सोमवार, 29 जून 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-2

 

उखीमठ से रांसी

उखीमठ समुद्रतल से 1311 मीटर (4301 फुट) फीट की ऊँचाई पर बसा कस्बा है व यह सर्दियों के दौरान जब ऊंचाईयों में भारी बर्फवारी पड़ती है, तो उस दौरान भगवान केदारनाथ और भगवान मदम्हेश्वर के शीतकालीन प्रवास और पूजा स्थान के रुप में जाना जाता है। उखीमठ का ओंकारेश्वर मंदिर इसीलिए जाना जाता है। उखीमठ पौराणिक महत्व का स्थान भी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह हुआ था। इसी कारण इस स्थान का नाम उषामठ पड़ा। मालूम हो कि उखीमठ ही चोपता, तुंगनाथ और देवरियाताल जैसे ट्रेकिंग, पर्यटन और तीर्थ स्थलों का मुख्य प्रारंभिक बिंदु है।

उखीमठ से आगे बढ़ते ही बाहर हवा में हिमालय टच वाला शीतल अहसास मिलना प्रारम्भ हो जाता है। हरी-भरी वादियों में प्रवेश के साथ लग रहा था कि हम एक नए परिवेश में आ गए हैं। रास्ते में गिरिया, मोनसुना मार्केट आते हैं। इस राह पर प्राकृतिक झरने स्वागत करते हैं।


रास्ते का प्राकृतिक दृश्य धीरे-धीरे अपने पूरे शबाव की ओर बढ़ता जा रहा था। सीढ़ीदार खेत, झरने, नाले और दूर पर्वतों की अंतहीन श्रृंखलाएं रास्ते को खुशनुमा बना रही थीं। मोनसुना मार्केट से बारिश से बचने के लिए एक रेनकोट खरीदते हैं।

आगे नीचे उतरते हुए एक पहाड़ी नदी पार करते हैं।


रास्ते में विराने में एक क्रिकेट मैदान ध्यान आकर्षित करता है। रांसी की ओर बढ़ता सफर एक नए प्रदेश में प्रवेश की सघन अनुभूति दे रहा था। सीढ़ीदार खेतों की अंतहीन श्रृंखला, घने जंगल, प्रकृति की गोद में बसे घर, आसमान छूते हरे-भरे पर्वत और सबसे ऊपर शहर के शौर-शराबे, किच-किच व प्रदूषण से रहित गाँव की शुद्ध आवोहवा और शांत एकांत परिवेश में स्वय को पाकर ऐसे लग रहा था कि कुछ दिन यहीं रुकें। एकांतिक रिट्रीट के लिए यह क्षेत्र एक आदर्श स्थल प्रतीत हो रहा था।

रास्ते में पहाड़ी कस्बे उनियाणा से होकर गुजरते हैं, जहाँ होमस्टे की बहुतायत दिखी। आगे खड़े पहाड़ को काटकर बनाए गई सड़क के साथ हम साढ़े चार बजे राँसी पहुंचते हैं।


यहां हल्के अभिसिंचन के साथ हमारा स्वागत होता है। पहले भवन पर ही हमारा वाहन खड़ा होता है, पास के ढावे के मालिक भट्ट साहब की सज्जनता और ईमानदारी को देखकर पहाड़ी मानुष का अक्स जेहन में कहीं गहरे छू जाता है। और यहीं चाय नाश्ते के लिए रुकते हैं।

थकान के चलते इसी ढावे में मैगी और चाय के लिए कहा, जिसका लाजबाव स्वाद देख हम लोग कायल हो गए। इनका पूरा परिवार इस कार्य़ में सहयोग दे रहा था। यहीं पर सामने कोमल टूरिस्ट एंड ट्रेकिंग प्वाइंट में रुकने की भी व्यवस्था हो जाती है और यहीं रात के भोजन की भी बात पक्की कर लेते हैं।


साथ ही राँसी के बार में मोटा-मोटी जानकारी बटोर लेते हैं। पता चला कि राँसी की अधिष्ठाक्षी माता राकेशवरी देवी के दर्शन से आगे की यात्रा शुभ मानी जाती है। इन्हीं के दर्शन के बाद बाबा मदमहेश्वर के दर्शन फलित होते हैं। हो भी क्यों न, आखिर शिव-शक्ति के युग्ल से ही सृष्टि संचालित है और उन्हीं की कृपा से जीवन की पूर्णता सुनिश्चित होती है।

सो हम कमरे में सामान रखकर, फ्रेश होकर मंदिर में माता के दर्शन करने निकल पड़ते हैं। मुख्य मार्ग से मुश्किल से 300 मीटर ऊपर मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर के बाहर जूत्ता स्टैंड पर जुत्ते उतारते हैं, अंदर कौने में लगे वाश-वेसिन से हाथ धोकर मंदिर में प्रवेश करते हैं।


मंदिर के पूजारी भट्ट साहब का सज्जनोचित्त एवं नेक व्यवहार प्रभावित करता है। मंदिर में विभिन्न विग्रहों से परिचय होता है। राकेश्वरी माता के साथ विष्णु भगवान, सत्यनारायण भगवान, मन्नणी माता, हनुमानजी, गणेशजी आदि के दर्शन होते हैं। पता चला कि मन्नणी माता का मूल स्थान यहाँ से 30 किमी ऊपर है, जो कठिन ट्रेक के बाद ही पूरा होता है। इसी स्थान पर भगवती ने महिषासुर का बध किया था।

राकेशवरी माता की पौराणिक कथा भी कम रोचक नहीं है। पता चला कि चंद्रदेव ने अपने दुराचार के पाप का प्रायश्चित यहीं पर किया था और माता की कृपा से अमृत तत्व की प्राप्ति हुई थी। इस तरह से प्रायश्चित तप की पौराणिक स्थली के रुप में इस मंदिर का महत्व स्वयं में महत्वपूर्ण है। नैष्ठिक साधक नौरात्रि में विशेषरुप से यहाँ आकर साधन-अनुष्ठान करते हैं।

राकेश्वरी माता के दर्शन के बाद हम बाहर परिसर में कुछ यादगार पलों को कैप्चर करते हैं। छोटे बच्चे परिसर में उछलकूद कर रहे थे। यहाँ से गाँव का नजारा देखने लायक था। प्रकृति की गोद में बसा एक पारंपरिक पहाड़ी गाँव स्वयं में परिपूर्ण प्रतीत हो रहा था। लोकल लोगों से बातचीत करने पर उनकी चिंता का अहसास भी हुआ। उनका मानना था कि गाँव का प्राकृतिक एवं पारम्परिक स्वरुप धीरे-धीरे खो रहा है। जैसे-जैसे लोगों की भीड़ बढ़ रही है, व्यापार बढ रहा है, पारंपरिक सरलता तरलता धीरे-धीरे कम हो रही है।

रास्ते से मदमहेश्वर साइड का नज़ारा देखने लायक था। बर्फ से ढकी चोटियाँ, कुछ बादलों से ढकी व कुछ स्पष्ट।


जानकारों के अनुसार उन्हीं की गोद में नंदी कुंड है। मदहेश्वर बाबा यहाँ से नहीं दिखते। इनका क्षेत्र यहाँ से वाईं ओर पहाड़ों के पीछे पड़ता है। नीचे गहराई में पुष्पगंगा नदी और सीढ़ीदार खेत, सामने जंगलों से लदे पहाड़। लगा जैसे प्रकृति अपने सारे रुप दिखाने के लिए तत्पर थी।

पहले साफ मौसम, फिर अचानक नीचे घाटी से बादलों का उमड़ना गुब्बार और पूरा कस्बा इसमें समाहित। बादलों का गुब्बार हम सबको छूते हुए, आलिंग्न करते हुए पार हो जाता है। कुछ ही देर में उस पार पहाड़ी के शिखर से इंद्रधनुष के दर्शन। लगा जैसे प्रकृति अपनी सतरंगी छटा के साथ सारे रुपों का दर्शन करवाकर हमें कृतार्थ कर रही हो।  

अंत में यहां की मार्केट का अवलोकन करते हैं। रास्ते में बारिश से बचने के लिए जुत्तों की खोज करते हैं, लेकिन साइज के जुत्ते नहीं मिलते, सो मज़बूरी में प्लास्टिक की चप्पल खरीद लेते हैं, कि आपात में काम जाएगी। नहीं मालूम था कि यही आगे यात्रा का पासा पलटने वाली थी। यहीं से रिंगाल की मजबूत लाठी 50 रुपए में खरीदते हैं। फिर शहर के उस छोर पर आगे झरने तक जाते हैं।


बीच में टैंट हाउस में भी रुकने की व्यवस्था दिखी।

खच्चरों पर रस्द सामग्री आगे जा रही थी। कुछ मिलाकर इस छोटे से पहाड़ी कसवे में यात्रियों की चहल-पहल देखने योग्य थी। जिनमें बंगाली ट्रेक्करों की बहुतायत दिखी। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, उत्तर-प्रदेश, मध्य्-प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखण्ड व हिमाचल से भी यात्री दिखे। लोक्ल लोगों से बातचीत पर सुनने में आ रहा था कि अबकी बार मदमहेश्वर के लिए काफी पर्यटक व तीर्थयात्री आ रहे हैं। अगले साल से यह कहीं दूसरा केदार न बन जाए।

अपने होटल में आकर रात का भोजन करते हैं। रोटी, आलू की सब्जी, दाल और चाबल, साथ में आचार और पहाड़ी खीरे का सलाद।


भोजन से तृप्त होकर कमरे में रात को सो जाते हैं, सुबह तड़के जो आगे चलना था। रात को पुष्पगंगा के जल की सांय-सांय की ध्वनि नादयोग का अहसास दिला रही थी।

सुबह ब्रह्ममुहुर्त के अंधेरे में ही नींद खुल गई थीं। बाहर आकर देखते हैं कि अंधेरे में दूर व नीचे गाँव में रोशनी टिमटिमा रही थी।


सड़क में नीचे चहल-पहल थी। यात्री आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे थे। सुबह चार बजे ही जागरुक यात्री बढ़ निकलते हैं। हम भी टीम के साथ साढ़े पाँच बजे तक नहा धोकर, सन्ध्या वंदन कर टीम के साथ चल पड़ते हैं।

एक जीप प्रति व्यक्ति 30 रुपए के हिसाब से अगतोलिधार छोड़ती है, जो राँसी के आगे 2 किमी दूरी पर है। यही वाहनों का अंतिम पड़ाव है, यहाँ से आगे पैदल चलना पड़ता है। हाथ में छड़ी और पीठ में रक्सैक व कंधे पर बैग लिए कदम बढ़ रहे थे मदमहेश्वर की ओर। आज का पहला प़डाव था यहाँ से छः किमी दूर गौंडार गाँव। हम राँसी के 7000 फीट की ऊँचाई से गौंदार के 5000 फीट ऊंचाई तक उतरने वाले थे। और फिर यहाँ से 12,500 फीट की ऊँचाई तक 10 किमी चढ़ाई करने वाले थे। (जारी...शेष अगले खण्ड-3 में)

रविवार, 28 जून 2026

हमारी अविस्मरणीय मदमहेश्वर यात्रा, भाग-1

हरिद्वार से उखीमठ

उत्तराखण्ड में गढ़वाल हिमालय के रुद्रप्रयाग जिले में केदारनाथ के समानान्तर घाटी में स्थित महमहेश्वर प्रख्यात पंचकेदार में से एक है व यात्रा के क्रम में द्वितीय केदार के नाम से भी जाने जाते हैं। यहाँ का अवलोकन अब तक स्थानीय यू-ट्यूबर्ज के विडियोज में न जाने कितनी बार कर चुका था। लेकिन इसकी जमीनी सच्चाई से अधिक परिचित नहीं था। जून के पहले सप्ताह में अचानक मित्र मंडली के साथ यहाँ जाने की योजना बन गई, लगा बाबा का बुलावा आ गया।

लेकिन अपनी तैयारी को लेकर थोड़ा संशय भी था, कि 16 किमी की ट्रेकिंग एक दिन में हो पाएगी या नहीं, वह भी 5,000 से 12,500 फीट की ऊंचाई तक। मदमहेश्वर से जुड़े तमाम ब्लॉग्ज व विडियोज खंगाले, लगा कि उतना कठिन भी नहीं है। फिर साथियों का उत्साह व जीवट देख लगा कि अपना अब तक का ट्रेकिंग अनुभव बटोरते हुए इसे डेयर करते हैं, बाबा के धाम में जहाँ तक पहुँच पाए ठीक है, बाकि बाबा की इच्छा।

आवश्यक तैयारी – टॉफी चॉकलेट, बिस्कुट-नमकीन, मेवे, दवाईयाँ आदि रास्ते के आवश्यक पाथेय जुटने शुरु हो गए। साथ में ट्रेकिंग शूज, पावर बैंक, चार्जर आदि। ऊंचाई के हिसाब से अंतिम दिन के लिए गर्म कपड़े, टोपी, मफलर, जुराबें, इन्नर वार्मर आदि। सबको अपने बैग में समेटते हुए एक पिट्ठू बैग तैयार हो गया और कुछ आवश्यक सामान एवं तात्कालिक उपयोग की सामग्री के साथ एक साइड बैग।

हरिद्वार से यात्रा का शुभारम्भ होता है। 7 जून रविवार की प्रातः छः बजे दे.सं. विश्वविद्यालय परिसर से निकल पड़ते हैं। आज की मंजिल थी मदमहेश्वर की राह में पड़ने वाला अंतिम मोटरेवल सुंदर सा पहाड़ी गाँव रांसी, जो 7000 फीट की ऊँचाई पर बसा है, जहाँ पर रुकने की उचित व्यवस्था है और यह महमहेश्वर यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है, जो माता राकेश्वरी देवी के पौराणिक मंदिर के लिए प्रख्यात है। रविवार के चलते ऋषिकेश से जाम शुरु हो जाता है, जो तपोवन से कुछ आगे तक यात्रा में थोड़ा ब्रेक लगाता है। इसमें चार धाम यात्रियों के साथ राफ्टिंग वालों का भी योगदान रहता है, जो जीप पर रॉफ्ट को लादे इस राह पर वहुतायत में मिलते हैं।

फिर आगे ब्यासी के प्रख्यात चौहान ढावे में नाश्ता करते हैं। आलू-परांठा-दाल-दही, चाय के साथ पर्फेक्ट नाश्ता होता है, जो आगे की यात्रा के लिए दल की बेट्री को चार्ज करता है।


रास्ते में कोडियाला सदैव की तरह ध्यान आकर्षित करता है, जो ठीक गंगाजी के किनारे बसा है और उस पार के उलट त्रिशंकु के रुप में विराजमान हरे-भरे पर्वत को निहारने के लिए मजबूर करता है, जो किसी ध्यानस्थ तपस्वी से प्रतीत होते हैं। इसी क्रम में शिवपुरी, ब्रह्मपुरी आदि आते हैं। रास्ते में बजी जंपिंग के तामझाम भी ध्यान आकर्षित करते हैं और गंगा मैया अपनी शांत नीली धारा के साथ कुछ दूर तक अपने पावन एवं शीतल स्पर्श का दिव्य अहसास कराती रहती हैं।

रास्ते में हेमकुंड साहिब के श्रद्धालुओं का अलग ही नज़ारा दिखता है। कतार में बाइक के आगे डंडे में फहराती धर्म-ध्वजा और श्रद्धालुओं का उत्साह नई ऊर्जा का संचार करता है। पंजाब के मैदानों इलाकों से आए इन श्रद्धालुओं के लिए पहाड़ों में ड्राइविंग अवश्य ही थोड़ा चुनौतीपूर्ण रहती होगी, लेकिन उत्साह व आस्था के आगे ऐसी बाधाएं नतमस्तक हो जाती हैं।

इसी रास्ते में पड़ती है तोता घाटी, जिसका अपना इतिहास है। यह लैंडस्लाइड जोन के रुप में प्रख्यात है व यहाँ इसे रोकने के तमाम प्रयास देखे जा सकते हैं। यहीं से आगे गढ़वाल हिमालय की पहाड़ियों की अंतहीन श्रृंखला के दर्शन भी किए जा सकते हैं औऱ नीचे गहराई में गंगाजी का धीमी गति से बहता अविरल प्रवाह। सड़क के किनारे तमाम ढावे और उनके बाहर सजे स्थानीय दाल, सब्जी, अदरक, बुराँश, मालटा जैसे उत्पाद ध्यान आकर्षित करते हैं।

इसी क्रम में आता है देवप्रयाग का संगम, जहाँ अलकनंदा और भगीरथी नदियाँ मिलकर गंगाजी का रुप लेती हैं। इससे थोड़ा पहले भारत की सबसे ऊंची बज्जी जंपिंग का सेटअप भी देखने को मिलता है, जिसमें जावांज लोग इसके दुस्साहसिक खेल का आनन्द लेते देखे जा सकते हैं।


हमारे विचार में यह खेल सिर्फ अल्ट्राफिट लोगों के लिए है, नहीं तो इसके झटके के साथ शरीर के अंग-अवयव व अस्थि-पंजर ढीले पड़ सकते हैं, छिन्न-भिन्न हो सकते हैं। ऐसी कुछ दुर्घटनाएं हाल ही में समाचारों की सुर्खियाँ भी बनी हैं।

देवप्रयाग से मार्ग श्रीनगर की ओर बढ़ता है। रास्ते भर हेंमकुंड साहिब जा रहे सिक्ख श्रद्धालुओं के झंडे लगे बाइक्स आते-जाते मिले। बापिसी में झंड़े नदारद थे। कुछ लोग गाड़ियों में परिवारजनों व मित्रमंडली के संग जा रहे थे। रास्ते में सड़क के किनारे लंगर की भी विशेष व्यवस्था दिखती है, जहाँ तीर्थ यात्री भोजन-प्रसाद ग्रहण कर रहे थे। रास्ते में कुछ यात्री बाइक में तिरंगा फहराए हुए भी दिखे, जो प्राय़ः सोलो ट्रैव्लर ही अधिक मिले।

रास्ते में कीर्तिनगर से पहले मलेथा में रेलरूट का कार्य जोरों-शोरों से चल रहा दिखा। इसके बाद आता है श्रीनगर शहर, जिसे माना जाता है कि आदि शंकराचार्यजी ने स्वयं श्रीयंत्र के ऊपर स्थापित किया था। प्रवेश करते ही गंगाजी का विस्तार एवं अविरल प्रवाह मन को बहुत सुकून देता है।


रास्ते में गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय और थोड़ी आगे नदी के उस पार इसका चौरास कैंपस चर्चा का विषय बनते हैं।

श्रीनगर के बाद जलप्रयोजना के चलते झील या डैम का रुका पानी दिखता है, जिसके किनारे बढ़ते हुए माता धारीदेवी का सिद्ध मंदिर आता है। यहाँ काफी भीड़ लगी थी, हम लोग दूर से ही प्रणाम करते हैं। रुद्रप्रयाग से थोड़ा पहले झील के बैक वाटर में रेतीले किनारों पर लोगों को स्नान व जलक्रीडा का आनन्द लेते देखा, निश्चित रुप से अलकनंदा का हिमालय टच वाला जल डुबकी लगाने वालों को तरोताजा कर रहा होगा।

आगे से बायीं ओर मुड़ कर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में थोड़ी दूरी पर दायीं ओर पड़ता है रुद्रप्रयाग संगम, जहाँ अलकनंदा और मंदाकिनी नदी का संगम होता है। यहाँ तक चार धाम यात्रियों की भीड़ मिलती है। अब हम आगे मंदाकिनी नदी के मंद-मंद प्रवाह के साथ आगे बढ़ रहे थे। आगे अगस्तमुनि कस्बा आता है। माना जाता है कि अगस्त मुनि ने यहाँ तप किया था। मालूम हो कि अगस्त मुनि रामायण काल के एक मूर्धन्य ऋषि थे, जो अध्यात्म विद्या के ज्ञान औऱ विज्ञान दोनों पक्षों में पारंगत थे। इनकी सिद्धियों के भय से रावण व उसकी राक्षस मंडली इनके आश्रम की ओर झांकने का तक दुस्साहस नहीं कर पाती थी।

वनवास के दौरान श्रीराम और महर्षि अगस्त्य का मिलन रामायण की एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रेरणादायी घटना है। जिसमें उन्होंने श्रीराम को देवताओं के राजा इंद्र द्वारा दिए गए कई दिव्य अस्त्र शस्त्र भेंट किए। इनमें एक दिव्य धनुष, कभी न खाली होने वाला अभेद्य तरकस शामिल थे। महर्षि अगस्त ने ही श्रीराम को सुंदर एवं रमणीय स्थल पंचवटी जाने की सलाह दी थी। महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को स्मरण दिलाया था कि वे राक्षसों को खत्म करने औऱ दुनियाँ में धर्म की रक्षा करने के लिए ही इस धरती पर आए हैं। इस मिलने ने श्रीराम को और अधिक शक्तिशाली बना दिया और उन्हें अपनी आगे की यात्रा के लिए सही दिशा दिखाई।

अगस्तमुनि के थोड़ा आगे मंदाकिनी नदी के किनारे एक एकांतिक ढाबे में दोपहर का भोजन करते हैं। यहाँ से तरोताजा होकर मंजिल की ओर बढ़ते हैं, जिसके रास्ते में आता है कुंड, यहाँ से वायीं ओर पुल पार करते ही रास्ता केदारनाथ की ओर बढ़ता है। हम दायीं ओर के मार्ग से आगे बढ़ते हैं। अब तक बाहर मौसम गर्मी का अहसास करा रहा था, हिमालय टच बाली आवोहवा नदारद थी। यहाँ से अभिसिंचन भी शुरु हो जाता है, जिसे हम एक शुभ लक्षण मान रहे थे।

कुंड से संकरी सड़क के साथ ऊखीमठ की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में एक झरना दायीं ओर ध्यान आकर्षित करता है। सामने वायीं ओर गुप्तकाशी कस्बा दर्शनीय लग रहा था, जो पारम्परिक बसावट की वजाए अपने आधुनिक भवनों के कारण हमें किसी दूसरे औद्यौगिक शहर का भ्रम दे रहा था, लेकिन बापिसी में आते समय पता चला कि यही गुप्तकाशी है। रास्ते में वायीं ओर एक मार्ग काली मठ की ओर जाता है। हम दाएं मार्ग पर चोपता की ओर बढ़ रहे थे, जो थोड़ी देर में वायीं ओर उखीमठ की ओर मुढ़ता है। इससे थोड़ा पहले ओंकारेश्वर मंदिर पड़ता है, जो बाबा केदारनाथ एवं बाबा मदमहेश्वर का शीतकालीन आवास स्थल है। उखीमठ में प्रवेश करते ही शीतल आवोहवा वाला हिमालयन टच प्रारम्भ हो चुका था। (जारी...भाग-2 अगले ब्लॉग में)

शनिवार, 20 जून 2026

जीवन बोध

समझें इस सुरदुर्लभ मानव जीवन का महत्व

मनुष्य जीवन कितना बेशकीमती है, इसका सामान्यतया अहसास नहीं हो पाता, क्योंकि यदि अहसास होता तो यह वहुमूल्य उपहार यूँ ही व्यर्थ नष्ट नहीं होता। दुर्व्यसन से लेकर नशा एवं आत्मघाती कृत्यों के साथ जीवन लीला को अपने हाथों से नष्ट करते समाचार नित्य समाचारों की सुर्खी बनते हैं। इसके साथ भ्रष्टाचार से लेकर आतंक एवं अपराधिक गतिविधियों के समाचारों के साथ देवत्व एवं ईश्वरत्व की संभावनाओं से युक्त मनुष्य जीवन को पतन-पराभव के गर्त में गिरते देखा जा सकता है। बिना सार्थकता की अनूभूति के जीवन की ऐसी दुर्गति को एक त्रास्द दुर्भाग्य ही माना जाएगा।

जबकि मनुष्य जीवन में सुख-शांति व सृजन के अभूतपूर्व रोमाँच की अनन्त संभावनाएं हैं। हर इंसान इनकी कल्पना भी करता है, नाना रुपों में पाने की चेष्टा करता है, लेकिन जीवन की सही समझ के अभाव में वह दिशा भटक जाता है और ये संभावनाएं अधूरी ही रह जाती हैं। जिस संतुष्टि, स्वतंत्रता व आनन्द की कल्पना मनुष्य बाहरी सम्पदा, मोह ममता और सत्ता सुख में करता है, वे भी अंततः मृग मारिचिका बनकर पहुँच से दूर हो जाती हैं और जीवन के अंतिम पलों में हाथ कुछ लगता नहीं। बिना किसी सार्थक निष्कर्ष के मानव जीवन के इस अवसान को एक दुर्घटना ही कहा जाएगा।

भारतीय परम्परा में मनुष्य जीवन को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ उपहार गया है और इसे सुलदुर्लभ कहा गया है। देवता भी मनुष्य शरीर को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं, क्योंकि इसी में वे संभावनाएं मौजूद हैं, जो आत्मतत्व को जाग्रत करते हुए सकल मानवीय सीमाओं एवं दुःख को तिरोहत कर सके और जीव से शिव, नर से नारायण की यात्रा सम्पन्न करते हुए अंततः परमात्मा के प्रतिरुप आत्म-स्वरुप को प्राप्त कर सके।

भारतीय परम्परा में जीवन का मूल्य बाहरी उपलब्धियों, धन-दौलत व पद प्रतिष्ठा आदि में कभी नहीं रहा है, ये सेवा के लिए जीवन के सहज अवलम्बन हो सकते हैं, जीवन उद्देश्य नहीं। क्योंकि यदि इनके रहते भी व्यक्ति अशांत, असंतुष्ट, हैरान-परेशान और जीवन के आनन्द से वंचित है, तो यह घाटे का सौदा माना जाएगा। आश्चर्य नहीं कि बुद्ध भगवान से लेकर महावीर, नानक, कवीर एवं महर्षि रमण जैसे ऋषितुल्य शिखर पुरुष शांति, आनन्द व धन्यता की खोज में  किसी बाहरी सुख, सुविधा व सत्ता आदि के मोहताज नहीं रहे, बल्कि इन सबका त्याग करते हुए जीवन के परमलाभ को प्राप्त हुए और आज भी प्रेरणा के प्रकाशपुंज बनकर जीवन जीने का कालजयी संदेश दे रहे हैं।

इन सबका एक ही संदेश रहा कि जीवन की असली सम्पदा इंसान के अंदर कस्तुरी मृग की भाँति छिपी पड़ी है। भ्रम की मारीचिका के कारण वह इसे बाहर ढूंढता फिर रहा है। वासना, त्रिष्णा और अहंता के नागपाश में बंधकर वह जीवन की सुख-संतुष्टि की तलाश बाहर खोजने के लिए प्रेरित हो रहा है, लेकिन उसका हर प्रय़ास चूक जाता है और अंततः जब समय आता है तो काफी देर हो चुकी होती है। समय रहते इसकी समझ व अंतर्दृष्टि विकसित की होती, तो हाथ में कुछ सार्थक लगता, जिसकी वह चिरकाल से प्रतीक्षा कर रहा था।

लकड़हारे की कहानी प्रख्यात है कि उसे राजा द्वारा उसके उपकार के लिए उपहार के रुप में एक चंदन का जंगल भेंट में मिलता है। राजा को आशा थी कि अब उसकी गरीबी दूर हो जाएगी और वह एक खुशहाल जीवन जीएगा। लकड़हारा इस वन से पेड़ काटकर, इसका कोयला बनाता और पास के शहर में जाकर बेच आता। यह सिलसिला कई माह वर्ष तक चलता रहा। और वह अपनी झोंपड़ी में इससे मिलने बाली धनराशि से गुजर बसर करता रहा।

जब एक दिन राजा जंगल में शिकार करते हुए वहाँ से गुजरता है तो आश्चर्यचकित होता है कि लकड़हारा उसी झोंपड़ी में रह रहा है, जबकि उसे उम्मीद थी कि वह अब तक सम्पन्न हो गया होगा। अब वहाँ कुछ पेड़ बचे थे। राजा ने पूरा हाल-चाल पूछा तो माथा थोककर रह गया। और लकड़हारे को समझाया कि यह चंदन का पेड़ है, जिसका एक पेड़ भी इसकी दरिद्रता को दूर करने के लिए पर्याप्त था। लकड़हारा अपनी मूर्खता पर पछताता है और बचे वृक्षों का सदुपयोग करते हुए शेष जीवन को सम्पन्नता एवं धन्यता के साथ गुजारता है।

यही कहानी हर इंसान की है, जिसे ईश्वर ने वे सारी क्षमताएं, विभूतियाँ बीज रुप में प्रदान की हैं - एक स्वस्थ-सबल काया, कम्प्यूटर से भी तेज चलने बाला मस्तिष्क, वायु से भी तीव्र मन, किसी भी समस्या को भेदने में सक्षम बुद्धि, प्रेरणा की अजस्र स्रोत भावनाएं, अस्तित्व के हर रहस्य को भेदने में सक्षम अंतर्प्रज्ञा, किसी भी कल्पना को मूर्त करने में सक्षम इच्छा शक्ति। औऱ साथ में समय के रुप में सबको चौबीस घंटे, जिनका सदुपयोग करते हुए वह अपनी मनचाही सृष्टि का सृजन कर सकता है। और अपने देवत्व, ईश्वरत्व को चैतन्य करते हुए इस जीवन को धन्य एवं सफल सार्थक कर सकता है।

देर इनके प्रति जागने भर की है, नित्य अपने अंतर मन में झांकने की है, आत्मनिरीक्षण करते हुए इसमें बाधक आंतरिक एवं बाह्य तत्वों को पहचान कर दूर करने भर की है। नित्य स्वाध्याय सतसंग एवं आत्मचिंतन-मनन के प्रकाश में प्राप्त अंतर्दृष्टि के आधार पर वह इसे सहजता से कर सकता है और जीवन शैली में आवश्यक परिवर्तन करते हुए, व्यक्तित्व में अभीष्ट पात्रता विकास के साथ जीवन को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है और इस सुरदुर्लभ मानव जीवन को सफल सार्थक बना सकता है।

 

शुक्रवार, 29 मई 2026

जीवनबोध

बिना मूल्य चुकाए, कुछ बड़ा हासिल न कर पाने की हताशा

जीवन में नीचे गिरना सहज-स्वाभाविक है, इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। चारों ओर का प्रवाह भी इसमें सहायक है, लेकिन ऊपर उठना कठिन है, समय साध्य, कष्ट साध्य है। इसलिए आश्चर्य़ नहीं कि कम ही लोग ऊपर उठ पाते हैं, श्रेय पथ पर चल पाते हैं। अधिकांश लोग पगडंडियों का सहारा लेते हैं, शॉर्टकट से बिना अधिक श्रम किए, बिना मूल्य चुकाए सस्ते में, हो सके तो मुफ्त में ही कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं, जो अन्त में एक भूल निकलती है और हाथ में हताशा-निराशा के अलावा कुछ लगता नहीं।

माना कि ऊपर उठना सहज नहीं, यह अनुशासन की माँग करता है, तप की तपन से गुजरना माँगता है, श्रम एवं पुरुषार्थ के श्वेत बिंदुंओं का श्रृंगार करना पड़ता है। लेकिन यही यही जीवन निर्माण का राजमार्ग है, चरित्र गठन की प्रक्रिया है, यही मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाला शाश्वत मार्ग है और यही पूर्णता की ओर ले जाता मुक्ति पथ भी। इसलिए समझदार लोग इसका सहर्ष वरण करते हैं और इसके लिए आवश्यक मूल्य चुकाने के लिए सदा तैयार रहते हैं।

नैतिकता का वरण क्यों करें

अच्छे क्यों बनें, नैतिक क्यों बनें, प्रश्न सहज ही मन में उठ सकता है, जीवन के पड़ाव पर कई बार कौंधता है। इसके कई उत्तर हो सकते हैं। लेकिन इसका सीधा सपाट उत्तर तो एक ही है कि जीवन की जो संभावनाएं बीज रुप में जीवात्मा में विद्यमान हैं, जो परामात्मा का अंश होने के नाते ईश्वरतुल्य हैं, नैतिकता इनके साकार होने का प्रवेश बिंदु है।

नैतिकता का वरण करते हुए मनुष्य नर पिशाच की असुरता से नर पशु की ओर ऊपर उठता है। फिर मानवीय संवेदना को धारण करता हुआ नर मानव की गरिमा को प्राप्त होता है। और फिर अपनी मानवीय दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करते हुए महामानव की श्रेणी में खड़ा होता है और फिर अपनी क्षुद्रताओं का तिरोधान करते हुए, अंतर्निहित देवत्व के जागरण के साथ देवमानव बनता है। इस तरह नर से नारायण, जीव से शिव बनने की प्रक्रिया नैतिकता, चरित्र निर्माण के आधार पर घटित होती है और जीवन की चरम संभावनाओं का द्वार खुलता है।

बिना नैतिकता के इंसान को पशु बनते देर नहीं लगती, इससे भी नीचे गिरते हुए आसुरी एवं पैशाचिक कृत्यों के साथ उच्चतर संभावनाओं के सत्यनाश की आत्मघाती दुर्घटना के साथ घटित हो सकती है। इस तरह नैतिकता को अपनाना किसी दूसरे पर उपकार या कोई अहसान नहीं, बल्कि यह स्वयं के प्रति ही उपकार है, स्वयं के जीवन की सुख, शांति और सद्गति का आधार है।

भाग्य एवं पुण्य का खेल

पुरुषार्थ अपनी जगह, लेकिन भाग्य एवं पुण्य की भूमिका को नकार नहीं सकते। यदि कोई गलत व्यक्ति फल-फूल रहा है, तो समझो कि यह उसके वर्तमान कर्मों का फल नहीं है, वह अपने पूर्व के संचित शुभ कर्मों या पुण्यों का फल है अर्थात वह अपने भाग्य का फल भोग रहा है। अतः जब तक यह पुण्य प्रबल रहता है, तब तक नाम यश, धन, सुख, लोक सम्मान, मानवीय प्यार आदि सर्वसुलभ एवं सहज प्रतीत होते हैं। लगता है कि ये तो जैसे अपने जन्मसिद्ध अधिकार हैं और व्यक्ति तप एव पुण्य के प्रति उदासीन हो जाता है।

ऐसे में आश्चर्य नही कि व्यक्ति भोगों की आँधी और अहं की मदहोशी में भूल-चूकों के साथ पाप वृत्तियों में मश्गूल हो जाता है। क्रमशः पुण्य क्षीण होने लगते हैं और इसी के साथ अर्जित नाम, यश, स्वास्थ्य, सुख, ऐश्वर्य भी सब क्षीण पड़ने लगते हैं और इसके साथ तथाकथ सब अपने भी छिटकने लगते हैं। जैसे कंगाल व्यक्ति फिर बाजार से कुछ खरीद नहीं सकता, यही स्थिति पुण्यहीन व्यक्ति की होती है। संसार में फिर कुछ हाथ नहीं लगता, सब बेगाना सा हो जाता है। जो पहले दुआ-सलाम करते थे, आगे पीछे घूमते थे, वे अब पूछते तक नहीं, राह में मिलते हैं, तो मुंह फेर लेते हैं।

यदि व्यक्ति समझदार है, तो जगत के ऐसे तत्वबोध के साथ आत्म-बोध के पथ पर अग्रसर हो जाता है और अध्यात्म मार्ग का पथिक बन जाता है। जीवन के प्रति सजग हो जाता है और ईश्वर का अवलम्बन लेकर निर्बल के बल प्रभुश्रीराम (समर्थ ईष्ट-आदर्श) की शरण में जाता है और जीवन के नवनिर्माण की नूतन पटकथा लिखता है।

जीवन में दुःख-कष्ट-पीड़ा का औचित्य

जीवन में दुःख, कष्ट, पीड़ा क्यों मिलते हैं, ईश्वर की बनाई इस सृष्टि में बुरे, धूर्त एवं दुष्ट लोग क्यों हैं। ये प्रश्न यदा-कदा कौंध सकते हैं, जब इनके अवांछनीय प्रवाह के बीच अनावश्यक पीड़ा, कष्ट एवं दुःख से गुजरना पड़ता है।

मानकर चलें कि ईश्वर की कर्मप्रधान सृष्टि में यह अनायास नहीं होता। यदि कोई इन परिस्थितियों से गुजरने के लिए विवश-बाध्य अनुभव कर रहा है तो शांत मनःस्थिति में स्पष्ट होगा कि ये सब प्रकृति माँ कहो या परमपिता परमेश्वर के उपहार हैं। हालाँकि तत्काल इनके औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है, इनके लाभ एवं निहितार्थ को जानना-पहचानना कठिन होता है, लेकिन दीर्घकाल में स्पष्ट होता है कि जीवन यदि इन अग्नि परीक्षाओं से न गुजरा होता तो, वह तप कर कुंदन नहीं बनता।

और यह भी स्पष्ट होता है कि स्वर्ग का रास्ता नरक से होकर गुजरता है, शांति का मार्ग अशाँति के विप्लवी दौर से होकर ही पूर्णता को पाता है। असत से सत, अंधकार से प्रकाश, मृत्यु से अमृत अर्थात शाश्वत जीवन की यात्रा इसी आधार पर घटित होती है। अनन्त धैर्य, अपार श्रद्धा और अनवरत प्रयास ही इस मार्ग के पाथेय हैं। न ही यहाँ कोई शॉर्ट कट हैं और न ही किसी दूसरे के कंधे पर सवार होकर इसे पार किया जा सकता है।

चुनींदी पोस्ट

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