उखीमठ समुद्रतल से 1311 मीटर (4301 फुट) फीट की ऊँचाई
पर बसा कस्बा है व यह सर्दियों के दौरान जब ऊंचाईयों में भारी बर्फवारी पड़ती है,
तो उस दौरान भगवान केदारनाथ और भगवान मदम्हेश्वर के शीतकालीन प्रवास और पूजा स्थान
के रुप में जाना जाता है। उखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर इसीलिए जाना जाता है।
उखीमठ पौराणिक महत्व का स्थान भी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाणासुर की
पुत्री उषा और भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह हुआ था। इसी कारण
इस स्थान का नाम उषामठ पड़ा। मालूम हो कि उखीमठ ही चोपता, तुंगनाथ और देवरियाताल
जैसे ट्रेकिंग, पर्यटन और तीर्थ स्थलों का मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।
उखीमठ से आगे बढ़ते ही बाहर हवा में हिमालय टच वाला शीतल अहसास मिलना
प्रारम्भ हो जाता है। हरी-भरी वादियों में प्रवेश के साथ लग रहा था कि हम एक नए
परिवेश में आ गए हैं। रास्ते में गिरिया, मोनसुना मार्केट आते हैं। इस राह
पर प्राकृतिक झरने स्वागत करते हैं।
रास्ते का प्राकृतिक दृश्य धीरे-धीरे अपने
पूरे शबाव की ओर बढ़ता जा रहा था। सीढ़ीदार खेत, झरने, नाले और दूर पर्वतों की
अंतहीन श्रृंखलाएं रास्ते को खुशनुमा बना रही थीं। मोनसुना मार्केट से बारिश से
बचने के लिए एक रेनकोट खरीदते हैं।
आगे नीचे उतरते हुए एक पहाड़ी नदी पार करते हैं।
रास्ते में
विराने में एक क्रिकेट मैदान ध्यान आकर्षित करता है। रांसी की ओर बढ़ता सफर एक नए
प्रदेश में प्रवेश की सघन अनुभूति दे रहा था। सीढ़ीदार खेतों की अंतहीन श्रृंखला,
घने जंगल, प्रकृति की गोद में बसे घर, आसमान छूते हरे-भरे पर्वत और सबसे ऊपर शहर के
शौर-शराबे, किच-किच व प्रदूषण से रहित गाँव की शुद्ध आवोहवा और शांत एकांत परिवेश
में स्वय को पाकर ऐसे लग रहा था कि कुछ दिन यहीं रुकें। एकांतिक रिट्रीट के लिए यह
क्षेत्र एक आदर्श स्थल प्रतीत हो रहा था।
रास्ते में पहाड़ी कस्बे उनियाणा से होकर गुजरते हैं, जहाँ
होमस्टे की बहुतायत दिखी। आगे खड़े पहाड़ को काटकर बनाए गई सड़क के साथ हम साढ़े
चार बजे राँसी पहुंचते हैं।
यहां हल्के अभिसिंचन के साथ हमारा स्वागत होता
है। पहले भवन पर ही हमारा वाहन खड़ा होता है, पास के ढावे के मालिक भट्ट साहब की
सज्जनता और ईमानदारी को देखकर पहाड़ी मानुष का अक्स जेहन में कहीं गहरे छू जाता
है। और यहीं चाय नाश्ते के लिए रुकते हैं।
थकान के चलते इसी ढावे में मैगी और चाय के लिए कहा, जिसका लाजबाव
स्वाद देख हम लोग कायल हो गए। इनका पूरा परिवार इस कार्य़ में सहयोग दे रहा था।
यहीं पर सामने कोमल टूरिस्ट एंड ट्रेकिंग प्वाइंटमें
रुकने की भी व्यवस्था हो जाती है और यहीं रात के भोजन की भी बात पक्की कर लेते
हैं।
साथ ही राँसी के बार में मोटा-मोटी जानकारी बटोर लेते हैं। पता चला कि राँसी
की अधिष्ठाक्षी माता राकेशवरी देवी के दर्शन से आगे की यात्रा शुभ मानी जाती
है। इन्हीं के दर्शन के बाद बाबा मदमहेश्वर के दर्शन फलित होते हैं। हो भी क्यों
न, आखिर शिव-शक्ति के युग्ल से ही सृष्टि संचालित है और उन्हीं की कृपा से जीवन की
पूर्णता सुनिश्चित होती है।
सो हम कमरे में सामान रखकर, फ्रेश होकर मंदिर में माता के दर्शन करने
निकल पड़ते हैं। मुख्य मार्ग से मुश्किल से 300 मीटर ऊपर मंदिर स्थित है। मंदिर
परिसर के बाहर जूत्ता स्टैंड पर जुत्ते उतारते हैं, अंदर कौने में लगे वाश-वेसिन
से हाथ धोकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।
मंदिर के पूजारी भट्ट साहब का सज्जनोचित्त
एवं नेक व्यवहार प्रभावित करता है। मंदिर में विभिन्न विग्रहों से परिचय होता है।
राकेश्वरी माता के साथ विष्णु भगवान, सत्यनारायण भगवान, मन्नणी माता, हनुमानजी,
गणेशजी आदि के दर्शन होते हैं। पता चला कि मन्नणी माता का मूल स्थान यहाँ से 30
किमी ऊपर है, जो कठिन ट्रेक के बाद ही पूरा होता है। इसी स्थान पर भगवती ने
महिषासुर का बध किया था।
राकेशवरी माता की पौराणिक कथा भी कम रोचक नहीं है। पता चला कि चंद्रदेव ने
अपने दुराचार के पाप का प्रायश्चित यहीं पर किया था और माता की कृपा से अमृत तत्व
की प्राप्ति हुई थी। इस तरह से प्रायश्चित तप की पौराणिक स्थली के रुप में इस
मंदिर का महत्व स्वयं में महत्वपूर्ण है। नैष्ठिक साधक नौरात्रि में विशेषरुप से
यहाँ आकर साधन-अनुष्ठान करते हैं।
राकेश्वरी माता के दर्शन के बाद हम बाहर परिसर में कुछ यादगार पलों को
कैप्चर करते हैं। छोटे बच्चे परिसर में उछलकूद कर रहे थे। यहाँ से गाँव का नजारा
देखने लायक था। प्रकृति की गोद में बसा एक पारंपरिक पहाड़ी गाँव स्वयं में
परिपूर्ण प्रतीत हो रहा था। लोकल लोगों से बातचीत करने पर उनकी चिंता का अहसास भी
हुआ। उनका मानना था कि गाँव का प्राकृतिक एवं पारम्परिक स्वरुप धीरे-धीरे खो रहा
है। जैसे-जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही है, व्यापार बढ रहा है, पारंपरिक सरलता तरलता
धीरे-धीरे कम हो रही है।
रास्ते से मदमहेश्वर साइड का नज़ारा देखने लायक था। बर्फ से
ढकी चोटियाँ, कुछ बादलों से ढकी व कुछ स्पष्ट।
जानकारों के अनुसार उन्हीं की गोद
में नंदी कुंड है। मदहेश्वर बाबा यहाँ से नहीं दिखते। इनका क्षेत्र यहाँ से वाईं
ओर पहाड़ों के पीछे पड़ता है। नीचे गहराई में पुष्पगंगा नदी और सीढ़ीदार खेत,
सामने जंगलों से लदे पहाड़। लगा जैसे प्रकृति अपने सारे रुप दिखाने के लिए तत्पर
थी।
पहले साफ मौसम, फिर अचानक नीचे घाटी से बादलों का उमड़ना गुब्बार और
पूरा कस्बा इसमें समाहित। बादलों का गुब्बार हम सबको छूते हुए, आलिंग्न करते हुए
पार हो जाता है। कुछ ही देर में उस पार पहाड़ी के शिखर से इंद्रधनुष के दर्शन। लगा
जैसे प्रकृति अपनी सतरंगी छटा के साथ सारे रुपों का दर्शन करवाकर हमें
कृतार्थ कर रही हो।
अंत में यहां की मार्केट का अवलोकन करते हैं। रास्ते में बारिश
से बचने के लिए जुत्तों की खोज करते हैं, लेकिन साइज के जुत्ते नहीं मिलते, सो
मज़बूरी में प्लास्टिक की चप्पल खरीद लेते हैं, कि आपात में काम जाएगी। नहीं मालूम
था कि यही आगे यात्रा का पासा पलटने वाली थी। यहीं से रिंगाल की मजबूत लाठी 50
रुपए में खरीदते हैं। फिर शहर के उस छोर पर आगे झरने तक जाते हैं।
बीच में टैंट
हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी।
खच्चरों पर रस्द सामग्री आगे जा रही थी। कुछ मिलाकर इस छोटे से पहाड़ी
कसवे में यात्रियों की चहल-पहल देखने योग्य थी। जिनमें बंगाली ट्रेक्करों की
बहुतायत दिखी। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर-प्रदेश, मध्य्-प्रदेश, छ्त्तीसगढ़,
महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखण्ड व हिमाचल से भी यात्री दिखे। लोक्ल लोगों से
बातचीत पर सुनने में आ रहा था कि अबकी बार मदमहेश्वर के लिए काफी पर्यटक व तीर्थयात्री
आ रहे हैं। अगले साल से यह कहीं दूसरा केदार न बन जाए।
अपने होटल में आकर रात का भोजन करते हैं। रोटी, आलू की सब्जी, दाल और
चाबल, साथ में आचार और पहाड़ी खीरे का सलाद।
भोजन से तृप्त होकर कमरे में रात को
सो जाते हैं, सुबह तड़के जो आगे चलना था। रात को पुष्पगंगा के जल की सांय-सांय की
ध्वनि नादयोग का अहसास दिला रही थी।
सुबह ब्रह्ममुहुर्त के अंधेरे में ही नींद खुल गई थीं। बाहर आकर देखते
हैं कि अंधेरे में दूर व नीचे गाँव में रोशनी टिमटिमा रही थी।
सड़क में नीचे चहल-पहल
थी। यात्री आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे थे। सुबह चार बजे ही जागरुक यात्री बढ़
निकलते हैं। हम भी टीम के साथ साढ़े पाँच बजे तक नहा धोकर, सन्ध्या वंदन कर टीम के
साथ चल पड़ते हैं।
एक जीप प्रति व्यक्ति 30 रुपए के हिसाब से अगतोलिधार छोड़ती
है, जो राँसी के आगे 2 किमी दूरी पर है। यही वाहनों का अंतिम पड़ाव है, यहाँ से
आगे पैदल चलना पड़ता है। हाथ में छड़ी और पीठ में रक्सैक व कंधे पर बैग लिए कदम
बढ़ रहे थे मदमहेश्वर की ओर। आज का पहला प़डाव था यहाँ से छः किमी दूर गौंडार
गाँव। हम राँसी के 7000 फीट की ऊँचाई से गौंदार के 5000 फीट ऊंचाई तक उतरने वाले
थे। और फिर यहाँ से 12,500 फीट की ऊँचाई तक 10 किमी चढ़ाई करने वाले थे। (जारी...शेष अगले खण्ड-3 में)
उत्तराखण्ड में गढ़वाल हिमालय केरुद्रप्रयाग जिले में
केदारनाथ के समानान्तर घाटी में स्थित महमहेश्वर प्रख्यात पंचकेदार में से एक है व
यात्रा के क्रम में द्वितीय केदार के नाम से भी जाने जाते हैं। यहाँ का अवलोकन अब
तक स्थानीय यू-ट्यूबर्ज के विडियोज में न जाने कितनी बार कर चुका था। लेकिन इसकी
जमीनी सच्चाई से अधिक परिचित नहीं था। जून के पहले सप्ताह में अचानक मित्र मंडली
के साथ यहाँ जाने की योजना बन गई, लगा बाबा का बुलावा आ गया।
लेकिन अपनी तैयारी को लेकर थोड़ा संशय भी था, कि 16 किमी की ट्रेकिंग
एक दिन में हो पाएगी या नहीं, वह भी 5,000 से 12,500 फीट की ऊंचाई तक। मदमहेश्वर
से जुड़े तमाम ब्लॉग्ज व विडियोज खंगाले, लगा कि उतना कठिन भी नहीं है। फिर
साथियों का उत्साह व जीवट देख लगा कि अपना अब तक का ट्रेकिंग अनुभव बटोरते हुए इसे
डेयर करते हैं, बाबा के धाम में जहाँ तक पहुँच पाए ठीक है, बाकि बाबा की इच्छा।
आवश्यक तैयारी – टॉफी चॉकलेट, बिस्कुट-नमकीन, मेवे, दवाईयाँ आदि
रास्ते के आवश्यक पाथेय जुटने शुरु हो गए। साथ में ट्रेकिंग शूज, पावर बैंक,
चार्जर आदि। ऊंचाई के हिसाब से अंतिम दिन के लिएगर्म कपड़े, टोपी, मफलर,
जुराबें, इन्नर वार्मर आदि। सबको अपने बैग में समेटते हुए एक पिट्ठू बैग तैयार हो
गया और कुछ आवश्यक सामान एवं तात्कालिक उपयोग की सामग्री के साथ एक साइड बैग।
हरिद्वार से यात्रा का शुभारम्भ होता है। 7 जून रविवार कीप्रातः
छः बजे दे.सं. विश्वविद्यालय परिसर से निकल पड़ते हैं। आज की मंजिल थी मदमहेश्वर
की राह में पड़ने वाला अंतिम मोटरेवल सुंदर सा पहाड़ी गाँव रांसी, जो 7000 फीट की
ऊँचाई पर बसा है, जहाँ पर रुकने की उचित व्यवस्था है और यह महमहेश्वर यात्रा का एक
महत्वपूर्ण पड़ाव भी है, जो माता राकेश्वरी देवी के पौराणिक मंदिर के लिए प्रख्यात
है। रविवार के चलते ऋषिकेश से जाम शुरु हो जाता है, जो तपोवन से कुछ आगे तक यात्रा
में थोड़ा ब्रेक लगाता है। इसमें चार धाम यात्रियों के साथ राफ्टिंग वालों का भी योगदान
रहता है, जो जीप पर रॉफ्ट को लादे इस राह पर वहुतायत में मिलते हैं।
फिर आगे ब्यासी के प्रख्यात चौहान ढावे में नाश्ता करते हैं।
आलू-परांठा-दाल-दही, चाय के साथ पर्फेक्ट नाश्ता होता है, जो आगे की यात्रा के लिए
दल की बेट्री को चार्ज करता है।
रास्ते में कोडियाला सदैव की तरह ध्यान
आकर्षित करता है, जो ठीक गंगाजी के किनारे बसा है और उस पार के उलट त्रिशंकु के
रुप में विराजमान हरे-भरे पर्वत को निहारने के लिए मजबूर करता है, जो किसी
ध्यानस्थ तपस्वी से प्रतीत होते हैं। इसी क्रम में शिवपुरी, ब्रह्मपुरी आदि
आते हैं। रास्ते में बजी जंपिंग के तामझाम भी ध्यान आकर्षित करते हैं और गंगा मैया
अपनी शांत नीली धारा के साथ कुछ दूर तक अपने पावन एवं शीतल स्पर्श का दिव्य अहसास
कराती रहती हैं।
रास्ते में हेमकुंड साहिब के श्रद्धालुओं का अलग ही नज़ारा दिखता है। कतार में बाइक के
आगे डंडे में फहराती धर्म-ध्वजा और श्रद्धालुओं का उत्साह नई ऊर्जा का संचार करता
है। पंजाब के मैदानों इलाकों से आए इन श्रद्धालुओं के लिए पहाड़ों में ड्राइविंग
अवश्य ही थोड़ा चुनौतीपूर्ण रहती होगी, लेकिन उत्साह व आस्था के आगे ऐसी बाधाएं
नतमस्तक हो जाती हैं।
इसी रास्ते में पड़ती है तोता घाटी, जिसका अपना इतिहास है। यह
लैंडस्लाइड जोन के रुप में प्रख्यात है व यहाँ इसे रोकने के तमाम प्रयास देखे जा
सकते हैं। यहीं से आगे गढ़वाल हिमालय की पहाड़ियों की अंतहीन श्रृंखला के दर्शन भी
किए जा सकते हैं औऱ नीचे गहराई में गंगाजी का धीमी गति से बहता अविरल प्रवाह। सड़क
के किनारे तमाम ढावे और उनके बाहर सजे स्थानीय दाल, सब्जी, अदरक, बुराँश, मालटा
जैसे उत्पाद ध्यान आकर्षित करते हैं।
इसी क्रम में आता है देवप्रयाग का संगम, जहाँ अलकनंदा और
भगीरथी नदियाँ मिलकर गंगाजी का रुप लेती हैं। इससे थोड़ा पहले भारत की सबसे
ऊंची बज्जी जंपिंग का सेटअप भी देखने को मिलता है, जिसमें जावांज लोग इसके
दुस्साहसिक खेल का आनन्द लेते देखे जा सकते हैं।
हमारे विचार में यह खेल सिर्फ अल्ट्राफिट
लोगों के लिए है, नहीं तो इसके झटके के साथ शरीर के अंग-अवयव व अस्थि-पंजर ढीले
पड़ सकते हैं, छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। ऐसी कुछ दुर्घटनाएं हाल ही में समाचारों
की सुर्खियाँ भी बनी हैं।
देवप्रयाग से मार्ग श्रीनगर की ओर बढ़ता है। रास्ते भर हेंमकुंड
साहिब जा रहे सिक्ख श्रद्धालुओं के झंडे लगे बाइक्स आते-जाते मिले। बापिसी में
झंड़े नदारद थे। कुछ लोग गाड़ियों में परिवारजनों व मित्रमंडली के संग जा रहे थे।
रास्ते में सड़क के किनारे लंगर की भी विशेष व्यवस्था दिखती है, जहाँ तीर्थ यात्री
भोजन-प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। रास्ते में कुछ यात्री बाइक में तिरंगा फहराए हुए भी
दिखे, जो प्राय़ः सोलो ट्रैव्लर ही अधिक मिले।
रास्ते में कीर्तिनगर से पहले मलेथा में रेलरूट का
कार्य जोरों-शोरों से चल रहा दिखा। इसके बाद आता है श्रीनगर शहर, जिसे माना
जाता है कि आदि शंकराचार्यजी ने स्वयं श्रीयंत्र के ऊपर स्थापित किया था। प्रवेश
करते ही गंगाजी का विस्तार एवं अविरल प्रवाह मन को बहुत सुकून देता है।
रास्ते में
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय और थोड़ी आगे नदी के उस पार इसका चौरास कैंपस
चर्चा का विषय बनते हैं।
श्रीनगर के बाद जलप्रयोजना के चलते झील या डैम का रुका पानी दिखता है,
जिसके किनारे बढ़ते हुए माता धारीदेवी का सिद्ध मंदिर आता है। यहाँ काफी
भीड़ लगी थी, हम लोग दूर से ही प्रणाम करते हैं। रुद्रप्रयाग से थोड़ा पहले झील के
बैक वाटर में रेतीले किनारों पर लोगों को स्नान व जलक्रीडा का आनन्द लेते देखा,
निश्चित रुप से अलकनंदा का हिमालय टच वाला जल डुबकी लगाने वालों को तरोताजा कर रहा
होगा।
आगे से बायीं ओर मुड़ कर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में
थोड़ी दूरी पर दायीं ओर पड़ता है रुद्रप्रयाग संगम, जहाँ अलकनंदा और
मंदाकिनी नदी का संगम होता है। यहाँ तक चार धाम यात्रियों की भीड़ मिलती है। अब हम
आगे मंदाकिनी नदी के मंद-मंद प्रवाह के साथ आगे बढ़ रहे थे। आगे अगस्तमुनि
कस्बा आता है। माना जाता है कि अगस्त मुनि ने यहाँ तप किया था। मालूम हो कि अगस्त
मुनि रामायण काल के एक मूर्धन्य ऋषि थे, जो अध्यात्म विद्या के ज्ञान औऱ विज्ञान
दोनों पक्षों में पारंगत थे। इनकी सिद्धियों के भय से रावण व उसकी राक्षस मंडली
इनके आश्रम की ओर झांकने का तक दुस्साहस नहीं कर पाती थी।
वनवास के दौरान श्रीराम और महर्षि अगस्त्य का मिलन रामायण की
एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी घटना है। जिसमें उन्होंने श्रीराम को
देवताओं के राजा इंद्र द्वारा दिए गए कई दिव्य अस्त्र शस्त्र भेंट किए। इनमें एक
दिव्य धनुष, कभी न खाली होने वाला अभेद्य तरकस शामिल थे। महर्षि अगस्त ने ही
श्रीराम को सुंदर एवं रमणीय स्थल पंचवटी जाने की सलाह दी थी। महर्षि अगस्त्य ने
श्रीराम को स्मरण दिलाया था कि वे राक्षसों को खत्म करने औऱ दुनियाँ में धर्म की
रक्षा करने के लिए ही इस धरती पर आए हैं। इस मिलने ने श्रीराम को और अधिक
शक्तिशाली बना दिया और उन्हें अपनी आगे की यात्रा के लिए सही दिशा दिखाई।
अगस्तमुनि के थोड़ा आगे मंदाकिनी नदी के किनारे एक एकांतिक ढाबे में दोपहर
का भोजन करते हैं। यहाँ से तरोताजा होकर मंजिल की ओर बढ़ते हैं, जिसके रास्ते में
आता है कुंड, यहाँ से वायीं ओर पुल पार करते ही रास्ता केदारनाथ की ओर
बढ़ता है। हम दायीं ओर के मार्ग से आगे बढ़ते हैं। अब तक बाहर मौसम गर्मी का अहसास
करा रहा था, हिमालय टच बाली आवोहवा नदारद थी। यहाँ से अभिसिंचन भी शुरु हो जाता
है, जिसे हम एक शुभ लक्षण मान रहे थे।
कुंड से संकरी सड़क के
साथ ऊखीमठ की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में एक झरना दायीं ओर ध्यान आकर्षित करता है।
सामने वायीं ओर गुप्तकाशी कस्बा दर्शनीय लग रहा था, जो पारम्परिक बसावट की
वजाए अपने आधुनिक भवनों के कारण हमें किसी दूसरे औद्यौगिक शहर का भ्रम दे रहा था,
लेकिन बापिसी में आते समय पता चला कि यही गुप्तकाशी है। रास्ते में वायीं ओर एक
मार्ग काली मठ की ओर जाता है। हम दाएं मार्ग पर चोपता की ओर बढ़ रहे थे, जो
थोड़ी देर में वायीं ओर उखीमठ की ओर मुढ़ता है। इससे थोड़ा पहले ओंकारेश्वर
मंदिर पड़ता है, जो बाबा केदारनाथ एवं बाबा मदमहेश्वर का शीतकालीन आवास स्थल
है। उखीमठ में प्रवेश करते ही शीतल आवोहवा वाला हिमालयन टच प्रारम्भ हो चुका था। (जारी...भाग-2 अगले ब्लॉग में)