बुधवार, 16 सितंबर 2026

मेरा गाँव मेरा देश – देवभूमि की एक भूली बिसरी विरासत

शेर-ए-कुल्लू, लाल चंद प्रार्थी, चाँद कुल्लवी

कुल्लू-मनाली लेफ्ट बैंक सड़क के मध्य में एक मनोरम पड़ाव पड़ता है नग्गर, जो कभी कुल्लू के राजघराने का निवास स्थान रहा है और कुल्लू की राजधानी भी, जिसके अवशेष नग्गर कैसल, हेरिटेज होटेल के रुप में आज भी मौजूद हैं। हम जब भी अपनी जन्म-भूमि पधारे, तो वहाँ से महज 10 किमी की दूरी पर स्थित नग्गर जाने का मौका कई बार मिला, कभी सीधे नग्गर को एक्सप्लोअर करने के वहाने, तो कभी मानाली की ओर बढते हुए।

नग्गर बस स्टॉप से मुश्किल से 200 मीटर पहले सड़क के ऊपर दायीं ओर लालचंद प्रार्थीजी का पुश्तैनी बंगला पड़ता है। लोकजीवन में प्रार्थीजी की चर्चा बचपन में अपने बढ़े-बुजुर्गों से सुनते आए, लेकिन उनके बारे में अधिक जानने की इच्छा तब जागी, जब उनका देहावसान (1982) हो चुका था। नग्गर में रोरिक गैलेरी जाते तो उनके संदर्भ में काफी सामग्री मिलती रही, लेकिन नग्गर में प्रार्थीजी की विरासत को संजोता कोई ठिकाना नहीं दिखा, न ही उनके नाम से प्रचलित साहित्य मिला।

हमारी खोज मूलतः उनकी कालजयी रचना कुल्लूत देश की कहानी को लेकर थी, जब इसका सार संदेश कहीं पढ़ने को मिला था। इस संदर्भ में चर्चा इस लेख के अंत में मिलेगी, पहले प्रार्थीजी के जीवन के मुख्य पहलुओं से परिचय करवाती कुछ बातें शेयर करना चाहूंगा, जो हमें उपलब्ध साहित्य के अवलोकन पर मिली।

लाल चंद प्रार्थी हिमाचल प्रदेश के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, प्रख्यात लेखक, कलाकार, कवि और संस्कृति प्रेमी थे। लाल चंद प्रार्थी को उनकी बेहतरीन काव्य और साहित्यिक रचनाओं के कारण 'चांद कुल्लवी' के नाम से भी जाना जाता था और उनकी अद्भुत शायरी के लिए उन्हें हिमाचल का 'मिर्ज़ा ग़ालिब' भी कहा जाता है। अपने संघर्षपूर्ण जीवन में उन्होंने राजनीति और संस्कृति के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण उपलब्धियां अर्जित की।

अपनी विशेषताओं एवं योगदान के लिए उन्हें हिमाचल के लाड़ले, कुल्लवी चाँद, शान-ए-कुल्लू, शेर-ए-कुल्लू जैसे नामों से संबोधित किया गया। हिमाचल प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री वीरभद्रजी के शब्दों में, प्रार्थी जी देशभक्त, लोक संगीत प्रेमी, लेखक तथा कवि थे। उन्होंने हिमांचल के सांस्कृतिक जीवन में नयी प्रेरणा जगाई तथा पहाड़ी भाषा और साहित्य के लिए अनथक कार्य किया। वह हिमाचल मन्त्रीमण्डल के सदस्य के रूप में जितने लोकप्रिय थे, साहित्यिक क्षेत्र में उससे कम लोकप्रिय नहीं थे।

जन्म एवं शिक्षा – प्रार्थीजी का जन्म 3 अप्रैल 1916 को कुल्लू जिले के नग्गर गाँव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद में डिग्री प्राप्त की थी और स्वतंत्रता संग्राम आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। लाल चंद प्रार्थी को हिमाचल प्रदेश में 'भाषा विभाग' और 'कला संस्कृति अकादमी' की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है। इस कारण उन्हें हिमाचल की कला-संस्कृति का जनक भी माना जाता है।

सामाजिक राजनैतिक जीवन - प्रार्थीजी एक आयुर्वेदाचार्य थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी। वे कुल्लू क्षेत्र से तीन बार (1952, 1962, और 1967) विधानसभा सदस्य चुने गए और राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। इस तौर पर वे कुल्लू से हिमाचल विधान सभा में, भाषा संस्कृति एवं कला मंत्री के रुप में सुशोभित रहे। इसके साथ वे समाज सेवा में भी अग्रणी रहे।

साहित्य सृजन एवं सांस्कृतिक अवदान – प्रार्थीजी एक उम्दा साहित्यकार, उर्दू, फारसी, हिंदी, अंग्रेजी में समान अधिकार रखते थे। प्रो. नारायण चन्द पराशर के शब्दों में, श्री लाल चन्द प्रार्थी का स्मरण आते ही पहाड़ी भाषा साहित्य तथा संस्कृति के प्रति जागरूक करने तथा अपनी संस्कृति पर गर्व करने वाले प्रेरक व्यक्तित्व की तस्वीर उभर कर सामने आती है। डॉ० यशवन्त सिंह परमार के साथ मिलकर उन्होंने जिस स्वप्न को साकार करने के लिए सफल प्रयत्न किए, वह हिमाचल के लिए एक वरदान सिद्ध हुआ। न केवल पंजाब के कांगड़ा, कुल्लू, लाहुल-स्पीति तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल हुए, अपितु प्रथम नवम्बर, 1966 से पहाड़ी भाषा, साहित्य तथा संस्कृति का युग भी आरम्भ हुआ।

प्रार्थीजी जीवन भर पहाड़ी भाषा-संस्कृति के विकास के लिए प्रयत्नशील रहे। आयुर्वेद की भी उन्होंने उल्लेखनीय सेवा की। प्रार्थीजी न केवल एक सफल राजनीतिज्ञ थे, अपितु लेखक, चिन्तक, कवि और आयुर्वेद विशेषज्ञ भी थे। लाल चन्द प्रार्थी 'चान्द कुल्लवी' के नाम से पहाड़ी तथा उर्दू में लिखते रहे। "हिमत केरिया अपणे देसा री किस्मत बणाणी असा" उनकी यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई। पत्रकारिता और सम्पादन के माध्यम से उन्होंने प्रदेश की भरपूर सेवा की। कुलूत देश की कहानी उनकी एक प्रसिद्ध कृति है, जिसमें इतिहास और संस्कृति, धर्म तथा दर्शन का तथ्यपरक वर्णन है। इस प्रकार प्रार्थीजी पहाड़ी संस्कृति के प्रबल उद्घोषक थे और वे महाराजा संसार चन्द, पहाड़ी गान्धी बाबा कांशीराम तथा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के स्वप्नों को साकार करना चाहते थे। यही दायित्व आज हमारे ऊपर है कि हम उनके मार्गदर्शन पर चलते हुए उनके संदेश को दोहराएं –

शबे गम के अन्धेरे से न घबरा ए-मुसाफिर।

तेरे लिए बेताब है आगोश सहर का।।

(प्रो० नारायण चन्द पराशर, शिक्षा, भाषा-संस्कृति मन्त्री एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष, हिमाचल अकादमी, चैत्र १ शक सम्वत् १६१६)

कालजयी साहित्यिक रचना - "कुलूत देश की कहानी" लाल चंद प्रार्थी द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक एवं कालजयी पुस्तक है। वर्ष 1971 में प्रकाशित यह कृति आज के कुल्लू (प्राचीन नाम: कुलूत) क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास, लोक-संस्कृति, राजनीति और विरासत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

कुलूत (कुल्लू) को भारत के प्राचीनतम गणराज्यों में से एक माना जाता है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद, महाभारत और रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। लेखक ने इस पुस्तक में ऋग्वेद के समय से लेकर आधुनिक युग तक के कुल्लू के इतिहास को संजोया है। पुस्तक में ऋग्वेद, महाभारत और प्राचीन पुराणों के संदर्भों के आधार पर कुलूत देश (कुल्लू) के उद्गम और इसकी कोल, दस्युराज शम्बर जैसी प्राचीन जातियों के इतिहास को रेखांकित किया गया है। साथ ही इसमें महाभारत काल, विभिन्न जातियों (कोल, किरात, नाग, खश आदि) के संघर्ष व फैलाव तथा प्राचीन राजवंशों और शासन प्रणाली पर प्रकाश डाला गया है।

पुस्तक में कुल्लू के स्थानीय राजाओं के शासन, उनकी वंशावली, क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, पारंपरिक वेशभूषा, लोककथाओं, वहाँ के समाज और स्थानीय देवी-देवताओं की परम्परा से युक्त समृद्ध देव-संस्कृति का व्यापक और रोचक वर्णन है। यह पुस्तक सांस्कृतिक धरोहर के रुप में हिमाचल प्रदेश की लोक-संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।

इसके साथ वजूद-ओ-अदम उनका प्रसिद्ध उर्दू ग़ज़ल संग्रह है, जो उनकी दार्शनिक सोच और उत्कृष्ट काव्य कला को दर्शाता है।

प्रार्थीजी का अमर संदेश - इस पुस्तक का उद्देश्य आने वाली पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित करवाना था। पुस्तक के समर्पण में प्रार्थी जी की ये प्रसिद्ध पंक्तियाँ शामिल हैं:

"निज गौरव का कुछ ज्ञान रहे।

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।

सब जाए अभी पर मान रहे।

मरणोत्तर गुंजित गान रहे॥"

प्रार्थीजी का यह सांस्कृतिक संदेश निश्चित रुप से पहाड़ी समुदाय को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।

विरासत - उनकी याद में और कुल्लू की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कुल्लू में एक प्रसिद्ध ओपन-एयर थिएटर का नाम लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र रखा गया है। यहाँ हर वर्ष प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। निसंदेह रुप में इस कला केन्द्र के निर्माण से संस्कृति तथा कला प्रेमियों को प्रोत्साहन मिला है।

कुल्लू के कलाकेंद्र एवं हिमाचल प्रदेश में भाषा, संस्कृति विभाग की स्थापना के अतिरिक्त कुल्लूत देश की कहानी जैसी एक शोध प्रधान कालजयी रचना उनकी एक अनुपम देन है, जिस पर कार्य अभी शेष है।

ठाकुर सत्यप्रकाशजी के शब्दों में, अपनी सशक्त लेखनी से प्रार्थीजी ने 'कुल्लूत देश की कहानी' पुस्तक रची, जिसमें यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया है कि कुल्लू से गढ़‌वाल तक के लोगों की भाषा एवं संस्कृति एक है, इसलिए यहां के लोगों का रहन-सहन, खान पान, रीति-रिवाज, लोक नृत्य, गीत की शैली एक सी है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से लोक-संस्कृति को जीवित बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वे स्वयं प्रसिद्ध लोकनर्तक, कलाकार, कवि, लेखक, तथा राजनीतिज्ञ थे। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व सभी के लिए प्रेरणादायी था।

प्रार्थी जी भक्ति प्रवृत्ति के व्यक्ति थे और अपना अधिकांश समय भगवान के ध्यान में लगाते थे। देवी-देवताओं में उनकी पूर्ण आस्था थी। वह कुल्लू को अठारह करडुओं का देश कहते थे। वे हिमाचल को पहाड़ी प्रदेश के तौर पर अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए भी हमेशा डॉ. यशवन्त सिंह परमार के कन्धे से कंधा मिलाकर कार्य करते रहे। (सत्य प्रकाश ठाकुर, मुख्य संसदीय सचिव, 3 अप्रैल 1994)

समाज, संस्कृति व अपनी मातृभूमि की अथक सेवा साधना करते हुए 11 दिसम्बर 1982 को प्रार्थीजी का देहावसान होता है और भावी पीढ़ी के लिए एक अनमोल साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विरासत छोड़ जाते हैं।

हिमाचल के यशस्वी मनीषी-साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ट के शब्दों में, साहित्यकार समाज की अमूल्य निधि हुआ करती हैं। अपनी पूरी जीवन यात्रा के अनुभव सारांश वे रचनाओं के रूप में पीछे छोड़ जाते हैं। जीवन सत्य सार के रूप में कही गई उनकी बातें हमें भटकी राह दिखाती हैं। उनकी कृतियों को हम देर तक याद करते हैं।

कई बार ऐसा भी हुआ है कि ढेरों पृष्ठ सामग्री समाज को देने पर भी हम रचनाकार के विषय में कुछ नहीं जानते। महर्षि व्यास का उदाहरण हमारे सामने है। जिस व्यास ने वेदों का विस्तार किया, महाभारत जैसा पंचम वेद रच डाला। उस श्रीकृष्ण द्वैपायन के जीवन के विषय में हम बहुत कम जानते हैं। बहुत ढूंढने पर भी उनके जीवन के क्षण अज्ञात ही रह जाते हैं। ऐसे ही महाकवि कालिदास के विषय में आज इतिहास अटकलें लगाता है। हम अपने रचनाधर्मी युग पुरुषों को नहीं जानते, यह हमारा दुर्भाग्य है।

प्रार्थी जयन्ती 3 अप्रैल, 1994 के पावन अवसर पर, सुदर्शन वशिष्ठ, सचिव, हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी के ऊपर कहे शब्द इतिहास का एक कटु सत्य है। हम स्वयं जब प्रार्थीजी की कालजयी रचना कुलूत देश की कहानी को पढ़ने के लिए प्रेरित हुए, तो हम चकित रह गए कि कुल्लू के किसी पुस्तक भंडार में यह पुस्तक उपलब्ध नहीं है। फिर हम जिला पुस्तकालय पहुँचे, इस आशा के साथ कि यहाँ तो यह अवश्य उपलब्ध मिलेगी। लेकिन वहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। हमारे कई बार के आग्रह पर कहीं से उपलब्ध इसकी पीडीएफ के आधार पर प्रिंट प्रति तैयार हुई, जो पुस्ताकलय के संदर्भ कक्ष में आज उपलब्ध है। प्रार्थी जी की कालजयी पुस्तक की मूल प्रति का उपलब्ध न होना हमारी साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना की कुंद पड़ती दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का द्योतक है।

पुस्तक के अध्ययन उपरान्त हमें लगा कि इस पर कार्य़ शेष है। प्रार्थीजी अपने अथक प्रयास के साथ इस पुस्तक में बहुत ही अहम एवं महत्वपूर्ण सुत्र-संकेत दे गए हैं, लेकिन इन पर शोध करते हुए इनकी पुष्टि एवं इतिहास लेखन वाकि है, जिसे प्रबुद्ध एवं जागरुक भावी पीढ़ी को करना है। ईश्वर कृपा से मिली अंतःप्रेरणा के आधार पर इस संदर्भ में प्रय़ास जारी हैं, देखते हैं कि यह किस अंजाम तक पहुँचता है।

निष्कर्ष रुप में आवश्यकता प्रार्थीजी की अनमोल विरासत को संजोने व आगे बढ़ाने की है। कुलूत देश की कहानी में वर्णित देवसंस्कृति की आध्यात्मिक विरासत को जीवंत जाग्रत एवं प्रतिष्ठित करने का कार्य अभी शेष है।

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

भारत के वन पुरुष का पर्यावरण संदेश

फोरेस्ट मैन पदमश्री जादव मोलाई पायेंग

पर्यावरण की समस्या, कटते जंगल, वेघर होते वन्य जीव और मानवीय अस्तित्व का संकट आज के ज्वलंत मुद्दे हैं। लोगों को शिकायत रहती है कि सरकार इसके लिए कुछ विशेष प्रयास नहीं कर रही और लोग साथ नहीं दे रहे। फिर घटते वनों के आच्छादन की चिंता भी सभी करते हैं, लेकिन क्या करें, इस पर कोई व्यवहारिक समाधान नहीं खोज पाते। प्रस्तुत है इस परिस्थिति में समाधान का आलोक विखेरती भारत के फोरेस्ट मैन पदमश्री जादव मोलाई पायेंग की अविश्वसनीय कर्म गाथा, जो पाठकों को झकझोरते हुए इन तमाम प्रश्नों के उत्तर देती है।

इस गाथा के नायक  की वाल्यवस्था गुजरती है आसाम में ब्रह्मपुत्र नदी में बने विश्व के सबसे बड़े टापू में, जो बनकटाव एवं बाढ़ के कारण रेगिस्तान व बंजर जमीन के टुकड़े के रुप में रुपाँतरित हो चुका था। इसके एक टीले पर बालक पायेंग की कुटिया थी, जो परिवार सहित गाय व भैंस का दूध बेचकर जीवनयापन कर रहे थे। बाढ़ के कारण सर्पों का एक झुण्ड टापू में इकट्ठा हो जाता है और कुछ दिन बाद तपती रेत में इनकी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। घटना वर्ष 1979 की है, जब 16 वर्षीय किशोर जादव पायेंग एक दिन धूप भरी दोपहरी में रेतीली जमीं पर कई मरे हुए सर्पों को देखता है। उचित छाँव, नमीं व जल के कारण वे अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।

यह दृश्य पायेंग के किशोर मन को झकझोर देता है और अंतर्मन में विचार कौंधता है कि यदि यहाँ पेड़ होते, जंगल का आच्छादन होता तो इनकी ऐसी अकाल मृत्यु नहीं होती। बड़ों से मार्गदर्शन मिला कि बाँस के जंगल उगाकर जीवों की रक्षा की जा सकती है। किशोक पायेंग के जेहन में घर कर गया कि टापू वृक्षों से हीन है और यदि यहाँ के जीव-जंतुओं व जीवन को बचाना है तो पेड़ लगाने होंगे, जंगल खड़ा करना होगा।

किशोर पायेंग नित्य बाँस का एक पेड़ लगाना प्रारम्भ करते हैं। और फिर दिन में तीन-चार घण्टे में सैंकड़ों पौध लगाते हैं। स्वयं ही पेड़ लाते हैं, स्वयं ही गड्ढा खोदते हैं और पौधारोपण करते हैं। और यह जादव पायेंग की नियमित दिनचर्या बन जाती है। सरकारी योजना भी इस दौरान यहाँ आजमायी जा चुकी थी, लेकिन तीन वर्ष में ही उचित सहयोग व प्रेरणा के अभाव में यह दम तोड़ती है। लेकिन किशोर पायेंग का वृक्षारोपण का एकला अभियान अनवरत रुप से ज़ारी रहा। अंतःकरण को झकझोरता प्रेरणा प्रवाह किशोर की प्रेरक शक्ति के रुप में कार्य कर रहा था।

इस तरह कुछ ही वर्षों में पेड़ बड़े होने के साथ टापू पर एक जंगल रुपाकार ले रहा था। शुरुआत की कठिनाई सरल हो रही थी, अब वृक्ष के बीज गिरकर स्वयं की पौध तैयार कर रहे थे। और धीरे-धीरे पशु-पक्षियों की भी यहाँ वसावट प्रारम्भ हो जाती है। ऐसे में वृक्षों के फलों को खाने पर पक्षी व जीव-जंतुओं द्वारा वन का विस्तार प्राकृतिक रुप से हो रहा था। और इनका एकला वृक्षारोपण अभियान भी जारी था।

इस अभियान में पायेंग किशोरावस्था से युवावस्था की दहलीज को पार कर जाते हैं, लेकिन उनका यह अभियान अखण्ड रुप से गतिशील था। लगभग 30 वर्ष पश्चात सन 2008 में स्थानीय वाइल्ड लाइफ फोटो पत्रकार जीतू कलिटा की नज़र पायेंग के इस अद्भुत प्रयोग पर पड़ती है और वे इसका समाचार स्थानीय अखबार में प्रकाशित करते हैं, लोगों को विश्वास नहीं होता कि ब्रह्मपुत्र के टापू में एक व्यक्ति इतना बड़ा प्रयोग कर रहा है और किसी को इसकी कानों कान कोई खबर तक नहीं। यहीं से जादव पायेंग का गुमनाम भगीरथी प्रयास जनता जनार्दन के सामने आता है।

इस अभूतपूर्व कार्य के लिए जाटव पायेंग को देश भर से प्रतिष्ठा मिलती है। राष्ट्रीय समाचार पत्रों में इसकी कवरेज होती है, विश्वविद्यालयों में उनके प्रयासों की प्रस्तुति होती है, 2010 के एक कार्यक्रम में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद स्वयं जादव पायेंग को पुरस्कृत करते हैं। जादव पायेंग को फोरेस्ट मैन ऑफ इंडिया की उपाधि मिलती है, जिसे पायेंग अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं। लेकिन उनके चेहरे पर उदासी भी छा जाती है कि लोग उस तत्परता के साथ वृक्षारोपण के कार्य में स्वयं कोई पहल नहीं क रहे, जिससे कि उनके आसपास के बंजर टापू, पहाडियों भी हरी-भरी हो सके।

वर्ष 2012 में जादव पायेंग के भगीरथी पुरुषार्थ पर पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनती है, जो कई पुरस्कारों से नवाज़ी जाती है। गाँव के एक सरल किंतु प्रेरक व्यक्ति को टेड़ टॉक के लिए बुलाया जाता है। देश ही नहीं विदेशों में भी उनके इस अभूतपूर्व कार्य की चर्चा होती है और वहाँ जाकर वृक्षारोपण व जलवायु संकट के समाधान पर अपने अनुभूत ज्ञान को सांझा करते हैं। वर्ष 2015 में जादव पायेंग को पदमश्री पुरस्कार से तत्कालीन राष्ट्रपति महोदय प्रणव मुखर्जी द्वारा पुरस्कृत किया जाता है।

आज पायेंग प्रौढ़ावस्था की दहलीज को पार कर चुके हैं और उसी निष्ठा के साथ वे प्रातः साढ़े चार बजे अपने वृक्षारोपण अभियान के लिए निकल पड़ते हैं। कई किमी पैदल चलकर, फिर नाव से ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को पार करते हुए वे टापू में पहुँचते हैं और अपने वृक्षारोपण के अभियान में जुटे हुए हैं।

आज उनके जंगल में हर तरह के जीव-जंतु आश्रय पा रहे है। गैंढ़ा, हाथी, हिरन सहित बंगाल टाइगर लगभग हर प्रजाति के जीव यहाँ पनप रहे हैं। उन्हीं के नाम से इसे मौलाइ फोरेस्ट के रुप में जाना जाता है, जिसे वे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।

और देश-विदेश से लोग आकर इनका कार्य देख चकित होते हैं, प्रेरणा लेते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में धरती पर हरियाली का आच्छादन लगाने के संकल्प के साथ लौटते हैं।

पदमश्री पायेंग की जीवन गाथा सीख देती है कि विपरीत परिस्थितियों के बीच एक व्यक्ति अकेले दम पर पूरा जंगल खड़ा कर सकता है, वह भी उन विषम परिस्थितियों में जब कुछ साथ नहीं था। था तो बस एक संकल्प, एक दृढ़ भाव कि इस टापू को हरा-भरा करना है, इसे मनुष्य सहित जीव-जंतुओं के लिए रहने योग्य बनाना है। यदि देश का हर संवेदनशील नागरिक वृक्षारोपण को लेकर छोटा सा भी संकल्प लेता है तो पूरा देश हरियाली की चादर औढ़कर वर्तमान पर्यावरण संकट की विकराल होती समस्या के समाधान की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

सोमवार, 31 अगस्त 2026

साधु संग - 4, प्रकाश पथ की चुनौतियाँ और साधना पाथेय

नियति की चुनौती स्वीकार करें

युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

 आगत कठिनाइयों को देखकर निढाल हो बैठना और रोते-कलपते समय गंवाना विपत्ति को दूना करने के समान है। हमें यह मानकर ही चलना पडेगा कि जीवन आरोह-अवरोध के ताने-बाने से बुना गया है। धूप, छाँह की तरह सफलताओं और असफलताओं की उभयपक्षी हलचलें होती ही रहती हैं और होती ही रहेंगी। सर्वथा सुख-सुविधाओं से भरा जीवन क्रम कदाचित् ही कोई जीता है। ज्वार-भाटों की तरह उठाने और गिराने वाली परिस्थितियाँ अपने ढंग से आती और अपनी राह चली जाती हैं। तट पर बैठकर उतार-चढ़ाव का आनंद लेने वाले ही जीवन नाटक के अनुभवी कलाकार कहे जा सकते हैं।

सदा दिन ही बना रहे, रात कभी आये ही नहीं, भला यह कैसे हो सकता है? जन्मोत्सव ही मनाए जाते रहें, मरण का रुदन सुनने को न मिले, यह कैसे संभव है। सुख की घड़ियाँ ही सामने रहें, दुख के दिन कभी न आयें - यह मानकर चलना यथार्थता की ओर से आँखें मूंद लेने के समान है। बुद्धिमान वे हैं जो सुखद परिस्थितियों का समुचित लाभ उठाते हैं और दुख की घड़ी आने पर उसका सामना करने के लिए आवश्यक शौर्य और साधन इकट्ठा करते रहते हैं।

माता भगवती देवी शर्मा

परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलताओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। शारीरिक संकट उठ खड़ा हो, कोई अप्रत्याशित रोग घेर ले यह असंभव नहीं। परिवार के सरल क्रम में से कोई साथी बिछुड़ जाय और शोक-संताप के आँखू बहाने पड़ें, यह भी कोई अनहोनी बात नहीं है। ऐसे दुर्दिन हर परिवार में आते हैं और हर व्यक्ति को कभी न कभी सहन करने पड़ते हैं। मनचाही सफलताएँ किसे मिली हैं। मनोकामनाओं को सदा पूरी करते रहने वाला कल्पवृक्ष किसके आँगन में उगा है? ऐसे तूफान आते ही रहते हैं जो सँजोई हुई साध के घोंसले उड़ाकर कहीं से कहीं फेंक दें और एक-एक तिनका बीनकर बनाए गए उस घरोंदे का अस्तित्व ही आकाश में छितरा दें, ऐसे अवसर पर दुर्बल मनःस्थिति के लोग टूट जाते हैं ।

नियति क्रम से हर वस्तु का, हर व्यक्ति का अवसान होता है। मनोरथ और प्रयास भी सर्वदा सफल कहाँ होते हैं। यह सब अपने ढंग से चलता रहे, पर मनुष्य भीतर से टूटने न पाए इसी में उसका गौरव है। समुद्र तट पर जमी हुई चट्टानें चिर अतीत से अपने स्थान पर जमी-अड़ी बैठी हैं। हिलोरों ने अपना टकराना बंद नहीं किया सो ठीक है, पर यह भी कहाँ गलत है कि चट्टान ने हार नहीं मानी।

न हमें टूटना चाहिए और न हार माननी चाहिए। नियति की चुनौती स्वीकार करना और उससे दो-दो हाथ करना ही मानवी गौरव को स्थिर रख सकने वाला आचरण है। 

            - युगऋषि वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

........................................................................

सद्विचारों का कारवाँ तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था

ध्यान की घड़ियों में आत्मा ने स्वयं से कहा-मौन में ही शांति का निवास है। और शांति पाने के लिए तुम्हें बलवान होना आवश्यक है। त्याग की शक्तिशाली निस्तब्धता में जब इन्द्रियों का विक्षोभ डूब जाता है तब मौन आता है। इस संसार-मरुभूमि में तुम पथिक हो। यहाँ न रुकना जिससे कि तुम रास्ते में ही नष्ट न हो जाओ। अपने लिए सद्विचारों का कारवाँ बना लो तथा जीवन्त विश्वास के जल की व्यवस्था कर लो। सभी मृगतृष्णाओं से सावधान रहो। लक्ष्य वहाँ नहीं है। बाह्य आकर्षणों से भ्रमित न होओ। सभी त्याग कर उन पथों से जाओ जो तुम्हें स्वयं तुम्हारी अन्तर्दृष्टि के एकांत में ले जायेंगे। अनेकत्व के जाल में फँस कर उसका अनुसरण न करो। एकत्व के जिस लक्ष्य की ओर संतगण सबसे अलग और अकेले जाते हैं, उसी पथ में तुम भी जाओ। वीर होने का साहस करो। प्रारंभिक प्रयत्नों में ही असत्य को जीतो। विचलित न होओ। पवित्रता में डूब जाओ। एक उन्मत्त छलांग में स्वयं को ईश्वरीय समुद्र में डूबो दो। दिव्यत्व ही लक्ष्य है। 

ओ महान् ज्योतिर्मय की किरण! प्रकृति में तुम्हारे लिए और कोई वस्तु नहीं हो सकती। शीघ्रता करो जिससे कि तुम्हें पश्चाताप न करना पड़े। धार्मिक आंतरिकता और दृढ़ विश्वास के घोड़ों को पकड़ो। यदि आवश्यक हो तो स्वयं को कुचल डालो। किसी भी वस्तु को तुम्हारे रास्ते में बाधक न होने दो। तुम्हारा भाग्य संयोग पर निर्भर नहीं है। निश्चय और आत्मशक्ति के साथ आगे बढ़ो क्योंकि तुम्हारा लक्ष्य सत्य है। वस्तुतः तुम स्वयं ही सत्य हो। मुक्त हो जाओ। मुक्त हो जाओ। आत्मानुभूति की भाषा में बल के समान और कोई महत्त्वपूर्ण शब्द नहीं है। प्रारंभ में, अंत में, सदैव तुम बलवान बनो। स्वर्ग, नरक, देवता, राक्षस किसी से भी न डरते हुए आगे बढ़ो। तुम्हें कोई नहीं जीत सकेगा। ईश्वर स्वयं तुम्हारी सेवा करने को बाध्य है, क्योंकि वह स्वयं तुम्हारे भीतर विराजमान है, जिसके प्रति कि वह आकर्षित है। अतः एकत्व ही अति उदार अन्तर्दृष्टि का सार है, क्योंकि जो तुम्हारे भीतर है, जो तुम हो, वह ईश्वर है। वास्तव में तुम स्वयं ही दिव्य हो।

 – एफ जे अलक्जेन्डर, स्वामी विवेकानन्द के अमेरिकी शिष्य

           ...................................................................................

साधक सावधान 

शक्ति को व्यर्थ न जाने दो। आत्मशक्ति का अविराम संचय और उसकी सुरक्षा करते रहो। व्यर्थ विवाद, उत्तेजना, आलस्य, त्वरा, जड़ता, उहापोह के द्वारा नष्ट होने वाली शक्ति को बचाना होगा साधक।

वास्तविक विनम्रता का मतलब है, एक च्युतिरहित और निर्भूल भावात्मकता और क्रियात्मकता। अतः आत्म-महत्त्व, आत्म-प्रदर्शन, आत्मपोषण, आत्म-कारुण्य, आत्म-कथन से बचो। सही विनम्रता शक्ति-संरक्षक है। प्रतिक्षण अपनी भौतिक, मानसिक, प्राणिक सभी सीमाओं का अतिक्रमण करते रहो। "नहीं सकता हूँ", से "सकता हूँ" की ओर चलना ही साधना-संतुलन का मूल है।

हम स्वयं ही हमारी सीमा हैं। एक आत्म ज्ञान, एक आत्म शक्ति, एक संचेतना-बीज हमारे भीतर बंद है। उसे लगातार ढूंढते रहो, खोजते रहो । उसका उद्घाटन कर पाना ही जीवन की एक मात्र सफलता है।

अपनी आध्यात्मिक सफलता सिद्धि के सबसे बड़े शत्रु हम स्वयं ही हैं। हमारा ही एक भाग एक भयानक व मरणान्तक विष-क्रीड़ा में लगा रहता है, जो हमारे प्रत्येक ज्ञान-प्रयास के विरुद्ध बक-बक करता रहता है। हमें उठने से रोकता रहता है। हम नहीं सुनते तो अवसाद व विषाद की काली मोटी चादर से हमें सब ओर से लपेट कर हमारी सारी गतियाँ व शक्तियाँ कुंद कर देता है। अतः स्वयं का स्वयं से उद्धार कर साधक। तुझे यह करना ही होगा।

हमारे भीतर की अंध-शक्तियाँ हमारे मन के द्वारा हमसे ही चालाकी व धूर्त्तता करती रहती हैं, कि हम अपनी ज्योतिर्यात्रा को छोड़ दें। इससे बचने का एकमात्र उपाय है हर प्रकार की बाधा और निराशा व असफलता के बावजूद लगे रहना, डटे रहना, बढ़ते रहना।

मनुष्य में यह सामर्थ्य होनी ही चाहिए कि जब चाहे मन के संकल्प-विकल्प व स्व-वार्तालाप को बंद कर सके। प्रकाश की ओर दृष्टि जमाने में यह स्व-वार्तालाप बहुत बड़ी बाधा है। एक साधक को सर्वदा योद्धाभाव में स्थित होना चाहिए। सदा चुस्त, चौकन्ना व सावधान। कहीं से भी, कभी भी, कोई भी प्रहार किया जा सकता है। प्रमाद व गफलत साधक के सबसे महान शत्रु हैं।

साधक को सदा शांत, समाहित व संगठित चित्त रहना चाहिए व अपनी पकड़-साधना विषय से कभी भी हटने देना नहीं चाहिए। - श्री माँ

चुनींदी पोस्ट

In the uplifting company of SWAMI VIVEKANANDA

Stick to your heartfelt CONVICTION, rest assured!                   1.      Be aware of your Divine essence & Love yourse...