन शैड़ वाले उस बिंदु को पार करते हैं। रात को यह बंद हो चुका था। सौरभजी हमें सहारा देकर नीचे उतरने में मदद कर रहे थे। रजतजी रोशनी के साथ रास्ता स्पष्ट कर हमारा सफर सरल बना रहे थे।

इस तरह तेज बारिश के बीच हम कल के रिंगाल जंगल व बुराँश पेड़ इलाके को भी पार करते हैं। इसके बाद अंतिम दो जिगजैग ट्रेक रात के इतना लम्बे लग रहे थे कि खत्म होने का ही नाम नहीं ले रहे थे। अंत में कौने पर पहुँचने पर बनलौती के  भवनों की रोशनी टिमटिमाती दिखती है, तो कुछ राहत मिलती है। लेकिन गांव में प्रवेश तक के कुछ सौ मीटर भी कई किमी जैसे लग रहे थे। पैर जैसे जबाब दे चुके थे।

इस रुट पर बिना तैयारी, हमारी तरह चल चुके यात्री इस स्थिति को भलीभाँति समझ रहे होंगे। लो वह ठिकाना आ गया, जहाँ हम कल सुबह नाश्ता किए थे, यहाँ लोगों की चहल-पहल थी, भोजन पानी चल रहा था, पता चला कि यहाँ रुकने की भी व्यवस्था है। यहाँ अंदर सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते हुए कमरे तक पहुँचते हैं। और गर्म पानी में हाथ पैर धोकर, सरसों के तेल की मालिश कर सोते हैं। चाबल रोटी, आलू-सोया बडी, दाल का बेहतरीन एवं पसंदीदा भोजन आता है, लेकिन हमारी भूख मर चुकी थी। भोलेनाथ की कृपा का आभार व्यक्त करते हुए बिस्तर मे जाते हैं कि आज की 10 किमी की यात्रा इस अवस्था में पूरी हो गयी थी। (जारी, अंतिम किश्त, अगला भाग-7 बनतौली से रांसी वाया गौंदार और घर बापिसी)

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