वीहड़ वन में फुआल बन घूमने की अधूरी तम्न्ना
इस यात्रा में आते-जाते लाहौल-स्पीति के ठंडे
रेगिस्तान के दर्शन हुए, बीच-बीच में घास के टापुओं और घाटी-मैदानों को भी देखे।
लगा हमारे पूर्वज फुआल, यहीं कहीं भेड़ों को लेकर आते रहे होंगे। यहाँ के विकट
जीवन को देखकर ताज्जुक किए कि कैसे वे अपने साथ महीनों का राश्न लेकर यहाँ पहुँचते
रहे होंगे, जहाँ रुकने के लिए सही ढंग का ठिकाना भी नहीं है।
नानाजी कहा करते थे कि वहाँ पत्थरों को एक के
ऊपर एक सटाकर दिवार व छत्त बनाकर रहने लायक गुफानुमा बसेरे तैयार होते, जिससे
बारिश में उनकी कुछ रक्षा हो पाती। लेकिन भेड़-बकरियों के लिए ऐसी सुरक्षा व छत्त
अधिकाँशतः उपलब्ध नहीं रह पाती और वे खुले आसमान के नीचे ही रात बिताने के लिए
विवश रहती। कल्पना करना कठिन है कि बारिश व ठंड में वे किस तरह यहाँ दिन व रात
गुजारती रही होंगी। हालाँकि ईश्वर ने उन्हें गर्म ऊन का एक मोटा सा जैकेट अवश्य
दिया है, जो इन विकट परिस्थितियों में ठंड से उनकी रक्षा करता है। यह ऊन फुआलों के
लिए भी वरदान से कम नहीं होती। वर्ष में
अमूनन दो बार वे इसको काटकर इसको बेचते हैं और कुछ ऊन से अपने व परिवारजनों के लिए
कोट से लेकर कम्बल तैयार करते हैं।
मालूम हो कि फुआल परम्परा से भेड़ की ऊन से
मोटे कम्बल (दोहड़ू) तैयार करते रहे हैं, जो बारिश के बीच जंगलों में उनके क्वच का
काम करते और बकरी के रेशेदार ऊन से बने ऑवरकोट (कुंठ) वाटरप्रूफ जैकेट का काम
करते। साथ ही जंगल में इनसे मजबूत बिछावन (सेला) की व्यवस्था हो जाती। आज तो टैंट
से लेकर आधुनिक सुविधाओं की व्यवस्था है, लेकिन हमारे पूर्वज फुआल इन सुविधाओं से
वंचित थे। यहाँ भी कल्पना करना कठिन है कि किस तरह वे बिना तरपाल या तंबू के पेड़
के नीचे प्रकृति के विषम प्रहारों को झेलते रहे होंगे। आश्चर्य नहीं कि फुआलों को
एक काठी जात (रफ-टफ) माना जाता है, जो फौलादी तन-मन व जीवनट के साथ हर तरह की
परिस्थितियों में सरवाइव करना जानते हैं। उनके साथ होता है परम्परा एवं नैसर्ग से
मिला आंतरिक जीवट और स्वतःस्फुर्त आत्म-विश्वास तथा साथ में प्रकृति की
अधिष्ठात्री महाशक्ति और पशुपतिनाथ भोलेनाथ का भरोसा। जिसके चलते इनका चूल्हा भी
धुनि का रुप लिए होता है।
लाहौल में तो नानाजी कहा करते थे कि खाना
बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ियाँ भी मिलना कठिन हो जाती थी। इस ठंडे रेगिस्तान में
कुछ इलाकों में बैठर (सुगंधित देवदार की छोटी प्रजाति, जिसकी सूखी पत्तियों को
देवकार्यों में धूप-अग्रवती के रुप में उपयुक्त किया जाता है) की सूखी झाड़ियों से
काम चलाते या भेड़ों की मिंगणियों को सुखाकर इनका इंधन के रुप में उपयोग करते। यदि
कहीं दूरस्थ गाँव वासियों के मवेशी यहाँ चरते तो उनके गौवर के उपले ईंधन में काम
आते।
वीहड़ वनों में आग सुलगाने की पारम्परिक
व्यवस्था भी विशिष्ट रहती। हम स्वयं नानाजी को मुलायम बाचा घास से आग जलाते देखे हैं।
जिसमें वे चकमक सफेद पत्थर के ऊपर लौहे की साज (छोटी हथोड़ी) का त्वरित प्रहार
करते, जिसके घर्षण के साथ चिंगारियाँ निकलती और बाचा घास आग पकड़ लेती। इससे वे
अपनी चिल्म जलाते थे और चूल्हे की आग भी प्रज्जवलित होती।
देवदार के जंगलों में तो आग जलाने के लिए शोली
(विरोजायुक्त देवदार की लकड़ी, जो माचिस से तुरन्त आग पकड़ लेती है) भी रहती। आज
तो लाइटर से लेकर तमाम विकल्प उपलब्ध हैं। कह सकते हैं कि आधुनिक टेक्नोलॉजी के
साथ फुआल लोगों के जीवन को थोड़ा राहत आवश्य मिली है। मोवाइल फोन आने से वे अपने घर-परिवार
से संपर्क में भी रहते हैं, हालाँकि नेटवर्क हर जगह उपलब्ध नहीं रहता। कुछ विशेष
ऊँचे स्थानों पर आकर ही वे संपर्क साध सकते हैं। जबकि पहले महीनों घर की कोई खबर
नहीं रहती। जंगल में तो किसी तरह की डाक सुविधा भी नहीं थी। घर-परिवार के सुख-दुःख
में भाग लेने के लिए उन्हें दिनों-सप्ताह लग जाते। कल्पना कर सकते हैं कि फुआल जीवन
तब कितना त्याग, तप और कठिनाई भरा रहा होगा।
प्रायः डेरा जलस्रोत के पास ही रहता, सो यहाँ
का जड़ी-बूटियों से युक्त (चार्ज्ड) प्राकृतिक जल किसी वरदान से कम नहीं होता। जो
एक ओर जहाँ पाचन को दुरुस्त रखता, वहीं छोटे-मोटे रोगों की भी दवा का काम करता।
हालाँकि ऊँचाइयों में तो ग्लेशियर से आता जल ही नसीव होता। इस जमाने वाले ठंडे जल
में नित्य स्नान संभव नहीं था, सो इसका भी मुहुर्त निकलता।
गर्मी व बारिश में नानाजी लोग लाहौल जाते, तो
सर्दी में नीचे मंडी-सलापड़ की ओर कूच करते। बचपन में जब हम पुश्तैनी मकान की
खिड़की के पास बैठते तो वहाँ से मंडी साइड के पहाड़ दिखाई देते। इसके साथ नानाजी
के रोमाँचक किस्सों के संग हम कल्पना की उड़ान भर कर वहाँ की भाव यात्रा करते।
मंडी साइड से ही वे तेजपत्र के जंगल की बात करते और घर में उनके लाए सूखे तेजपत्र
मसाले के रुप में पर्व-त्यौहारों के व्यंजनों में उपयुक्त होते।
यहाँ पर यह भी स्पष्ट कर दूँ कि हमारे जंगलों
में, राह में कुछ ऐसे विशेष स्थान भी हैं, जिन्हें रुआड़ (चट्टान से बनी प्राकृतिक
गुफाएं) कहते हैं, जिनकी आड़ में भेड़-बकरियाँ बारिश व बर्फवारी में
सुरक्षित-संरक्षित रहती हैं। फिर देवदार से लेकर रई-तौस व जंगली खनोर (चेस्टनट) के
गगनचुम्बी वृक्षों के नीचे भी उनके लिए सिर छुपाने की जगह मिल जाती।
फिर जंगल में भालू से लेकर गुलदार एवं शंकू जैसे
खुंखार जानवरों का भी खत्तरा रहता, जो रात को आकर कभी भी झुंड़ पर हमला कर नुकसान
पहुँचा सकते हैं। ऐसे में हालाँकि रात को पहाड़ी कुत्ते सजग एवं नैष्ठिक पहरेदार
की भाँति पहरा देते और स्वयं फुआल भी विशेष परिस्थितियों में रात भर नींद के बीच
भी जागते हुए रखवाली करते। नानाजी ऐसी भिड़ंत के लोमहर्षक किस्से सुनाते, कैसे वे
भालू आने पर पेड़ पर चढ़ गए थे, और भालू पीछा कर रहा था तो ऊपर से उसकी नाक पर लात
मारकर और पेड़ को हिलाकर उसे भगा दिए थे।
यहाँ यह भी बता दें कि नानाजी बहुत ही निडर
और दिलेर किस्म के व्यक्ति थे। उन्हें कई मन्त्र सिद्ध थे और उन्होंने शमशान में
साधना कर ये मंत्र सिद्ध किए थे। साँपों को चुटकी में वश करना उन्हें आता था और वे
उसे पकड़ कर दूर निर्जन स्थान पर छोड़ देते। मंत्र सिद्धि की शर्त थी कि साँप को
किसी तरह का कोई नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
जंगली पक्षियों से लेकर जीवों के शिकार के
किस्से भी भी वे बड़े उत्साह और संजीदगी से सुनाते। हालाँकि आज हम इस तरह की हिंसक
गतिविधियों के समर्थक नहीं है, लेकिन लोकजीवन में परम्परागत चलन अपनी जगह हैं, जो
इतिहास का हिस्सा बने हुए हैं। आज भी घाटी के प्राचीन मंदिरों में ऐसे दुर्लभ
जीव-जंतुओं के सींग और अवशेष टंगे मिलेंगे, जो कभी जंगलों में विचरण करते रहे
होंगे और आज विलुप्त हैं।
किन परिस्थितियों में यह सब हुआ शोध का विषय
है, लेकिन नानाजी के फुआल जीवन के संग हम उस समुदाय के जीवन के संघर्ष, रोमांच व
कठोर यथार्थ को कुछ-कुछ समझते रहे। चम्बा साइड में यही समुदाय गद्दी के रुप में
विशिष्ट पहचान रखता है, जिसकी अपनी संस्कृति है, परम्परा है और जो अमूनन फुआलों के
उपरोक्त वताए किस्सों से मिलती-जुलती है। वे भी चम्बा से दुर्गम कुगती पास या काली
छो दर्रे को पार कर लाहौल घाटी पहुँचते हैं और तप-त्याग एवं कठोर श्रम भरे भेड़
पालन के पेशे को निभाते हैं।
फुआलों के ऊपर बताए गए कठोर जीवन के साथ उनके
प्रकृति की गोद में अलमस्त व एकांत शांत जीवन की कल्पना भी हमें रोमाँचित करती, कि
काश एक वार हम भी कुछ दिन, सप्ताह या माह उनके साथ रहकर इसको अनुभव करें। आज भी यह
अरमान बाकि हैं। देखते हैं किस तरह प्रकृति-परमेश्वर, आदिशक्ति-भोले बाबा इसकी
व्यवस्था करते हैं और हम फुआल जीवन के फर्स्ट हैंड अनुभव को जी पाते हैं और बीहड़
वन के रफ-टफ एवं रोमाँचक जीवन को सुधी पाठकों तक पहुँचा पाते हैं।





















