बुधवार, 31 दिसंबर 2025

गंगा पार टापू में प्रवास के यादगार पल

गंगाजी में डुबकी के संग जंगल में मंगल

हर वर्ष सर्दी का मौसम आते ही गंगाजी के टापू जैसे नेह भरा आमन्त्रण देते हैं पधारने के लिए अपने आंचल में। न जाने कितने सामूहिक भ्रमण की यादें गंगाजी के टापूओं की गोद में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों व कार्यकर्ता भाई-बहनों के साथ जुड़ी हुई हैं, जो क्रमिक रुप से एकांतिक प्रवास की ओर सिमटती जा रही हैं।

तीन दशक पूर्व का ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में प्रवास का दौर, जब समूह के साथ गंगा पार, नदी को पार करते हुए जाते थे, जहाँ टापूओं में बेल फल से लेकर जंगली बेर का आनन्द लेते। पार करते हुए गंगाजी में डूबने व फिर सामान को बटोरते हुए पार करने की यादें ताजा हैं। हरिद्वार महाकुंभ के दौरान इन्हीं टापुओं में बाबाओं के तम्बू गढ़े रहते। पार जाने के लिए अस्थायी पुल की व्यवस्था रहती और सारे टापू साधु-संतो की छावनियों में रुपाँतरित हो जाते।

फिर ब्रह्मवर्चस के निदेशक एवं विवि के कुलाधिपति महोदय के साथ गंगा भ्रमण की भी कई यादें सहज ही चिदाकाश में तैर जाती हैं। हरिपुर गाँव के आगे गंगा के किनारे टॉवर के पास, फिर आगे अनुसूइया आश्रम के प्रांगण में और गंगाजी के उस पर चीला डैम के साथ कई यादें जुड़ी हुई हैं, हालाँकि काल के प्रवाह में अब ये मात्र चित्त को कुरेदती हुई स्मृतियों तक सिमटी हुई हैं।

फिर देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों के संग टापूओं के कई सामूहिक भ्रमण याद हैं, जिनको किश्तों में विजुअल स्टोरीज के रुप में प्रकाशित किया जा सकता है। हालाँकि गंगाजी के तट पर कई दुर्घटनाओं के चलते ऐसे भ्रमण अब बीते दिनों की बातों तक सामित हो गए हैं। फिर यदा-कदा पासआउट विद्यार्थियों के साथ गंगाजी के टापुओं पर भ्रमण की यादें भी जुड़ी हुई हैं, जो समय के साथ अब सिमट रही हैं।

अभी शेष बची हैं इन टापुओं की सहज-स्फुर्त यात्राएं, जो कभी कभार उपलब्ध शिक्षकों व मित्रों के साथ संभव हो पाती हैं। पिछले ही वर्षों ऐसी यात्रा का आगाज़ हुआ था, जिसको आप संपादित वीडियो के रुप में देख व अनुभव कर सकते हैं।


लगता है कि ये यात्राएं मात्र इंसानी इच्छा से निर्धारित नहीं होतीं। कहीं गहरे अंतरात्मा की समवेत पुकार और गंगाजी की कृपा स्वरुप ऐसे संयोग घटित होते हैं और कुछ यादगार पल स्मृतिकोश से जुड़ते हैं और कुछ कर्मों का प्रवाह लेन-देन के क्रम में अपने नियत निष्कर्ष की ओर आगे बढ़ता है।

इसी वर्ष 2025 प्रयागराज महाकुंभ के दौरान जब वहाँ जाने का संयोग नहीं बन पाया तो मकर संक्राँति के दिन इन्हीं टापुओं पर गंगाजी का जैसे बुलावा आता है और यहीं सप्तसरोवर क्षेत्र में महाकुंभ के भावभरे सुमरण के साथ गंगाजी में डुबकी के संग कुंभ स्नान का सुयोग घटित हो जाता है।

इस वर्ष 2025 के दिसम्बर माह में ऐसे ही एक सहज स्फुर्त टापू भ्रमण का संयोग बनता है। शोध छात्र की भारतीय देशज संचार परम्परा पर सप्तवर्षीय शोध-साधना की पूर्णाहुति के रुप में भी इसका संयोग बन रहा था।

गंगा कुटीर घाट नम्बर 18 से प्रवेश होता है, जहाँ इस वर्ष गंगाजी की निर्मल धार पर्याप्त गर्जन-तर्जन के साथ प्रवाहित हो रही है, मानो पहाड़ से उतर कर मैदान की ओर बढ़ने का उत्साह संभाल नहीं पा रही हो।


हरिद्वार में गंगाजी को इसके निर्मलतम स्वरुप में देखने व अनुभव करने के लिए यह घाट सर्वोत्तम है। यहीं पर हरिद्वार क्षेत्र में गंगाजी के पहले दिग्दर्शन होते हैं।

यहाँ से उत्तर की ओर बिरला घाट को पार करते हुए, आगे व्यास मंदिर घाट के समीप से गंगा की पहली धार को पार करते हैं। आगे रेत के मैदान को पार कर पत्थरीले मैदान से होकर दूसरी धार को पार करते हैं। गंगाजी के किनारे कुछ श्रद्धालु, परिवारजन तो कुछ बाबाजी विश्राम कर रहे थे, कुछ स्नान कर रहे थे, तो कुछ ध्यान में मग्न थे। एक विश्राँति, शांति का अनुभव यहाँ सहज रुप में हो रहा था। जीवन के सकल द्वन्द-विक्षोभ और तनाव-अवसाद जैसे गंगाजी के कलकल निनाद में विलीन हो रहे हों।

इसी तरह जल की दो-तीन और धाराएं पार करते हुए हम अंततः जंगल में प्रवेश करते हैं, जहाँ जंगली बेर फल की झाड़ियाँ पके फलों से लदी थीं। आज तक हमने इतने बैर फल पहले कभी नहीं देखे थे। स्वाद में खट्टे-मीठे बैर फल।

थोड़ी आगे पेड़ों के नीचे चिर-परिचित रेतीले टीले पर हम आसन जमाते हैं, जहाँ से गंगाजी के दर्शन सुलभ थे और दूर-दूर के दृश्य का अवलोकन कर सकते थे। यहाँ चूल्हा पहले से ही बना रखा था। यहाँ आसन बिछाते हैं, लकड़ी बटोरते हैं और धूप जलाकर जलपान व स्नान ध्यान का कार्यक्रम शुरु करते हैं।

पास में चरती गाय स्थान की जंगली जानवरों से रहित होने की सूचना दे रहीं थी। दो लड़के जंगल से आते दिखे, शायद इनके चरवाहे रहे हों या हमारी ही तरह घूमने आए हों।

चाय की चुस्की के साथ चर्चा करते हुए आज की पिकनिक का उद्घाटन होता है और फिर गंगाजी के किनारे स्नान के लिए जाते हैं। गंगाजी के बर्फीले स्पर्श वाले निर्मल जल में जैसे तन-मन के सकल विकार धुल रहे थे। आत्म-चैतन्यता जाग्रत हो रही थी और सारी थकान जैसे छूमंतर हो जाती है।

फिर आकर चाय-नाश्ते का क्रम चलता है। चाय पर आपसी संवाद के अतिरिक्त विभाग एवं विश्वविद्यालय के विकास सम्बन्धी भावी संभावनाओं पर चर्चा होती है। साथ ही धुनी, मचान और गुफा आदि पर भी विचार-विमर्श होता है, जो यहाँ पर साधु-संतों की तप साधना के प्रचलित प्रारुप हैं और किसी भी साधक को प्रयोग के लिए लुभा सकते हैं।

अपना आज का संक्षिप्त प्रवास पूरा कर, सामान समेटते हुए पूरा दल गंगाजी की धाराओं को पार करते हुए घाट नम्बर 18 पहुँचता है। और अपने पात्रों में गंगाजाल को भरकर, गंगाजी को प्रणाम करते हुए आज के सफल प्रवास के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है और विवि परिसर की ओर बढ़ता है।

सारतः यदि कोई हरिद्वार पधारता है, तो सहज ही इन टापुओं में गंगाजी के तट पर स्नान-ध्यान व आत्मचिंतन के साथ भीड़ से दूर कुछ शांति-सुकून भरे एकांतिक यादगार पल बिता सकता है और एक नई ऊर्जा के साथ अपने कार्यक्षेत्र के लिए तैयार हो सकता है।

जीवन गीत - अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना

 

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा

 


अंधेरी सुरंग के पार एक रोशनी का टिमटिमाना,

सोए बुझे अरमानों में जैसे नए पंख का लग जाना,

घनघोर रात के बाद जैसे भौर का उजाला छा जाना,

रेगिस्तान में भटक रहे प्यासे को जल का स्रोत मिल जाना।

 

लेकिन अभी तो क्षितिज के पार बहुत दूर है मंजिल,

अग्नि परीक्षा के कई दौर हैं अभी बाकि,

बाहरी छल-छद्म के खेलों का भी होगा राह में सामना,

थक जाओगे राह में पथिक, लेकिन तुम्हें है बस चलते जाना।

 


सबसे बड़ी चुनौती हो स्वयं, चित्त् शुद्धि का विकट कार्य,

बिगड़ैल मन की कुचालों को भी है पग-पग पर साधना,

बार-बार गिरोगे, फिसलोगे, लेकिन लक्ष्य सिद्धि तक

अनन्त काल तक बिना हारे तुम्हें है बस चलते जाना।

 

जहाँ अपनी शक्ति चूक जाए, हाथ खड़े हो जाएं,

वहाँ दैवीय शक्ति, गुरु अवलम्बन में क्या शर्मिंदगी,

दो कदम बढ़ो उस ओर, वह दस कदम पास मिलेगा,

2025 बीत चला, 2026 में मंजिल का नया सोपान मिलेगा।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

मरणोतर जीवन रहस्य

 

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-2


सतत अनुग्रह बरसाने वाले सदाशय पितर –

मरण और पुनर्जन्म के बीच के समय में जो समय रहता है, उसमें जीवात्मा क्या करता है, कहाँ रहता है, आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में भी विभिन्न प्रकार के उत्तर हैं, पर उनमें भी एक बात सही प्रतीत होती है कि उस अवधि में उसे अशरीरी, किंतु अपना मानवी अस्तित्व बनाए हुए रहना पड़ता है।

जीवन मुक्त आत्माओँ की बात दूसरी है। वे नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त पुनः अपने लोक को लौट जाती हैं। इन्हें वस्तुओं, स्मृतियों, घटनाओं एवं व्यक्तियों का न तो मोह होता है और न उनकी कोई छाप इन पर रहती है। किंतु सामान्य आत्माओं के बारे में यह बात सही नहीं है।

वे अपनी अतृप्त कामनाओं, विछोह, संवेदनाओं, राग, द्वेष की प्रतिक्रियाओं से उद्गिन रहती हैं। फलतः मरने से पूर्व वाले जन्मकाल की स्मृति उन पर छाई रहती है और अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए ताना-बाना बुनती रहती हैं। पूर्ण शरीर न होने से वे कुछ अधिक तो नहीं कर सकती, पर सूक्ष्म शरीर से भी वे जिस-तिस को अपना परिचय देती हैं। उस स्तर की आत्माएं भूत कहलाती हैं।

वे दूसरों को डराती या दबाव देकर अपनी अतृप्त अभिलाषाएं पूरी करने में सहायता करने के लिए बाधित करती हैं। भूतों के अनुभव प्रायः डरावने और हानिकारक ही होते हैं। पर जो आत्माएं भिन्न प्रकृति की होती हैं, वे डराने, उपद्रव करने से विरत ही रहती हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में समय-समय पर जिन पितरों के अस्तित्व अनुभव में आते रहते हैं, उनके आधार पर यह मान्यता बन गई है कि वहाँ पिछले कई राष्ट्रपतियों की प्रेतात्माएं डेरा डाले पडी हैं। इनमें अधिक बार अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली आत्मा अब्राह्म लिंकन की है। ये आत्माएं वहाँ रहने वालों को कभी कष्ट नहीं पहुँचाती। वस्तुतः उपद्रवी आत्माएं तो दुष्टों की ही होती हैं।

मरण के समय में विक्षुब्ध मनःस्थिति लेकर मरने वाले अक्सर भूत-प्रेत की योनि भुगतते हैं, पर कई बार सद्भाव सम्पन्न आत्माएं भी शांति और सुरक्षा के उद्देश्य लेकर अपने जीवन भर सम्बन्धित व्यक्तियों को सहायता देती-परिस्थितियों को सम्भालती तथा प्रिय वस्तुओं की सुरक्षा के लिए अपने अस्तित्व का परिचय देती रहती हैं। पितृवत् स्नेह, दुलार और सहयोग देना भर उनका कार्य होता है।

पितर ऐसी उच्च आत्माएं होती हैं जो मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बनकर गुजारती हैं और अपने उच्च स्वभाव संस्कार के कारण दूसरों को यथासम्भव सहायता करती रहती हैं। इनमें मनुष्यों की अपेक्षा शक्ति अधिक होती हैं। सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण उनकी जानकारियाँ भी अधिक होती है। उनका जिनसे सम्बन्ध हो जाता है, उन्हें कई प्रकार की सहायताएं पहुँचाती हैं। भविष्य ज्ञान होने से वे सम्बद्ध लोगों को सतर्क भी करती हैं तथा कई प्रकार की कठिनाईयों को दूर करने एवं सफलताओं के लिए सहायता करने का भी प्रयत्न करती हैं।

ऐसी दिव्य आत्माएं, अर्थात पितर सदाशयी, सद्भाव-सम्पन्न और सहानुभूतिपूर्ण होती हैं। वे कुमार्गगामिता से असन्तुष्ट होतीं तथा सन्मार्ग पर चलने वालों पर प्रसन्न रहती हैं।

पितर वस्तुतः देवताओं से भिन्न किंतु सामान्य मनुष्य से उच्च श्रेणी की श्रेष्ठ आत्माएं हैं। वे अशरीरी हैं, देहधारी से सम्पर्क करने की उनकी अपनी सीमाएं होती हैं। हर किसी से वे सम्पर्क नहीं कर सकतीं। कोमलता और निर्भीकता, श्रद्धा और विवेक दोनों का जहाँ उचित संतुलन सामंजस्य हो, ऐसी अनुकूल भाव-भूमि ही पितरों के सम्पर्क के अनुकूल होती है। सर्व साधारण उनकी छाया से डर सकते हैं, जबकि डराना उनका उद्देश्य नहीं होता। इसलिए वे सर्व साधारण को अपनी उपस्थिति का आभास नहीं देतीं। वे उपयुक्त मनोभूमि एवं व्यक्तित्व देखकर ही अपनी उपस्थिति प्रकट करती और सत्परामर्श, सहयोग-सहायता तथा सन्मार्ग-दर्शन कराती हैं।

अवांछनीयता के निवारण, अनीति के निकारण की सत्प्रेरणा पैदा करने तथा उस दिशा में आगे बढ़ने वालों की मदद करने का काम भी ये उच्चाशयी पितर आत्माएँ करती हैं। अतः भूत-प्रेतों से विरक्त रहने, उनकी उपेक्षा करने औऱ उनके अवांछित-अनुचित प्रभाव को दूर करने की जहाँ आवश्यकता है, वहीं पितरों के प्रति श्रद्धा-भाव दृढ़ रखने, उन्हें सद्भावना भरी श्रद्धांजलि देने तथा उनके प्रति अनुकूल भाव रखकर उनकी सहायता से लाभान्वित होने में पीछे नहीं रहना चाहिए। (जारी, शेष अगले ब्लॉग में...)


रविवार, 30 नवंबर 2025

कर्म की खेती, आस्था की उड़ान

ईष्ट के संग, जीवन का पथ संधान...


कर्म की खेती, विचारों के बीज,

भावनाओं का सिंचन, आस्था की उड़ान,

धर्म का पथ रुहानी, सत्य का संधान,

वाकि ईष्ट की इच्छा, ईश्वर का कृपा विधान ।1।

 

जो समझ आया, वो करते गए,

अंतरात्मा का थाम दामन, अंधड़ का सामना करते चले,

मंजिल का नहीं रहा अधिक ठौर ठिकाना,

अपने कर्तव्य पथ पर बस आगे बढ़ते चले ।2।

 

होती रही राह में भूल चूकें भी कई,

होश आते ही उनको सुधारते चले,

नहीं कभी सोचा किसी का बुरा,

जो बन पड़ा सबका भला करते रहे ।3।

 

नहीं रहा कोई बंधन स्वीकार,

न किसी को कभी बाँध कर रखे,

सब परमात्मा के भेजे अपने पराए,

उसी में रमकर सबको निभाते रहे ।4।

सुखी को देख होते रहे प्रमुदित,

दुःखी को देख ह्दय से हुए भावुक,

अनाधिकार चेष्टा अवश्य उलझाती रही राह में,

अपमान नहीं उपेक्षा का सुत्र अपनाते रहे ।5।

 

रहा अग्नि परीक्षाओं का दौर कुछ लम्बा,

रास्ते में करारे सबक झोली में गिरते रहे,

कर्मों की खेती लहलहाने को तैयार अब तो,

दूर मंजिल के दिग्दर्शन भी हो चले ।6।

 

रखना याद विधान ईश्वर का, जो अटल,

कर्म की गति सूक्ष्म अति गहन,

चाहे हो भगवान राम कृष्ण या सिद्ध पुरुष कोई,

कर्म के विधान से नहीं बच सका यहाँ कोई ।7।

 

एक ही मार्ग शांति, स्वतंत्रता का,

प्रकाश, आनन्द, सुकून का यहाँ,

अपने भीतर तलाश कर सुख की,

बाहर इसकी खोज में भटकना नादानी ।8।

 

सकल संभावनाएं भरकर जब भेजा है खुदा ने,

तो फिर कैसी भटकन, कब तक खुद से अनजान,

उम्दा विचार बीजों के संग कर लो अब कर्म की खेती,

करो ईष्ट के संग जीवन पथ का मौलिक संधान ।9।


मरणोतर जीवन रहस्य

 

पितर हमारे अदृश्य सहायक, भाग-1


अदृश्य जगत अपने आप में एक परिपूर्ण संसार है, जहाँ सूक्ष्म जीवधारियों की एक अनोखी दुनियाँ है।...शरीर छोड़ने के उपरान्त नया जन्म मिलने की स्थिति आने तक मनुष्यों को इसी क्षेत्र में रहना पड़ता है। भूत-प्रेतों की, देवी-देवताओं की, लोक-लोकान्तरों की, स्वर्ग-नरक की चर्चा प्रायः होती ही रहती है। ऐसे प्रमाण उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं जिनमें दिवंगत मनुष्यों के साथ सहयोग या विग्रह करने की जानकारियाँ मिलती हैं। मनुष्यों की तरह इनकी भी एक दुनियां है। चूँकि ये सभी मनुष्य शरीर को छोड़कर ही उस क्षेत्र में पहुँचे हैं, इसलिए स्वभावतः इस संसार के साथ सम्पर्क साधने की इच्छा होती होगी। कठिनाई एक ही है कि जीवित या दिवंगत आत्माओं में से किसी को भी यह अनुभव नहीं है कि पारस्परिक सम्पर्क-साधना और आदान-प्रदान का सिलसिला चलाना किस प्रकार सम्भव हो सकता है।...आत्मिकी में वह सामर्थ्य है कि वह इन दोनों लोगों के बीच भावनात्मक एवं क्रियात्मक सहयोग का द्वार खोल सके। 

प्रेत – क्रुद्ध, असन्तुष्ट, दुर्गतिग्रस्त आत्माओं को कहते हैं और पितर वे हैं, जो श्रेष्ठ समुन्नत जीवन जीते रहे हैं। वे जीवनकाल की तरह, मरणोत्तर स्थिति में पहुँचने पर भी किसी को सहायता पहुंचाने और परिस्थितियाँ अच्छी बनाने में योगदान करना चाहते हैं। ऐसी आत्माओं की सहायता से कितनों ने ही कितने ही प्रकार के महत्वपूर्ण अनुदान प्राप्त किए हैं। 

शास्त्रों में विभिन्न लोकों का वर्णन मिलता है, जिनमें जीवन मुक्त आत्माएं विचरण करती हैं एवं शरीरधारी पृथ्वीवासियों की मदद हेतु सतत् तत्पर रहती हैं। इन लोकों को भौतिकी के डायमेन्शन के आधार पर नहीं समझा जा सकता, क्योंकि सूक्ष्म होने के कारण इनकी स्थिति चतुर्थ आयाम से भी परे होती है। किन्तु साधना पुरुषार्थ से अर्जित दिव्य दृष्टि सम्पन्न शरीरधारी साधक स्वयं को सूक्ष्म रुप में बदलकर  अथवा स्थूल स्थिति में इन आयामों के रहस्यमय संसार का दिग्दर्शन कर सकते हैं। इस संसार में अपने कर्मों के अनुरुप सूक्ष्म आत्माएं फल पाती हैं एवं उसी आधार पर एक निश्चित अवधि तक उन्हें उसमें रहना पड़ता है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है। 

शास्त्रों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में घूमता हुआ जीव स्वर्ग-नरक, प्रेत-पिशाच, पितर, कृमि-कीटक, पशु एवं मनुष्य योनि प्राप्त करता है। इस दौरान उसे जो-जो गतियाँ प्राप्त होती हैं, शास्त्रों में उन्हें दो भागों में बाँटा गया है – कृष्ण या शुक्ल गति। इन्हें धूमयान तथा देवयान भी कहा गया है। छान्दोग्योपनिषद में इन गतियों और जीवात्मा की विभिन्न स्थितियों को विस्तार से वर्णन किया गया है। 

अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार सूक्ष्म दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति पृथ्वी पर बैठे-बैठे ही समस्त लोकों व उनमें निवास कर रही सूक्ष्म आत्माओं से सम्पर्क साधने में समर्थ होते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ सूक्ष्म सत्ताएं अन्तरीक्षीय लोकों में ही नहीं, प्रत्युत पृथ्वी पर भी निवास करती हैं। वे अपनी ओर से शरीरधारियों से सम्पर्क स्थापित करने का पूरा प्रयास करती हैं, परन्तु सूक्ष्म जगत से अनभिज्ञ मनुष्य समुदाय के भयभीत होने से वे संकोच करती हैं, जबकि द्रष्टा साधक उनसे पूरा सहयोग लेते हुए स्वयं को नहीं, अपितु जीवधारी समुदाय को परोक्ष के वैभव से लाभान्वित कराते हैं। 

इस प्रकार शास्त्र वचनों में परोक्ष जगत एवं वहाँ रहने वाली अदृश्य सूक्ष्म आत्माओं के अस्तित्व के समर्थन में तो प्रतिपादन मिलते ही हैं, पृथ्वी पर बसने वाली श्रेष्ठ आत्माओं द्वारा उनसे सम्पर्क स्थापित कर आदान-प्रदान के प्रसंग भी प्रकाश में आते हैं। 

वास्तव में अदृश्य जगत अपने आप में परिपूर्ण रहस्य रोमांच से भरी एक दुनियां है। वह उतनी ही विलक्षण है, जितनी कि हमारी निहारिका, सौर मण्डल एवं ब्रह्माण्ड का यह पूरा दृश्य परिकर है।...जो दृश्यमान नहीं है, ऐसा अदृश्य लोक मरणोत्तर जीवनावधि में रह रहे जीवधारियों का भी है जिसके प्रमाण, उदाहरण आए दिन मिलते रहते हैं। पितर एवं अदृश्य सहायक यहीं रहते हुए निर्धारित समय व्यतीत करते हैं एवं समय आने पर समान गुणधर्मी आत्माओं से अपना सम्पर्क जोड़कर स्नेह-सौजन्य-सहयोग का सिलसिला चलाते हैं। पितरगण अपने जीवनकाल की ही तरह मरणोत्तर स्थिति मरणोत्तर स्थिति में भी किसी के काम आने, सहायता पहुंचाने अथवा हितकारी परिस्थितियाँ बनाने में योगदान करना चाहते हैं। आत्मिकी का यह अध्याय रहस्यपूर्ण तो है ही, अपने आप में शोध का विषय भी है। (जारी, शेष अगले अंक में...)

शनिवार, 29 नवंबर 2025

हिमालय कुछ कह रहा है...

 

2025 मौनसून के प्रकृति ताँडव में छिपे संकेत-संदेश


हिमालय विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और अपनी विशिष्टताओं के कारण सभी का ध्यान आकर्षित करता है। इसका प्राकृतिक सौंदर्य, गगनचुम्बी हिमशिखर, ताल-सरोवर और हिमनदियाँ, सब इसे विशिष्ट बनाते हैं और सबसे अधिक महत्वपूर्ण है इनसे जुड़ा आध्यात्मिक भाव। जहाँ गंगाजी का पतितपावनी स्वरुप सभी हिमनदियों में पावनता का संचार करता है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं, हिमालय के रुप में अपने स्वरुप की व्याख्या करते हैं। शिव-शक्ति से जुड़े तमाम शक्तिपीठ, सिद्धपीठ एवं तीर्थस्थल इसमें बसे हैं और सर्वोपर स्वयं शिव-शक्ति का निवास स्थान भी तो हिमालय ही है, तमाम ऋषि आज भी इसके दुर्गम क्षेत्रों में तप साधना कर रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि हिमालय अध्यात्म चेतना का ध्रुव केंद्र है, जिसे देवात्मा हिमालय की संज्ञा दी गई है।

लेकिन हिमालय आज रुष्ट दिख रहा है, अपनी विप्लवी हलचलों के माध्यम से कुछ कह रहा है। पावनता के प्रतीक हिमालय के साथ अल्पबुद्धि नादान इंसान ने जो खिलवाड़ किया है व कर रहा है, वह दारुण है, क्षोभ उत्पन्न करता है, चिंता का विषय है। जिस तरह से इसकी तलहटियों, शिखरों, गर्भ व गोद में विकास के नाम पर बेतरतीव अनियोजित योजनाएं क्रियान्वित हुई हैं और हो रही हैं, उनमें से अधिकाँश किसी भी रुप में हिमालय की प्रकृति से मेल नहीं खाती, इसके प्रति न्यूनतम संवेदना से हीन कृत्य प्रतीत होती हैं, जिनमें व्यक्ति की अदूरदर्शिता, क्षुद्र लोभ, अहंकार एवं महत्वाकाँक्षाएं ही अधिक झलकती हैं।

वर्ष 2025 में जिस प्रकार का ताँड्व प्रकृति ने हिमालय के हिमाचल, उत्तराखण्ड और जम्मु-काश्मीर प्रांतों में किया है और इसके भयावह दुष्परिणाम इसकी तलहटी में बसे पंजाब, दिल्ली तक देखने को मिले हैं और जिसका विस्तार प्रयागराज से लेकर बनारस तक हुआ है, वह उपरोक्त धारणा को पुष्ट करता है और समय रहते हिमालय के संकेत को ह्दयंगम करने व आवश्यक सवक सीखने का संदेश दे रहा है। हिमालय अब तक पर्याप्त वार्निंग दे चुका है और ऐसा प्रतीत होता है कि अब सीधे कार्यवाही पर उतर गया है और यदि नहीं सुधरे तो इसके ओर विकराल लोमहर्षक दृश्यों को हम किश्तों में आगे भी देखने व झेलने के साक्षी व भुगतभोगी होंगे।

माना कि इन घटनाओं में ग्लोबल वार्मिंग, वैश्विक मौसम परिवर्तन आदि के कारण भी सक्रिय हैं, जिनमें प्रभावित लोगों का सीधा हाथ नहीं रहता, लेकिन इनके नाम पर हम अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते, अपनी बेवकुफ़ियों को नहीं ढक सकते, अपनी अदूरदर्शिता को बेदस्तूर जारी नहीं रख सकते, अपनी प्रकृति विरोधी योजनाओं को विकास का जामा नहीं पहना सकते। समय गहन आत्मचिंतन, समीक्षा और ठोस सुधार का है। प्रकृति व हिमालय के प्रति न्यूतम संवेदना के साथ व्यवहार समय की माँग है। नहीं तो भविष्य में ट्रेलर के आगे की विध्वंसक पिक्चर के लिए सभी को मिलजुलकर तैयार रहना होगा। कुपित प्रकृति के सामूहिक दण्ड विधान से कोई बच नहीं सकता।

इस प्राकृतिक आपदा में हताहत हुई सभी दिवंगत आत्माओं के प्रति पूरी संवेदना व्यक्त करते हुए, इनसे जुड़े परिजनों के प्रति हार्दिक सांत्वना का भाव रखते हुए, सभी निवासियों एवं परिजनों से भाव भरा निवेदन एक ही है कि प्रकृति के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलें। भारतीय चिंतन में प्रकृति को माँ का दर्जा दिया गया है, जो अपनी संतानों का आवश्यक पौषण, संवर्धन और संरक्षण करती है। इस माँ के प्रति अगाध कृतज्ञता का भाव रखते हुए तालमेल के साथ काम करें, उसकी कृपा पग-पग पर अनुभव होगी। और यदि हम इसे भोग्या मानकर उसका दोहन-शौषण करेंगे, उस पर अत्याचार जारी रखेंगे, अपने लोभ व मूढ़ता की अंधी दौड़ में मनमाना आचरण करते रहेंगे, तो फिर इसका खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।

गौर करें, वर्ष 2025 में हिमालय क्षेत्र में शिव-शक्ति से जुड़े तीर्थस्थलों के आसपास ही प्राकृतिक आपदाएं अधिक आई हैं। स्पष्ट संकेत है कि प्रकृति रुष्ट है, प्रकृति की अधिष्ठात्री माँ जगदम्बा रुष्ट हैं, प्रकृति के अधिपति भगवान शिव रुष्ट हैं और महाकाल-महाकाली अपना ताण्डव नर्तन करने के लिए विवश हैं। वे सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक विध्वंस करने के लिए वाध्य हैं।

जिस तरह से तीर्थ स्थलों को भोगलिप्त इंसान ने पिकनिक स्पॉट बना रखा है, तीर्थयात्रियों को लूटने का व्यापार केंद्र बना दिया है, वह किसी भी रुप में तीर्थ की गरिमा के अनुरुप नहीं है। और फिर बिना जीवन तो तपाए, सुधार किए, पात्रता का विकास किए, सस्ते में, मुफ्त में भगवान की कृपा के लिए भीड़ का हिस्सा बनकर तीर्थस्थलों में जमघट लगाना, सारा कचरा, गंदगी वहीं तीर्थ क्षेत्र में फैंकना समझदारी के कदम नहीं हैं। ऐसे तीर्थाटन की चिन्हपूजा के साथ भगवान की कृपा की आशा लगाना नादानी है, नासमझी है, जो जीवन के सुत्रों के प्रति न्यूनतम समझ का भी अभाव दर्शाती है। ईश्वर कृपा के लिए न्यूनतम पात्रता का अर्जन करना होता है, जो अंतर की ईमानदारी, जिम्मेदारी और समझदारी के अनुपात में होता है। गैरजिम्मेदार आचरण, बेईमानी, धूर्तता, चालाकी, होशियारी, अदूरदर्शिता, निष्ठुरता, निपट स्वार्थता, दर्प-दंभ-अहंकार से इसका दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं।

फिर सीधे इन तीर्थ स्थलों के ह्दयक्षेत्र तक राह की प्रकृति को तहस-नहस करते हुए सड़क से लेकर रोपवे व रिजोर्टों का निर्माण कितना उचित है। प्रकृति की गोद में सुरम्य स्थल पर एकांतिक वातावरण में तीर्थस्थल की पावन स्थिति ही आदर्श रही है। वहाँ तक पहुँचने के लिए थोड़ा श्रम तो तप का हिस्सा माना जाता रहा है और जो अशक्त हैं, उनके लिए कंडी से लेकर तमाम सेवाएं उपलब्ध रहती हैं, जो स्थानीय लोगों के रोजगार का भी माध्यम बनते हैं।

वर्ष 2025 के प्रकृति ताँडव ने एक बात ओर स्पष्ट कर दी है कि नदियों व जल स्रोत्रों के साथ खिलवाड़ न किया जाए व इनको हल्के से लेने की भूल न की जाए। इनकी राह में वसावट बसाने, मकान-दुकान, होटल व रिजॉर्ट सजाने की कुचेष्टा न करें। यहाँ अंग्रेजों की तारीफ करनी पडेगी, जो अपने समय में जिस भी हिल स्टेशन में रहे, उनके द्वारा प्रकृति के साथ संयोजन में खड़ी की गई रचनाएं आज भी सुरक्षित-संरक्षित हैं, जबकि उनके जाने के बाद जिस तरह से हमने पहाड़ों की ढलानों पर जंगल का सफाया करते हुए वेतरतीव बहुमंजिला भवनों की कतार, कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए हैं, वे हमारी सोच के दिवालिएपन को ही दर्शाते हैं, जिसके साथ हम जैसे अपने ही विनाश की पटकथा लिख बैठे हैं। यदि किसी भी मौनसून के सीजन में बारिश कुछ दिन ओर रहती है, तो होने वाले नुकसान का अनुमान लगाया जा सकता है। और भूकंप जोन में तो यह खामियाजा अकल्पनीय हो सकता है।

सार रुप में हिमालयी प्राँतों में विकास के कर्णधार नेताओं, अधिकारियों, इँजीनियरों और बुद्धिजीविओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अब सजग सचेत हो जाएं और आम इंसान भी जागरुक हो जाएं और विकास के नाम पर अपने अस्तित्व के लिए खतरा बनने वाली योजनाओं में समय रहते परिमार्जन करें, सुधार करें। नहीं तो आने वाला समय बहुत विकट, विप्लवी एवं विध्वंसक होने वाला है। थोड़ी सी समझदारी, थोड़ी सी ईमानदारी व प्रकृति के प्रति न्यूनतम संवेदनशीलता के आधार पर हम इस तरह की त्रास्दी के दुष्प्रभावों को एक सीमा तक नियंत्रित करते हुए अपने भविष्य को संरक्षित कर सकते हैं।

मंगलवार, 30 सितंबर 2025

नवरात्रि का तत्वदर्शन एवं साधना पथ

हठयोग से बचें, मध्यमार्ग का वरण करें

नवरात्रि सनातन धर्म की अध्यात्म परम्परा का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो वर्ष में दो बार क्रमशः मार्च और सितम्बर माह में क्रमशः चैत्र वासंतीय नवरात्रि और आश्विन शारदीय नवरात्रि के रुप में देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त दो बार क्रमशः आषाढ़ और माघ माह में गुप्त नवरात्रि के रुप में भी इसका समय आता है, जो सर्वसाधारण के बीच कम प्रचलित है।

नवरात्रि वर्ष भर की ऋतु संध्या के मध्य के पड़ाव हैं, जब सूक्ष्म प्रकृति एवं जगत में तीव्र हलचल होती है और स्थूल रुप में यह ऋतु परिवर्तन का दौर रहता है। इस संधि वेला में एक तो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से और दूसरा आध्यात्मिक दृष्टि से नवरात्रि साधना का विधान सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने सोच समझकर रचा है। और भगवती की उपासना के साथ स्थूल एवं सूक्ष्म प्रकृति के संरक्षण संबर्धन का संदेश भी इन नवरात्रियों में छिपा रहता है।

इस समय व्रत उपवास एवं अनुशासन से देह मौसमी विकारों से बच जाता है और ऊर्जा के संरक्षण एवं अर्जन के साथ साधक आने वाले समय के लिए तैयार हो जाता है। मन भी आवश्यक शोधन की प्रक्रिया से गुजर कर परिष्कृत हो जाता है और व्यक्ति बेहतरीन संतुलन एवं दृढ़ता को प्राप्त कर जीवन यात्रा की चुनौतियां का सामने करने के लिए तैयार हो जाता है। सामूहिक चेतना के परिष्कार का उद्देश्य भी इसके साथ सिद्ध होता है। 

नवरात्रि के दौरान शक्ति उपासना भारतीय अध्यात्म परम्परा की एक विशिष्ट विशेषता को भी दर्शाता है। भारत में ईश्वर को जितने विविध रुपों में पूजा जाता है, वह स्वयं में विलक्षण है। यहाँ तो नदी, पहाड़ों, पर्वतों, वृक्षों से लेकर जीव-जंतुओं में, यहाँ तक कि पाषाण में भी भगवान की कल्पना कर उसे जीवंत किया जाता है। नवरात्रि में देवी के दिव्य नारी रुप में ईश्वर की उपासना का भाव है, जो मुख्यतया शाक्त सम्प्रदाय से जुड़ा है। हालाँकि देश के विभिन्न क्षेत्रों में देवी की, भगवती की, माँ दुर्गा की उपासना नाना रुपों में प्रचलित है, जिसे किसी साम्प्रदाय विशेष तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह तो लोक आस्था का पर्व है, जो हर क्षेत्र में अपनी क्षेत्रीय भाषा में वहाँ के भजन, कीर्तन व विधि-विधान के साथ मनाया जाता है।

जो भी हो नवरात्रि में माँ दुर्गा की उपासना नौ रुपों में की जाती है। जो नारी शक्ति के रुप में भगवती की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाते हैं। शैलपुत्री हिमराज हिमालय की पुत्री के रुप में भगवती की प्रतिष्ठा है, ब्रह्मचारिणी के रुप में भगवती के कन्या रुप में, तपस्विनी स्वरुप की उपासना की जाती है। चंद्रघण्टा भगवती की किशारोवस्था के दिव्य स्वरुप की कल्पना है, तो कुष्माण्डा ब्रह्माण्ड को स्वयं में धारण करने में सक्षम भगवती के यौवनमयी दिव्य स्वरुप को दर्शाती है। सकन्दमाता के रुप में देवी देवसेनापति कार्तिकेय की मातृ शक्ति के रुप में पूजित हैं, तो कात्यायनी के रुप में वे अपने कुल एवं प्रजा की रक्षा के लिए खड़गधारिणी माँ भवानी के रुप में विद्यमान हैं।

कालरात्रि के रुप में भगवती सत्य, धर्म एवं श्रेष्ठता की विरोधी प्रतिगामी और आसुरी शक्तियों के जड़मूल उच्छेदन एवं परिष्कार के लिए कटिबद्ध विकराल एवं प्रचण्डतम शक्ति की द्योतक हैं, तो महागौरी के रुप में देवी का शांत-सौम्य, दिव्य एवं सात्विक प्रौढ़ स्वरुप व्यक्त होता है औऱ सिद्धिदात्री के रुप में वे भक्तों की मनोकामना को पूर्ति करने वाली, सिद्धियों की अधिष्ठात्री करुणामयी माँ हैं और दुर्गा के रुप में उपरोक्त सभी रुपों का सम्मिलित रुप अष्टभूजाधारिणी, सिंहारुढ़ दुर्गा शक्ति रुप में प्रत्यक्ष है।

इस तरह शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, सकन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिदधिदात्री के रुप में भगवती के नौ स्वरुपों की उपासना की जाती है। इसके अतिरिक्त मूल रुप में सृष्टि की आदि स्रोत के रुप में वे आद्य शक्ति माँ गायत्री-दुर्गा के रुप में पूजित हैं। सृजन, पालन एवं ध्वंस की शक्ति के रुप में क्रमिक रुप में महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं मकाहाली के रुप में पूजित-वंदित हैं।

साधना विधान – नवरात्रि के प्रारम्भ में घर के पावन कौने या पूजा कक्ष में भगवती की दिव्य प्रतिमा के साथ कलश एवं अखण्ड दीपक की स्थापना की जाती है, जहाँ नवरात्रि संकल्प के बाद नित्य पूजा, जप-ध्यान एवं साधना का क्रम चलता है। अपनी श्रद्धा अनुसार गायत्री उपासना, नवाण मंत्र जप, दुर्गा सप्तशती पाठ आदि का साधना विधान सम्पन्न होता है। पूजा-पाठ, उपासना एवं स्वाध्याय परायण की नियमितता के साथ साधना पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

इन नौ दिनों में नियम, व्रत एवं संयम का विशेष ध्यान रखा जाता है। जिसमें अपनी क्षमता के अनुसार उपवास से लेकर मौन व्रत आदि का अभ्यास किया जाता है। युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्यजी ने तप के अंतर्गत 12 विधानों का वर्णन किया है, जौ हैं - अस्वाद तप, तितीक्षा तप, कर्षण तप, उपवास, गव्य कल्प तप, प्रदातव्य तप, निष्कासन तप, साधना तप, ब्रह्मचर्य तप, चान्द्रायण तप, मौन तप और अर्जन तप। (गायत्री महाविज्ञान, भाग-1, पृ. 182-188) इन्हें साधक अपनी स्थिति एवं क्षमता के अनुरुप पालन कर सकता है।

यहाँ किसी भी नियम व्रत में अति से सावधान रहना चाहिए। जो सहज रुप में निभे, बिना मानसिक संतुलन खोए, वही स्थिति श्रेष्ठ रहती है। नियम व्रत का स्वरुप कुछ ऐसा हो, जिसका परिणाम नौ दिन के बाद एक परिमार्जित जीवन शैली एवं श्रेष्ठ भाव-चिंतन के रुप में आगे भी निभता रहे। साधना के संदर्भ में व्यवहारिक नियम एक ही है कि जहाँ खड़े हैं, वहाँ से आगे बढ़ें। देखा देखी कोई अभ्यास न करें और हठयोग से बचें।

इस दौरान भगवती की कृपा बरसे, इसके लिए नारी शक्ति को भगवती का रुप मानते हुए पवित्र दृष्टि रखें, घर-परिवार में नारी का सम्मान करें। इसी तरह बाहर प्रकृति के प्रति भी सम्मान एवं श्रद्धा का भाव रखें और तदनुरुप पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन में अपना योगदान दें। नवरात्रि के अंत में कन्या पूजन, प्रीतिभोज एवं यज्ञादि के साथ पूर्णाहुति की जाती है और उचित जल स्रोत में देवी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

नवरात्रि के दौरान उपासना-साधना के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी जुड़ा हुआ है। अपने पारिवारिक, सामाजिक एवं व्यवसायिक जीवन के दायित्वों की कीमत पर किए गए साधना-अनुष्ठान को बहुत श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता। साथ ही इस दौरान झूठ, प्रपंच, ईर्ष्या-द्वेष, कामचौरी, आलस, प्रमाद आदि से दूर रहें। इस तरह जीवन साधना के समग्र भाव के साथ किया गया नवरात्रि का व्रत-अनुष्ठान हर दृष्टि से साधक का उपकार करने वाला रहता है और साधक भगवती की अजस्र कृपा को जीवन में नाना रुपों में बरसते हुए अनुभव करता है।



चुनींदी पोस्ट

Travelogue - In the lap of Surkunda Hill via Dhanaulti-Dehradun

A blessed trip for the seekers of Himalayan touch Surkunda is the highest peak in Garwal Himalayan region near Mussoorie Hills wi...