शनिवार, 16 मई 2026

मेरा गाँव मेरा देश – भेड़-बकरी पालन और फुआल नानाजी के रोमाँचक किस्से, भाग-1

 

वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना

गाय-बैल के साथ भेड़-बकरियों का पालन पूरे गाँव का पुश्तैनी पेशा रहा। प्रारम्भ से पहाड़ों में अन्न, दाल व सब्जियों के सीमित विकल्प होने के कारण भेड़-बकरियों का पालन बुजुर्गों का मुख्य व्यवसाय रहा। सर्दियों में अधिक बर्फ के चलते अन्न व फल शाक के साधन सीमित रहते, सो पशु धन लोगों की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते। सर्द मौसम में ठंड से बचाव के लिए भेड़-बकरियों से ऊन मिल जाती और आपातकाल में इनसे दूध से लेकर माँस आदि की आवश्यकता पूर्ति हो जाती।

घर में एक व्यक्ति की ड्यूटी इनको चराने की रहती। सुबह आठ-नौ बजे क्लार (ब्रँच) के बाद घर का एक सदस्य इनके काफिले को लेकर जंगल में जाता। भेड़ के छोटे मेमणों व बकरियों के छोटे बच्चों (छेलूओं) को घर में ही एक विशिष्ट स्थान पर रखा जाता। सर्दियों में चूल्हे व तंदूर बाले कमरे में एक बाढ़ा लगाकर एक कौने में इनको रखा जाता, जिसमें फर्श पर नरम घास-पत्तियां बिछी रहती। बचपन इनके बाढ़े में घुसकर उनके साथ लाड़-प्यार करते, खेलते कैसे बीता, पता ही नहीं चला। अभी भी इनके साथ बिताए विशिष्ट पल याद करने पर गुदगुदाते हैं, एक सुखद सिहरन पैदा करते हैं। खुला छोड़ने पर इन नन्हें फरिश्तों की ऊछल-कूद देखने लायक रहती।

शाम को भेड़-बकरियाँ जंगल से घर आते ही अपने मेमनों व छेलुओं को याद करतीं। इनकी विशेष आबाजें सुनकर मेमने व छेलू भी मिलने के लिए जैसे मचल जाते और सीधा उनके पास पहुँचकर स्तनपान करते। जीव-जंतुओं के इस ममत्व भाव को देखकर ईश्वर की कलाकारिता पर विचार होता कि उसने अपनी सृष्टि को चलाने के लिए कैसे जीव-जंतुओं से लेकर इंसान को तक ममत्व एवं वात्सल्य की डोर में बाँध रखा है, जिसके चलते उसकी सृष्टि का पालन-पौषण एवं विस्तार सहज रुप से होता रहता है।

बचपन ननिहाल में बीता, सो हमारे मामू साहब भेड़ों-बकरियों को लेकर जंगल में जाते। हमारे बुजुर्ग नानाजी भी भेड़-बकरियों का पालन कर चुके थे, व कई बार इनके झुंडों के साथ फुआल की भूमिका में लाहौल-स्पिति जा व रह चुके थे। वे बड़ी रूचि के साथ वहाँ बिताए रोमाँचक पलों को याद करते और कथा-कहानियों व किवदंतियों के रुप में हम बच्चों को बड़े शौक और गर्व के साथ सुनाते। जो निश्चित रुप से हमारे बाल मन को रोमाँचित करती, कहीं गहरे छू जाती। और हमारा संकल्प बलवती होता कि एक बार हम भी इस यात्रा का हिस्सा अवश्य बनेंगे और कुछ दिन-सप्ताह या माह वहाँ रहकर जीवन की बीहड़ सच्चाई को नज़दीक से देखेंगे।

बारिश में लाहौल-स्पिति जाने से पहले भेड़-बकरियों का काफिला गाँव के ऊँचाई वाले जंगल में ही रहता, यहाँ रुकने के लिए रुआड़ थे व साथ ही देवदार से लेकर रई-तोश के आसमान छूते सदावहार हरे-भरे वृक्ष। जंगली खनोर (चेस्टनट) के पेड़ों से गिरने के सीजन में तो भेड़-बकरियों की डाइट प्लानिंग होती। एक दिन पनाणी शिला में खनोर के जंगलों में चरती और दो दिन ऊपर ठेली (जंगली घास के ढलानदार मैदान, बुग्याल) में। जंगली खनोर के गिरे काले रंग के गिरिदार बीजों को भेड़-बकरियाँ फोड़कर खातीं, जिनको बहुत पौष्टिक माना जाता है। अधिक खाने पर पेट फूलने का डर रहता, सो बाकि के दो दिन इनसे दूर रखा जाता।

जुलाई माह में हमारे इलाके में मौनसून की बारिश होती, सो फुआल मई-जून में लाहौल-स्पीति की ओर कूच करते। मालूम हो कि लाहौल-स्पिति घाटी में मौनसून की बारिश नहीं होती। कुल्लू-मानाली के आगे पीर-पंजाल पर्वत श्रृंखला मौनसून के नम बादलों को आगे बढ़ने से रोकती है। इस तरह लाहौल-स्पिति घाटी भेड़ पालकों के लिए इस सीजन में आदर्श रहती।

सड़कें तो बाद में बनीं, हमारे पुरखों के समय तो आवागमन का मार्ग पहाड़ों की ऊँचाईयों में धार (रिज़) से ही रहता। काइस धार से आगे पटोउल, फुटा सोर, दोहरा नाला और फिर रूमसू टॉप से होकर चंद्रखणी पास और फिर आगे कई पर्वत शिखरों को पार करते हुए हामटा पास पहुँचते, वहाँ से आगे रोहतांग दर्रा पार करते हुए लाहौल-स्पीति घाटी में प्रवेश होते और वहाँ से चंद्रताल से लेकर बारालाचा, सूरजताल के बीच भेड़-बकरियों के काफिले को चराते हुए कुछ माह वहाँ रहते।

सड़क मार्ग बनने से फिर फुआलों की भेड़ें सीधे सड़कों से होते हुए आगे बढती हैं, हालाँकि ट्रैफिक के चलते काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आवादी के बीच बढ़ते हुए भेड़ चौरों का भी भय रहता है। इसलिए मध्यम मार्ग अपनाते हुए कहीं जंगल से होते हुए भेड़ों को चरवाते हुए आगे बढ़ते हैं और कहीं सीधे सड़क मार्ग से लाहौल स्पीति की ओर कूच करते हैं। मालूम हो कि कुल्लू व लाहौल घाटी को जोड़ने वाली अटल टनल में भेड़-बकरियों के लिए वैकल्पिक मार्ग मुख्य मार्ग के नीचे बनाया गया है, यह कितना उपयोग में है, इसको तो सुधी लोग ही बता सकते हैं।

नानाजी लाहौल घाटी के नीरु घास का जिक्र खूब करते, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए जाना जाता है। इसको खाने से भेड-बकरियों में चर्बी बढ़ती है और इसका अत्यधिक सेवन नुकसानदायक भी माना जाता है। यहाँ तक कि इसके अत्यधिक सेवन से भेड़-बकरियों की मौत भी हो सकती है। अतः इसका यथोचित ही सेवन हो, ये फुआल ध्यान रखते। इसके अतिरिक्त कोड़ु, पत्तीस व अन्य जड़ी-बूटी नुमा घास भी इस घाटी के उच्चर क्षेत्रों में होती, जिसके सेवन से भेड़-बकरियाँ विशेष पौषण पाती और इनके दूध में भी इसके स्वाद व पौष्टकता का समावेश होता। इस तरह फुआलों से लेकर कुत्तों को तक इनका दूध आवश्यक पौषण का काम देता।

नानाजी से भेड़ चरवाने के रोमाँचक किस्सों को सुनते-सुनते यह भाव बलवती होता गया कि गाँव के जंगल से लाहौल-स्पीति तक यात्रा एवं वहाँ पर रुकने के अनुभव का डॉक्यूमेंटेशन करेंगे, इसकी कथा-गाथा व रोमाँच को लिपिवद्ध करेंगे। हमारे बचपन का यह सपना, सपना ही रहा, लेकिन 22-23 वर्ष की आयु में हमें पर्वतारोहण करते हुए लाहौल-स्पिति घाटी में जाने का अवसर अवश्य मिला। हालाँकि तह तक नानाजी गुज़र चुके थे।  

मानाली में पर्वतारोहण संस्थान से बेसिक प्रशिक्षण के दौरान हम पूरी टीम के साथ मानाली से अपने प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में रोहताँग दर्रा पार करते हुए, खोखसर पहुँचे, फिर सिसू से होते हुए तांदी पुल पार करते हुए कैलाँग पहुंचे और फिर जिस्पा में पर्वतारोहण संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र में रुके और आगे दारचा पार करते हुए, पटसेऊ और फिर जिंगजिंगवार में अपना बेसकैंप लगाए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-2, मानाली से जिंगजिंगवार घाटी का रोमाँचक सफर

यहाँ की आइस फील्ड़ और बर्फ की ढलानों पर आठ-दस दिन का अभ्यास करते हुए फिर सूरजताल झील, बारालाचा दर्रा पहुँचे और वहाँ से लगभग 18,000 फीट ऊंची चोटी का आरोहण किए। (इस यात्रा का रोमाँच आप नीचे दिए लिंक में पढ़ सकते हैं।)

बेसिक कोर्स का रोमाँच, भाग-3, लाहौल घाटी में पर्वतारोहण और शिखर का आरोहण

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

जीवन गीत - इससे तो मौन बेहतर...


देखता रहूँ अब खेल मालिक का बन मौन दर्शक

 

कड़ुआ सच्च कहूँ, तो वो बुरा मान जाएं,

किसी का दिल दुखाना भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।1।

 

खरी खोटी सुनाऊँ तो हो जाए इज्जत तार-तार उनकी,

किसी की इज्जत से खिलवाड़ भी तो ठीक नहीं,

इससे तो मौन बेहतर ।2।

 

सच्च कहूँ, तो उनकी मूढता हो जाए उज़ागर,

उनके अज्ञान से पर्दा हटाने की घृष्टता भी ठीक नहीं,

फिर, इससे तो मौन ही बेहतर ।3।

 

धूर्त की शातिरता करुँ ऊजागर, तो उनकी शांति हो जाए भंग,

किसी की अशांति, बेचैनी का कारण बेमतलब क्यों बनूं,

इससे तो मौन ही बेहतर ।4।

 

उनके हठ पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका मान हनन,

किसी के हठयोग में क्यों बनूं बाधक,

इससे तो मौन ही बेहतर ।5।

 

ज़बरपेली पर उठाऊँ उंगली, तो हो जाए उनका लोकहित बाधित,

उनके तथाकथ विजयी अभियान में क्यों बनूँ बाधक,

इससे तो मौन बेहतर ।6।

 

कागजी अभियान पर उनके उठाऊँ सवाल, तो उन्हें लगे न अच्छा,

उनके मायावी खेल का मजा क्यों करुँ किरकिरा,

इससे तो मौन बेहतर ।7।

 

दूसरों के कंधे पर रख बंदूक, उनकी मनमानी पर उठाऊं सवाल,

तो उनके सृजन अभियान का बन जाऊं रोढ़ा,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।8।

जब औकात से बाहर हो परिस्थितियाँ, इंसान मात्र कठपुतली,

तो न्याय का ठेका ले, क्यों दैवीय विधान में बनूं बाधक,

इससे तो मौन रहना ही बेहतर ।9।

 

समय से पहले जब नहीं कोई सुनने समझने सुधरने के लिए तैयार,

तो क्यों करुँ छेड़खान किसी की नियति, भाग्य, भवितव्यता से,

ऐसे में तो फिर मौन रहना ही बेहतर ।10।

 


जब काल के भी काल महाकाल के हाथों कमान युग परिवर्तन की,

तो फिर क्यों न दूँ उस महानायक को काम करने अपना,

अकिंचन सा सेवक बन देखता रहूँ खेल मालिक का बन मौन दर्शक ।11।

 

ईमानदारी संग निभाता रहूँ जिम्मेदारी अपनी, रह अपने स्वधर्म में अढिग,

अपना सुधार ही जब सेवा संसार की सबसे बड़ी,

तो क्यों न करता रहूँ सत्यं-शिवं-सुंदरं की अराधना, सतत मौन रहकर ।12।

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-2

 

अन्नामलाई से पांडिचेरी, ऊटी, कोडाइकनाल एवं मैसूर

नटराज मंदिर, चिदाम्बरम

मालूम हो कि अन्नामलाई यूनिवर्सिटी तमिलनाड़ु के चिदंबरम में स्थित एक प्रमुख, सरकारी आवासीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना सन 1929 में हुई थी। 1000 एकड़ में फैला इसका परिसर कृषि, इंजीनियरिंग, चिकित्सा व कला सहित विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करता है। यह दक्षिण एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक है। 

अन्नामलाई विश्वविद्यालय चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन से 2-3 किमी दूरी पर स्थित है और चिदाम्बर शहर के ह्दय क्षेत्र में स्थित है प्रख्यात नटराज मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत प्राचीन एवं पवित्र मंदिर है। यह 10वीं-11वीं शताब्दी की चोल वास्तुकला का एक प्रमुख उदाहरण है, जो अपने चार ऊंचे गोपुरमों, भरतनाट्यम नृत्य की मुद्राओं की नक्काशी और आकाश तत्व को दर्शाने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान शिव की ब्रह्माण्डीय नर्तक के रुप में पूजा होती है और शिव को निराकार (आकाश) रुप में पूजा जाता है, जिसे चिदंबर रहस्य कहा जाता है।

भगवान नटराज

यूनिवर्सिटी में राइस प्रोसेसिंग यूनिट में हमें यहाँ की राइस मिल्ज को देख आश्चर्य हुआ कि राइस ब्रान (चाबल भूसी) कितना बहुमूल्य होता है, जिससे तेल से लेकर साबुन, पशु खाद्य उत्पाद, सौंदर्य़ प्रसाधन जैसे कितने ही उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। पौष्टिकता की दृष्टि से राइस ब्रान विटामिन बी और ई सहित फाइबर एवं एंटिऑक्सिडेंट से भरपूर होता है।

सुबह-शाम परिसर में भ्रमण के तहत हम लोग हॉस्टल से लेकर विश्वविद्यालय के प्राकतिक एवं सुरम्य कैंपस में टहलते। रास्ते में एक तालाब पड़ता, आगे खेल के मैदान और बैडमिंटन कोर्ट आदि। एक दिन यूनिवर्सिटी के किसी बड़े अधिकारी की बेटी की शादी में उनके घर जाने का निमंत्रण मिलता है। यहाँ के लोगो का अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा होना व उनकी सादगी हम सबको गहरे प्रभावित करती है। शादी में पधारे विश्वविद्यालय के कुलपति एवं बड़े अधिकारी तक धोती-कुर्ता में केले के पत्ते में भोजन करते दिखे।

यूनिवर्सिटी से ही कुछ दूरी पर समुद्री बीच था। फुर्सत के दिनों में हम यहाँ भी किराए से ली गई साईकल से टूर कर आए। बेैकवाटर में मेंग्रोव के जंगल हमने पहली बार देखे। और नाव में चढ़कर इनका नज़दीक से अवलोकन किए और वहाँ चहचहाते पक्षियों के दृश्यों का आनन्द लिए। रास्ते के ग्रामीण परिवेश में नारियल के वृक्षों की भरमार के साथ चाबल की खेती अधिक दिखी। दूर-दूर तक इनका विस्तार दर्शनीय रहा।

तमिलनाडू की एक विशेषता उम्दा बस सर्विस लगी, जिसका किराया भी किफायती था। स्पीड के मामले में लगता था कि जैसे हवाई जहाज में सफर कर रहे हों। इस तरह लम्बी दूरी का सफर कुछ घंटों में पूरा हो जाता।

ट्रेनिंग के अंतिम दिनों में आसपास भ्रमण के अंतर्गत हम पांडिचेरी की योजना बनाते हैं, चिदम्बर बस स्टेशन से बस पकड़ते हैं, जो यहाँ से लगभग 70 किमी पड़ता था व लगभग डेढ़ घंटे में पहुँचते हैं। अरविंद आश्रम में समाधी दर्शन करते हैं और इसके बाद सागर तट का अवलोकन करने के वाद फिर पास के एक पार्क में बैठकर विश्राम करते हैं।

पुडुचेरी, सागर तट

सामने एक कोठी के गेट पर रंग-बिरंगी टोपी पहने सुरक्षा गार्ड हमारे लिए कौतुक का विषय थे। हम अनजाने में ही जिज्ञासावश उनकी ओऱ इशारा कर रहे थे। कुछ ही मिनट में हमारा दल पुलिस के घेरे में था। वे हम सबको पुलिस जीप में बिठाते हैं। हम सब हैरान थे कि हमारे साथ ये क्या हो रहा है। हमने तो कोई गुनाह नहीं किया है और न ही कोई कानून तोड़ा है, पार्क में बैठकर हंजी मजाक ही तो कर रहे थे।

बिनम्रतापूर्वक हम सबको स्थानीय पुलिस स्टेशन में बिठाया जाता है। पीछे फोटो लगे थे, उग्रवादियों के। लगा कि हम सबका मिलान उनके फोटो के साथ हो रहा था। हम सबकी तहकीकात हो रही थी। बाद में पता चला कि हम जिस पार्क में बैठे थे, सामने पांडिचेरी के राज्यपाल की कोठी थी, जो थे रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल, जिनका स्वर्ण मंदिर अमृतसर के ब्लू स्टार ऑपरेशन में अहं भूमिका थी। इस कारण वे उग्रवादियों की हिटलिस्ट में थे। इस बात से अनजान हम सब पार्क में हंसी मजाक व इशारेबाजी कर रहे थे। फ्रेंच उपनिवेश होने के कारण अभी भी पांडिचेरी में सुरक्षा गार्ड वही पारम्परिक रंग-विरंगी टोप पाली बर्दी पहने थे।

तहकीकात में पुलिस को कुछ हाथ नहीं लगा। अंत में हमारे एक सहपाठी संस्थान के निर्देशक का मोबाइल नम्बर शेयर करते हैं, जिनसे बातचीत करने पर पुलिस दस्ते को स्पष्ट होता है कि यह ग्रुप ट्रेनिंग करने आया छात्रों का एक समूह था और वे हमे वाई-इज्जत बरी करते हैं। वहाँ से छूटते ही हम उल्टे पाँव बस में बैठकर बापिस अन्नामलाई कैंपस पहुँचते हैं और रास्ते भर आज की रोमाँचक घटना की चर्चा का आनन्द लेते हैं।

ट्रेनिंग पूरी होने पर हम दक्षिण भारत के कुछ हिल स्टेशन व मुख्य शहरों का दिग्दर्शन करते हुए लुधियाना यूनिवर्सिटी कैंपस बापिस आते हैं। इस क्रम में हमें मैसूर पलेस के म्यूजियम व महल को देखते हैं, यह वाडियार राजवंश का पूर्व निवास है, जो इंडो-सार्सेनिक शैली में बना है। इसके अंदरूनी हिस्से की नक्काशी और शाही वस्तुओं का संग्रह दर्शनीय लगा।

चामुंडेश्वरी मंदिर, चामुंडी हिल्स, मैसूर

इसके बाद पहाड़ी रास्ते में ऊपर चढ़ते हुए पहाड़ी पर चामुंडी हिल्स के नाम से प्रख्यात स्थान पर चामुंडेश्वरी मंदिर के दर्शन करते हैं, जहाँ से मैसूर शहर के विहंगम दर्शन होते हैं। इन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है और ये 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी पहाड़ी पर देवी ने महिषासुर का वध किया था। पास में ही पहाड़ी पर एक ही चट्टान से तराशी गई नंदी महाराज की वृहद प्रतिमा ध्यान आकर्षित करती है, जहाँ सामूहिक फोटोग्राफी होती है।  

इसी क्रम में हम ऊटी हिल स्टेशन पहुंचते हैं। मैदानी क्षेत्र से धीरे-धीरे पहाड़ों का आरोहण करती बस यात्रा हमें बखुबी याद है। यहां ऊटी झील में बोटिंग का आनन्द लेते हैं। बॉटेनिकल गार्डन के दर्शन करते हैं, जहाँ दुर्लभ प्रजाति के पेड़-पौधे हैं। 1848 में स्थापित यह गार्डन 55 एकड़ में फैला हुआ है।

डोड्डाबेटा पीक से ऊटी का विहंगम दृश्य

फिर ऊटी स्टेशन से सर्पिली सड़कों से होते हुए पहाड़ की चोटी तक पहुँचे थे, जहाँ हल्की बारिश हो रही थी, ठंडक भी काफी थी। यह नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी डोड्डाबेटा पीक थी, जहाँ वर्नाकुलर से नीचे मैदानी घाटियों के दर्शन करते हैं। बिना दूरवीन के भी यहाँ से घाटी के मनोरम दृश्य दिखते हैं, हालाँकि बादल के कारण दृश्य बाधित थे। तात्कालिक फोटो के अभाव में प्रस्तुत प्रतीकात्मक फोटो से इसका अवलोकन किया जा सकता है।

इसके बाद हम लोग दूसरे हिल स्टेशन कोडाइकनाल पहुंचते हैं, जहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य़ ऊटी की तुलना में अधिक संरक्षित व नैसर्गिक लगा। आश्चर्य नहीं कि इसे दक्षिण भारत का स्विटजरलैंड कहा जाता है। यह अपनी झीलों, जंगलों व ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है। यहाँ झील में कुछ बोटिंग करते हैं और यहाँ से साइकिल किराए पर लेकर साइक्लिंग करते हुए हिल स्टेशन का अवलोकन करते हैं। यहाँ के पहाडी मार्ग पर चढते हैं और फिर घूमकर बापिस आते हैं।

कोडाइकनाल का विहंगम दृश्य

इस तरह ईश्वर की कृपा से हमारी दक्षिण भारत की पहली यात्रा से कई सुखद स्मृतियाँ जुड़ीं, जो याद करने पर फिर ताजा हो उठती हैं। लगभग तीन-चार दशकों बाद अपनी धुंधली पड़ी स्मृती को केरेदते हुए कुछ यादगार स्थल एवं पल यहाँ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस दौर में तो अब वहाँ बहुत कुछ बदल चुका होगा। आज भी इन स्थलों से जुड़ी कोई सूचना अखबार या इंटरनेट पर देखते-पढ़ते हैं, तो महज़ ही इनसे जुड़ी पुरानी यादें झंकृत हो उठती हैं।

यादों के झरोखों से – मेरी पहली दक्षिण भारत यात्राएं, भाग-1


लुधियाना से उड़ीसा, तमिलमाड़ू

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय लुधियाना का मुख्य भवन

कॉलेज में बिताए स्वर्णिम दिनों में दक्षिण भारत की पहली यात्राएं उल्लेखनीय हैं। पहली उड़ीसा के कटक शहर की और दूसरी अन्नामलाई यूनिवर्सिटी की। कटक यात्रा में पहली बार महानदी और पुरी में सागर के दर्शन हुए थे। और अन्नामलाई की यात्रा में दक्षिण भारत के हिल स्टेशन ऊटी व कोडेक्नाल के साथ मैसूर, बैंगलोर व पाँडिचेरी की एक झलक पायी थी।

बाहरवीं के बाद हमें सौभाग्य मिला पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के कॉलेज ऑफ एग्रीक्चलचरल इंजीनियरिंग (COAE) में अध्ययन करने का। विश्वविद्यालय भारत के अग्रणी कृषि विश्विविद्यालयों में से एक है, जो कृषि शिक्षा, अनुसंधान और विस्तार के लिए प्रसिद्ध है औऱ इसने भारत की हरित क्राँति में अहम भूमिका निभाई है। संयोग से हमारे पिताश्री भी इसे विश्वविद्यालय के कृषि कॉलेज के स्नातक रहे। विश्वविद्यालय लुधियाना में 494 एकड़ (और कुल 1793 एकड़) में फैला हुआ है।

उड़ीसा की पहली यात्रा संभवतः वर्ष 1988 के दौरान सम्पन्न हुई थी, जब हम पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में अपनी बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। यूनिवर्सिटी की वेटलिफ्टिंग टीम के सदस्य के रुप में हम इंटर-यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता हेतु कटक विश्वविद्यालय गए थे। लगभग एक दर्जन युवा खिलाड़ियों की टीम कोच के साथ थी। इंजीनियरिंग कॉलेज से हम अकेले थे, कुछ वेटनरी कॉलेज से तथा अधिकाँश एग्रीक्लचर-हॉर्टिक्लचर कॉलेज से थे। सफर की यादें काफी धुंधली हो चुकी हैं, लेकिन जेहन में अंकित स्मृतियों को कुरेदते हुए यहाँ कुछ रोचक एवं यादगार घटनाओं का वर्णन कर रहा हूँ।

हमारे साथ वेटलिफ्टिंग टीम में प्लस 110 किलो के सुपर हेवीवट केटेगरी में भाई दलजीत सिंह टीम में आकर्षण का विशेष केंद्र थे, जिन्हें हम प्यार से पहलवानजी कहते थे। दूर से ही उनका ढील-ढोल और चाल-ढाल देखकर पता चलता था कि पहलवानजी आ रहे हैं। उनकी डाइट भी उनके बजन के हिसाब से कुछ स्पेशियल थी। तीन दर्जन रोटियाँ, दर्जनों अण्डे व लीटरों के हिसाब से दूध उनकी खुराक रहती थी। उसी हिसाब से उनकी वेटलिफ्टिंग का अभ्यास रहता था।

याद है ट्रेन में केले बेचने वाला जब फल से भरी टोकरी लेकर आता है, तो रेट पूछने पर वह दर्जन के हिसाब से केले के दाम बताता है। लेकिन पहलवानजी अपने नाश्ते के हिसाब से पूरी टोकरी का रेट पूछ रहे थे। फेरी बाले ने जीवन में शायद पहली वार पूरी टोकरी को एक साथ बिकते देखा होगा। केले का साइज सामान्य से छोटा था, लेकिन विशेष स्वाद लिए थे। पहलवानजी एक बार में एक केला छील कर उदरस्थ करते और देखते-देखते पूरी टोकरी खाली कर गए। हमारे लिए यह सामान्य घटना थी, लेकिन फेरी वाले व ट्रेन में बैठे लोगों के लिए यह कौतुहल का विषय था।

कटक पहुँचने पर महानदी के पुल के किनारे गुरुद्वारे में रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ से महानदी का विस्तार देखने योग्य था, जिसके ऊपर कई किमी लम्बा पुल बना था। यहाँ से स्टेडियम थोड़ी दूरी पर था। आसपास हर घर के साथ पानी का तलाब और साथ में नारियल के झुरमुट हमें बहुत दर्शनीय लगे। इनके साथ एक नए प्रारुप में ग्रामीण जीवन के दर्शन हमें रोमाँचित कर रहे थे। हालाँकि किसी के घर जाकर नजदीक से देखने का समय नहीं था, लेकिन इस नए प्रदेश के नए परिवेश व संस्कृति को देखकर कई प्रश्न उठ रहे थे कि क्या इन तालावों में मछलियाँ भी होती हैं। इनके जल का स्रोत क्या रहता है। इसकी शुद्धता कैसी रहती होगी व इसका उपयोग किन-किन रुपों में होता होगा। यह प्रश्न हमारे लिए अभी भी पूरी तरह उत्तरित नहीं हैं। समय मिलेगा तो एक बार इनको नजदीक से देखकर अवश्य जानना व समझना चाहूँगा।

वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में प्रतिभाग लेने के बाद हम सभी पुरी साइड के सी बीच (सागर तट) में भी भ्रमण किए, इसकी भी यादें धुधली सी हैं, जहाँ पर कुछ यादगार सामूहिक फोटोग्राफी होती है (इससे जुड़ी फोटो आज खो चुकी हैं, इन्हें इकट्ठा करने का प्रयास जारी है।) इस समय हमारा शारीरिक सौष्ठव अपने चरम पर था, क्योंकि इसी दौर में हम विश्वविद्यालय स्तर पर बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता में मिस्टर यूनिवर्सिटी बने थे।

उस दौर में शारीरिक फिटनेस के प्रति अपनी दिवानगी का जिक्र अवश्य करना चाहूँगा। खेल के प्रति हमारी निष्ठा अप्रतिम रही। कबड्डी से लेकर शॉट पुट, डिस्कस, जेवलिन थ्रो जैसे पॉवर गेम्ज़ में हम प्रतिभाग करते रहे, लेकिन मुख्य खेल बॉडी बिल्डिंग ही चयनित था, साथ ही कोच के प्रोत्साहन में वेटलिफ्टिंग से भी जुड़ गया था। किशोरावस्था में स्वामी विवेकानन्द के युवाओं को संदेश में मुखरित मस्ल्ज़ ऑफ आयरन के आग्नेय वचन हमारे प्रेरक मंत्र बन चुके थे, जिसके अनुरुप पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में एनएसओ (NSO-नेशनल स्पोर्टस ऑर्गेनाइजेशन) के अंतर्गत हमें अपने पैशन को पूरा करने का यहाँ स्वर्णिम अवसर मिला था।

खेल का मैदान व जिम हमारे लिए किसी मंदिर व तपःस्थली से कम नहीं था। क्या आँधी, क्या तुफान, क्या परीक्षा, क्या बारिश, हम शाम को ठीक साढ़े चार बजे ग्राउंड में पहुंच जाते थे। पहले बीस मिनट एथलेटिक ट्रेक पर राउंड के साथ वार्मअप करते और फिर जिम में प्रवेश करते। लगभग दो-अढ़ाई घंटे कोच के मार्गदर्शन में जिम में पसीना बहाते। इसके बाद योगासन के कुछ स्ट्रेचिंग आसन व शवासन आदि के साथ कूलडाउन करते। अंत में पसीने से तर-बतर वनियान को निचोड़ते, तो पसीने की धार झरने लगती।

इसके बाद यूनिवर्सिटी गेट के बाहर जेंटलमेन दी हट्टी में दूध का गिलास व गर्मागर्म जलेबी का सेवन होता। इसके साथ शारीरिक श्रम के साथ खर्च हुई ऊर्जा की कुछ भरपाई हो जाती। फिर हॉस्टल पहुँच कर स्नान-ध्यान के साथ अपनी सांयकालीन दिनचर्या आगे बढ़ती।

कॉलेज ऑफ एग्रीक्लचरल इँजीनियरिंग, PAU का प्रवेश द्वार

पढ़ाई के अंतिम वर्ष संभवतः सन 1989-90 के दौरान हमें फील्ड प्रोजेक्ट के तहत अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु भेजा गया, साथ में थे एग्रीक्लचरल इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक अंतिम वर्ष के लगभग एक दर्जन सहपाठी छात्र। हमें याद है कि लुधियाना से हम ट्रेन में चढते हैं और तमिलनाड़ू के चिदम्बरम स्टेशन पर उतरते हैं, जहाँ अन्नामलाइ विश्वविद्यालय सामने ही पड़ता है।

चिदाम्बरम रेल्वे स्टेशन प्रवेश द्वार

मालूम हो कि अन्नामलाई यूनिवर्सिटी तमिलनाड़ु के चिदंबरम में स्थित एक प्रमुख, सरकारी आवासीय विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना सन 1929 में हुई थी। 1000 एकड़ में फैला इसका परिसर कृषि, इंजीनियरिंग, चिकित्सा व कला सहित विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करता है। यह दक्षिण एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक है। 

यहीं एक होस्टल में हम लोगों के रुकने की व्यवस्था थी। यहाँ कर्मचारी हिंदी या पंजाबी अधिक नहीं समझते थे, अंग्रेजी भी कम ही समझ पाते थे। वे तमिल में ही अधिक बोलते थे। इसलिए अधिकांश संवाद इशारे में ही होते व किसी तरह काम चलाते। धीरे-धीरे हम पानी पीने से लेकर अभिवादन में उपयोग होने वाले दैनिक व्यवहार के कुछ शब्दों को सीख गए थे, जैसे वनक्कम, तन्नी कुडुङ्गा आदि। यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों से तो अंग्रेजी में संवाद हो जाता था, हॉस्टल में थोड़ा कठिन रहता था।

बाहर दुकानदारों के साथ भी इशारों में अधिक बात होती थी। हमारे साथ पंजाब से आए सहपाठी अधिकाँशतः पंजाब से थे, जहाँ रोटी खाने का चलन अधिक है। वे चावल को अधिक पसन्द नहीं करते। होस्टल में उपलब्ध भोजन चाबल प्रधान ही रहता। इडली से लेकर डोसा, हर डिश में चाबल ही रहता। बड़ी मुश्किल से रोटी वाला ढाबा बाहर शहर में मिलता है और बीच-बीच में रोटी वाला भोजन करने वहाँ जाते। (...शेष अगली पोस्ट में)

अन्नामलाई विश्वविद्यालय, तमिलनाड़ु


मंगलवार, 31 मार्च 2026

चरित्र निर्माण की प्रक्रिया

चरित्र निर्माण के प्रति सजग रहने की आवश्यकता


चरित्र निर्माण के बिना हम अपने पुरुषार्थ, भाग्य या किसी समर्थ की कृपा-आशीर्वाद के फलस्वरुप तथाकथ सफलता या बुलन्दी के शिखर पर तो पहुँच सकते हैं, लेकिन वहां टिके रहें, यह सिर्फ और सिर्फ चरित्र बल के आधार पर ही संभव होता है। अतः जीवन में टिकाऊ सफलता के साथ शांति एवं सद्गति के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग एवं गंभीर हो जाए, ताकि वह शिखर से रसातल की ओर लुढ़कने की त्रास्द बिडम्बना से बच सके।

इसके लिए चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के चरणों की तात्विक समझ आवश्यक है। महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त अन्तर्दृष्टि के आधार पर इसके आधारभूत तत्वों पर प्रकाश डाला जा रहा है।

चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार - जैसा हम सोचते हैं, बैसा ही हमारा संकल्प बनता है, क्रियाएं सम्पन्न होती हैं, क्रमशः आदतें बनती हैं और संस्कार पुष्ट होते हैं तथा चरित्र का निर्माण होता है, जो हमारे आचरण-व्यवहार को प्रभावित करता है। युगऋषि पं.श्री रामशर्मा आचार्यजी के शब्दों में जैसा हम सोचते व करते हैं, बैसे ही बनते जाते हैं। और इस तरह चरित्र ही हमारी नियति एवं भविष्य को तय करता है।

इस प्रक्रिया को समझते हुए चरित्र निर्माण के संदर्भ में निम्न चरणों को अपनाया जा सकता है –

स्वाध्याय-सत्संग – महापुरुषों का स्वाध्याय एवं सत्संग सबसे महत्वपूर्ण है, जिसके प्रकाश में चिंतन-मनन करते हुए आत्म-चिंतन संभव हो पाता है। आत्म-विश्लेषण की प्रक्रिया गति पकड़ती है, आत्म-सुधार के साथ आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के चरण आगे बढ़ते हैं और व्यक्तित्व विकास के साथ चरित्र गठन की महान प्रक्रिया सम्पन्न होती है।

आध्यात्मिक आदर्श का वरण – जीवन में कैरियर एवं पेशेवर लक्ष्यों के अनुरुप अपने क्षेत्र से सम्बन्धित महानतम एवं श्रेष्ठतम आदर्शों का चयन किया जा सकता है, लेकिन चरित्र निर्माण के संदर्भ में आध्यात्मिक आदर्शों का वरण आवश्यक है। लौकिक आदर्श सामाजिक सफलता के प्रेरक हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के गहनतम स्तर से रुपाँतरण एवं चरित्र गठन की प्रेरणा, त्वरा एवं प्रकाश तो आध्यात्मिक आदर्श से ही प्राप्त हो पाते हैं। अतः आध्यात्मिक आदर्श का वरण पहला चरण है।

श्रेष्ठ संग-साथ एवं वातावरण – दिन भर हम किन व्यक्तियों, विचारों व संग-साथ के साथ विचरण कर रहे हैं, किस वातावरण में रह रहे हैं, यह चरित्र निर्माण के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। कुसंग और दूषित वातावरण में हम किन्हीं श्रेष्ठ विचारणा एवं प्रेरणा की आशा नहीं कर सकते। ऐसे में बुरी संगत से अकेला भला की उक्ति को अपनाया जा सकता है। सोशल मीडिया के वर्तमान युग में यहाँ डिजिटल संयम के महत्व को भी समझा जा सकता है।

अनुशासित जीवनशैली – चरित्र गठन के संदर्भ में जीवनशैली का अनुशासित होना आवश्यक है। बिना खान-पान, दिनचर्या, विचार एवं व्यवहार को साधे चरित्र निर्माण की प्रक्रिया को सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में संयमित आहार, कसी हुई दिनचर्या, सकारात्मक-श्रेष्ठ विचार एवं संतुलित-उदात वाणी-व्यवहार के माध्यम से चरित्र निर्माण की जड़ों का पोषण किया जा सकता है।


जीवन साधना – चरित्र निर्माण के लिए अन्ततः चित्त के स्तर पर उतर कर स्वयं पर कार्य करना पड़ता है। मात्र वाणी, व्यवहार एवं विचारों पर कार्य करने भर से चरित्र गठन की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं हो पाती। दीर्घकाल से जड़जमा कर बैठी आदतों एवं हठीले कुसंस्कारों का परिष्कृत करने में समय लगता है। इसके लिए जप, ध्यान प्रार्थना से लेकर प्रायश्चित तप के आध्यात्मिक उपचारों का अवलम्बन लेना पड़ता है। समूचे जीवन को साधनामय बनाना पड़ता है।

निसंदेह रुप में चरित्र निर्माण एक जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है (Character building is a lifelong process) और युगनायक स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में हजारों ठोकरें खाने के साथ चरित्र का गठन होता है। (Character has to be established through a thousand stumbles.) इसकी दुरुहता, जटिलता, गंभीरता एवं महत्व को समझते हुए हम चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति सजग हो जाएं, इसको जीवनचर्या का हिस्सा बनाएं, क्योंकि यही हमारे गौरव-गरिमा की रक्षक है, यही हमारे गुरुत्व की पौषक है, यही हमारे आत्मिक उत्थान की नींव है और यही हमारे जीवन की टिकाऊ सफलता, सुख-शांति, संतुष्टि एवं परिपूर्णता का आधार है।

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